मन अनजाने से भी डरता है और जाने हुए से भी

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प्रश्न:

कृष्णमूर्ति कहते हैं कि

“हमअननोन’ से तो डरते ही हैंऔर तो और, हमनोनसे भी डरते हैं”

 ऐसा क्यों?

आचार्य प्रशांत: वास्तव में जो अननोन भी है, वो है तो मानसिक ही ना। मन, अननोन भी जब कहता है तो अननोन की एक छवि तो रखता ही है ना कि वो अननोन है।

मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है। क्योंकि जो कुछ भी सीमित है उसे ख़त्म हो जाना है। और मन बिना छवि बनाये जी नहीं सकता। तो मन कहने को तो, नाम मात्र को तो कह देता है कि ‘अननोन’ (अज्ञात) । ‘अननोन’ का विशुद्ध अर्थ तो यह हुआ ना, कि उसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते । अगर कुछ नहीं जानते तो ये भी कैसे जानते हो कि उसके बारे में नहीं जानते । मन, कहने को तो कह देता है ‘अननोन’, पर अननोन के बारे में भी वो नॉलेज रखता है। क्या नॉलेज? कि कुछ है । ऐसा है, कि वैसा है। कुछ न कुछ रखता है छवि। मन जो भी छवि रखता है वो सीमित होगी, और जो भी सीमित होगा वो मन को डरायेगा।

तो इसीलिए मन का डरना तय है, वो दाएँ चले तो डरेगा, बाएँ चले तो डरेगा। जिधर को भी चलेगा, अगर छवियों पर चल रहा है, तो डरेगा। मन देखे हुए से भी डरेगा, मन अनदेखे से भी डरेगा। क्योंकि जिस को मन अनदेखा कहता है उसको भी अपनी वृत्ति के चलते कुछ छवि तो दे ही रहा है, वरना कैसे कहता। आप क्या जब सुषुप्ति में होते हो तो किसी भी चीज़ को अनदेखा कह पाते हो? अनदेखा कहने के लिए भी तो चेतना चाहिए ना? जब आप सुषुप्ति में होते हो, गहरी नींद में, तो क्या कह पाते हो कि आपको कुछ नहीं पता? ये भी तो आप चेतना में ही कह पाते हो ना, जागृत अवस्था, कि आपको कुछ नहीं पता? यानी कि जो कुछ भी, चेतना के दायरे में घट रहा होगा वो डर ही होगा।

चेतना मात्र ही डर है, क्योंकि चेतना द्वैत है । चेतना में हमेशा जो हो रहा होता है, उसमें मैं और संसार दो होते हैं । जहाँ ये दो आये, तहाँ डर है – द्वितीयाद्वै भयं भवति । दो हुए नहीं कि डर हुआ। यानी की चेतना आयी नहीं, कि डर हुआ । चेतना में ही कहते हो कि जानता हूँ, और चेतना में ही कहते हो, कि नहीं जानता हूँ । कहोगे कि – जानता हूँ, तो भी डर, कहोगे – “नहीं जानता हूँ”, तो भी डर, क्योंकि हैं तो दोनों चेतना में ही घटी हुई घटनाएं । चेतना ही डर है, द्वैत मात्र डर है ।

श्रोता: ये बात तो साफ़ है कि चेतना ही डर है क्योंकि वहाँ द्वैत है। ओशो की एक पुस्तक है, “अजहुँ, चेत गंवार”, तो वो वहाँ पे किस चेतना की बात कर रहे हैं?

वक्ता: वो वहाँ परम चेतना की बात कर रहे हैं। जब संत कहते हैं कि “अजहुँ चेत गंवार”, जब आम बोलचाल की भाषा में भी बोला जाता है, कि अब तो चेत जाओ। या कि, कबीर कहते हैं, अब उठ जाओ, जाग जाओ, अब जाग मुसाफिर भोर भई। तो उस चेतना का, या उस जागृति का अर्थ सामान्य चेतना या सामान्य जागृत अवस्था नहीं है। उसका अर्थ है, ‘चेतनातीत’ चले जाना। सामान्य चेतना के पार बोध होता है, शान्ति होती है, मौन होता है। वहाँ चेतना ख़त्म हो जाती है। चेतना जैसे जैसे उठती जाती है, वैसे वैसे ख़त्म हो जाती है। जैसे तलवार की धार। तलवार पर धार जितनी महीन होती जाएगी उतना ज़्यादा तलवार मिटती जाएगी। चेतना भी ऐसी ही है। चेतना जितनी गहरी और जितनी तीक्ष्ण होती जाती है, उतना ज़्यादा वो मिटती जाती है।

तो जब संत समझाते हैं कि अब चेतो, तो वो यही कहते हैं, कि अब चेतना के पार जाओ। चेतना इतनी बढ़ाओ, इतनी उठाओ, कि चेतना के पार निकल जाओ। कॉन्शियसनेस्स (चेतना)और अवेयरनेस (बोध)का अंतर है। कॉन्शियसनेस्स जब गहरी हो जाती है, तो मौन हो के, ख़त्म हो कर के जो बचता है वो निःशब्द, शून्य, शांत, अवेयरनेस है। वहाँ द्वैत नहीं है। चेतना जब तक है, वहाँ द्वैत है।

श्रोता: सर, चेतना की उपयोगिता क्या है? एक्सिस्टेंस में चेतना है ही क्यों?

वक्ता: है बस। ‘क्यों’, नहीं पूछते। क्यों माने कारण। क्यों माने?

श्रोता: कारण

वक्ता: इसलिए हमेशा समझाता हूँ, ‘क्यों’ नहीं पूछो। ‘क्या’ पूछो। ‘क्यों’ पूछना, दुःख को आमंत्रण देना है । ‘क्या’ पूछो, ‘क्या’? ‘क्या’ है? अगर दुःख है तो नहीं चाहिए। ‘क्यों’ है दुःख, ये नहीं पूछना। अगर दुःख है तो नहीं चाहिए, हटाओ बाबा हटाओ, ये माल नहीं चाहिए। हटाओ, हटाओ।

ये मत पूछो किस फैक्ट्री से आया, ये मत पूछो कितने का है, ये मत पूछो इसके साथ कुछ मुफ्त मिल रहा है क्या । जैसे ही देखो कि माल का नाम क्या है?

श्रोता: दुःख

वक्ता: तहाँ, तुरंत कहो, “बाबा हटाओ, बाबा हटाओ”। ये मत पूछना किस ब्रांड का है। फंस जाओगे। ये मत पूछना कि बाबा आपकी दुकान पर क्यों है। फंस जाओगे। देखा नहीं कि दुःख है, कि हटाया। देखा नहीं कि आकर्षण है, कि उत्तेजना है, कि हटाया ।

श्रोता: शायद इसीलिए कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, “कैन द माइंड बी एम्प्टी ऑफ़ ऑल इट्स पास्ट, येट रिटेन नॉलेज एस मेमोरी एंड येट फंक्शन। ..

वक्ता: ज्ञान रहे । ज्ञान रहे, लेकिन उस ज्ञान के कोई अर्थ न रहें। ज्ञान रहे, पर ज्ञान के कोई अर्थ न रहें। हर्ट का मतलब होता है कि अतीत अब अर्थवान हो गया। अतीत अब क़ीमती हो गया। अतीत अब आपकी आत्म-परिभाषा से जुड़ गया। अतीत अब आपके, आत्म मूल्य से जुड़ गया। आपने अपना जो मूल्यांकन करा, वो अतीत पर आधारित हो गया। अतीत रहे, सामग्री की तरह मौजूद रहे। वो सामग्री और आपकी आत्म परिभाषा, आपकी आत्म-छवि, दोनों एक दूसरे से मुक्त रहें। आप क्या हैं?

मैं वो, जिसकी कोई छवि नहीं हो सकती। अतीत क्या है? वो जो छवि देने को आतुर रहता है। मैं अतीत को सफल नहीं होने दूँगा, मैं मुक्त रहूँगा। अतीत मौजूद रहे, दूर मुझसे। मैं अतीत से संबंधित हो कर के नहीं जियूँगा। मैं अतीत को यह अनुमति नहीं दूंगा, कि वो मुझे व्याख्याहित करे, मुझ पर चढ़ कर बैठ जाए। होगा, मौजूद है। जैसे इ-मेल का पासवर्ड, आप जानते हैं उसको। लेकिन वो आपका जीवन निर्धारित नहीं करने लग जाता।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति पर: मन अनजाने से भी डरता है और जाने हुए से भी


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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

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