चार महावाक्य

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श्रोता: जैसे-जैसे कुछ भी समझ में आता है, शुरुआत कहीं से भी करो, जैसे-जैसे कुछ भी समझ आएगा उस क्षेत्र के जो हिस्से हैं वो मिटते जायेंगे और एक एकीकृत करने वाली कोम्मुनालिटी सामने आती जाएगी, ये तो है ही है| इतने सारे धूप के यहाँ छोटे-छोटे टुकड़े पड़े हुए हैं जमीन पे, धूप के कितने छोटे-छोटे टुकड़े दिख रहे है जमीन पे पड़े हुए है| जैसे-जैसे समझते जाओगे कि ये धूप क्या है, ये प्रकाश क्या है, वैसे-वैसे ये छोटे-छोटे टुकड़ों से शुरुआत करके एक सूरज तक पहुँच जाओगे| शुरुआत तो ऐसे ही करोगे कि अरे! ये टुकड़ा, वो टुकड़ा, वो टुकड़ा, असंख्य टुकड़े है |

अब ये टुकड़े भी पैदा क्यों होते है? जानते हो? ये पत्तियों के बीच में छोटे-छोटे छेद है| पिन-होल कैमरा पढ़ा होगा? ये सूरज है, ये धूप के टुकड़े नहीं हैं, ये सूरज है| वो जो पत्तियों के बिच में जरा-जरा सी छेद है, जरा-जरा सी दरारे है वो पिन होल कैमरा का काम कर रही है और ये पूरा का पूरा सूरज है जो यहाँ उतर आया है|

श्रोता1: सर अगर कोई बहुत ही छोटा कोई पौधा हो मैगनीट्यूड के हिसाब से तो?

वक्ता: वो भी पूरा सूरज ही उतर आता है|

श्रोता1: सर, उसको तो वो सूरज ही लगेगा|

वक्ता: लगेगा नहीं,  है, लगेगा नही|बात लगने की नही है, है| बात समझ रहे हैं?

पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते 

पूर्ण से पूर्ण ही पैदा होता है|

क्या कहते है उपनिषद?

पूर्नामिदः पूर्णमिदं

पूर्णात्  पूर्णम्  उदच्यते

पूर्ण से पूर्ण ही पैदा होता है; लगता अपूर्ण है, लगता छोटा है पर ये पूरा सूरज उतरा हुआ है|

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते

और जब पूर्ण से पूर्ण पैदा हो जाता है उसके बाद भी पूर्ण, पूर्ण ही रहता है|

दृष्टि का फेर है की अंश दिखाई देते है| अंश नहीं  है, जो है वो सब पूरा ही पूरा है| वो भी पूरा है सूरज, ये टुकड़ा भी पूरा है| और अगर आप ध्यान देंगे तो जिन पत्तियों की दरारों से, छिद्रों से ये छोटा सूरज सामने आ रहा है वो खुद भी सूरज है| वो पत्तिया भी सूरज के अत्तिरिक्त और कुछ नहीं  हैं| जितना भी जीवन है इस धरती पे, जितनी भी उर्जा, है वो सब सूरज की ही उर्जा है| तो पेड़ के भीतर भी जो ऊर्जा  प्रवाहित है वो भी सूरज की ही उर्जा है| ये भी सूरज के अतिरिक्त और कुछ नही है|

सूरज ऊपर, सूरज बीच में, और सूरज नीचे| अब ये आपकी मर्जी पर है की आप उसे सूरज न कहें,  कभी पेड़ कह दे, कभी धूप का टुकड़ा कह दे, कभी कुछ और नाम दे दें| पर सूरज के अलावा और कुछ हैं नहीं| समझ में आ रही है बात?

श्रोता2: सर, हम भी पेड़ को ही खाते है तो हम भी उसी उर्जा से बने है| सूरज भी किसी और एनर्जी से चल रहा है?

वक्ता: सूरज को हमने प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया है| सूरज तो कुछ भी नही है, बहुत छोटा है| पूरे  ब्रह्माण्ड को लोगे तो उसमें सूरज उसमे रेंत के एक कण बराबर भी नहीं है| हमारा जो सूरज है वो बहुत छोटा सा तारा है| सूरज बस प्रतीक है बात को समझने के लिए|

आँखों के तल पे तो हमेशा धूप का टुकड़ा ही दिखाई देगा| एक दूसरा तल है जहाँ से सब कुछ सूरज है| बात समझ रहे हो? जब हम कहते है, “सब कुछ सूरज है|” तो वो सब कुछ क्या? जो आँखों को दिखाई देता है| सब कुछ सूरज हो सके तो उसके लिए सबसे पहले आँखों को सूरज होना होगा| बात समझ रहे हो ना? उस तल से सबसे पहले ये जाना जाता है कि मेरी दृष्टि और कुछ नही है मेरा ही प्रक्षेपण है|

 संसार को आप कह सको कि सत्य है, इसके लिए जरुरी है ना कि पहले उसको सत्य कहो जो संसार को देख रहा है| संसार आपको प्रतीत ही इन्द्रियों से और मन से होता है| जब तक आपने ये नहीं जाना साफ़-साफ़ कि मन और इन्द्रियाँ आत्मा से उद्भूत हैं, तब तक संसार आपके लिए सत्य नहीं हो सकता| तब तक संसार आपके लिए वही रहेगा वैविध्य से भरा हुआ, हिस्सा-हिस्सा, टुकड़ा, अंश|

बात समझ रहे हो ना?

तो प्रज्ञान में स्थित होने पर ऐसा नहीं है की हिस्से दिखाई देने बंद हो जाते है| ऐसा नहीं है की हर हिस्से को देख कर के तुम खयाल करते हो कि अरे! ये अंश नही है, ये पूर्ण है| इतना ही होता है कि हिस्से के पीछे जो हिस्से को देखने वाला यंत्र है वो यंत्र अपने स्रोत को समर्पित हो चूका होता है|

जब मन आत्मा में डूबा होता है तो संसार सत्य में|

ये सूत्र अच्छे से समझ लो|

जब मन आत्मा में डूबा होता है तो संसार सत्य में डूबा होता है तब सत्य में और संसार में कोई भेद नही रह जाता है|

श्रोता3: सुबह सर इसी चीज पर रिफ्लेक्शन लिखा था मैंने, “ध्यान जितना सूक्ष्म होता है तो अनुभूति भी सशक्त शान्ति पूर्ण|” मैं सोच रहा था, यहाँ बैठ के की एक यथार्थ सामंजस्य है, और हर चीज बड़े सलीके से अपनी जगह पे रखी हुई है उसको अनुभूति यहाँ से और दिखती है, सजावट|

दोनों ही मन के प्रक्षेपण है क्योंकि यहाँ आने का निर्णय  भी मन का ही है?

वक्ता: जिधर मन शांति पाएगा उधर को जाएगा| वही उसकी गहरी से गहरी आकांक्षा रहेगी लेकिन मन क्योंकि स्वयं सीमित है इसीलिए इस बात की पहचान करने में भ्रमित हो सकता है कि शांति कहाँ है| तलाश तो वो शांति की ही करेगा| जहाँ भी उसे आशा बंधेगी कि शान्ति है वो वहीं को जाएगा| तुम्हे आशा बंधी है कि यहाँ शांति है, तुम यहाँ आए हो| तुम कह रहे हो शहरो में भीड़ है, क्लटर है,  तो लोग शहरो में क्यों रह रहे है? उन्हें वहां आशा बंधी हुई है| और जिसकी आशा तुम्हे यहाँ है ठीक उन्ही की आशा उन्हें वहाँ है बस ये है की तरीका दूसरा है|

शांति ही तो वो भी खोज रहे है ना? शहर में जो उन्हें मिलना है उनसे उन्हें शांति की उम्मीद है|

श्रोता4: शहर में तो सेफ्टी होता है| सेफ्टी और शांति मतलब शांति का क्या करना है सेफ्टी का क्या करना है दोनों अलग-अलग चीजें हैं?

वक्ता: बिलकुल एक सी है, बिलकुल एक सी है| मन को है सुरक्षा की ही तलाश है|पर उसे ये  पता नही है कि सुरक्षा मिलेगी कहाँ पे इसीलिए वो बहुत विक्षिप्त तरीकों से सुरक्षा खोजता है – पैसे में, संबंधो में, रिश्तो में, प्रतिष्ठा में, वो इन चीजो में सुरक्षा खोजता है|

पूरा वेदांत इन चार महावाक्यों में समाया हुआ है|

श्रोता4: सर, श्रवानादी अनुष्ठान  का मतलब क्या होता है?

वक्ता: अनुष्ठान माने करना| श्रवण करना| जो लोग ‘रेज़ोल्यूशन’ ले लेते हैं|

वक्ता: सर, समाधि का अनुष्ठान करना?

श्रोता4: समाधि करना, ध्यान लगाना|

श्रोता5: सर्वव्यापक मतलब”

वक्ता: ‘ऑल पर्वैसिव’

श्रोता3: सर, उपनिषद किस शाखा में आते हैं?

वक्ता: हर उपनिषद किसी न किसी वेद से जोड़ा जाता है| वेद के चार हिस्से होते हैं:

  1. मंत्र
  2. ब्राह्मण
  3. अरण्यक
  4. उपनिषद्

 

और इनका ‘आध्यात्मिक’ भी बढ़ता जाता है|

मंत्र में तो ये कहा जाता है कि देवता कि ‘कैसे पूजा करें?’, ‘क्या मंत्र जाप करें?’

ब्राह्मण में फिर यह आता है कि जब यज्ञ हो रहा हो तो उसके तरीका क्या है, उसमें क्या होता है, कैसे करे| उसमे थोड़ा और आध्यात्मिक हो जाता है इंसान|

फिर उपनिषद् आते हैं|

श्रोता5: सर, जो बातें वेदों में लिखी हैं, उनको उपनिषदों में विस्तार मे समझाया गया है?

वक्ता: हाँ, पर आमतौर पे जो लोग वेद-वेद चिल्लाते हैं, उनका उपनिषद् से कोई मतलब नहीं होता है| उनको बस उपरी चीज से मतलब है और उसका कोई फायदा नहीं है| वेदों का जो उत्कर्ष है पूरा वो उपनिषद् हैं|

श्रोता6: सर “परमात्मा ब्रह्म है”  इसका मतलब?

वक्ता: लिख लो पहले अभी समझाता हूँ|

श्रोता7: सर, इसका मतलब क्या है, “परन्तु जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा बुद्धि के साक्षी रूप से अधिकारी को फांसने  में लग पड़ता

वक्ता: जब किसी अधिकारी देह में, किसी अधिकारी शरीर में परिपूर्ण वह परमात्मा बुद्धि के साक्षी रूप से और अधिकारी को फांसने भी लग जाता है, साक्षी हो के खुद को देखने लग जाता है|

वक्ता: सर, अगले वाक्य में अहम् का प्रयोग किया गया है|

श्रोता: विटनेस (साक्षी) ही अहम् हो जाता है| परमात्मा ही साक्षी बनता है उसी को अहम् कहा गया है| जिसको देखा जा रहा है वो अहम् नहीं है, जो देखने वाला है वो अहम् है| वैसे तो अहम् शुभांकर है, लेकिन इस महावाक्य में अहम् शुभांकर के पीछे वाला वो है जो शुभांकर को देख रहा है|

वक्ता: उपनिषदों में चार महावाक्य हैं|

पहला महावाक्य है, “प्रज्ञानं  ब्रह्म” (ऐतरेय  उपनिषद्  3.3, ऋगवेद )

दूसरा महावाक्य है, “अयं  आत्मा  ब्रह्म”  (मांडूक्य उपनिषद्  1.2, अथर्ववेद )

तीसरा महावाक्य है, “तत् त्वम् असि” (छान्दोग्य  उपनिषद्  6.8.7, सामवेद )

चौथा महावाक्य है, “अहम् ब्रह्मास्मि” (बृहदारणयक  उपनिषद्  1.4.10, यजुर्वेद )


” प्रज्ञानं ब्रह्म”

वक्ता: ज्ञान का अर्थ होता है टुकड़े-टुकड़े संसार की जानकारी| संसार के किसी टुकड़े को जान लिया उसका नाम है ज्ञान| मन ऐसे असंख्य टुकड़ों से घिरा रहता है| जब ध्यान में इनमें से किसी भी अंश को देखा जाता है — और ध्यान की शुरुआत गहरे विचार से ही होती है — जब गहरे रूप से विचार किया जाता है,  तब जल्दी ही विचार निर्विचार में तब्दील हो जाता है| टुकड़े की सीमाएँ हटने लगती हैं और उसके नीचे का जो आधार है वो दिखाई देने लग जाता है| वो आधार किसी एक टुकड़े का नहीं होता| ये ऐसे ही है जैसे आप एक पत्ती को समझना चाहें और उसे समझते-समझते जड़ तक पहुँच जाएँ|

तो जड़ किसी एक पत्ती की नहीं होती है| फिर आप पाते हैं सारी पत्तियाँ, टहनियाँ, डालियाँ, फूल उसी जड़ से निकल रहे हैं| ज्ञान का अर्थ है पत्ते  का विश्लेष्ण करना, पत्ती की विवेचना करना| “प्रज्ञान” का अर्थ है मूल तक  ही पहुँच जाना| समझ रहे हो | आँखे जहाँ तक देखती हैं उन्हें पत्तियाँ ही दिखाई देती हैं| आँखे सतह के ऊपर-ऊपर ही देख पाती हैं| ज्ञान है आँखों का विषय|

ब्रह्म को  तो विचारातीत मौन में ही जाना जाता है और जब वो विचारातीत मौन है, तब जानने वाले भी तुम नहीं हो| ऐसे समझ लो –

आँखे पत्ती को जानती हैं और जो तुम्हारा केंद्र है, वही पत्ती के मूल को जान सकता है| तुममें आँखों की जो जगह है वही जगह वृक्ष में पत्ती कि है |और तुम में जहाँ बोध है ठीक वहीं  पर वृक्ष में  जड़  है  मूल है| आँखों से पत्ती का रिश्ता है और बोध से मूल का रिश्ता है|आँखों से पत्ती का रिश्ता है और प्रज्ञान से ब्रह्म का रिश्ता है|

ज्ञान से संसार का रिश्ता है|

प्रज्ञान से सत्य का रिश्ता है|

ये पहला महावाक्य हुआ, “प्रज्ञानं ब्रह्म्”|

 

अयम् आत्मा ब्रह्म”

वक्ता: यह आत्मा ही ब्रह्म है| पहले में और दूसरे में सम्बन्ध साफ़ है| चारो महावाक्य एक ही सत्य की घोषणा कर रहे हैं| जरा ध्यान से देखोगे तो “प्रज्ञानं ब्रह्म” और “अयम् आत्मा  ब्रह्म”, तो एक ही सत्य सीधे नजर आएगा|

हमने कहा, “आँखों को ज्ञान है, आँखों से संसार है और जो तुम्हारा केंद्र है उसमे सत्य है, मूल है|” जो तुम्हारा केंद्र है, जिसको अभी हम प्रज्ञान कह रहे थे, उसी प्रज्ञान को आत्मा भी कहा जाता हैं|

मन – ज्ञान, आत्मा – प्रज्ञान|  मन को विचारोगे और आत्मा से जानोगे| मन से जब भी देखोगे तो विचारना पड़ेगा, मन विचारने के अलावा  कुछ नहीं  कर सकता| और आत्मा विचारती नहीं है, वहाँ ज्ञान के लिए कोई जगह ही नहीं है| आत्मा ज्ञानातीत है| अज्ञानी भी कह दो तो कोई बुराई नहीं है| गलत नहीं अगर आत्मा को ज्ञानातीत कह दो या सीधे अज्ञानी भी कह दो, क्योंकी ज्ञान से आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं| ज्ञान बहुत छोटी चीज है आत्मा के सामने| ज्ञान तो टुकड़ा, हिस्सा, सीमित है|

आत्मा जानती है, आत्मा सोचती नहीं है| तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी ऐसा है जहाँ बिना सोचे जान लिया गया है और पुख्ता जान लिया गया, संदेह की कोई संभावना नहीं है, वही आत्मा है|

जब कहा जा रहा है कि आत्मा ही ब्रह्म है| तो कहा जा रहा है कि बाहर के पूरे विस्तार का जो सत्य है, वही तुम्हारे व्यक्तिगत विस्तार का सत्य है| शरीर का संसार से जो  रिश्ता है, आत्मा का ब्रह्म से ठीक वही रिश्ता है| एक हैं दोनों; तुम्हारे शरीर के बिना संसार नहीं, एक हैं दोनों|

दृष्टि का अंतर है, अलग-अलग करके देखते हो| शरीर को जो जानने निकलेगा, सत्य की राह पर, जो शरीर से शुरुआत करेगा, वो आत्मा तक पहुँच जाएगा| सत्य तक जाना है तुमको, तुमने अगर शरीर से शुरुआत करी तो आत्मा पे जा पहुँचोगे|और अगर तुमने संसार से शुरुआत करी तो ब्रह्म तक जा पहुँचोगे| पहुँचे एक ही बिंदु पे हो| सत्य जानना चाहते थे, चले शरीर से तो आत्मा तक पहुँच गये और चले संसार से तो ब्रह्म तक पहुँच गए| पहुँचे एक ही जगह, अलग-अलग नही पहुँचे|

यह आत्मा ही ब्रह्म है| जो आत्मा को जानते हैं उन्हें आत्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं  दिखाई देता| लेकिन जो शरीर की दुनिया में जीते हैं उन्हें शरीर में और संसार में सदा भेद दिखाई देता है| भेद ही नहीं, उन्हें शरीर और संसार में विरोध भी निरंतर दिखाई देता है| वो लगातार शरीर को बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं| दुनिया से इनका रिश्ता खिंचा -खिंचा सा होता है| दुनिया से उनका रिश्ता हिंसा का रहता है|

मैं कौन हूँ? जिसे दुनिया किसी तरह से अपने अनुरूप बनाना है अन्यथा दुनिया मुझे खा जाएगी| मुझे माहौल को अपने अनुरूप ढालना है अन्यथा मैं बचूँगा नहीं| उसकी सारी लड़ाई बस किसी तरीके से ‘सर्वाइवल’ की होती है; सुरक्षा| जो शरीर की दुनिया में होगा, उसे शरीर में और संसार में वैमनस्य दिखाई देगा और जो आत्मा के तल पे जियेगा वो कहेगा, “आत्मा और ब्रह्म एक हैं, विरोध कहाँ!”

अब उसका संसार से भी रिश्ता प्रेम का होगा, हिंसा का नहीं| स्वयं को शरीर मानोगे तो संसार से सदा डर में, विरोध में, लालच में, द्वैत में जियोगे और अगर ध्यान में आत्मा तक उतर जाओगे तो  फिर यही संसार प्रीतिकर हो जाएगा, अब ऐसा नहीं लगेगा जैसे दुनिया खाने को दौड़ी चली आ रही है फिर बात-बात में झगड़ोगे नहीं|

जब-जब ये लगे, “मैं और संसार एक दूसरे के विपरीत हैं, विरोधी हैं, तब-तब समझ लेना बड़े सतही तरीके से जी रहे हो| जब-जब लगे मैं इसका अविभाज्य हिस्सा हूँ, अलग हो ही नहीं सकता, अपरिच्छिन्न हो; जब भी कभी ऐसी अनुभूति उठे तो जान लेना कि तुम नहीं आत्मा बोल रही है| यही है दूसरा महावाक्य|

 

“तत् त्वम्  असि ”

पहले,  दूसरे को जिसने जान लिया वो सहज ही तीसरे में उतर जाएगा| कोई नई बात कही नहीं गयी है क्योंकि कोई दूसरी बात है ही नहीं कहने के लिए| एक ही बात है अनेक रूपों में उसे कहा गया है|

‘तत् त्वम् असि’, वह तुम ही हो| वह सत्य, वह ब्रह्म, वह तुम ही हो| जब यहाँ ‘तुम’ कहा जा रहा है तो निश्चित रूप से उससे नहीं कहा जा रहा है जो स्वयं को देह जानता है, जो देहाभिमानी है| ये महावाक्य एक विधि जैसे हैं जो तुम्हें याद दिलाएगा की कहा तो उससे जाएगा जो कान मात्र है| जो अपने आप को कान समझता है कि मैं कान से सुन रहा हूँ पर सुनने के फल स्वरूप अचानक तुम्हें कुछ याद आ जाएगा , “हाँ, हाँ, ठीक कहा, मैं ही तो हूँ|” ये जो मैं है, ये शरीर-रूपी नहीं है| ये वो नहीं जिसको तुमने अपना नाम दे रखा है, जो कभी पैदा हुआ था, जो किसी का भाई है,  किसी की माँ है, ये उससे नहीं कहा, ये उससे नहीं कहा जा रहा है, “तत् त्वम् असि|” पड़ेगा उसी के कान में, क्योंकि शब्द हैं तो कान में ही पड़ेंगे, पर कान में पड़ते ही उसे बदल देगी| त्वम् बदल जाएगा|

जिसने सुना वो त्वम् दूसरा था और सुन कर के ध्यान में जिसने जाना वो दूसरा है| ये महावाक्य ‘तत् तवं असि’ समझ लो एक दवाई की तरह है, जिसको पीता रोगी है पर पीने के साथ ही स्वस्थ हो जाता है|

त्वम् कौन है इसमें? रोगी, या वो जो स्वस्थ हो गया? वो जो स्वस्थ हो गया| वो जो अब आत्मा में केन्द्रित हो गया|

‘तत् त्वम् असि’, वो तुम वो हो| वो तुम हो| नहीं, तुम अपनी दिनचर्या में ऐसे नहीं जीते हो कि वो तुम हो| दिनचर्या तो तुम्हारी ऐसी ही रहती है, जिसमें तुम सीमित, क्षुद्र मानसिकता में काम करने वाले हो| पर कभी कोई आता है सामने जैसे की ये महावाक्य सामने आ गया| वैसे ही कभी घटनाएँ सामने आती हैं, ग्रन्थ सामने आते हैं, व्यक्ति सामने आते हैं, जिनके सामने आते ही बिजली सी कौंध जाती है और बिलकुल स्पष्ट हो जाता है की, मैं ही तो हूँ| वो सत्य जिसको मैं लगातार खोज रहा हूँ वो मैं ही तो हूँ| अपनी पूरी यात्रा का अंत मैं ही तो हूँ| अपनी आखिरी मंजिल मैं ही तो हूँ| वह से अनजाने का आभास होता है| वह से  विस्तार का आभास होता है| वह से उसका आभास होता है जिस तक तुम अभी पहुँचे नहीं हो, जो तुम्हारा सपना है, जिसको तुम जानते नहीं लेकिन जिसकी तरफ बढ़े चले जाते हो|

वह से उसका आभास है जो तुम्हारी सारी बैचैनी के लिए ज़िम्मेदार है, जो तुम्हें मिला नहीं है और तुम बेचैन हो कि किसी तरह मिल जाए| महावाक्य तुमसे कह रहा है, “वो तुम ही हो, अपना अनुसंधान करो| स्वयं को जान लो बाहर नहीं मिलेगा वो| तुम ही हो अपनी यात्रा की मंजिल और कही मंजिल नहीं है| तुम्हारा सफ़र तुम्हीं से शुरू हुआ और तुम्ही पे ख़त्म होगा| ‘तत् त्वम् असि|

इच्छा है तुम्हारी तो भटक लो, इच्छा है तुम्हारी तो सुख दुःख चखने की, चख लो| पर रुकोगे तो खुद पे ही आके, अन्यथा भटकते रहोगे|

श्रोता7: हमारे शरीर को कुछ भी हो सकता है| अब मैं एहसास कर रहा हूँ कि कांस्टेंट चीज तो कांस्टेंट रहेगी| शरीर के साथ कुछ भी हो जाए क्योंकि ऐसा हमेशा नहीं होता की शरीर अगर सुख में हैं तो वो हिस्सा शांत ही होगा| वो कांस्टेंट हमेशा ‘कांस्टेंट’ है धीरे-धीरे पता चल जाएगा कि ये अलग चीज है| ‘कांस्टेंट’, ‘कांस्टेंट’ रहेगा और तुम्हारी ‘बॉडी’ अलग चीज है|

वक्ता: वो जो तुम ‘कांस्टेंट’ बोल रहे हो वो जब तक याद रहेगा तब तक शरीर डराएगा नहीं, पागल नहीं होगा, नहीं तो शरीर का ही दूसरा नाम डर है|

श्रोता6: सर, प्रज्ञान और आत्मा भी एक ही चीज हैं?

वक्ता: बिलकुल एक चीज हैं| दोनों में कोई अंतर नही है| बस सन्दर्भ थोड़ा सा अलग है|

जब आप प्रज्ञान कहते हो तो आप मन की नजर से आत्मा का अनुभव बता रहे हो| प्रज्ञान में शुरुआत ज्ञान से ही कर रही हो, हालांकि जब प्रज्ञान आया तो ज्ञान अब कहीं नहीं है| ये प्रज्ञान में ही कह रहा है| मन कह रहा है कि यूँ ही देखा तो ज्ञान मिला और गहरा उतरता रहा – गहरा उतरता रहा तो मिल गया प्रज्ञान पर जब मिला गया प्रज्ञान तो मैं कहीं नहीं था, आत्मा थी

आत्मा का ही दूसरा नाम प्रज्ञान है| बोध को ही प्रज्ञान जानो|

“अहम ब्रह्मास्मि”

फिर आता है जो इन चारो वाक्यों में भी शिखर वाक्य है “अहम् ब्रह्मास्मि| ये मह्वाक्य कम है, उत्सव ज्यादा है| पहले तीनों  महावाक्य तुमसे कह रहे थे कि दो तल हैं|

पहले में कहा तुमसे कि ज्ञान है और प्रज्ञान भी है|

दूसरे में भी तुमसे यही  कहा गया कि सत्य है और संसार भी है| शरीर है तो संसार, और आत्मा हो तो ब्रह्म|

तीसरे में तुमसे कहा गया कि जिसे तुम खोज रहे थे, वो तुम हो|

अब चौथा जो है वो दोनों तलो को एक कर देता है| अब कोई भेद नहीं रहा| “मैं” – अहम और मेरा अहं  अब बैठ गया है जाकर के ब्रह्म की गोद में|

दोनों दुनिया एक हो गई है| शरीर है पर शरीर अब शरीर न रहा| अहम् ब्रह्मास्मि, अहं  तो मैं था सदा से पर वो अहम् संयुक्त किससे था? छोटे-छोटे टुकड़ों से, अंशो से, संसार से, शरीर से| ये अहं इन से शरू हुआ था| अहं अभी भी है पर अब वो अहं दैवीय है| अब वो अहं ब्रह्म से जुड़ गया है, विलीन हो गया है ब्रह्म में, कहीं देखने को नहीं मिलता|

अब कोई मुझसे ये न कहे कि मन है तो संसार और सत्य है तो ब्रह्म, न! अब दो वाक्य कहने की ज़रूरत नहीं| अब तो मन भी आत्मा है और संसार भी सत्य है, अहं ब्रह्मास्मि| अब कोई मुझसे ये ना कहे कि इसका निषेध करना है, और इस-इस तरफ को जाओ| अब कोई ये ना कहे| अब कोई ये ना कहे कि दो राहें है और दोनों राहों पर अलग-अलग यात्राएँ हैं, किस राह पे जाऊँ|मैंने अब बिंदु को पा लिया,  जहाँ सब जुड़ता है, जहाँ परम योग होता है|

अहम् का तल ब्रह्म से जाकर के मिल गया है| वो जो सबसे ज्यादा तिरस्कृत था, नीचे से नीचे, दुःख का कारण था, वो अब जाकर के आनंद में समा गया है| अहम् जो मेरी बीमारी थी, वो अहम परम स्वास्थ में घुल गया| रोग स्वास्थ में विलीन हो गया है| अब कोई मुझसे ये न कहे कि देखो ऐसा करोगे तो रोग लग जाएगा| हाँ, हमें रोग लगा था, अहम् रोग है, पर मेरा रोग अब योग हो गया  है|

श्रोता7: सर, हम असली के सामने पर्दा डाल देते हैं| एक बार मैंने आपसे सुसाईड के बारे पे पूछा था, मर जाने के बारे मे और आपने बताया था कि मरना शारीरिक है और अगर शरीर नहीं है बस चेतना  है तब?

वक्ता: आम तौर पे जिसे तुम चेतना बोलते हो, वो सिर्फ ज्ञान है| ज्ञान के तल पे है क्योंकि  जिसे आप चेतना  कहते हो उसमे सदा कोइ वस्तु होता है, विषय| उसके बिना चेतना नहीं हो सकती| ‘तुम किसी चीज़ के प्रति चेतन हो ‘

श्रोत6: सर, मैं उसकी बात कर रहा हूँ जो ‘कांस्टेंट’ है|

वक्ता: जो कांस्टेंट रहता है उसे हम नहीं जान सकते, उसे तुम नहीं जान सकते| हम जिसे चेतना बोलते हैं वो तो द्वैत का खेल है| तुम विचार को जान सकते हो, तुम बिलकुल दावा कर सकते हो कि मैं इस वक़्त फलानी वस्तु का या घटना का विचार कर रहा हूँ| उसमें तुम हो, वो घटना है, दो हैं, द्वैत है, रहेगा ही रहेगा|

‘चेतना’ और ‘अवेयरनेस’ में बहुत अंतर है| चेतना मन के तल पर है और ‘अवेयरनेस’ आत्मा के तल पर है| ‘चेतना’ ज्ञान है, ‘अवेयरनेस’ प्रज्ञान है| इन दोनों शब्दों को एक साथ, एक ही अर्थ में, कभी इस्तेमाल मत करना| चेतना’ तो मस्तिष्क में घटने वाली घटना है| उसे नाप सकते हैं,  डॉक्टर नाप सकता है कि तुम कितने ‘सचेतन’ हो|

हाँ, ‘अवेयरनेस’ को नहीं नापा जा सकता|थोड़ी नापी जा सकती है| ठीक वैसे ही जैसे ज्ञान की परीक्षा हो सकती है पर प्रज्ञान की कोई परीक्षा नही होती|

श्रोता6: सर, तो मरने पर केवल ‘अवेयरनेस’ रहे ऐसा नहीं हो सकता?

वक्ता: नहीं कहाँ रहे? मरने पर कहाँ रहे? क्या मरा? शरीर मरा, शरीर ‘स्पेस’ है| तो तुम कहना चाहते हो कि ‘अवेयरनेस’ ‘स्पेस’ की कोई चीज़ है की शरीर मर जाएगा और वो बची रह जाएगी| वो चला जाएगा और ये बची रहेगी|

बोलने से पहले अपने ‘फ्रेम वर्क’ को परख लिया करो कि क्या बोल रहे हो| तुम कहते हो जब मैं मरूँगा ‘चेतना’ चीज़ मर जाएगी ‘अवेयरनेस’ बच जाएगी| कहाँ बच जाएगी? तुम बचने का अर्थ क्या करते हो? जब भी तुम कहते हो बच गया तो तुम्हारा आशय यही होता है – तुम्हारी थाली में रोटी थी सब्जी थी, रोटी हट गयी सब्जी बच गयी| बची कहाँ? थाली में ही ना?

हम अक्सर कहते हैं कि शरीर मर जाएगा, आत्मा रह जाएगी| कहाँ रह जाएगी?

श्रोता7: सर, आत्मा को ध्यान से जाना जाता है?

वक्ता: पर जानने वाला मन नहीं है और आप जानोगे ऐसे नहीं की आपको पता चल जाएगा कि आप जान रहे हो| आप ब्रह्म को जियोगे और आपको उस अर्थ में पता भी नहीं होगा, जिस अर्थ में विचार होता है|

आमतौर पे आप जब कहते हो, “मैंने जाना”, तो आप उसका विचार करते हो, विचार का  ही दूसरा नाम आपका ही जानना है| कहा जा रहा है विचारातीत मन से ब्रह्म को जाना जाना जाता है| तो इसका अर्थ ये नहीं है कि आपको दावा करने के लिए सामग्री मिल गयी कि मैंने ब्रह्म को जान लिया है, मैंने अभी-अभी ब्रह्म को जाना| आप जियोगे ब्रह्म को|

श्रोता5: जब विचार वापस आते हैं तो समझ में आत है कि ओह!

वक्ता: तब भी यही समझ आता है कि कुछ गन्दा सा हो गया| खुला आसमान है वास्तव में तुम्हे दिखाई नहीं देता है| बादल आते हैं तो ये कह सकते हो, “कुछ चला गया|” क्या चला गया? ये नहीं कह सकते हो|

श्रोता5: तो जो कुछ चला गया, उसको ही नाम दे दिया इन्होंने भ्रम|

वक्ता: हाँ, और जो है ही और आच्छादित हो जाता है विचारों के पीछे|

श्रोता4: जो भी किसी आदमी का विचार आ रहा है वो उस आदमी के अंदर से आ रहा है और वो शरीर सम्बन्धी है और जैसे ही पता चलता है कि सारे विचार व्यर्थ है| उसके साथ ताज़गी आ जाती है|

वक्ता:जो भी’ कोई विचार नहीं हो सकता| विचार की दुनिया से वही ज़रूरी लगेगा जिस विचार को ज़रूरी मानने की शिक्षा दी गयी है| वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है और क्या नहीं, ये ध्यान में ही पता चलेगा|

विचार तुम्हे एक-दो कदम ले जाएगा, उसके बाद अब तुम पाओगे की उसकी सीमा आ गई| और उसकी सीमा वही है जो तुम्हारे अतीत से मिली है| शुरुआत के लिए ठीक है, पर दो कदम के बाद रुक जाओगे| फिर तो ध्यान चाहिए| गहरे ध्यान में उतरना पड़ेगा|

श्रोता4: सर, जैसे जब शरीर स्वस्थ है तो शरीर का ख्याल भी नहीं रहता है, पर जब बीमार पड़ते है तो शरीर का ध्यान आता है|

श्रोता7: सर, इसी तरह जब मन स्वस्थ होता है तो वो अपने स्वस्थ होने का एहसास भी नहीं कराता|

वक्ता: बेशक, बात ही पूरी यही है| इसीलिए ब्रह्म अपने होने का एहसास कभी भी नहीं करवाएगा| इतनी देर से यही कह रहा हूँ, तुम उसे जान नही सकते क्योंकि वो अपने होने का एहसास नहीं कराएगा| आनंद में रहोगे, मस्त रहोगे पर उसे जान नहीं सकते, जानोगे तो तभी जब कुछ गड़बड़ हो जाए|

श्रोता 5: जो आपने बात बोली थी कि आप एक ही हो, एक प्रमाण है की कुछ मिसिंग है| वो आपमें हो तो आपको पता ही न चले की कुछ है की नहीं|

श्रोता 7: उससे ये भी देख सकते हैं की, जो आपका  है “दोस्त वो जो तुम्हें तुम तक वापस लाए”| वो अपने होने का अहसास नहीं कराए |

वक्ता: सब जुड़ी हुई बातें हैं – ब्रह्म, दोस्त,प्रेम, स्वास्थ्य, प्रेम|

श्रोता 7: जो कोई भी पूरा है वो अपने होने का एहसास नहीं कराएगा|

वक्ता: बहुत, बहुत बढिया बात| तुम्हारे जीवन में वही सब शुभ है जो अपने होने का एहसास नहीं कराता, जिसका तुम्हें पता नहीं चलता| जो भी कोई तुम्हारी जिंदगी में अपनी मौजूदगी का एहसास कराए  वो घोर अशुभ है|“जो मन से न ऊबरे, माया कहिये सोय|” तो परखना चाहते हो की तुम्हारे जीवन में क्या क्या अशुभ है, तो बस ये देख लो की कौन-कौन है ऐसा है जो लगातार तुम्हारी जिंदगी में अपनी मौजूदगी प्रस्तुत करता रहता है, “मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ|”

दोस्त कौन? जो मौजूद से ज्यादा मौजूद है पर जिसकी मौजूदगी अपना एहसास नहीं कराती हो|

जो भी कुछ मन को अपने होने का एहसास कराए वो बात छोटी हो गई| सत्य भी अपने होने का एहसास कराता है मन को पर सत्य ज्यों-ज्यों अपना एहसास कराएगा, त्यों-त्यों मन गायब होता जाएगा या ये कह लो सत्य का एहसास ही तब होगा जब मन विलुप्त होना शुरू होगा| तो जब तक वो एहसास करेगा तब तक वो गायब हो जाएगा|

रामकृष्ण की कहानी है ना कि नमक का पुतला सागर का एहसास करना चाहता था कि सागर कैसा है और जैसे-जैसे एहसास करता गया, घुलता रहा, गायब हो गया| तो जैसे-जैसे मन सत्य का एहसास करेगा, एहसास तो कर लेगा पर गायब हो जाएगा|

लेकिन मन क्या चाहता है कि मैं बचा भी रहूँ और सत्य का एहसास  कर लूँ| वो हो नहीं सकता|

श्रोता4: क्योंकि आगे ऐसा होगा तो वो उसे कैद  कैसे करेगा|

वक्ता: मौज है पर पता नहीं है और ये तुम्हारे लिए बहुत अच्छी बात है| मन के लिए नहीं है, मन को मौज से कोई मतलब नहीं  है, उसे पता होना चाहिए| जैसे कोई ‘गार्ड’ हो कॉलेज में, अन्दर ज्ञान की क्या बात चल रही है उससे उसे कोई मतलब नही| बस अंदर कौन-कौन है ये पता होना चाहिए| मन उसकी तरह है जो फ़ालतू चीज है वो उसे पता होनी चाहिए, जो दो कौड़ी की चीज है वो उसे पता होनी चाहिए| असली बात उसे न भी पता हो तो भी कोई फर्क नही पड़ता|

बहुत सुन्दर नाच चल रहा है और वहाँ तुमने खड़ा कर रखा है एक चौकीदार और उसका काम क्या है? गिनना की  कितने लोग बैठे हैं, यही सब फालतू , की बिना मूल्य की बाते हैं उन सब पे नजर रखना| जैसे मन|अब उस बेचारे चौकीदार की बहुत बड़ी दुविधा है, नाच बहुत खुबसूरत है, सत्य का नाच चल रहा है पर नाच में जैसे ही वो डूबा उधर भूलेगा, नाच में जैसे ही वो डूबा तो चौकीदार खत्म हो गया| नमक का पुतला घुल गया, नाच में डूबेगा तो व्यर्थ की बातें  गिन नहीं पाएगा और जब तक व्यर्थ की बातें गिन रहा है तो नाच को नहीं  देख पाएगा और दिशाएँ भी दो उलटी हैं| नाच देखेगा तो लोगो की तरफ पीठ करनी पड़ेगी और लोगो को देखेगा तो सत्य की तरफ नहीं|

श्रोता4: मन ने सत्य कि तरफ पीठ कर रखी है|

मन की बड़ी दुविधा है खुद को बचाए या सत्य को पाए|



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: चार महावाक्य (Four Upanishadic Mahavaakyas)


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हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

 

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