धोखा भावनाओं का

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वक्ता: एक आम दिमाग कैसा होता है? एक आम दिमाग कैलकुलेटिव (गणनात्मक) होता है| तो, जब भी उसे दिखाना होता है कि अब वो कैल्कुलेट (सोच-विचार) नहीं कर रहा है, वो सच्चा है, वो बना-बना के नहीं बोल रहा है, वो जोड़-तोड़ नहीं कर रहा है, तो वो इमोशनल (भावुक) हो जाता है| और हमें ये लगता है कि भावुक होने का मतलब है सच्चा होना| समझ रहे हो बात को? वो ये समझ भी नहीं पाता है कि जब कॉन्शियस (सचेत) मन में गणना होती है तो विचार आता है, और वही चीज़ जब और गहरे से उठती है और, और तगड़ा प्रभाव करती है, तो भावनाएं आ जाती हैं|

तो यहाँ तक तो हमने ठीक समझा कि विचार गणनात्मक है, विचार में बनावट रहती है| विचार कुछ-न-कुछ पाना चाहता है, हासिल करना चाहता है| कोई फायदा देखता है तभी विचार आता है| तो तुमने ये सोचा कि विचार न हो, विचार की जगह कुछ और हो जब भी, तो बात सच्ची होगी| तो तुमने  विचार का विकल्प क्या बना दिया? इमोशनल (भावुक) होना| तो इसीलिए तुम देखोगे कि हमारी आदत पड़ गई है कि जैसे ही कोई रोने लग जाता है हमारे सामने तो हमें क्या लगता है?

श्रोता: सच ही कह रहा होगा|

वक्ता: की सच्चा आदमी है भाई| भावुक है तो सच्चा है| और ये बात हमें बहुत गहरे जा चुकी है ना| तुम दिन-रात टीवी में, फिल्मों में, घरों में, यही तो होता देखते हो|

श्रोता: हम भी कभी-कभी ये अनुभव करते हैं|

वक्ता: और कभी-कभी तुम भी ऐसा ही अनुभव करते हो कि अगर तुम रो पड़े, तो तुम्हें लगता है कि ये तो बड़ी गंभीर बात हो गई, और “मैं सच्चा ही हूँगा|”

श्रोता: कभी आप मज़ाक कर रहे हो किसी के साथ और वो रो पड़े तो लगता है कि अब तो ये सच में बुरा मान गया|

वक्ता: ‘अब तो ये सच में हो गया|’

इसी तरीके से कोई बात, कोई सीधी-साधे तौर पे बोले, ऐसे ही सामान्य, जैसे मैं बोल रहा हूँ, तो तुम्हें उसमें कुछ ख़ास नहीं लगेगा| लेकिन उसी बात को कोई चीख के, चिल्ला के, आँखें लाल करके, मुँह लाल कर के बोल रहा है, तो तुम्हें ये लगता है कि, “भाई, आदमी ईमानदार है| नहीं तो इसे इतना गुस्सा नहीं आ सकता था|” ऐसा होता है या नहीं होता है? फिल्मों में भी देखो ना| अब सनी देओल को जज पे गुस्सा आ रहा है, तो वो चिल्ला के बोलेगा, नाना पाटेकर जल्दी-जल्दी उत्तेजित होकर के बोल रहा है, तो तुमको क्या लगता है? कि ये सच्चा आदमी हैं| यही बात अगर वो थम के, धीरे-धीरे, शान्ति से बोलें तो हमको लागेगा, “नहीं! नहीं! इसमें तो ज़्यादा सच्चाई नहीं होगी शायद|”  ऐसा ही होता है की नहीं होता है?

तो हमने विचार को तो माना की उल्टा-पुल्टा है| पर हमने सच्चा किसको मान लिया? भावनाओं को मान लिया| तो हम करते क्या हैं? तो हम करते ये हैं कि जितनी भी सच्ची चीज़े हैं, जो भी सत्य की बाते हैं, हम उनको भावुक हो करके कहना शुरू कर देते हैं क्योंकि हमने सच्चे का सम्बन्ध ही किससे जोड़ लिया है? हमने सच्चे का सम्बन्ध ही किससे जोड़ लिया है?       

श्रोता: भावनाओं से|

वक्ता: भावनाओं से| पहली बात तो ये समझो कि ये बड़ा नकली सम्बन्ध है| ये जो सम्बन्ध ही है, ये बड़ा झूठा है| ये तुम्हारे सामने जो चीज़ रखी हुई हैं ना, ये जो तुमने दो-तीन पंक्तियाँ लिखी हैं, ये भावुक पंक्तियाँ नहीं हैं| ये बहुत समझदार पंक्तियाँ हैं| ये भावनाएं नहीं हैं- ‘तेरी ये ज़मीं, तेरा आसमान,’ हांलाकि गाया इसको ऐसे ही गया है| जिन्होंने इसको गाया है, उनके गाने में तुम्हें कोई समझ नहीं सुनाई देगी| वो इसको गाते यूँ ही हैं कि जैसे ये बड़ी भावुक होने वाली बात है|

श्रोता: मूवी में है|

वक्ता: मूवी में है| और इस तरह के बहुत हैं कि जहाँ पर बोल प्रोफाउंड (प्रगाढ़) हैं| पर उन्हें गा यूँ दिया जाता है जैसे की वो बातें भावुकतापूर्ण हैं| एक बात तो हमको ये साफ़-साफ़ समझनी होगी आज, जो कहने जा रहा हूँ, “भावुकता की कोई हैसियत नहीं है| भावुकतापूर्ण में कुछ ख़ास नहीं है|” बात समझ में आ रही है?

सतही कंडीशनिंग (अनुकूलन) विचार बनके सामने आती है, और गहरी कंडीशनिंग, भावना के रूप में सामने आती है| हलकी – फुलकी अशांति विचार कहलाती है| और जब अशांति बहुत गहरी हो जाए, शरीर को भी गिरफ्त में ले-ले, तो वो भावनाएँ कहलाती है|

श्रोता: सर, लेकिन जॉय (आनंद) भी तो एक भावना है|

वक्ता: जॉय (आनंद) भावना नहीं है| बिलकुल भी नहीं है|

श्रोता: सर, ये जो आप बोल रहे हैं कि भावनाओं में कुछ ख़ास नहीं है, वो कभी-कभार मुझे उदास कर देता है| जैसे आप अभी कुछ बोल रहे हो, तो वो एक गुस्सा आता है, जो भरा होता है| तो उस वक़्त…

वक्ता: वो सच्चा नहीं होता| बात को बिलकुल ध्यान से समझना| जब तुम विचार में कपट करते हो, तब तुमको पता होता है कि तुम कपट कर रहे हो| जब तुम विचार में ये सब करते हो, तो तुमको पता होता है कि तुम ये सब कर रहे हो| जब तुम्हारे साथ भावनाओं में ये सब हो रहा होता है तो तुमको पता भी नहीं होता है कि तुम कपट कर रहे हो|   

दो भीड़ हैं| दंगा चल रहा है, वो लड़ रहे हैं आपस में| दोनों पूरे भावुक हैं, जो दंगे के लोग हैं| उनको पता भी नहीं है कि वो बनावटी हैं| उस वक़्त उन्हें बहुत गुस्सा है और वो जान दे देंगे, “जय श्री राम,” “अल्लाह-हू-अकबर”| उनको पता भी नहीं है कि वो बनावटी हैं| तो भावनाएँ विचार से भी ज़्यादा संकटपूर्ण हैं| क्योंकि विचार में कम से कम ये गुंजाईश है कि तुम्हें पता है कि तुम बनावटी हो और कंडीशंड हो| भावनाओं में तुम्हें पता भी नहीं चलता है कि तुम कितने गहरे शिकार हो कंडीशनिंग के|

भावुक बन्दा, चूँकि उसे पता नहीं होता है कि वो बनावटी है, इसीलिए उसको ये लगता है कि वो सही है| उसको लगने दो| तुम ऐसा मत सोच लेना कि कोई तुम्हारे सामने भावुक हो गया और तुम्हें ये लगे कि ये तो साफ़ आदमी है| उसका बनावटीपन बहुत गहरा  है पर उसको पता भी नहीं है|

श्रोता: सर, उसको पता भी नहीं है कि वो बनावटी है?

वक्ता: नहीं पता| पता से अर्थ ये है कि वो इस बात को सोच नहीं पा रहा|

श्रोता: फ्यूज़ है अभी उसका मन|

वक्ता: उसका सोचना फ्यूज़ है| वृत्तियाँ सक्रिय हैं, मन नहीं रुक गया है|

श्रोता: लेकिन वो जागरूक नहीं है|

वक्ता: वो सोच नहीं रहा है|

श्रोता: पर हमने क्या मान लिया है कि जैसे पत्थर है, उसके अंदर भावनाएँ नहीं हैं, हमने उसे निर्जीव बोल दिया है|

वक्ता: भावनाओं का तुम्हारे जीवित और निर्जीव रहने से कोई मतलब नहीं है| ये सब जो पट्टी पढ़ ली है ना कि भावनाओं से आदमी, आदमी बनता है, बहुत बेवकूफी की बात है| आदमी, आदमी भावनाओं से नहीं बनता| आदमी, आदमी बनता है बोध से, समझ से| ठीक है|

श्रोता: भावनाएँ तो कंडीशंड ही हैं ना?

वक्ता: भावनाएँ पूरी तरह कंडीशंड हैं| भावनाएँ बहुत गहरी कंडीशनिंग  हैं|

विचार जितनी बड़ी कंडीशनिंग है, भावनाएं उससे ज़्यादा बड़ी  कंडीशनिंग है|

श्रोता: सर ये अस्वभाविक नहीं होगा कि आप कुछ भावनाएँ दिखा ही नहीं पा रहे?

वक्ता: तुम भावुक न रहो, इसका अर्थ ये नहीं है कि तुम कुछ नहीं रहे|

श्रोता: संवेदनशीलता बढ़ती जाएगी|

वक्ता: समझ रहे हो? जिसने भावनाओं से मुक्ति पा ली, जिसने भावनाओं को महत्व देना कम कर दिया, उस आदमी ने एक बड़ी लड़ाई जीत ली| इस चक्कर में कभी मत पड़ना कि कोई तुमसे बोले कि तुम मेरी भावनाओं की इज्ज़त नहीं करते, तुम मेरी भावनाओं की परवाह नहीं करते| और तुमने कहा कि हाँ, बात तो सही है, मुझे भावनाओं की कद्र करनी चाहिए|

तुम्हारी भावनाएँ  क्या हैं? क्या तुमने कभी ये देखा कि भावनाएँ कहाँ से आती हैं? बहुत सीधी सी बात नहीं है क्या ये?

श्रोता: दिमाग से|

वक्ता: और दिमाग में कुछ भी कहाँ से आता है? 

श्रोता: बाहर से|

वक्ता: और तुम किसी को ये बोल दो कि मैं तुम्हारे विचोरों की परवाह नहीं करता, तो उसको कम बुरा लगेगा| पर उसको ये बोल दो कि मैं तुम्हारी भावनाओं की प्रवाह नहीं करता| तो उसको बहुत ज़्यादा बुरा लग जाएगा| क्योंकि लोगों को ये लगता है कि भावनाओं में कुछ ख़ास है| लोगों को ये लगता है कि भावनाएं तो सच्ची होती हैं|

श्रोता: ‘उनमें एक गुण होता है जो गहरी होती है|’

वक्ता: गहरी होती है| ‘तो कुछ भी करना किसी की भावनाओं को ठोस मत पहुँचाना|’ उसी बात को ऐसे भी कहा जाता है कि- ‘किसी का दिल मत तोड़ना, किसी का दिल मत दुखाओ|’

श्रोता: ‘कुछ भी करो पर किसी का दिल मत दुखाओ|’

वक्ता: और ये बहुत बड़ी मूर्खतापूर्ण बात है|

विचार और भावनाओं के बीच की दीवार बड़ी हलकी है| सच तो ये है, अगर तुम ध्यान से देखो कि जहाँ विचार है, वहीं भावनाएँ हैं| बस विचार जब तक हलका है, भावनाओं का पता नहीं चलता| विचार जैसे-जैसे तगड़ा होता जाता है ना , फिर तुम्हें भावनाएँ पता लगनी शुरू हो जाती हैं|

तुम भावनाएँ किसे बोलते हो?

कब कहते हो कि भावुक हो रहा हूँ?

तुम्हें कैसे पता चलता है कि तुम भावुक हो?

श्रोता: जब आपके मन कि स्तिथि एक प्रकार के व्यवहार में हो जाता है| जैसे आप गुस्सा हो जाओगे, आक्रामक हो जाओगे..

वक्ता: आक्रामक हो जाओगे, कैसे पता चलता है?

श्रोता: कि आप चीज़े फेंक रहे हो और आपके अन्दर क्रोध है|

वक्ता: शरीर का कोई कर्म है?

श्रोता: हाँ|

वक्ता: तुम भावुक हो, तुम्हें कैसे पता चलता है?

श्रोता: हमें, अपना?

वक्ता: अपना भी कैसे पता चलता है कि अब मैं भावुक हो रहा हूँ?

श्रोता: अपने ऊपर संयम नहीं रहता|

वक्ता: वो कैसे पता चलता है? क्या होने लगता है?

श्रोता: सर जब शरीर काबू से बाहर होने लग जाता है|

वक्ता: शरीर|

भावुकता कुछ नहीं है| जब विचार का असर शरीर पर दिखने लगे, तब उसे भावुकता कहते हैं| तो भावना क्या है? भावना, विचार ही है जो अब  दिखाई दे रहा है क्योंकि शरीर हिलने लग गया है, आँसू गिरने लग गए हैं, चेहरा लाल होने लग गया है| जब शरीर भी विचार का शिकार हो जाए, तो उस स्तिथि को क्या कहते हैं? भावना| उसमें कुछ ख़ास नहीं है| ख़ास क्या नहीं है, वो तो बल्कि विचार से भी ज़्यादा गिरी हुई हालत है|

श्रोता: सर, गुस्सा और भावनाएँ  एक जैसे प्रकृति के ही तो हैं ना? गुस्से में भी आपको नहीं पता कि आप क्या कर रहे हो और भावनाओं में भी नहीं पता कि आप क्या कर रहे हो?

वक्ता: किसी भी भावना में आपको कुछ नहीं पता बेटा|

श्रोता: गुस्सा भी तो भावना ही है ना?

वक्ता: किसी भी भावना में कुछ नहीं पता होगा| इस बात को जितना अभ्यास लगे, करो| अगर मैं आज का सत्र अभी भी रोक दूँ ना, तो समझ लो कि पूरा हो गया| ये इतनी महत्वपूर्ण बात है कि जीवन से ये धारणा निकाल दो कि जज़बातों में कुछ रखा है| ये जो सारी बातें होती हैं न भावना, जज़बा, भाव, इसको बिलकुल…

श्रोता: सर ये ऐसा ही है कि उस दिन हमने साइलेंस (मौन) वाली की थी एक्टिविटी| उस वक्त में न अमैं खुश थी, न मैं दुखी थी, बस…

वक्ता: पर फिर भी थी|

श्रोता: थी|

वक्ता: और कुछ भी बुरा नहीं था|

श्रोता: कुछ बुरा नहीं था|

वक्ता: एक आम आदमी की ज़िन्दगी सिर्फ भावनाओं पर चलती हैं| और वो भावनाओं के लिए ही जीता है|

श्रोता:  सर, ‘मज़ा’ भी एक भावना है?

वक्ता: और क्या है?

सारा खेल बेटा, मन और शरीर का है| विचार, भावना है, भावना, विचार है| दोनों में कोई अंतर नहीं है| बस एक हल्का है, एक भारी है| चीज़ एक ही है| एक ही एक्सिस पर हैं वो| मात्रा का अंतर है|

श्रोता: बस वही है कि जब आपके विचार आप पर भरी पड़ जाते हैं, तो वो भावनाएँ बन जाते हैं|

वक्ता: हाँ| और हर विचार आप पे भारी होता है| बस मात्रा का अंतर है|

श्रोता: इसीलिए कई बार बिना मतलब के ही दुखी हो जाते हैं| कुछ पता नहीं होता,..तो विचार ही काम कर रहा है|

वक्ता: तुम मुझसे बहस करो, तो पहले सिर्फ तर्क-वितर्क होंगे, फिर चिड़चिड़ाहट होगी, और एक ही चीज़ चल रही है -बहस| पहले क्या? सिर्फ बहस है| उसको तुम बोलोगे- ‘यह तो विचारों का आदान-प्रदान है|’ उससे चिड़चिड़ाहट होगी| फिर भाव उठेंगे| उसके बाद चप्पल चलती है|

(श्रोतागण हँसते हुए)

श्रोता: सर, इमोशन (भाव) आया कहाँ से?

वक्ता: वो कहीं से आया नहीं| वो पहले से ही था|

बस जब विचार आगे बढ़ गया, तो इमोशन (भाव) दिखाई देने लग गई|

श्रोता: सर, तो ये विचारों का आदान-प्रदान भी…

वक्ता: हाँ! वो भी कुछ नहीं था|

श्रोता: चिड़चिड़ाहट होना मतलब गुस्सा आ गया|

वक्ता: हाँ! क्योंकि विचार जहाँ है, वहाँ तो गुस्सा आएगा ही ना | विचार का तो मतलब ही है कि मेरा अपना एक दायरा है|

श्रोता: तो तर्क भी हमारे विचार ही हैं|

वक्ता: हमेशा| बस ये है कि जब तक जूता नहीं चल रहा तो तुम उसको क्या बोल देते हो? “विचारों का आदान-प्रदान|” तुम्हें ये समझ ही नहीं आता कि इसी चीज़ को आधे घंटे और चलने दूँ, तो जूता चल जाएगा|

दूसरों की भावनाओं को बहुत महत्व न दो, उससे पहले ज़रूरी है कि अपनी भावनाओं को महत्व न दो| और ये ख़ास तौर पे सबके लिए होता है पर लड़कियाँ  क्योंकि रोती ज़्यादा जल्दी हैं, इसलिए तुम दोनों से बोल रहा हूँ-कभी आँसू आ जाए ना, तो अपने आपको ही ये मत बोला करो कि बहुत गंभीर चीज़ हो गई|

तो इसमें एक तरह से कहो कि अभ्यास डालो, अभ्यास करो| मैंने अभ्यास पहले भी बोला था| तो अब जब भी ऐसा होगा, तो मैं अपने आप को यही बोलूंगी, “कोई बड़ी बात थोड़ी ही हो गई|”

 “कोई बड़ी बात थोड़ी ही हो गई| इतनी चीजें दिन भर में होती है, एक चीज़ और हो गई| थोडा सा रो लिए|”

याद रखना मैं रोने की बुराई नहीं कर रहा हूँ| आँसू दूसरे तरह के भी होते हैं और वो बड़े प्यारे भी होते हैं| मैं (इमोशन) भावनाओं की बात कर रहा हूँ| अब मैं तुमसे एक बात बोलने जा रहा हूँ, तुम्हें सुनने में अजीब लगेगी| मैं कह रहा हूँ बिना भावनाओं के भी रोया जा सकता है और वो बहुत प्यारा रोना होता है|

श्रोता: वो फिर ख़ुशी के आँसू होते हैं|

वक्ता: बिना ख़ुशी के भी, बिना दुःख के भी  होतेआँसू हैं| और वो बहुत प्यारे होते हैं| पर वो बहुत दूर की बात है| अभी उसको छोड़ो| अभी तो मैं उन आंसुओं की बात कर रहा हूँ, जो रोज़-मर्रा के हैं| कि किसी ने गाली दे दी और हम कुछ कर नहीं सकते और हमें रोना आ गया| होता है न मज़बूरी के आँसू – कि कोई आपके साथ कुछ कर रहा है, और आप कुछ कर नहीं सकते, तो आप रो ही पड़े| ये होता है की नहीं?

इसी तरीके से अपने गुस्से को भी गंभीरता से लेना छोड़ो| गुस्सा बढ़ता ही इसीलिए है क्योंकी हमने उसको बड़ी महत्वपूर्ण बात मान रखा है| हमें सिखा ही दिया ये गया है|

श्रोता: जी सर| वास्तव में यही बात है|

वक्ता: कि जैसे गुस्सा कोई बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ है और जो बात तुम गुस्से में बोलोगे, वो बात तो सच्ची होगी ही होगी|

श्रोता: सर, गुस्से में हमारे विचार ही बाहर आ रहे होते हैं|

वक्ता: असलियत बाहर आ रही है| मैं दोहरा के बोल रहा हूँ, “गुस्से में कुछ सच्चा नहीं होता|”

श्रोता:  सर, गुस्से के वक़्त तो विचार चलते ही नहीं|

वक्ता: होते भी हैं कई बार| कई बार क्या होता है न कि गुस्से में लोग ऐसी बातें बोल जाते हैं जो आम तौर पर नहीं बोलते| तुमने कुछ दबा रखा है  (मन में),” मुझे तुमसे बड़ी लड़ाई है| मुझे बड़ी नफरत है तुमसे, खुंदक है|” अब ये मैं आम तौर पे बोल नहीं पता तुमसे| मैं तुमसे डरता हूँ| पर एक दिन मुझे बड़ा गुस्सा आया| मैंने जाके बोल दिया कि तू सोचता क्या है? मैं तुझे बताऊँ कि तू क्या है? तू न एक नम्बर का मक्कार है और तू झूठा आदमी है| ये जो तू नकली होके घूमता है ना , दो रहपट लगाऊंगा, सही हो जाएगा|” ये बात मैं आम तौर पे नहीं बोल पाता,  पर मैं गुस्से में बोल दूँगा|

तो मुझे क्या लगता है कि मैं गुस्से में?

श्रोता: सच बोलता हूँ|

वक्ता: ये सच-वच नहीं बोल रहे हो|

श्रोता: सप्रेस्ड थॉट (मन में दबा हुआ विचार) है|

वक्ता: क्या है?

श्रोतागण: सप्रेस्ड …

वक्ता: थॉट (मन में दबा हुआ विचार) ही है|

श्रोता: सर, लेकिन जो ये बोल रहा है गुस्से में, वो पहले से ही स्प्प्रैसड (दमित) हो रहा है|

वक्ता: पहले से ही सप्रेस्ड  हो रहा है|

श्रोता: तो, वो जो अब बोलेगा, वो तो अब सच बोल रहा है ना|

वक्ता: सच नहीं है| कोई भी विचार सच नहीं होता| हम यहाँ पे ये इंकार नहीं कर रहे की विचार है| हम ये इंकार कर रहे हैं की सच है| तुम उसको ख़ास मनना छोड़ो| तुम उसको उतनी ही कीमत दो जितनी की तुम किसी भी दूसरे विचार को देते हो| ये कह रहे हैं| भाई, भावना की बस उतनी ही कीमत है  जितनी किसी भी दुसरे विचार की| ये कह रहे हैं|

समझ में आ रही है बात?

दूसरे तक जाओ, उससे पहले अपने भावुक होने पर गंभीर होना छोड़ दो|

श्रोता: और सर सिम्पथी (सहानभूति) भी?

वक्ता:  सिम्पथी भी| बहुत अच्छी बात खोली है|

किसी से जुड़ जाना एक बात है| और जिसे तुम आम तौर पे सिम्पथी (सहानभूति) कहते हो, दया होती है वो| वो बिलकुल दूसरी बात है| दया में कुछ नहीं रखा है| दया में कुछ नहीं रखा है| प्रेम बिलकुल दूसरी बात है| करुणा बिलकुल दूसरी बात है|

श्रोता: दया में आप दूसरे को छोटा मान रहे होते हो|

वक्ता: हाँ, तो तुमने अब किस सेंटर से बात की है?

श्रोता: ईगो (अहंकार) से |

वक्ता: अपने अहंकार के सेंटर से|

और एक तुलना करी है| अब तुम्हें क्या पता है की कौन किस स्तिथि में है जब तुम अपनी ही  स्तिथि को ही सच्चा मान रहे हो? खूब ठण्ड है और बाहर पेड़ हैं और पौधे हैं और तुम्हें पता होगा की ज़्यादातर पेड़-पौधे जनवरी, फरवरी के महीने में ही सुनार फुल देते हैं| और जनवरी-फरवरी ठीक वो  महीने होते हैं जब तुम सबसे ज़्यादा कपडे पहनते हो| और सबसे ज़्यादा तुम घर के अंदर रहते हो और हवा तुम बर्दाश्त नहीं कर सकते| और ये ठीक वही महीने होते हैं जब वो पौधे…क्या करते हैं? बिलकुल खिल जाते हैं| तुम्हें तो दया करनी चाहिए उन पर| दया करों न- ‘अरे! ये बेचारे तो बाहर हैं| इनके पास तो कोट भी नहीं है|’ तुम जाकरके उस पर रजाई डाल दो| तुम जब दया कर  रहे हो, तो तुम कहाँ से देख रहे हो? अपने सेंटर से न? कि जो मेरी हालत है, उसके मुताबिक़ ये दया का पात्र है| बात नहीं समझ में आ रही है?

श्रोता: आ रही है सर|

वक्ता: तुम्हें तो फिर दया ही करनी चाहिए न पौधे पर| इतना ठंडा मौसम है| अब वो मौज मना रहा है| तुम्हें ठण्ड लग रही है| उसे वो ठण्ड अच्छी लग रही है| तुम्हें ये बात समझ में क्यों नहीं आ रही?

श्रोता:  ठण्ड में फूल खिल रहे हैं|

वक्ता: ठण्ड में ही फूल खिल रहे हैं|

श्रोता: सर, मुझे एक बात पूछनी है आपसे| दो छोटे बच्चे ऐसे ही रडियो लेके जा रहे थे| उनके पास चप्पलें  नहीं थी| तो मैंने उनको बिठाया, चप्पलें दिलाई और मैंने उनको छोड़ दिया| तो, सर ये क्या मैंने सही किया?

वक्ता: देखो बेटा! दोनों बातें हो सकती हैं यहाँ पर| इसमें तुम कुछ लेना चाह रहे थे या तुम कुछ छोड़ देना चाह रहे थे? अहंकार हमेशा क्या करना चाहता है?

श्रोता: लेना|

वक्ता: लेना चाहता है| अगर तुम इसमें ये भाव लेना चाह रहे थे कि मैं बड़ा आदमी हूँ, मैं अच्छा आदमी हूँ, ‘मैंने दो बच्चों की मदद की|’ तो वो तो एक बात हो गई|

श्रोता: सर मेरा किसी को बताने का मन भी नहीं किया| बस ये था कि मैंने..

वक्ता: खुद को तो बताया न| तुम्हें तो पता है न| अपनी नज़रों में तो पता ही है ना|

श्रोता: सर लेकिन ये एक बात थी कि वो जा रहे हैं| आपने उनको देखा| आपने उन्हें बुलाया और आपने उन्हें चप्पलें दिलवाई|

वक्ता: ठीक, ठीक| ये तो तुम सिर्फ घटना बता पाओगे जो बाहर की है| मैं आंतरिक घटना की बात कर रहा हूँ| अन्दर क्या घट रहा है? कुछ लेने का भाव है या हल्का हो जाने का? अगर यी भाव है कि मेरे पास है इतना, मैं इसको दे दूँ, तब तो समझ लो कि अहंकार कम हो रहा है और कोई अच्छी बात हुई है| तुम समझ रहे हो न?

अहंकार इकट्ठा करने का नाम है| अहंकार हमेशा क्या करना चाहता है?

श्रोता: इकट्ठा |

वक्ता: इकट्ठा  करना चाहता है|

वो और चीजें तो इकट्ठा करता ही है| एक चीज़ और भी करना चाहता है – कृतज्ञता | ‘मैं कौन हूँ?’ सब जिसको थैंक यू (धन्यवाद) बोलते हैं| मैं कौन हूँ? सब जिसको…

श्रोता: थैंक यू बोलते हैं|

वक्ता: ‘तो मेरे पास पैसा तो नहीं है| पर मेरे पास लोगों की दुआएँ बहुत हैं|’ लोगों को सुना है ऐसा बोलते?

श्रोता: जी सर|

वक्ता: हो गई ना गड़बड़| और तुम्हें लगता है कि ये अच्छा आदमी है| इसके पास पैसे नहीं है पर लोगों की दुआएँ हैं| हमें ये दिखता ही नहीं है कि दोनो ही अहंकार के काम हैं| एक अहंकार पैसा इकट्ठा कर रहा है और दूसरा अहंकार क्या कर रहा है?

श्रोता: दुआएँ इकट्ठा कर रहा है|

वक्ता: तो किसी को देने में अगर ये हो रहा है कि कुछ इकट्ठा करना है, तो गड़बड़ हो रहा है| उससे कुछ भी अगर तुम्हें चाहिये, तो भिकारी वो नहीं है, भिकारी कौन है?

श्रोता:  हम|

वक्ता: क्योंकि चाहिए किसको है?

श्रोता: सर, अब वो उस वक़्त तक क्या हुआ था कि मैंने उनको देखा, मैंने उनको बस बिठाया और मैंने उनको  चप्पलें दिला दी और उनकी छोड़ा और मुझे नहीं पता कि..

वक्ता: चलो एक टेस्ट बताता हूँ| इस टेस्ट पर अपने आप को परख लो| पता चल जाएगा कि सटीक घटना क्या है? आम आदमी जब भिखारी को दान देता है, तो वो सोचता है कि भिखारी कहे कि शुक्रिया| और अगर तुम वाकई खुद हलके होने को भिकारी को दे रहे हो, तो तुम भिकारी को दोगे पांच रुपय और तुम कहोगे, “शुक्रिया| क्योंकि तेरी वजह से मैं हल्का हो पाया| तू न होता तो देता किसको?”

श्रोता: सर, अगर हम ऐसा सोच लेते हैं कि मदद करें किसी की, तो..

वक्ता: तुम मदद उसकी नहीं कर रहे, अपनी कर रहे ओ ना|

‘तेरे होने से, मैं हल्का हो पाया| तू न होता, तो देता किसको? तो धन्यवाद तुझको|’

तब समझना कि वास्तव में प्रेम है, दया नहीं है|

श्रोता: ये अपने आप ही आएगा ना| ऐसा नहीं है  आपको ये सोच कर ही जाना है|

वक्ता: बुद्ध से पूछा था किसी ने ये| बुद्ध घूमते थे इधर, उधर भीक मांगने| अब वो राजा हैं| उनके पास तो करोड़ों की संपत्ति| पर इधर-उधर घूम रहे हैं और भीख मांग रहे हैं| तो लोग पूछ रहे हैं कि बाकी सब ठीक है, आप ज्ञान की बातें करते हो| आपने बहुत सारी नयी चीजें खोजी| आपने एक नया दर्शन ही दे दिया| लेकिन ये भीख मांगने का क्या चक्कर है? आप बैठ जाओ, लोग वैसे ही आपको दे देंगे| आपके इतने भिक्षु हैं, आप इनको बोल दो, ये आपके लिए खाना इकट्ठा कर सकते हैं कहीं से भी| ये आप करते क्या हो की घर-घर जाकर के, कटोरा लेकर के भीख मांगते हो| इसकी ज़रूरत क्या है आपको? तो बुद्ध बोलते हैं, “इसीलिए करता हूँ ताकि तुम दे सको| मैं भीख नहीं  मांगूगा तो तुम हलके कैसे होओगे?”

आ रही है बात समझ में?

जब देकर के ये भाव आए कि तूने लिया, तेरा शुक्रिया| ये भाव न आए कि मैंने दिया, तू मुझे शुक्रिया दे| तब समझना कि प्रेम है| अब अहंकार का काम नहीं चल रहा, अब कुछ और चल रहा है|

दूसरों की भावनाओं को गंभीरता से न ले सको, उसके लिए अपनी भावनाओं को गंभीरता से लेना…?

श्रोता: बंद करो|

वक्ता: बंद करो|

गहरे गुस्से के बीच भी शांत रहो| मैं तुमसे कहता ही नहीं कि गुस्से पर काबू पाओ| मैं कह रहा हूँ गुस्सा चढ़ा रहे, तुम तब भी शांत रहो| ऐसे समझ लो कि आग के बीच में बर्फ है, और बर्फ तब भी नहीं पिघल रही| ऐसे हो जाओ|

पूरा जल रहा है, पूरा खोपड़ा जल रहा है, आँखों में आग निकल रही है| गाल जल रहे हैं, कान जल रहे हैं| हालत महसूस करी है कभी?

श्रोतागण: हाँ सर|

वक्ता:  हाथ भी कांपने शुरू हो जाते हैं| अनुभव करा है?

श्रोतागण: जी सर|

वक्ता: उसके बाद भी यहाँ (दिमाग की ओर इशारा करते हुए), कुछ है जो बर्फ जैसा ठंडा है|

श्रोता: मतलब कोई इमोशन (भावना) है, वो बस जान लो कि वो भावना सच नहीं है| चाहे उस भावना से किसी को मार भी दो, तो भी कुछ नहीं…

वक्ता: बेटा, जब ये जानने लग जाओगे ना कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है तो इमोशन (भावना) की जो ताकत है, वो अपने आप कम हो जाती है| इमोशन (भावना) को ताकत तुम्हारी गंभीरता देती है|

तो इमोशन (भावना) से लड़ने की ज़रूरत नहीं है बस उसको भाव मत दो| इमोशन चढ़ रहा है, उसको चढ़ने दो| अब उसका काम है| इतने दिनों की तुम्हारी प्रैक्टिस (अभ्यास) है इमोशनल(भावुक) होने की| तो अभी भी तुम इमोशनल तो हो गए ही| पर इमोशन (भावना) चढ़ता  है तो चढ़ता रहे| तुम उसे भाव मत दो| आग के बीच भी बर्फ जैसे रहे आओ|

श्रोता: सर, हमें अपने इमोशन से ज़यादा फर्क नहीं पड़ता पर जो दूसरा, सामने बन्दा इमोशनल है, तो हमें ज़्यादा फर्क पड़ता है|

वक्ता: तुम्हें फर्क इसीलिए पड़ता है क्योंकि तुमने इमोशन को, दोहरा रहा हूँ, सच्चाई समझ रखा है| जब तुम ध्यान से देखोगे और बार-बार कहोगे कि इमोशन ही तो है, सच्चा थोड़ी है, फिर तुम्हें उस इमोशन से फर्क नहीं पड़ेगा|

श्रोता: सर, गिल्ट (अपराध)भी एक इमोशन ही है?

वक्ता: बिलकुल है|

आ रही है बात? ये सारी बात हमने इस सन्दर्भ में करी थी कि दुनिया में ऊँचे से ऊँचे सत्य को भी इमोशन बना दिया गया है| उसकी कोई ज़रूरत नहीं है|

तुमने ये तीन पंक्तियाँ लिखी हैं-

“तेरी ये ज़मीन, तेरा आसमान|

तू बड़ा मेहरबान,

तू बक्शीश कर|”                                  

ये पंक्तियाँ भावुक हो करके गाने वाली नहीं है| इनको तो बड़े ध्यान में, बड़ा संयत होके, बड़ी स्थिरता के साथ गाना चाहिए|

पहले इनका अर्थ करो, फिर मैं तुम्हें गाना सुनाता हूँ|



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: धोखा भावनाओं का (The deception of emotions)


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com प या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें:  सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

        

 

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