पानी में घर मीन का, काहे मरे पियास

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आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास।

पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास।।

कबीर 

वक्ता: मुदित जी का सवाल है कि, अष्टावक्र जैसे ज्ञानियों ने कहा है कि आशा ही परमम दुखम। और दूसरी ओर कबीर कह रहे हैं कि आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस नीरास। ये बातें तो विरोधी लगती हैं। आशा, क्या आशा मन का विचलन नहीं है?और अगर है, तो फिर ये कैसी बात कि आशा तो गुरुदेव की।

मुदित जी आशा का दो तरफा आशय है। एक आशा होती है, एक कामना होती है कि और-और इकठ्ठा करता चला जाऊं, संसार से और ज़्यादा पाता चला जाऊं। ये पैदा होती है इस भाव से कि कोई कमी है मेरे भीतर। केंद्र से छिटके हुए मन को ये एहसास तो होता है कि कुछ छूट गया है, कोई भूल हो गई है, कोई कमी आ गई है। ये एहसास तो उसे होता है, पर ध्यान की अनुपस्थिति में साफ़-साफ़ समझ नहीं पाता कि क्या गलती हुई। क्यों एक खालीपन, सूनापन महसूस हो रहा है। कभी थोड़ा ध्यान दिया भी, कभी ये बात दिखी भी कि अपने घर से बिछड़ा हुआ हूँ, तो भी श्रद्धा के अभाव में ये हिम्मत नहीं हुई की कह सके कि घर वापस लौटना है। ऐसे मन के पास एक ही विकल्प रह जाता है कि अपने सूनेपन को संसार से भरे।

सूनापन है, सूनेपन की स्पष्ट प्रतीति है। कुछ कमी है, जीवन में कुछ, गायब है, बात पूरी बैठ नहीं रही है। कहीं कुछ है जो चुभ रहा है लगातार। भर-भर के भी रिक्तता का अनुभव है। ये हो रहा है उसको लेकिन इतना ना उसमें ध्यान है,  इतनी ना श्रद्धा है कि वो कहे, कि जान गया कि वास्तव में किसकी कमी थी और उसकी ओर जाऊँगा ।

तो वो एक नकली तरीका निकालता है अपने सूनेपन को भरने का, वो कहता है, “हाँ ठीक, खाली जगह तो है दिल में, पर उसको मैं संसार से भर दूँगा” अब उसे संसार से और-और-और बहुत कुछ चाहिए। ये पहले तरीके की आशा है। ये आशा कुछ पाने की है। और पा-पा कर के स्वभाव से और दूर जाने की है। ये आशा कुछ और नहीं करेगी, बीमारी बढ़ाएगी। इसी आशा के लिए अष्टावक्र कहते हैं कि आशा परम दुःख है, आशा परम दुःख है, ये पाने की आशा है और आशा समान्यत: पाने की ही होती है।

लेकिन कबीर जैसे कुछ विरल लोग भी होते हैं जिन्होंने एक दूसरी आशा को जाना है। वो आशा है छोड़ने की। पहले प्रकार की आशा है कि घर से दूर हूँ, और दूर हो जाऊँ। दूसरे प्रकार की आशा है कि घर से दूर हूँ, और पा-पा के दूर हूँ, इकठ्ठा कर-कर के, संचय कर-कर के दूर हूँ, खूब कमाई करी है मैंने, ऐसे दूर हूँ।

दूसरी आशा कहती है, “दूर हूँ, उम्मीद है एक दिन लौटूँगा । दूर हूँ, उम्मीद है एक दिन लौटूँगा। लेकिन ये आशा बड़ी दुसाध्य है। क्योंकि आशा का तो अर्थ ही होता है कुछ पाना, और ये जो दूसरी आशा है इसमें पाना नहीं खोना होता है। इकठ्ठा कर-कर के दूर हुआ हूँ तो खो-खो के ही लौटना पड़ेगा।

जिन सब को मन में जगह दी, जो कुछ अपना माना, उसी ने तो मेरी ये गति कर दी है कि आज निरंतर एक खालीपन का एहसास होता है। ये बात आसान नहीं है जाननी। इसके लिए बहुत ध्यानी मन चाहिए और श्रद्धा से भरा हुआ हृदय चाहिए। जिसको ये साफ़ एहसास हो सके कि मेरे कष्ट मेरी अपनी कमाई हैं। मैंने ही जितनी तरह की चेष्टाएँ करी और दौड़ लगाईं, उन्होंने ही मुझे यहाँ लाकर के पटक दिया है। इसके लिए बड़ी सूक्ष्म बुद्धि चाहिए। स्थूल बुद्धि को तो यही रहता है कि जो कर-कर के बीमार हुए हो, वही और करो तो स्वस्थ हो जाओगे। ये मूढ़ बुद्धि का, स्थूल बुद्धि का तर्क है। वो कहता है कि जो कर-कर के बीमार हुए हो, उसी को जरा और करो तो स्वस्थ हो जाओगे। ये निश्चित रूप से पागलपन का तर्क है। ये हमारी सामान्य आशा है कि और पा लूँ कुछ। सामान्य आशा का अर्थ है, “और पा लूँ कुछ, तो मन का छेद भर जाएगा”। भरता नहीं ऐसे, और बड़ा, और बड़ा, होता जाता है।

ब्लैक होल जानते हैं ना, उसमे जो डालिये वो उसी को खा जाता है। उससे हो कर के रौशनी भी नहीं गुज़र सकती वो रौशनी को भी खा जाता है। मन ऐसा ब्लैक होल है और आशा उस बेवकूफी का नाम है जो कहती है कि मैं इस ब्लैक होल को भर दूँगा। और बहुत मज़ेदार बात है कि ब्लैक होल भी वैसे ही बनते हैं, जैसे मन का होल बनता है। ब्लैक होल वो जगह होती है जहाँ पदार्थ इतने घनत्व में इकठ्ठा हो गया है, डेंसिटी इतनी ज़्यादा हो गई है कि उसका जो अब आकर्षण है, जो ग्रेविटी है, वो असीमित हो गई है। वो सब कुछ खींच लेगी। जहाँ कहीं भी पदार्थ इकठ्ठा होगा वो और पदार्थ को खींचेगा, हम जानते हैं ना ये? गुरुत्वाकर्षण का यही तो नियम है, पदार्थ पदार्थ को खींचता है। तो आपके जीवन में जितना पदार्थ उपस्थित होगा, वो उतने ही और पदार्थ को खींचेगा।

बीवी होगी तो गाड़ी चाहिए, बीवी ने किसको खींचा? गाड़ी को। गाड़ी है तो ड्राईवर चाहिए, ड्राईवर कई बार अपने साथ अपनी बीवी ले आएगा। अब पदार्थ, पदार्थ को खींच रहा है। एक बार एक मर रहा था मुनि, तो उसका एक शिष्य आया उसके पास बोला महाराज आप मर रहे हैं आपको बहुत कष्ट नहीं दूँगा, पर आपने जीवन भर में जो भी जाना है उसको बहुत संक्षेप में बता सकते हैं? तो मुनि बोलता है, मरते-मरते, “बिल्ली मत पालना”(सभी हँसते हैं)। बिल्ली मत पालना। और मर गया। ये हैरान कि ये कौनसी जीवन भर की शिक्षा, ये कैसा सूत्र दिया है कि बिल्ली मत पालना, बिल्ली मत पालना। फिर एक दूसरे सज्जन आये, उन्होंने कहा बताता हूँ कहानी पूरी।

ये अपना रहते थे खुले आसमान के नीचे, वृक्षों के नीचे बैठते थे। अपना चिंतन-मनन करते थे, कुछ पढ़ते थे, कुछ लिखते थे, ऐसे इनकी ज़िंदगी चल रही थी, मस्त थे। ये बैठे रहते थे तो एक चूहा आकर के कभी पीछे से इनका कोई, लंगोटी में, काट दे; कभी कुछ हाथ में लेके पढ़ रहे हैं तो उसको थोड़ा कुतर दे, तो बड़े परेशान हुए। तो इनसे जो लोग मिलने आते थे कभी-कभार, तो उन्होंने कहा – ‘ऐसा करिये बिल्ली रख लीजिये। बिल्ली से ये चूहा आपके आस-पास नहीं आएगा।’ तो उन्होंने कहा, ‘मैं कहाँ पाऊं बिल्ली?’ तो लोग आकर के एक बिल्ली दे गये। कि ये बिल्ली रखिये, इसके कारण चूहा आस-पास नहीं आएगा। ठीक है बिल्ली रहने लगी।

अब बिल्ली रहे तो उसे खाना भी चाहिए। इनके पास कहाँ कुछ खाना है देने को। तो लोग आते थे, लोग उन्हें सुबह-शाम कुछ दूध दे जायें, कुछ कर जायें। पर लोगो पर कब तक आश्रित रहें। तो जो बिल्ली दे गए थे उन्होंने कहा ‘एसा करते हैं महाराज आपको एक गाय भी दे देते हैं। तो गाय के दूध से बिल्ली अपना रहेगी और आपको भी दूध मिलता रहेगा।‘ उन्होंने कहा ‘ठीक है ले आओ।’ गाय आ गई, बंध गई। अब इनका समय बहुत लगने लगा; गाय की सेवा करो, उसको भूसा और खली और ये सब दो, नहलाओ-वहलाओ भी, दूध भी दूहो। फिर बिल्ली को खोजो, उसके कटोरे में दूध रखो, कई बार बिल्ली का दूध चूहा पी जाए। तो ये सब झंझट देखो ताको। इनका जो समय था चिंतन-मनन का, पठन-पाठन का वो इनमे जाने लगा। थोड़े परेशान हुए, लोगो ने पूछा महाराज, “क्या परेशानी है?”तो बोले “ये ऐसा-ऐसा है, समय बड़ा ख़राब होता है गाय की देखभाल में।” तो उन्होंने कहा, “कोई बात नहीं एक नौकरानी लगा देते हैं, वो सुबह-शाम आया करेगी, और गाय की सफाई-वफाई करके, गोबर-वोबर हटा कर के, दूध-वूध दूह कर के, भूसा-वूसा दे कर के चली जाया करेगी।”

तो वो आने लगी, अब महाराज जंगल में रहते थे, सुबह भी एक औरत आए, शाम को भी एक औरत आए, तो जो होना था वही हुआ। एकांत, चूहा, बिल्ली, गायें, चूहा-बिल्ली का खेल शुरू। गांव वालों को पता चला कि ये तो गाय-बैल का मामला बन गया है, तो उन्होंने कहा महाराज क्यों बुढ़ापे में नाम ख़राब करते हो इससे शादी ही कर लो। गांव की बेज्ज़ती हो रही है कि इस ग़ाव के साधु-संयासी ऐसे हैं। तो उन्होने और कह दिया, ठीक है चलो कर दो। अब आती ही है वैसे भी, सुबह-शाम रहती है, दिनभर भी रह लेगी, रात में भी रह लेगी। क्या दिक्कत हो गई? शादी हो गई। वैसे तो महाराज संयासी थे तो शरीर योग द्वारा हट्टा-कट्टा था, बुढ़ापे में भी दो चार औलादें पैदा हो गईं। और ये सब कर-करा के, मरते-मरते तक महाराज पूरे गृहस्थ बन गए थे। पूरे गृहस्थ।

पदार्थ, पदार्थ को खींचता है, पदार्थ, पदार्थ को खींचता है। एक कदम रखोगे अगला रखना ही पड़ेगा। तो सूत्रों का सूत्र है कि बिल्ली मत पालना। जिसने बिल्ली पाली, वो पूरी दिल्ली पालेगा (सभी हँसते हैं)। सब खिंचा चला आएगा बिल्ली के पीछे-पीछे।

ये आशा है पहले तरीके की। कि चूहा है, दुःख दे रहा है तो क्या कर लो? बिल्ली पाल लो। भूल गए की चूहे के होने से दुःख है, बिल्ली के और होने से दुःख कम नहीं होगा, दूना हो जाएगा। समझना बात को, दुःख है चूहे के होने से। बिल्ली के होने से जो ‘होनापन’ है वो शून्य नहीं हुआ, कितना हो गया? दुगना हो गया (सभी एक स्वर में)। अब बिल्ली का होना है, वो भी कष्ट दे रहा है तो क्या आ गई, गाय। भूल गए तुम कि बिल्ली के होने से कष्ट है। पर तुमने क्या किया? तुमने ये नहीं किया कि बिल्ली से मुक्ति पा लूँ। तुमने क्या किया? तुमने कहा बिल्ली को पालने के लिए अब गाय भी चाहिए। ये हमारी सामान्य संसारी आशा है। थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है। कुछ है, जिससे दुःख मिल रहा है। कुछ है जिससे दुःख मिल रहा है, तो बुद्धि ये नहीं चलती कि इसके होने से दुःख मिल रहा है इसको ही हटा दो। बुद्धि ये चलती है कि ये अधूरा है और पा लो ताकि ये पूरा हो जाए। और पूरा कभी होता नहीं। पूरा कभी होता नहीं। ये सामान्य आशा है जो कहती है, “और पा लो। और पा लो।”

कबीर जिस आशा की बात कर रहे हैं वो पाने की आशा नहीं है। वो आशा कहती है, “जो है वही तो दुःख है। उसको हटा दो।” इसीलिए कह रहे हैं कि आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास । गुरु का तो काम ही है -छीन लेना। हटा देना। वो देता कहाँ है? उसका तो काम ही है ख़त्म कर देना ना?

तुम अपनी गाड़ी लेकर उसके पास जाओगे, कहोगे दो टायरों में पंक्चर है, दो टायर अभी चल रहे है। तो जो टायर अभी दो चल रहे होंगे वो जाके उनमे सुई घुसा  देगा। कहेगा,  “ठीक, हो गया इलाज।” तुम शायद ये सोच के गए थे कि जो दो टायर पंक्चर है वो उनका कुछ इलाज करेगा। वो कहेगा, “ना-ना-ना-ना; गलती, रोग उन दो टायरों में नहीं है जो पंक्चर हो गए। तुम्हारा रोग है ये दो टायर जो अभी पंक्चर नहीं हुए हैं, तो मेरा काम है इन दो टायरों को भी खत्म कर देना, अब तुम मुक्त हो। अब तुम मुक्त हो, अब पूरी दुनिया तुम्हारी है। कहाँ हाइवे पर फँसे हुए थे?” बात समझ में आ रही है?

गुरु पंक्चर मैकेनिक नहीं है कि तुम वहाँ पहुँच जाओ अपने फटे हुए टायर लेके और वो बैठ के सिल रहा है। उसका तो काम है कि जो तुम्हारी चलती हुई गाड़ी है, उसको बिलकुल खत्म ही कर दे। वही तो दुःख है तुम्हारा। वही तो बिल्ली है, वही तो गाय है, वही तो गोबर है, उसी के बोझ तले तो मर रहे हो। जब तक तुम्हारी गाड़ी में आग नहीं लगेगी, तुम ज़मीन पर उतरोगे कैसे? और गाड़ी भी ऐसी ही है, सबकी ऐसी ही होती है, दो टायर चल रहे है, दो टायर घिसट रहे है, किसी तरह से खीच रहे हो। सब की ही गाड़ी ऐसी होती है। वो कहावत है ना कि गृहस्थी की गाड़ी में चार पहिये होते है, उसमें आधी बात कही ही नहीं गयी। जिसमें से दो पंक्चर होते है। और खिंच रही है, खिंच रही है। कभी गाड़ी चलाई है, पंक्चर? कितना आनंद है उसमें? खिंच रही है। गुरु का काम ये नहीं है कि उसकी रिपेयर कर दे।

तो दो तरह की आशाएँ – दूजी आस निरास । दूजी आस से तो निराश हो जाना है। दूसरी आशा छोड़ देनी है। दूसरी आशा कौनसी? वही, कि बिल्ली है तो गाय पालो। दो प्रकार की आशाएँ हैं, उस प्रकार की आशा को छोड़ देना है। एक ही आशा रखनी है कि मुक्त हो जाऊँ, हल्का हो जाऊँग।

गुरु दो काम करता है, एक तो ये कि जो तुम इकठ्ठा करके बैठे हो उससे तुमको मुक्त कर देता है, और दूसरा काम कि पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास । वो तुम्हें ये स्पष्ट एहसास भी दिलाता है कि तू क्यों इकठ्ठा कर रहा था, जो महत्वपूर्ण है वो तुझे मिला ही हुआ है। पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास। तेरी सारी प्यास झूठी है, तेरा ये इकठ्ठा करना ही तुझे ये भ्रम दे रहा है कि तू प्यासा है। तू प्यासा है ही नहीं, ये सब छोड़ के देख। तुझे ज़रूरत ही नहीं है, ये सब, प्रपंच जुटाने की।

पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास । क्या, ज़रूरत क्या है ये सब करने की? ठीक-ठीक बता, क्या कमी आ जाएगी? ये ना हो तो क्या कमी आ जाएगी? और ठीक-ठीक बता कि इन सब के होने से तुझे मिला क्या है? सिर्फ इतना हुआ है कि तुझे ‘आदत’ लग गई है।

आदत की बात है और कुछ भी नहीं है। जिसको आप कहते हैं मेरा जीवन वो सिर्फ एक आदत है। एक लम्बी चौड़ी आदत। उसमे मिल कुछ नहीं रहा है, कोई शांति, कोई प्रेम नहीं है उसमें। बस आदत है। कुछ चीजें हैं-उनके प्रयोग की आदत है; कुछ चहरे हैं-उन्हें देखने की आदत है; कुछ विचार हैं-उन्हें सोचने की आदत है; बस आदत है। और आदत में कोई सत्य तो होता नहीं। एक मनोस्थिति है। जब तक है तब तक बड़ी भारी लगती है, जब नहीं है तो कहोगे, “अरे! इसमें फंसे  हुए थे? इसमें तो कुछ था ही नहीं, क्यों फंसे  हुए थे?” आदत।

गुरु की एक बड़ी अच्छी परिभाषा हो सकती है।

 कौन है गुरु? जो आदत से मुक्ति दिला दे। 

आदतों को तोड़ दे, और याद रखना हर आदत के साथ तुम थोड़ा-थोड़ा टूटते हो। आदत यूँ ही नहीं जाती क्योंकि तुम, और कुछ हो ही नहीं तुम सिर्फ आदतों के पिंड हो। तुम जिस भी बात को अपना कहते हो, जिसके साथ तुमने अपने आप को परिभाषित किया है, वो तुम्हारी एक गहरी आदत है। आदत के साथ तुम भी जाओगे। और तुम्हारे जाने का अर्थ है केंद्र की ओर वापस आना।

तुम कहते हो, “मैं आक्रामक हूँ”| ये आक्रमण ही हटना होगा। ये गया नहीं की तुम्हें मुक्ति मिलेगी। यही तो बोझ है तुम्हारा। तुम कहते हो तुम किसी के मोह में, लगाव में पड़े हो; बस वहीँ, वहीँ फँसे हो, उसी को जाना होगा। वो गया नहीं कि तुम मुक्त हो जाओगे। वही बीमारी है तुम्हारी। तुम कहते हो बड़े ज्ञानी हो, जान गए हो, दूसरों को बताने में बड़ा रस है तुम्हारा; वहीँ, वहीं, वहीँ चोट करनी होगी। ये आदत टूटेगी नहीं कि तुम मुक्त हो जाओगे। तुम कहते हो ना, मैं तो एकांतवासी हूँ, ज़्यादा बोलता-चालता नहीं। मैं तो चुपचाप रहता हूँ, अन्तर्मुखी हूँ ना! यही रोग है तुम्हारा, यही टूटेगा और मुक्त हो जाओगे।

अपनी मोटी-मोटी, सबसे बड़ी-बड़ी, आदतों को पहचान लो और निर्मम होके उन्हें तोड़ डालो। यही मोक्ष है, इसके आलावा और कुछ नहीं। लेकिन बड़ा मुश्किल होगा, खुद तोड़ पाना, क्योंकि तुम ही कौन हो? आदतों के पिंड। अब आदत, आदत को तोड़ दे, बड़ा मुश्किल होता है, इसलिए गुरु की ज़रूरत होती है, अपने करे तुम तोड़ नहीं पाओगे। ऐसी सी ही बात है कि तुम कहो इस हाथ से कि अपने आप को हरा दे। तुम करोगे नहीं। न करने की तुम्हारी सामर्थ्य होगी, न इरादा। पहले तो इरादा ही नहीं बनेगा, इरादा कभी बन भी गया तो पाओगे कि सामर्थ्य नहीं है। गुरु इसीलिए चाहिए। प्यारा नहीं होता है गुरु। कसाई जैसा ज़्यादा होता है। क्योंकि उसका काम ही है, जो टायर अभी चल भी रहा है उसे भी पंक्चर करो। इसी टायर ने ही तो उम्मीद बांध रखी है कि शायद बाक़ी दोनों भी ठीक हो जाएं।

दो टायर पंक्चर हैं, दो अभी चल रहे हैं, इन्ही दो की वजह से तुमने बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं कि ‘एक दिन’, होंगे कामयाब एक दिन। आज दो टायर है कभी चार भी होंगे। ये दो हटा दो, चार की उम्मीद अपने आप खत्म हो जाएगी। फिर ठीक हो जाओगे। लोग ९९ के फेर की बात करते है। ९९ का फेर होता है कि ९९ मिल गए तो १ और चाहिए, न। फेर ९९ का नहीं होता, फेर एक का होता है। ये न कहो कि ९९ मिल गए हैं तो गलती हो गई है, एक का मिलना ही गलती है। जिसको एक मिला हुआ हो, वो उससे छीन लो एक। वो फिर मुक्त हो जाएगा, खुश। हाँ अब ठीक है।

पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास। जिस समय, मछली से मिनेरल वाटर की बोतल छीनी जाती है, उस समय तो मछली को यही लगेगा कि बड़ा कमीना था, मैंने ज़िंदगी भर मेहनत कर-कर के, ये मिनेरल वाटर कमाया था, और ये गुरु का बच्चा, दो चार गालियाँ  जोड़ लो, मेरी १०० मी.ली. की कमाई छीन ले गया। अब मैं पीउंगी क्या? तो तब तो कसाई जैसा ही लगेगा।

छिनने के बाद जब बेसहारा हो जाओगे, निरुपाय हो जाओगे, कहीं और से पानी मिलेगा ही नहीं, तब तुम्हें ऐसा लगेगा कि मौत खड़ी है सामने, तुम्हारे विचार तुमसे यही कहेंगे कि जो कुछ मेरा था वो तो सब छिन गया, मैं बचा ही नहीं, मौत खड़ी है सामने। तुम आँख बंद कर लोगे मौत के लिए तैयार हो जाओगे। कि सब खत्म हो गया, सब खत्म हो गया, ज़ोर से रोओगे, सब खत्म हो गया। आँख बंद करके प्रतीक्षा करोगे, अब मरा, अब मरा, अब मरा, अब मरा। वक्त बीतता जाएगा तुम कहोगे मर क्यों नहीं रहा। आँख खोलोगे, कहोगे मरा नहीं। मिनेरल वाटर की तो ज़रूरत ही नहीं थी, व्यर्थ ही कमा रहा था, पानी में ही तो था। ये नया जीवन है, अब तुम द्विज हुए। पुराना तो मर ही गया, सही में मर गया।

पुराना कौन था? पुराना वो था जिसे समुद्र में रहते हुए भी बोतल में बंद पानी की आवश्यक्ता थी। वो तो मर गया, वो सही में मर गया। अब ये नया जन्म, ये वो है जो, अब वो सब चाहता ही नहीं जिसके पीछे तुम पागल थे। लेकिन इसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट से तो गुज़रना ही पड़ा। श्रद्धा जितनी ज़्यादा होगी, कष्ट उतना कम होगा। श्रद्धा होती है तो वो यही कहती है कि जो छीन रहा है वो हितैषी है मेरा, इस छिनने में भी मेरा कुछ भला ही होगा, नहीं तो छीनता नहीं। श्रद्धा का इतना ही अर्थ है। श्रद्धा का इतना ही अर्थ है।

श्रद्धा का इतना ही अर्थ है कि मैं जाकर के गुरु की गर्दन न पकड़ लूँ। उपनिषदों में शांति पाठ है जिसमें गुरु और शिष्य मिल कर के प्रार्थना करते है कि हममें एक-दूसरे के प्रति द्वेष भाव न आये। और गुरु से ज़्यादा द्वेष भाव तुम्हारे मन में किसी के प्रति आएगा नहीं। तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारी कार के टायर पंक्चर किये जा रहे हैं। तुम्हारी इच्छा तो यही होगी कि इस आदमी को आज यही पर खत्म ही क्यों न कर दूँ ! मेरी बरसों की कमाई, इसने पंक्चर करा। और दूसरी बात धोखा दिया। मैं किसलिए इसके पास आया था? मैं सुख मांगने के लिए इसके पास आया था। और इसने ये दिया मुझे, धोखेबाज़। ज़रूर ये जलता है मुझसे, इसके अपने पास तो कार है नहीं। मेरी कार से जलता है। खुद न बीवी है न बच्चे, मेरी छुड़वा रहा है। ईर्ष्या है और कुछ नहीं है।

जब कार जाती है, तो दुनिया खुल जाती है। देखो, जब लाओ-त्जू  तुम्हें समझाता है ना  कि यूज़लेस हो जाओ, तो उसका मतलब समझना बे-कार हो जाओ (सभी हँसते है)। वो बात बहुत गहरी है, सूत्र पकड़ा नहीं लोगो ने।

बे-कार हो जाओ। दो टायर पंक्चर है, बाकी दो में आग लगाओ। (हँसते हुए ) छोड़ो उसे।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: पानी में घर मीन का, काहे मरे पियास (Your thirst is false)


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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

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