आत्मा ही ब्रह्म है

आत्मा जानती है, आत्मा सोचती नहीं है| तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी ऐसा है जहाँ बिना सोचे जान लिया गया है और पुख्ता जान लिया गया, संदेह की कोई संभावना नहीं है, वही आत्मा है|

जब कहा जा रहा है कि आत्मा ही ब्रह्म है| तो कहा जा रहा है कि बाहर के पूरे विस्तार का जो सत्य है, वही तुम्हारे व्यक्तिगत विस्तार का सत्य है| शरीर का संसार से जो  रिश्ता है, आत्मा का ब्रह्म से ठीक वही रिश्ता है| एक हैं दोनों; तुम्हारे शरीर के बिना संसार नहीं, एक हैं दोनों|

दृष्टि का अंतर है, अलग-अलग करके देखते हो| शरीर को जो जानने निकलेगा, सत्य की राह पर, जो शरीर से शुरुआत करेगा, वो आत्मा तक पहुँच जाएगा| सत्य तक जाना है तुमको, तुमने अगर शरीर से शुरुआत करी तो आत्मा पे जा पहुँचोगे|और अगर तुमने संसार से शुरुआत करी तो ब्रह्म तक जा पहुँचोगे| पहुँचे एक ही बिंदु पे हो| सत्य जानना चाहते थे, चले शरीर से तो आत्मा तक पहुँच गये और चले संसार से तो ब्रह्म तक पहुँच गए| पहुँचे एक ही जगह, अलग-अलग नही पहुँचे|

यह आत्मा ही ब्रह्म है| जो आत्मा को जानते हैं उन्हें आत्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं  दिखाई देता| लेकिन जो शरीर की दुनिया में जीते हैं उन्हें शरीर में और संसार में सदा भेद दिखाई देता है| भेद ही नहीं, उन्हें शरीर और संसार में विरोध भी निरंतर दिखाई देता है| वो लगातार शरीर को बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं| दुनिया से इनका रिश्ता खिंचा -खिंचा सा होता है| दुनिया से उनका रिश्ता हिंसा का रहता है|



लेख पढ़ें: चार महावाक्य

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