गिरते हुए समाज में मेरे लिए सही कर्म क्या है?

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)

 

आचार्य प्रशांत: व्हाट इज़ करेक्ट एक्शन इन अ डेटेरिओरेटिंग वर्ल्ड, (गिरते हुए समाज में मेरा सही कर्म क्या है)|

समाज या दुनिया क्या है? हम हैं, आप हैं, जैसे हम हैं, आप हैं, वैसा ही संसार है। वैसा ही। अगर आप समाज को और संसार को गिरता हुआ पाते हैं, तो उसका कारण यही है कि इंसान गिर रहा है, हम और आप गिर रहे हैं । ऐसा तो नहीं हो सकता कि इंसान उठा हुआ रहे, और समाज पतित रहे। उर्ध्गामी है अगर मनुष्य, तो अधोगामी तो नहीं हो सकता ना, मनुष्य का समाज। ठीक है।

और जब समाज गिर रहा होता है, तो उसका अपना एक वेग होता है । उसका अपना एक वेग होता है। गिरता हुआ समाज औरों को और गिराता है। अपने साथ गिराता है। गिरते हुए समाज के मध्य में अगर आप बैठे हैं तो आपका धर्म है कि अपने आस पास गिरती हुई चीज़ों और इंसानो और व्यवस्थाओं के साथ आप स्वयं भी न गिर जाएँ। यही धर्म है आपका।

कृष्णमूर्ति पूछ रहे हैं, “क्या करें इस गिरते हुए संसार में?” स्वयं न गिर जाएँ। जैसे गिरते हुए का वेग होता है, एक कर्षण होता है कि वो औरों को भी अपने साथ नीचे खींच लेना चाहता है, गिरा लेना चाहता है। ठीक उसी तरह से न गिरने का भी अपना एक कर्षण होता है। उसका भी अपना एक महत्व होता है। जैसे समझ लीजिये कि गिरना संक्रामक होता है, न गिरना भी संक्रामक होता है  दस लोग मूर्खताएँ कर रहे हैं, तो ग्यारवेह पर भी प्रभाव पड़ता है मूर्खता करने का। पर अगर ग्यारहवाँ अडिग रहे और अपने आप को प्रभावित न होने दे, तो इस ग्यारहवें  का बाकी दस पर भी प्रभाव पड़ता है।

यही धर्म है आपका, कि जब दस लोग मूर्खता कर रहे हों, तो आप मूर्खता न करें। आप मूर्खता न करें तो उन दस के सुधरने की संभावना बढ़ जाती है।

एक फिल्म है जो मैं कई बार देख चुका हूँ, मेरे ख्याल से “ट्वेल्व एंग्री मेन” नाम है उसका। उसमें एक मुक़दमा चल रहा है, एक लड़के के ख़िलाफ़। जो लोग जज बन के बैठे हैं वो पूर्वाग्रह ग्रस्त हैं। एक अकेला है जो कहता है “मैं जानता नहीं, मैं जानना चाहता हूँ, मैं पहले से ही धारणा नहीं बनाऊँगा, ज़रा मुझे बताओ”। तो जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, और वो एक व्यक्ति तय करता है कि मुझे पूर्वाग्रहों के आकर्षण में गिरना नहीं है। मुझे बने रहना है, मुझे बचे रहना है। मुझे अपनी निष्पक्षता बरक़रार रखनी है। वैसे वैसे, उस एक के सामीप्य के कारण, उस एक की उपस्थिति के कारण, बाक़ी सब लोग भी धीरे धीरे सुधरने लग जाते हैं। यही समाज में धर्म है आपका। आप सुधरे रहिये, आपको देखे देखे और लोग भी सुधर जाएँगे।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति पर: इस गिरते हुए समाज में मेरे लिए सही कर्म क्या है?


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com प या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें:  सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s