जो निर्विशेष हो गया, वो ही संत है|

जो निर्विशेष हो गया, वो ही संत है|

जिसका कुछ भी अब व्यक्तिगत नहीं रहा, सो संत|

जिन सब बातों को हम बड़प्पन का, विशिष्टता का सूचक मानते हैं, बड़ी संभावना है कि वो संत में दिखाई ही न दे|

संत जब अपना आपा खो देता है, अपनी सत्ता खो देता है, तो उसके माध्यम से उसी परम की, पूर्ण की सत्ता अपने आप को प्रकट करती है|

वो कैसा है यदि ये जानना है तो नदियों, पत्थरों, पहाड़ो और पशुओं को देखो| और यदि व्यक्ति में, मनुष्य रुप में उसकी सत्ता के दर्शन करने हैं तो या तो बच्चे को देखो या तो संत को देखो|

हमने तो जो चित्र भी बनाए हैं, जो छवियाँ भी बनाई ही हैं संतो की, बुद्धों की, पक्का समझिए की वो झूठी है| हम महत्व देते हैं आकार को, हम महत्व देते हैं बड़े होने को, हम महत्व देते हैं उसको, जो हम पर हावी हो सके, हम महत्व देते हैं रूप को, हम महत्व देते हैं ताकत को| तो इसीलिए हम संतो को भी उसी रूप में बना देते हैं|

संत कहीं से असाधारण नहीं होता, संत के पास कहीं से ये ताकत नहीं होती कि वो मरे हुओं को जिन्दा कर दे| संत के पास कहीं से ये ताकत नहीं होती है की वो छ: सौ, आठ सौ साल जी जाए| सच तो ये है कि वो फूल की तरह नाजुक होता है| आप अगर अस्सी साल जीते होंगे तो वो पचास ही साल में मर जाएगा| आप अगर अस्सी साल जीते हो तो संत आपसे कम ही जियेगा, ये पक्का मानिए|

वो बहुत साधारण जीव होगा| आप उसको बेवकूफ बना सकते हो बड़ी आसानी से, उसके पास कोई जादुई शक्तियाँ नहीं होंगी| उसको तो बेवकूफ बनाना बहुत आसान होगा| हाँ, इतना ही है कि आप उसे बेवकूफ बना लोगे वो उसके बाद भी हँसेगा| आप उसे बना लो बेवकूफ, बन भी जाएगा पर उसके बाद भी वो हँस लेगा| बस इतना सा ही अंतर है, बहुत छोटा सा, महीन|

आप सोचो कि वो शरीर का बड़ा पुष्ट होगा और… कुछ भी नहीं जानवरों जैसा होगा, साधारण होंगी उसकी काया, बहुत साधारण|

कुल मिला-जुला के संत में वो सब कुछ है जो आपको निराश कर सकता है| न वो सुंदर दिखता है, न वो लंबा जीता है, न उसमे कोई चालाकी है, न वो आपको कुछ दे सकता है| तो आखिरी बात ये है की आप के किसी काम का है नहीं|

ईश्वर परम बे पढ़ा-लिखा है, एकदम अनाड़ी है| जो एक दम अनाड़ी हो, वही ईश्वर है| ब्रह्म को कुछ नहीं आता-जाता, ब्रह्म महा अज्ञानी है – बिलकुल रॉ, अनछुआ|

जिसको सोचना ही नहीं पड़ता या यूँ कहिये जिसके पास सोचने की क्षमता ही नहीं है, वो निर्विकल्प| तो वो जो परम है, वो परम भोंदू है|

वो तो बड़ा भुलक्कड़ है, उसके पास यादाश्त भी नहीं है| पक्का समझ लीजिए कि उसके पास कोई स्मृति नहीं है| उसको पिछले एक क्षण का भी नहीं  याद रहता, उसके पास सिर्फ वर्तमान है| वही वर्तमान है|

उस बेचारे का घर भी नहीं है| उसके लिए कहने वालों ने कहा है “अनिकेत”, वो इतना बेसहारा है|

न घर है, न बीवी है, न दौलत है, न बुद्धि है, न स्मृति है, न कान है, न आँख है – ये है परम|

उसकी अवतार-ववतार लेने में भी कोई रूचि नहीं है|



लेख पढ़ें: जिसके खालीपन में झलके अनंत, उसी को शून्यवत कहो उसी को संत

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