जब सुधरते हैं तो सब एक साथ सुधरते हैं

आम तौर पर जब सुधरते हैं तो सब एक साथ सुधरते हैं, सुधरने के रास्ते मैं बाधा यह बात बन जाती है कि अगर किसी एक से मोह बैठ गया हो…आप ऐसे समझ लीजिए कि कोई बहुत बड़ी ट्रेन है, उसके सारे डब्बे आपस में जुड़े हुए हैं| यह सारे डब्बे, ये हमारी दिनचर्या के अलग-अलग भाग हैं या इसको जीवन के अलग-अलग भाग समझ लीजिए| इसीलिए मैंने दिनचर्या सम्बंधित प्रशन किया था| इनको जुड़े ही रहना है इन्हें अलग अलग कर पाने का कोई तरीका नहीं है| इनमे से एक भी डब्बा अगर चलने से इनकार कर दें तो बाकी भी नहीं चल पाएँगे|

मैं इसी बात को थोड़ा और आगे ले जाता हूँ, अगर रेलगाड़ी है और लम्बी रेलगाड़ी है तो उसमे सैकड़ों पहिये होंगे| उनमे से अगर एक पहिया भी चलने से इनकार कर दे तो बाकी भी बहुत दूर नहीं जा पाएँगे, बाकियों पे बहुत ज़ोर पड़ेगा, बड़ा घर्षण हो जाएगा| तो हमारी जो समूची दिनचर्या है उसको आप डब्बे मानियेगा और दिनचर्या के भी सूक्ष्म अंगो को आप डब्बे के पहिये मानियेगा| चलेंगे तो सब साथ चलेंगे| और अगर एक भी अटक रहा है तो या तो पूरी तरह से रोक देगा|या फिर अगर व्यवस्था आगे बढ़ेगी भी तो घिसटकर बढ़ेगी|

एक भी पहिया ऐसा न हो जिसने पटरी से मोह बाँध लिया हो, तादात्मय स्थापित कर लिया हो| कुछ भी जीवन में अगर ऐसा रहता है ना, जहाँ फँस गया आदमी तो वो छोटा सा हिस्सा नहीं फसता, आदमी समूचा का समूचा फंसता है| इतना बड़ा शरीर है,  लेकिन मेरी ये छोटी उंगली भी अगर इस मेज से चिपक गई तो ये उंगली नहीं चिपकी, मैं ही चिपक गया| और अक्सर यही चूक हो जाती है, हम अस्सी प्रतिशत मुक्त हो जाते हैं, हम  पिचान्य्वे प्रतिशत मुक्त हो जाते हैं; यह छोटी उंगली का मेज से मोह नहीं जाता, कुछ ना कुछ रह जाता है जो पकड़े रहता है|



लेख पढ़ें: सुधरेगी तो पूरी ज़िन्दगी या फिर कुछ नहीं

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s