अस्तित्व हँसेगा और नाचेगा भी तुम्हारे साथ, जगत नहीं नाचेगा|

‘ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोए ’| अस्तित्व हँसेगा और नाचेगा भी तुम्हारे साथ, जगत नहीं  नाचेगा| सम्भव नहीं है कि वो स्थिति आए कि तुम भी हँसो और जगत भी हँसे| जिस दिन तुम वाकई हँसे उस दिन जगत रोएगा ही क्योंकि जगत के होने का अर्थ ही है भ्रमों  का होना| भ्रम नहीं तो जगत कहाँ और तुम्हारे हँसने का अर्थ ही यही है कि भ्रम मिट गया, कोहरा छंट गया| भ्रम तो रोयेगा, तुम्हारा जगना उसकी मौत है| जगत तो रोएगा जब तुम वास्तव में हँसोगे| तो साफ़ समझ लो जब जगत को रोते देखो, तड़पते देखो अपने चारो ओर अपने कारण तो जान लेना की कुछ ठीक ही किया होगा| जान लेना की ठीक न किया होता तो ये लोग इतना बिलबिला न रहे होते| जान लेना कि कबीर को आज नाज है तुम पर क्योंकि यही तो सन्देश दिया उन्होंने, तुम्हारे ही लिये तो जिये वो| ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोए| 

और जग का अर्थ क्या है? जग का अर्थ कोई बहुत बड़ा नहीं है| हमने कहा जगत वो जो आदमी ने बनाया है, वो तुम्हारे मन से निकला है| तो जगत का अर्थ बस वही है तुम्हारे आस-पास के लोग, तुम्हारा करीबी परिवेश बस इतना ही है| जगत का अर्थ दुनिया की पूरी आबादी नहीं हैं| जगत में नदी या पहाड़, पर्वत शामिल नही हैं, जगत में तो यही लोग शामिल हैं, बस लोग व्यक्ति| और मैं साफ़-साफ़ ये निवेदन कर देना चाहता हूँ तुम जागोगे तो ये व्यक्ति रोएँगे| ये इसलिये रोएँगे क्योंकि ये इतने मूढ़ हैं की इन्हें पता ही नहीं  है की इनका हित किस में है| ये अँधेरे के इतने अभ्यस्त हैं कि रौशनी इनकी आँखे चौंधिया देती है, इन्हें कष्ट देती है|

बहुत रोएँगे, बहुत बिलखेंगे, इनके रोने, बिलखने, कलपने से पसीज मत जाना| वो रोना, बिलखना, कलपना, वो सब भी चाल है माया की, वो भी अँधेरे की शाजिश है अपने आप को कायम रखने की| उनके रोने से तुम पे जो असर होता है उसको शाजिश मानना और उनके रोने से उन पर जो असर हो रहा है उसे उनकी सफाई मानना| उसे उनके प्रायश्चित की शुरुआत मानना|



लेख पढ़ें:  हम हँसें जग रोये

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