ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

 

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आचार्य प्रशांत: अच्छा, आप ने एक चीज़ गौर करी है? यूँ ही, कहीं रहो, घर में, बाज़ार में, बोलना आसान होता है। यहाँ आते हैं, शुरुआत में, बोलना थोड़ा सा अटक जाता है और फिर कुछ देर बाद, या आधे घंटे बाद, यहाँ भी बोलना आसान हो जाता है, बहाव आ जाता है। बाज़ार में भी शब्द बोल रहे होते हैं, कुछ देर बाद यहाँ पर भी शब्द झरने लगेंगे। दो बहाव दिख रहे हैं हमको, और बीच में एक ये अंतराल आता है, अड़चन का। ये क्या है?

श्रोता: एक तो ये है कि पहल कौन करे?

वक्ता: ये सब बाज़ार में क्यों नहीं होता? ‘पहल कौन करे?’ ये सब कुछ।

श्रोता: और दूसरी यह कि यहाँ पहुँचने तक सवालों की लड़ियाँ होती हैं दिमाग में, और यहाँ बैठते ही कागज़ है, कलम है और मुझे लिखने का मन कर रहा है पर मेरा दिमाग खली हो चुका है|  वो सारे सवाल याद ही नहीं आते हैं।

वक्ता: और बहुत सारे सवाल होते हैं, उनको आप लिख लेते हैं, किसी को व्हाट्स ऐप करना है, किसी दुकानदार से दाम पूछने हैं, किसी और चीज़ के बारे में कुछ तहक़ीक़ात करनी है। आसानी से कर लेते हैं। मैंने कहा, दो बहाव हैं, और बीच में अड़चन। दो बहाव हैं, एक बहाव है बाज़ार का और एक बहाव इस सत्र में भी आ जाता है। सत्र आरम्भ होने के थोड़ी देर बाद। बीच में सब गटमट हो जाता है। ये क्या है? ये कौन से दो बहाव हैं, और बीच में आने वाला वो रोड़ा कौन सा है?

श्रोता: मुझे लगता है कि बाज़ार में एस्केप करना बहुत आसान है। पर यहाँ हम जो बैठे हैं, सबका एक दूसरे के बारे में कोई परसेप्शन है। और सवाल पूछने से यह डर है कि कुछ ऐसा परसेप्शन न बन जाए जो हम नहीं चाहते।

वक्ता: तो ये जो परसेप्शन है, ये जो डर है,  ये पंद्रह बीस मिनट बाद कहाँ चला जाता है? अभी हम लोग बात करने लगेंगे, बीस मिनट में  देखेंगे कि सब मज़े में बोल रहे हैं। बाज़ार में भी बहाव आ जाता है, कुछ देर बाद यहाँ भी बहाव आ जाता है। बीच में ठहराव रहता है। और यह ठहराव, स्थिरता या शान्ति का नहीं है, ये कुछ और है।

ये ऐसा है, जैसे नदी का पानी बहने की जगह जम गया हो। कल मैं देख रहा था, उत्तर की बहुत सारी नदियों की यही दशा है, वो जम गयी हैं, बह ही नहीं रही। उसमें बड़ा मज़ेदार खेल हो रहा है। जो नदियाँ दक्षिण से उत्तर की तरफ बह रही हैं, वो अपने स्रोत के पास तो पानी है, पिघली हुई हैं, क्योंकि दक्षिण की तरफ से आ रही हैं। जहाँ अभी तापमान ऊँचा है। जब आगे की और बह रही हैं, तो तापमान कम है, गिरा हुआ है, तो वहाँ पर जम जा रही हैं। अब पीछे से तो पानी आ रहा है, स्रोत की तरफ से, पहाड़ों की तरफ से तो पानी आ रहा है। और नदी जब तक उत्तर पहुँच रही है, साइबेरिया तक पहुँच रही है, तो वहाँ पर पानी जमा हुआ है। नतीजा जानते हैं क्या हो रहा है? वहाँ बड़े दलदल बन रहे हैं क्योंकि स्रोत तो आतुर है कि बहाव हो, वो तो पानी भेज रहा है। आगे मामला जम गया है, बह नहीं पा रहा, तो पीछे का पानी आगे आता है और तमाम दलदल बन जा रहे हैं ।

मुझे नहीं मालूम, उस दृश्य का इस दृश्य से संबंध कितना है। कौन से बहाव हैं ये? एक बहाव बाज़ार में रहता है, एक बहाव यहाँ भी आ ही जाता है। बीच में ये क्या आ जाता है?

श्रोता: मैं सामने वाले को पढ़ने की कोशिश में लगा होता हूँ, इसलिए एकदम से नहीं बोलता, पहले समझने की कोशिश करता हूँ।

वक्ता: ये काम बाज़ार में क्यों नहीं करते? वहाँ क्यों झटपट मुँह खोल देते हो? जब जाते हो दुकानदार के पास, “सिम कार्ड चाहिए”, तो पहले उसका व्यक्तित्त्व परखते हो, पहले पूरा माहौल नापते हो, उसके बाद बोलते हो क्या? या घुसते ही, अगर भीड़ देखते हो तो चिल्ला कर दूर से ही बोल देते हो।

श्रोता: बैठक के अंदर, मैं कार्य के नियम नहीं समझता। बाज़ार मैं बचपन से जाता रहा हूँ, तो वहाँ मैं कार्य के नियम समझता हूँ|

वक्ता: बैठक भी ये कोई पहली नहीं है। क्या पहली है? बचपन से बीसियों बैठकें देखी होंगी।

श्रोता: जो हमारा अनौपचारिक  व्यवहार है, वो प्रतिक्रिया करने वाला होता है। जैसे हमारे पैटर्न होते हैं, वैसे ही हम प्रतिक्रिया करते हैं। यहाँ पर हमारा उद्देश्य है कि हम उस पैटर्न को तोड़ें। यहाँ पर भी जब भी, जैसा अवसर होगा, हम बोलेंगे, चीजें अपने आप निकलेंगी|

श्रोता: सर, मुझे लगता है, जब  प्रसंग दिया हुआ है, तब उस पर बात करना आसान होता है। कॉन्टेक्स्ट सेट करना, जहाँ पर शब्द अगले बन्दे के मौन को तोड़ सकती हैं, ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है।

वक्ता: अच्छा, इसका ताल्लुक क्या सही में दूसरे से है? कोई बात कर रहा है बैठक की, कि जैसे यहाँ पर दूसरे बैठे हैं, इसीलिए असर पड़ रहा है। अभी भी तुमने बात करी कि तुम्हारे शब्दों का दूसरे के मौन पर क्या असर पड़ेगा। क्या वाकई बात दूसरे की है? मान लो कोई दूसरा न होता, मात्र हम और तुम होते। तो क्या तुम्हें बोलने में ज़्यादा सुविधा होती?

मैंने तो ऐसा नहीं देखा है। मैंने तो देखा है कि अगर अकेला बंदा भी सामने बैठा हो, तो भी खामोशी कुछ ऐसी ही रहती है। बात क्या वाक़ई दूसरे की है?

श्रोता: आचार्य जी, उस टाइम पर आपकी स्टेट ऑफ़ माइंड क्या है, उस पर भी निर्भर करता है – प्रश्न बहुत आ रहे हैं, या स्थिर हैं अंदर से।

वक्ता: एक भाव रहता है, जब आप शॉपिंग मॉल में होते हो। एक भाव रहता है, जब आप सड़क पर गपशप कर रहे हो। एक भाव अब यहाँ पर भी आ रहा है धीरे-धीरे। एक ही हैं? वो चेहरे एक ही हैं जो सड़क पर गपशप कर रहे होते हैं और यहाँ पर, धाराबद्ध हो के कुछ कह रहे होते हैं?

श्रोता: आचार्य जी, हमारी समझ से बाहर की हैं। और फिर सोच समझ कर बोलना चाहते हैं।

वक्ता: हाँ, वो ठीक है, मैं समझ रहा हूँ। पर कुछ ही देर में वो डर, कि मैं कहीं कुछ गलत तो नहीं बोल रहा हूँ, चला जाता है। और जब आप अपने आम जीवन में होते हो तब भी उस डर की कोई विशेष अनुभूति नहीं करते। मुझे नहीं लगता कि हम घरों में, दफ़्तरों में, सड़कों में, बाज़ारों में, डरे-डरे घूमते हैं। ऐसा तो नहीं है ना?

विषय है – अभिव्यक्ति, एक्सप्रेशन; बोलना, जीना। एक ही तरह की तो अभिव्यक्तियाँ होती नहीं। जो कुछ कर रहे हो, वो तुम्हारी अभिव्यक्ति है। तुम जो हो, वही वचनों में, कर्मों में, परिलक्षित होता है। अभिव्यक्ति लगातार होती ही रहती है, उसी अभिव्यक्ति को मैं बहाव कह रहा हूँ। मैं, अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति में अंतर जानना चाहता हूँ।

मैं जानना चाहता हूँ, उस चेहरे में, उस ज़बान में, उस वाणी में, क्या अंतर है जो यहाँ बोलती है, बनिस्पत उसके, जो सड़क पर बोलती है। बोलती यहाँ भी धारा प्रवाह है, और धारा वहाँ भी बहती है। कभी लोगों को, गपशप में संलग्न देखना, धारा ही बह रही होती है ना? बिलकुल अविरल धारा, तीन घंटे तक गॉसिप चल रही है। बहती है कि नहीं बहती है? और धारा यहाँ भी बहती है| अभिव्यक्ति यहाँ भी हो रही है, अभिव्यक्ति वहाँ भी हो रही है; जीवन यहाँ भी है, जीवन वहाँ भी है। वचन यहाँ भी हैं, शब्द वहाँ भी हैं, अंतर क्या है जीने और जीने में, कहने और कहने में, अंतर क्या है?

श्रोता: कभी बोलने में पता होता है कि मैं क्या हूँ| कभी नहीं।

वक्ता: कौन अभी यहाँ बैठा सोच रहा है कि मैं क्या हूँ? मैं तो नहीं सोच रहा। ये पता होना क्या चीज़ है? तुम कह रहे हो कि कभी अभिव्यक्त होने में पता होता है कि मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ। ये सब ख़्याल कौन करता है,और क्यों करना है? तुमने अभी बोला तो इस बात का इंतज़ाम कर के बोला कि तुम कौन हो?

तो फिर?

श्रोता: बाज़ार में हम जिनसे बात करते हैं, हम ये मान कर के चलते हैं कि वो और हम एक ही तल पर हैं। यहाँ पर हम शिष्ट हैं, एक माहौल है।

वक्ता: वो तो आप बाज़ार में भी हो जाओगे। आपने देखा नहीं है, कि आप ठेले वाले से, और बड़ी दुकान वाले से अलग-अलग तरीकों से बात करते हो? तो ऐसा कुछ नहीं है, कि एक ही तल पर वहाँ आप सब को मान रहे हो। वहाँ पर भी आपने तलों का भेद तो रखा ही हुआ है।

श्रोता: सर वो जो हमारा बाहरी जीवन है, एक तरह से रोल प्ले है। कभी हम बेटे हैं, बाप हैं, प्रोफेशनल हैं। यहाँ पर हमारा उद्देश्य थोड़ा अलग है। यहाँ पर हम थोड़ा व्यावहारिक जीवन के उन तलों से ऊपर उठ कर देखना चाहते हैं। हमें लगता हैं, एक डायमेंशन ऐसी है, जो हमें मुक्त करती है।

वक्ता:  इन्होंने (पहले श्रोता ने) एक बात यहाँ के बहाव के बारे में बोली कि यहाँ का बहाव स्रोत जनित है, और यहाँ पता होता है कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ। एक बात आपने बाहर के बहाव के लिए बोली, कि वहाँ हम रोल प्ले करते हैं, कुछ किरदार निभाते हैं।

मैं दोनों से एक ही सवाल पूछ रहा हूँ, “जब यहाँ बोल रहे होते हो तो इस बात का पता ले के बोल रहे होते हो, कि ‘मैं कौन हूँ?’, इत्यादि और जब वहाँ पर बातचीत कर रहे होते हो, वहाँ जब बहाव होता है, वचन होते हैं, अभिव्यक्ति होती है, तो ये ख्याल कर के बोल रहे होते हो क्या, कि तुम कोई किरदार निभा रहे हो या कोई पात्र है तुम्हारा, रोल प्लेइंग चल रही है?

इस भावना के साथ बाहर बात करते हैं कि मेरा यहाँ पर किरदार क्या है? रहता है? कुछ ऐसा पता रहता है – कोई होश, कोई ख्याल? इसी तरीके से, यहाँ पर तुम क्या ये ख़्याल कर के बोलते हो कि में तो विशुद्ध आत्मन हूँ, जो बोल  रहा है? बहाव है। बहाव का तो मतलब ही है, कि रुकने सोचने का समय नहीं है, बस बह रहा है। सोचा, तो जमा। बर्फ़ हो गए। बर्फ़ होने का तो समय ही नहीं है, बहाव का तो अर्थ ही है कि बस चल रहा है खेल।

बाहर भी जो खेल चल रहा है, उसमें क्या कुछ पता है आपको? और यहाँ पर भी थोड़ी देर में, जब धारा बहने लगेगी, जैसे कि अब क़रीब क़रीब बहने ही लगी है, तो क्या कुछ पता करने का अवसर होता है? रुकते हो? सोचते हो?

सोचते बाहर भी नहीं, सोचते यहाँ भी नहीं, धाराएँ दोनों जगह हैं, धारा-धारा में अंतर क्या है? कहने कहने में अंतर क्या है?

श्रोता: यहाँ आके जो शांत मौहौल में जो धारा बहती है, वो अपने ओर आने वाली होती है। और बाहर वाली का कोई अता पता नहीं।

वक्ता: चलिए, सवाल को थोड़ा सा और सरल किये देते हैं।

किसी भी पात्र में होते हो, और पात्र में अगर रम गए हो, तो फिर संवाद याद रखने की ज़रुरत नहीं पड़ती ना? बोले जाते हो? ठीक? अधखुली आँखों से भी बोल लोगे, उनींदे हो तो भी बोल लोगे, आधे बेहोश हो तो भी बोल लोगे। और जब गहरे बोध में होते हो, किसी से गहरी आत्मीयता में होते हो, या प्रेम का क्षण होता है, तब भी संवाद याद करने की ज़रुरत नहीं पड़ती, बोले जाते हो? या तुम्हारी निर्दोषता के क्षण हैं, या किसी से निःस्वार्थ तरीके से बस यूँ ही जुड़े हुए हो, तब भी जो तुम्हारी अभिव्यक्ति होती है, वो रटी-रटाई नहीं होती? दोनों में ही स्मृति का कोई विशेष काम दिख नहीं रहा है। दोनों में अंतर क्या है? आप ये भी कह सकते हैं कि कोई अंतर नहीं है। आप ये भी कह सकते हैं कि एक दुकानदार जो धारा प्रवाह अपने माल की बोली लगा रहा है, और एक कबीर, जो धारा प्रवाह रमैनी गा रहे हैं, एक ही हैं। आप कह सकते हैं। कहिये आप, जो भी कहना चाहते हैं।

श्रोता: सर एक कन्वर्सेशन मेरे हिसाब से, एक लेन-देन की तरह होती है। एक वैल्यू होती है उसके अंदर। एक बाज़ार में मैं जो भी कहता हूँ, बात करता हूँ, उसकी एक वैल्यू होती है, जिसका मुझे अंदाज़ा होता है। यहाँ पर जो बात करूँगा, उसकी क्या वैल्यू है मेरे लिए, मुझे अभी अंदाज़ा नहीं है। जब होगा तब शायद खुल के बात कर पाऊँँ।

वक्ता: ये थोड़ी बात आगे बढ़ी। कह रहे हैं कि बाज़ार में जो भी कुछ कह रहे हैं, तयशुदा है, पता है कि क्या करूँगा तो क्या मिलेगा, कितना दे रहा हूँ, कितना पा रहा हूँ। यहाँ पर कुछ पता नहीं है कि जो पूछ रहा हूँ वो उचित है कि क्या? ये भी पता नहीं है कि जो प्रतिसाद आना है, उसमें भी कुछ क़ीमत है या नहीं। पर फिर भी बैठे हुए हैं।

तो आपका दावा है कि अंतर है? पहले बहाव और दूसरे बहाव में अंतर है? मुझे नहीं मालूम, आप बताईये। आप कह रहे हैं, कि एक जीवन में और दूसरे जीवन में, अंतर है। हो सकता है हो, हो सकता है न हो। आप समझाइये।

श्रोता: वहाँ पर अपने आप को बोध कराते रहते हैं, यहाँ आलरेडी बोध में होते हैं।

वक्ता: तुम केले खरीदने गए हो,  तुम अपने आप को क्या बोध कराते रहते हो?

जीवन से बोलो बात, किताबों से नहीं। जो तुम्हारे अनुभव होते ही हैं, रोज़ाना, उनसे बोलो। उनमें कोई शर्माने की बात नहीं है, वही तुम्हें सच्चाई दिखाएँगे।

श्रोता: सर बाहर की दुनिया में प्रॉफिट-लॉस चल रहा होता है, अपना अकाउंट साथ रखे होते हैं, टैली हो रहा होता है। हम किसी को कन्विंस कर रहे होते हैं, और अगला अपने विचार बेच रहा होता है। आदान प्रदान चल रहा होता है। यहाँ पर हमें किसी को कन्विंस नहीं करना। तो यहाँ पर एनवायरनमेंट इस बियॉन्ड ट्रांसेक्शनल ऐटिटूड।

वक्ता: तो इसी बात को थोड़ा और साफ़ कर के समझाइये मुझे|

श्रोता: उद्देश्यता और निरुद्देश्यता|

वक्ता: बाहर कुछ उद्देश्य होता है लगातार। अच्छा। होता है, ये पक्का पता है? बाहर जब भी आप किसी भी गतिविधि में, आदान प्रदान में लिप्त होते हैं, तो वो सोद्देश्य होता है, ऐसा होता है?

श्रोता: उद्देश्य तो यहाँ भी है सर|

वक्ता: उद्देश्य देखिये, कह रहे हैं, यहाँ भी है|

श्रोता: लेकिन वहाँ तो पक्का होता है|

वक्ता: वहाँ पक्का होता है, और यहाँ पर?

श्रोता: आचार्य जी, यहाँ तो ये है ना कि समझ नहीं आ रहा कि क्या लेना है। कुछ मिलेगा की नहीं मिलेगा, पहले से बहुत विमूढ़ भी होते हैं| मान लीजिये पहले सत्र में गए, कुछ सीख के, कुछ पकड़ के, अपनी लाइफ में प्रयोग करने लगे, तो पता लगा वो फेल हो गया। फेल हो गया तो फिर आ रहे हैं, सोच समझकर कि चलो अबकी बार कुछ सही मिले।  तो उस तरह का कन्फ्यूज़न भी होता है।

लेकिन बाहर अगर हम किसी से गपशप भी कर रहे हैं, तो पता है कि हम बटोर रहे हैं वहाँ पर। अपनी इमेज को बनाये रखने के लिए, कुछ भी करने के लिए।

लेकिन यहाँ ऐसा कुछ दिखता नहीं, जिसको पकड़ के, उस के सहारे से चीज़ शुरू कर सकें।

वक्ता: तो हम क्यों आते हैं यहाँ? (मुस्कुराते हैं) कोई उद्देश्य नहीं। ये महत्वपूर्ण है। माल की कोई आश्वस्ति नहीं, माल, माल है भी कि नहीं ये भी पता नहीं। तो हम आते क्यों हैं, बैठते क्यों हैं?

सवाल क़ीमती है, क्योंकि आये तो हैं, बैठे तो हैं। आपने भी यही कहा कि जो मिलेगा उसका मूल्य पता नहीं। और इन्होंने अभी कहा कि बाहर तो बटोरते रहते हैं, और यहाँ कोई ज़रूरी नहीं है कि कुछ बटोरने को मिले। और बटोर भी लें तो उसकी कोई उपयोगिता होगी या नहीं ये जानते नहीं। तो फिर क्या है जो, हम में से कई लोग हैं, जिनसे अक़सर मुलाक़ात होती रहती है, हम लोग अक़सर बैठक करते रहते हैं।

ये बाज़ार नहीं, ये हाट नहीं, कोई यहाँ से रुपये पैसे लेके नहीं जा रहा। अक़सर आप यहाँ से बिलकुल खाली हाथ ही लौटते हैं। और कई बार तो उलझे हुए लौटते हैं, ऐसा भी हुआ है।

श्रोता: सर एक अनजानी सी ताकत यहाँ पर खींच लाती है।

श्रोता: खाली होने के लिए भी आते हैं, काफी भर चुके हैं।

श्रोता: क्लैरिटी के लिए, ज़िन्दगी के तथ्यों को समझने को।

वक्ता: तो अंतर क्या हुआ, होने और होने में, जीने और जीने में? अंतर क्या हुआ?

श्रोता: केंद्र का ही अंतर है ।

वक्ता: क्या? बात थोड़ी सी गूढ़ हो जाती है फिर। और थोड़ा उसको समझा के बताईये।

श्रोता: सर जैसे आपने कबीर का उदाहरण दिया, और व्यापारी का। तो अगर रोल रेवर्सल भी कर दिया जाए, कबीर को व्यापारी बना दिया जाये, तब भी कबीर उसी धारा से व्यापर करेंगे जैसे कि वो हैं। और वही व्यापारी अगर कबीर के दोहे गा रहा होगा, तो शायद वो अपनी ही धारा कायम रखेगा। तो शायद अंतर ये होगा कि किस केंद्र से वो धारा बह रही है ।

वक्ता: तो ये केंद्र क्या चीज़ है? इसी चीज़ को मैं ज़रा समझना चाहता हूँ, ये केंद्र क्या है?

अभी ये बात आयी है, कि दोनों बहाव हैं। लेकिन दोनों बहावों का केंद्र अलग-अलग है। कोई गुणात्मक अंतर है दोनों में, ऊपर ऊपर से एक से लगते हैं। ऊपर ऊपर से ऐसा ही लगता है कि यहाँ भी कुछ बह रहा है, वहाँ भी कुछ बह रहा है, लेकिन फिर भी कोई अंतर है जो कि क्वालिटी का है। किसी गहरे गुण में अंतर है। वो क्या अंतर है?

श्रोता: ये बेमतलब है, वो मतलब वाला है|

श्रोता: इधर तेज़ होता है बहाव, वहाँ कम होता है|

वक्ता: बेटा बहाव तो वहाँ भी तेज़ हो सकता है। तुमने कभी अपने आप को बहस में देखा है? तुमने कई बार अपने को गुस्से में देखा है? या किसी भी और क़िस्म की उत्तेजना में देखा है? बहाव में इतना ज़ोर होता है, तुम्हें घसीट ले जाता है। तो बहाव में तो वहाँ भी, बल हो सकता है।

श्रोता: आचार्य जी, प्रेरणा होती है, वो बुद्धि से होती है। और यहाँ आने की प्रेरणा मन से होती है।

वक्ता: कहिये, बोलिये। ये कहने से ज़्यादा जानने, देखने की बात है। मैं फिर कह रहा हूँ, इसमें तो आप अपने अनुभव को ही कसौटी बनाइये। क्योंकि ये दोनों बहाव आपके अपने हैं, हम इनका अनुभव करते ही रहते हैं। और ये दो तरह के बहाव, दो तरह का जीवन है। मानते हो की नहीं?

श्रोता: आचार्य जी,  बाज़ार के रूल्स ऑफ़ इंगेजमेंट मुझे पता हैं। हो सकता है यहाँ भी धीरे-धीरे रूल्स ऑफ़ अंगेजमेंट समझ में आने लगें। तो आपसे उसी बहाव में बात कर सकूँगा।

वक्ता: बिलकुल वैसे, जैसे बाज़ार में व्यापारी से बात करते हो।

श्रोता: हाँ बिलकुल आ जायेगा।

वक्ता: पूछोगे कि कितने का माल दे रहे हो, और उतने का नहीं दे रहे हो तो तुम्हारी दुकान से नहीं लेना।

श्रोता: नहीं। तब नहीं पूछूंगा क्योंकि मैं ऑलरेडी ले चुका हूँगा।

वक्ता: तुम्हें कैसे पता छ: महीने बाद क्या होगा?

श्रोता: आचार्य जी यहाँ की, इनमें परसेप्शन का फ़र्क़ है। यहाँ पर आके हमें शिफ्ट मिलता है परसेप्शन में जो बाहर नहीं है, बाहर की दुनिया में हमारा परसेप्शन सतही है। यहाँ आ कर के वो परसेप्शन थोड़ा गहरा हो जाता है। जो हमारी माइंड क्रिएटेड प्रोब्लेम्स हैं, उनको माइंड से नहीं सॉल्व किया जा सकता। और यहाँ आ कर के हमें नो-माइंड वाली स्थिति हो जाती है| अगर हम इसको डिसकस कर रहे हैं माइंड लेवल पर तो  वो एक सर्कल में घूम रहा है| यहाँ पर जो चीजें मन-रचित हैं उनका समाधान मन के तल पर मिलना मुश्किल है| यहाँ पर आ कर के शिफ्ट इन परसेप्शन होता है| हम अन्दर की ओर जाते हैं कुछ हद तक,तरीके से देख पाते हैं।

श्रोता: वहाँ हम बहाव ही हो जाते हैं, जो भी करते हैं, वो देख नहीं पाते हैं, बस कर देते हैं । यहाँ अगर बहाव आया, तो दिखाई देता है ।

वक्ता: अच्छा एक उदाहरण देता हूँ। आप जा रहे हैं, किसी ने अकारण आपकी कार पर चोट मार दी है। और आप उतर कर देखने गए, तो आपको लगता है कि वो आपसे व्यर्थ की बहस कर रहा है। उलटे आपको ही दोषी ठहरा रहा है| देखा है, कितनी ज़ोर से रोष चढ़ता है? चेहरा सुर्ख हो जाता है, दिमाग भन्ना जाता है । और फिर, मुँह से बिलकुल धारा झरती है।

और एक दूसरी स्थिति भी होती है, उससे आप कभी गुज़रे होंगे, कि दिल पिघल सा गया है, बैठे हैं, किसी अपने के पास। आँखों से एक धारा झर रही है, और ज़ुबान से भी एक धारा झर रही है। कुछ दिखाई नहीं दे रहा, कुछ सुनाई नहीं दे रहा। शब्द क्या हैं, पता नहीं । वो शब्द हैं भी कि  नहीं, ये भी नहीं पता, किसी व्याकरण से आ रहे हैं कि नहीं, ये भी नहीं पता ।

दोनों ही जगह आप ही होते हैं । दोनों ही स्थितियों से आप ही गुज़रे हैं, आपको दोनों का अनुभव है । दोनों स्थितियों में मूलभूत अंतर क्या है? आपा पहले में भी खोया है, आपा दूसरे में भी खोया है । जीवन वो भी है, जीवन ये भी है । प्रवाह वहाँ भी है, यहाँ भी है ।

श्रोता: सर एक जगह कॉज़ एंड इफ़ेक्ट दिखता है, दूसरी जगह खाली इफ़ेक्ट इफ़ेक्ट दिखता है|

श्रोता: आचार्य जी, ये दोनों नदी के दो किनारे हैं, बीच में नदी का प्रवाह है, इधर विश्वास ये है कि ये मेरा अपना है। उधर विश्वास ये है कि ये मेरा अपना नहीं है।

वक्ता: दोनों स्थितियों में डूबो। डूब के बताओ कि उनमें मूल अंतर क्या है?

श्रोता: दिशा का अंतर है। अगर मैं गुस्से में हूँ, तो उस समय ये मैटर नहीं करता कि मुझे कैसा फील हुआ, उस समस्य ये मैटर कर रहा है, कि इस बन्दे को मैं कैसे सुना दूँ।

वक्ता: ज़रा गौर करना जो तुमने कहा। जब तुम बहुत गुस्से में होते हो, तो हुआ है कभी कि दूसरे को मारने में खुद को भी चोट पहुंचा ली?

श्रोता: हाँ

वक्ता: तो अपना ख़्याल रखते हो क्या? तब भी आप खो देते हो।

श्रोता: तभी तो मैं कह रही हूँ, मैं कोलैटरल डैमेज बन जाऊँ, ये नहीं मैटर कर रहा उस राह पर। उस बंदे को तो पाठ पढ़ाना है, कैसे भी।

दूसरे केस में अगले इंसान पर विश्वाश इतना ज़्यादा है कि कहीं न कहीं से उसका प्रेज़ेंस भी मैटर नहीं कर रहा है ।

वक्ता: वो तो पहली और दूसरी स्थिति में भी हो सकता है ना? पहली स्थिति में भी ये हो सकता है, कि वो डर के भाग गया है, अब वो नहीं है। और तुम फिर भी गाली बक़े जा रहे हो। दूसरी स्थिति में भी ऐसा हो सकता है, कि प्रेमी दूर है और फिर भी तुम पीछे से कवितायें पढ़े जा रहे हो।

पहली स्थिति में भी ये हो सकता है, कि उसके होने न होने का आभास ही छोटी बात बन गया हो। हुआ है कभी, कि जिससे तुम लड़ रहे हो वो बेचारा आक्रांत हो के भाग भी गया, लेकिन तुम फिर भी पीछे से पत्थर फेंके ही जा रहे हो? और उसके जाने के दो घंटे बाद भी उसको अपशब्द बोले ही जा रहे हो । वो है नहीं कहीं आस पास, उसको सुनेगा भी नहीं, पर फिर भी तुम भरे हुए हो ।

और दूसरी स्थिति में भी ऐसा हो सकता है, कि प्रेमी आसपास है नहीं, लेकिन फिर भी तुम्हारे आँसू झर ही रहे हैं। दोनों ही स्थितियों में बात दूसरे की शारीरिक उपस्थिति तक सीमित नहीं है।

अंतर पता नहीं है कि नहीं, आपको मुझे बताना है कि अंतर है या नहीं । आप ये भी कह सकते हो, कि दोनों बहाव एक ही हैं ।

श्रोता: आचार्य जी, अंतर नहीं है, बस शब्दों का अंतर है।

वक्ता: और शब्दों का अंतर न हो तो?

आपको अपने भीतर जाना होगा, आपको खुद ही देखना पड़ेगा कि उस स्थिति में, जब आप पड़ोसी से, भाई से, पत्नी से, या सड़क पर किसी अनजान मुसाफ़िर से, लड़ने में संलग्न होते हैं। या किसी व्यापारी से दाम की खातिर जिरह करने में लगे होते हैं। उस स्थिति में, और एक प्रेम की स्थिति में, सरलता की स्थिति में, बहावों में कोई फ़र्क़ है कि नहीं? अनुभव का अंतर बताइये|

श्रोता: आचार्य जी, एक हमारी नेगटिव फ्रेम ऑफ़ माइंड है|

वक्ता: ये तो आप बाद में बोलेंगे, “नकारात्मक-सकारात्मक|” ये तो नाम देने की बात है| मैं गुण का अंतर पूछ रहा हूँ, नाम का नहीं| एक बिल्ली का नाम हो सकता है ‘मिली’, एक बिल्ली का नाम हो सकता है ‘न मिली’| नाम का अंतर मत बताइये, उनके गुण में क्या अंतर है? दोनों ही म्याऊँ बोलती दिख रही हैं मुझको|

श्रोता: आचार्य जी, अंतर नहीं है| बस शब्दों का अंतर है|

श्रोता: गहराई का अंतर है|

वक्ता: क्या? गहराई का अंतर कैसे पता चलेगा? आप ही थे जो चौराहे पर बहसबाज़ी कर रहे थे, भीड़ खड़ी  हो गयी थी आपको देखने के लिए। और आप ही थे जो कहीं एकांत में किसी के सामने नतमस्तक हो गए थे। आपा खो दिया था।

श्रोता: एक में घृणा का भाव आया, और दूसरे में स्नेह का|

वक्ता: भाव तो भाव है। स्नेह का भाव बाज़ार में भी आ सकता है। बहुत स्नेह उठता है नयी शर्ट को देख कर के। पिज़्ज़ा की ओर आपने कितनी स्नेहपूर्ण लालायित नज़रों से देखा है, जानते हैं आप? दोनों जीवन हैं।

श्रोता: विशुद्ध प्रेम की स्थिति में पाने का लालच नहीं होता। पाने की उम्मीद भी कम ही होती है।

वक्ता: देखो जब किसी से गाली गलोज  कर रहे होते हो, तब भी पाने का लालच तो बहुत पीछे छूट चुका होता है। वो बोल रहा, “है पुलिस बुला लूँगा, तुम कहोगे, “बुला दे।’ अब इसमें पाने का क्या लालच बचा है बताओ?

श्रोता: जो अपना अहम है, वो रह जाए, वो नहीं गिरना चाहिए।

वक्ता: अहम की भी बलि चढ़ाने को खूब तैयार हो जाते हो। जब तुम्हारा स्वार्थ सामने होता है, तो अहम कहाँ छूट जाता है पीछे? फिर तो कहा जाता है कि लाइन में लग जाओ, और तुम्हारा नंबर पचीसवाँ है – तब अहम् को जेब में डाल के लग जाते हो लाइन में ।

कहीं पर स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो, बाज़ार में, और कहा जाए कि चलो, ये क़तार है और क़तार में पचीसवाँ नंबर है, लग जाओ । तो लग जाओगे के नहीं? फिर अहम कहाँ चला जाता है? फिर कहते हो क्या कि ‘हम’, और पीछे लगें?

श्रोता: सर, एक में केंद्र से आप नज़दीक रहे, और दूसरे में आप केंद्र से दूर|

वक्ता: ये क्या चीज़ें आ गयी? केंद्र वगैरह। आप जब लड़ने जाते हो, क्या केंद्र वन, केंद्र टू, करते हो क्या?

श्रोता: सर पहली वाली में हम कन्क्लूड करना चाह रहे हैं, दूसरी वाली में हमारा कोई कन्क्लूज़न की तरफ ध्यान नहीं है। बस शुरू किया और छोड़ दिया।

वक्ता: ये कागज़ नीचे रख कर बात कीजिये, बहुत कागज़ी है बात। (मुस्कुराते हुए)

(श्रोता हँसते हैं)

श्रोता: सर जो एक एक्शन यहाँ और वहाँ अलग है, वो ड्रिवेन होता है हमारे प्रीवियस एनकाउंटर्स विद लाइफ से। और मेरे दिमाग में एक ‘आईडिया ऑफ़ मी’ है, वो ड्राइव करता है मुझे एक एक्शन लेने के लिए, जो मेरे पिछले एनकाउंटर्स से ड्रिवेन होता है। तो ये डिफरेंस है, मुझे लगता है ।

बहाव सेम ही है, बस ये डिफरेंस है जो डिपेंड करता है – हैव आई रीच्ड देयर और नॉट ।

वक्ता: रीच्ड वेयर?

श्रोता: वेयर एवर आई वांटेड टू|

वक्ता: इतना सब सोचते हो?

श्रोता: हाँ शायद|

वक्ता: अभी अभी गाड़ी से ठोकर लगी है, धड़ाम। वेयर हैव आई रीच्ड।, वेयर डिड आई वांट टू रीच, ये सब सोच कर दरवाज़ा खोलोगे और फड़फड़ाते हुए नीचे उतरोगे?

श्रोता: सर आपकी इतनी दाढ़ी है, शायद इसलिए आपके सामने नहीं बोल सकते। नहीं तो लप्पड़ मार देंगे।

वक्ता: बाज़ार में भी मिलते हैं, बहुत भिखारी घूम रहे होते हैं, लम्बी दाढ़ियों वाले। वो आते हैं तुम्हारे पास, “बाबा, दो रुपया।” उनको तो भगा देते हो, नहीं डरते । और उनको भगाते भी ठीक उसी बहाव के साथ हो, बिलकुल ऐसे हाथ, “चलो हटो, आगे बढ़ो, काम देखो अपना” ।

श्रोता: एक चीज़ ये दिख रही है कि उस वाले बहाव में एक में उत्तेजना है, एक अशांति है । इस बहाव में एक शान्ति है। अब ये नहीं दिख पा रहा कि क्या एक में बहाव बाहर की तरफ है, एक में अंदर की तरफ है?

वक्ता: बात सुनने में अच्छी लग रही है, मन सा कर रहा है स्वीकार भी कर लूँ। पर फिर मुझे रूमी याद आते हैं, रूमी बाज़ार में नाच रहे हैं। कपड़ो का होश नहीं, कहाँ जा के भिड़ रहे हैं ये  होश नहीं, हाथ पाँव कट रहे हैं, छिल रहे हैं ये होश नहीं, कौन क्या कह रहा है पता नहीं। आँखें लाल हो गयी हैं, जैसे भूत चढ़ आया हो, गिर रहे हैं, पड़ रहे हैं। उन्हें उत्तेजना नहीं है क्या? कौन कहेगा उन्हें शांत? खुद रूमी भी नहीं कहेंगे कि मैं शांत हूँ । नाचते नाचते बेहोश हो के गिर पड़ते हैं। इसे आप शान्ति कहेंगे? उत्तेजित नहीं हैं वो?

उत्तेजना तो गुस्से में भी है, और उत्तेजना तो रूमी के सरे बाज़ार नाचने में भी है। उत्तेजना का भी फ़र्क़ नहीं है।

श्रोता: पहले वाली स्थिति में सेल्फ इमेज थोड़ी थ्रेटन होती है तो हम रिएक्शन मोड में आ जाते हैं , और दूसरे में समर्पण वाला भाव है।

वक्ता: समर्पित तो आप पहली स्थिति में भी हो सकते हो। कोई आपको बहुत बड़ा स्वार्थ दिखाए आप, तन, मन, धन, सर्वांग समर्पित हो जाओगे। होते हो कि नहीं? होते देखा है कि नहीं? हो सकता है आप ना हुए हों। पर देखा तो होगा ही, किस्से तो सुने ही होंगे? समर्पण कौन सी बड़ी बात है? बाज़ार के लिए तो समर्पण का दूसरा नाम है बिकना। समर्पण माने, बिक जाओ। समर्पित हो गए।

देखिये, लक्षणों के आधार पर, दृश्यों के आधार पर, पकड़ पाना बहुत मुश्किल होगा, कि पहले और दूसरे तरह के जीवन में क्या अंतर है। आप कह नहीं पाएंगे कि पहले में इस तरह का व्यवहार होता है, उसके ये चिन्ह होते हैं, और दूसरे में उस तरह का व्यवहार होता है, और उसके कुछ भिन्न चिन्ह होते हैं। चिन्हों में, व्यवहार में, आचरण में, आप अंतर पा पाएँ, ये कोई आवश्यक नहीं है। हमारे सामने दो हैं विकल्प, या तो हम कह दें कि फिर अंतर है ही नहीं, क्योंकि दिखने में तो अंतर लग नहीं रहा।

या हम ये भी कह सकते हैं, कि अंतर कुछ ऐसा है कि दिख नहीं सकता पर अंतर है ज़रूर। आप क्या पक्ष चुनते हैं, वो इस पर निर्भर करेगा कि आप ‘दिखने’ को कितनी प्राथमिकता देते हैं। अगर आप के जीवन में वही केंद्रीय है जो ‘दिखता’ है, और आपके लिए मात्र वही अस्तित्वमान है, जो ‘दिखे’, तो आप कहेंगे कि पहला बहाव और दूसरा बहाव एक हैं। पहली तरह का बोलना, पहली तरह जीना और दूसरी तरह बोलना, दूसरी तरह का जीना एक हैं।

और अगर आप किसी ऐसे के सामने नतमस्तक हैं, उसे अपनी मूक मान्यता देते हैं, जो दिख तो नहीं सकता पर है ज़रूर; तो फिर आप कहेंगे कि दोनों में अंतर दिखता भले न हो, पर है। और दिखने के तल पर अंतर खोजना ही व्यर्थ है। क्योंकि जो भी अंतर आप खोजोगे, आप पाओगे कि वो अंतर कोई सही अंतर नहीं है। आप कहोगे, “शान्ति का अंतर है”, आप कहोगे कि अशांति यहाँ भी हो सकती है, और वहाँ भी दिख सकती है।

जो लक्षण आप एक से साथ जोड़ के देखोगे, वो लक्षण आपको दूसरे में भी मिल  सकते हैं। आप कहोगे, दूसरे बहाव में इंसान मौन हो जाता है, तो आप पाओगे कि अकसर दुश्मन एक दूसरे के सामने बहुत मौन रहते हैं। चिन्हों के आधार पर, आचरण के आधार पर, भेद कैसे करोगे? प्रेमी मौन हो जाते हैं, देखा है? निर्वाक, क्या कहें ! और जिससे आपकी रंजिश हो उसके सामने भी आप छह महीने तक मौन रह सकते हो। देखा है कभी? जब लड़ाईयाँ हो जाती हैं, तो वचन रुक जाते हैं, बातचीत थम गयी। मौन दोनों जगह हो सकता है। मौन भी दोनों जगह हो सकता है, और अशांति भी दोनों जगह हो सकती है। गति भी दोनों जगह हो सकती है, अगति भी दोनों जगह हो सकती है।

तो कह पाना बहुत मुश्किल होगा फिर कि पहले और दूसरे में अंतर क्या है। कह पाना बहुत मुश्किल होगा फिर, कि जिसको आपने पहला केंद्र बोला, और जो दूसरा केंद्र है, इन दोनों से उठते हुए जीवनो में अंतर क्या है। फिर कह पाना बहुत मुश्किल होगा कि एक जिसको हम कहते हैं संसारी, और एक जिसको हम कहते हैं  संत, उन दोनों में अंतर क्या है। क्योंकि हो सकता है कि दोनों का आचरण बिलकुल एक सा लगे, हो सकता है उन दोनों का जीवन एक सा लगे। दोनों अपने अपने बहाव में रत हैं।

आप एक गृहस्थ को देखिये, आप  पाएँगे कि उसको अब विचार की अब बहुत ज़रुरत ही नहीं बची। उसका जीवन अब अभ्यास पर चल रहा है। वो सुबह उठता है, उसको विचार नहीं करना पड़ता, क्या करना है। वो सुबह उठते ही, किचन की तरफ भागता है, चाय बनाता है, बच्चों को तैयार करता है, बस में बैठाता है। फिर खुद तैयार होता है, दफ्तर चला जाता है। दफ्तर में भी उसके तयशुदा काम हैं, निर्विचार जीवन जी रहा है? कोई ग्रंथि नहीं, कोई उलझन नहीं । कोई समस्या ही नहीं है उसके सामने, उसे सब पता है। जीवन में अब उसके लिए कोई रहस्य बचा कहाँ है? कोई गुत्थी नहीं सुलझानी है, कहाँ कोई पहेली है? जो कुछ है, हमें पता है। मुझसे पूछो, पूरे दिन का क्या कार्यक्रम होना है, मुझे पता है। सब कुछ ठीक ठीक पता है। कुछ भी ऐसा नहीं जो कोहरे में छुपा हो। कुछ भी ऐसा नहीं जिसे वो अज्ञेय कह सके। यह गृहस्थ का जीवन है|

और तुम किसी संत के पास जाओ, तो वहाँ पर भी तुम एक अविच्छिन्न धारा देखोगे। उसे भी सोचना नहीं पड़ता। वो भी उठता है, और कहीं को भी चल देता है। वो भी उठता है और कुछ भी कर लेता है। उसको भी दिन जहाँ ले जाता है वैसे ही चला जाता है; सूरजमुखी का फूल, जिधर सूरज ले गया, उधर को चल देता है।

तुम कहोगे, “ये भी तो फिर गृहस्थ जैसा ही हुआ। गृहस्थ को भी परिस्थितियाँ जहाँ को ले जाती हैं, उधर को चला जा रहा है। संत को भी अस्तित्व जहाँ ले जा रहा है, उधर को ही चला जा रहा है, दोनों में अंतर क्या हुआ? वाक़ई दोनों में कोई अंतर नहीं दिखेगा अगर दृश्य के तल पर अंतर खोजोगे। तो अंतर है कहाँ?

आप चुन लीजिये। बिलकुल आप कह सकते हैं कि कोई अंतर नहीं है। और आप कह सकते हैं, कि है कोई गूढ़, सूक्ष्म अंतर जिसको इन्द्रियां नहीं पकड़ पाएँगी, जो मन की समझ से परे है। पर कुछ अंतर है ज़रूर। वहाँ कुछ खिला-खिला सा दिखता है जो इधर नहीं है। इधर कुछ उजाड़-उजाड़ सा दिखता है जो उधर नहीं है। पर याद रखियेगा, आप जो भी कुछ कहेंगे, उसका कोई साक्षी आपके पास नहीं होगा। फूल, यदि आप कहते हैं कि खिला है संत के जीवन में, तो उस फूल का कोई चित्र आप कभी नहीं उतार पाएँगे। आप कभी प्रमाणित नहीं कर पाएँगे कि वास्तव में संत के जीवन में कोई फूल है।

और अगर आप कहते हैं कि गृहस्थ के जीवन में कोई सूनापन है, तो उस सूनेपन की भी कोई तस्वीर आप कभी उतार नहीं पाएँगे। कोई आपसे साक्ष्य मांगे, कि बताओ, मैं हूँ गृहस्थ, और मेरे जीवन में क्या कमी है? आप कभी उसे साबित नहीं कर सकते। कभी नहीं साबित कर सकते। कभी इन तर्कों में उलझिएगा भी मत। कभी किसी को साबित करने मत बैठ जाइएगा कि उसके जीवन में कोई कमी है। अगर उसे स्वयं नहीं दिख रही, तो आप दिखा नहीं पाएँगे।

कबीर सुन्दर क्यों हैं, कृष्ण आकर्षक क्यों हैं, जीसस दिल क्यों जीत लेते हैं? ये बात कोई कहने समझाने की है? प्रमाणित करने की है? प्रमाणित आप कर ही नहीं पाएंगे। प्रमाण देने बैठेंगे, आपके हर प्रमाण को काट दिया जायेगा। कोई अकाट्य तर्क हो ही नहीं सकता।

अब ये आपके ऊपर है, आप कह दीजिये कि दोनों एक हैं। प्रमाण यही कहता है, कि दोनों एक हैं । और आप यह भी कह सकते हैं, कि दोनों अलग अलग हैं। और अगर आप कहते हैं कि दोनों अलग अलग हैं, और दोनों में गुणात्मक तल पर कोई अंतर है; तो याद रखियेगा कि आप ख़तरा उठा रहे हैं। ख़तरा  है, अतर्क बात कहने का। क्योंकि अब आपने जो कहा, वो बात आप साबित नहीं कर सकते। तो आपने बात ख़तरे की कह दी। कोई आपसे कहेगा, “कह तो रहे हो, अब साबित कर के दिखाओ।” आप कर नहीं पाएँगे। अब ख़तरा उठाना चाहते हो? तो कह दीजिये कि अंतर है। आप साक्ष्यों पर चलना चाहते हो, तो कह दीजिये कि अंतर नहीं है। आपके ऊपर है।

याद रखियेगा, आप जो भी उत्तर देंगे, वो ये निर्धारित कर देगा, कि आप किस तरह का जीवन जीना चाहते हैं। इस तल का, या उस तल का। आपका उत्तर ही आपका जीवन बनेगा। तो उत्तर, ज़रा केंद्रित हो कर दीजियेगा।

श्रोता: फिर क्या यहाँ होना इस बात का सबूत नहीं है, कि वहाँ कुछ तो सूनापन है?

वक्ता: और वहाँ होना किस बात का सबूत है फिर, कि यहाँ कुछ सूनापन है?

( मुस्कुराते हैं)

अभी यहाँ बैठी हो, और यहाँ से उठ के वहाँ पहुँच जाओगी। तो उससे तो जो तुमसे बहस करना चाहे वो तुरंत तर्क दे देगा ना? कि वहाँ अगर इतने ही बाग़ लहलहा रहे होते, तो अनन्या तू लौट के क्यों आती?

श्रोता: मुझे लगता है कुछ महसूस करने का फ़र्क़ है। मान लीजिये कि आप किसी से अटैचमेंट महसूस करते हो । तो ये जो महसूसियत है, जिसे आप नाप नहीं सकते हो, प्रमाणित नहीं कर सकते क्यों अटैच हो गया उससे। लेकिन उस महसूसियत की वजह से, आप कहीं पर होते हो, और कहीं पर नहीं होते।

वक्ता: बेटा, वो तो तुम ये भी नहीं बता सकते ना, कि तुम्हारी ज़िन्दगी में जो लोग हैं, तुम उनसे क्यों अटैच हो गए? कोई लड़की है तुम्हारे जीवन में । तुम्हें ठीक ठीक पता है, तुम उससे क्यों सम्प्रत्त हो? तुम्हारा मोह क्यों लगा है उससे? कुछ भी पता है? तुम कबीर से पूछोगे, तेरा राम से क्या रिश्ता? कबीर ईमानदार हैं, बता ही नहीं पाएँगे। या कुछ बताएँगे भी, तो ऐसे संकेतों में, जो कोई कबीर ही समझ सकता है।

तुमसे भी कोई पूछे कि तुम्हारा तुम्हारी प्रेमिका से क्या रिश्ता है, और अगर तुम ईमानदार हो तो बता नहीं पाओगे। तुम कहोगे ऐसा हुआ था, एक बार बस में दिखी थी। फिर क्या हुआ था? तुम्हें पता ही नहीं है क्या हुआ था, तुम बता ही नहीं पाओगे। कुछ हो गया। क्यों मिले, इसका भी कोई कारण नहीं दे पाओगे। मिलने का जो कारण होगा, पूरा का पूरा सांयोगिक होगा। हुआ क्या था? कुछ नहीं, पड़ोस में रहती थी, बस में मिल गयी थी, मोहल्ले में रहती थी, एक ही कॉलेज में पड़ते थे।

टूटे क्यों? वो भी सांयोगिक होगा। अब कोई कहे, कि ये तो वैसे ही बात है, जैसे कबीर का राम से रिश्ता। अकारण है! मेरा और मेरी प्रेमिका का रिश्ता भी तो… वहाँ भी कोई साफ़ साफ़ कारण नहीं पता, यहाँ भी कोई साफ़ साफ़ कारण नहीं पता । जो कारण पता चलते हैं, वो बस ऐसे ही छोटे मोटे हैं। मैं घर आ रहा था, उसके रिक्शे ने टक्कर मार दी । अब इससे प्रेम थोड़े ही हो जाना चाहिए? पर हो गया (अचंभित होते हुए) ! तुम्हारे ऊपर उसका रिक्शा चढ़ा खड़ा है, तुम्हें प्रेम हो रहा है? ये कोई कारण हुआ? तुम कॉलेज में थे, तुम्हारे कॉलेज में सैंकड़ों लड़कियाँ रही होंगी, एक तुमने पकड़ ली, ये कोई कारण हुआ? तो कारण यहाँ भी नहीं, कारण वहाँ भी नहीं दिखता।

खोजिये, खोजिये, अंतर खोज के निकालिये।

श्रोता: बहुत स्पष्ट तो नहीं पता चल रहा, लेकिन अभी अब जो हम चर्चा भी कर रहे हैं, यदि हम पहले बहाव में हैं, तो ये चर्चा भी कर पाएँगे क्या? इतना भी समय मिल पायेगा क्या?

वक्ता: पता नहीं। पर जो पहले बहाव में होता हैं, उसको क्या पता कि पहला बहाव है, कि दूसरा बहाव है।

वैसे ही जो दूसरे बहाव में होता है, उसे भी क्या पता कि दूसरा है, कि पहला है?

श्रोता: सर कोई मौलिक फ़र्क़ तो है। कुछ मूलभूत फ़र्क़ तो है।

वक्ता: पक्का है? एकदम लग रहा है?

श्रोता: पहले वाले में रेस्टलेसनेस्स है, चिंता है।

वक्ता: विरह के गीत सुने हैं? उनमें कितनी रेस्टलेसनेस्स है? कभी दयाबाई को सुनिए, कभी मीरा को सुनिए, जितनी बेचैनी उन्हें है, उतनी, किसी पत्नी को कहाँ होगी हीरों का हार पाने के लिए। ऐसा थोड़े ही है कोई कि जो आध्यात्मिक है, वो बिलकुल शान्ति की प्रतिमूर्ति बन जाता है।  बेचैनी तो उधर भी है। मैं आपसे पूछ रहा हूँ, बेचैनी और बेचैनी में, गुणवत्ता का कोई फ़र्क़ होता है या नहीं होता?

श्रोता: आचार्य जी बाहर का जो है, तो इमपरमानेंस नज़र आएगा| जो चीज़ आपको आज खुश करती है, कुछ टाइम में आपकी मिसरी का कारण बन जाएगी।

वक्ता: ये बात, आपको तब पता होती है, जब आप गुस्से में होते हो, जब आप भावना के आवेग में होते हो, जब आप काम के आवेग में होते हो? सेक्स के क्षण में कभी ये याद आया है, कि सामने जो है इसे राख हो जाना है एक दिन। राख में लोट रहा हूँ?

श्रोता: सर, इंसान हैं तो इमोशंस तो होंगे ही।

वक्ता: मैं कह ही नहीं रहा कि नहीं होने चाहिए। मैं पूछ रहा हूँ, कि क्या बहाव के क्षण में याद आता है?

श्रोता: सर, मुर्दे में और ज़िंदा में यही तो फ़र्क़ है|

वक्ता: क्या (हँसते हुए)? कि जो ज़िंदा होता है, उसे कुछ पता नहीं होता?

श्रोता: नहीं, मतलब उसके अंदर इमोशंस होंगे|

वक्ता: मैं इमोशंस का विरोध कब कर रहा हूँ। मैं तो ये पूछ रहा हूँ, कि जो बातें आप कह रहे हैं, इम्परमानेंस इत्यादि, वो बात बहाव में कहीं याद आती है क्या?

श्रोता: आचार्य जी, आपने वो एक वर्ड यूज़ किया था, याद । वो रहती है सर, आप ऐंगर में भी होते हैं, तो याद है आपको ।

वक्ता: सही में? फिर आपने गहराई से ऐंगर नहीं करा कभी। कितने हैं लोग यहाँ, जो गुस्से में पागल हुए हों कभी? तब याद रह जाता है कि ये सब इम्परमानेन्ट है?

अच्छा, इस वक़्त भी अगर आप बहाव में हैं, तो कुछ याद आ रहा है, कि ये जो हो रहा है ये इम्परमानेन्ट है, थोड़ी देर में सत्र ख़त्म हो जायेगा और आपको घर जाना है? ये सब याद कहाँ है? बहाव का अर्थ ही है, कि याद वगैरह पीछे छूटी। विचार पीछे छूटा। जीवन बह रहा है।

श्रोता: वो सर एक्युमुलेट नहीं कर रहा ना, किसी चीज़ को, गुस्सा है तो गुस्सा है। हो रहा है तो हो रहा है।

वक्ता: वो ही यहाँ हो रहा है। क्या वही यहाँ नहीं हो रहा? यहाँ पर भी तो सब बह रहा है। सत्र यहाँ तक खिंच आया, घंटे से ऊपर हो रहा होगा। हमें क्या पता क्या हो रहा है? पहले से, यहाँ क्या होना है, इसका कोई खाका हमारे पास तैयार नहीं था। मेरे पास भी नहीं था, आपके पास भी नहीं था। एक आड़ा, तिरछा, घुमावदार, सर्पीला, बहाव है जो बढ़ा जा रहा है आगे। वैसा ही जैसा होता है किसी भी स्थिति में जीवन की। तो फिर इस स्थिति में, और बाज़ार की स्थिति में, मूलभूत अंतर क्या है?

वहाँ भी यही हो रहा होता है ना? आप बाज़ार गए होते हो कई बार, और एक दुकान से दूसरी दुकान, तीसरी दुकान। फिर कोई बीच में परिचित मिल गया, उससे थोड़ी देर गपशप। फिर कहीं पर दिख गया, कि संतरे का रस मिल रहा है, तो वहाँ सोचा अच्छा चलो पीलें। अब दिख गया है, तो पीलें। ये सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से थोड़े ही हो रहा होता है। या हो रहा होता है?

श्रोता: एफर्ट लेस्स|

वक्ता: फिर धूप लगती है, तो आप कहते हो, अरे, यहाँ पर नहीं पीयेंगे, वहाँ अंदर चलते हैं, अंदर बैठ के पी लेंगे। वहाँ अंदर पीने जाते हो, तो कहते हो ये तो गंदा बहुत है। चलो फिर किसी मॉल में चलते हैं, किसी ब्रांड का पाएँगे, एक के बाद एक स्थितियाँ आ रही होती हैं, और जीवन? घुमावदार तरीकों से आगे बढ़ रहा होता है। ठीक वैसे जैसे यहाँ पर एक के बाद एक उत्तर आ रहे हैं, और ये जो उत्तर हैं, यही सत्र को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसा ही तो हो रहा है ना?

तो उसमें और इसमें अंतर क्या है?

श्रोता: मुझे तो बारबार यही बात समझ में आ रही है, कि उसमें हम निष्कर्ष निकालने को तत्पर हैं, और यहाँ एक कॉन्टिनुएशन है।

वक्ता: और अभी जो आपने वक्तव्य दिया, क्या वो एक निष्कर्ष नहीं है? आपने कहा, यहाँ हम कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे। बहुत अच्छा निष्कर्ष निकाला आपने। (मुस्कुराते हुए)

(सब हँसते हैं)

श्रोता: आचार्य जी, न जानने की स्थिति है यहाँ|

वक्ता: जिसको आप जानते हैं। एक न जानने की स्थिति जिसको आप जानते हैं| हाँ?

(सब हँसते हैं)

श्रोता: आचार्य जी, आप तर्कों में उलझा रहे हैं|

वक्ता: (मुस्कुराते हुए) मैं उलझा रहा हूँ, आप उलझने से इंकार भी तो नहीं कर रहे। मैंने उत्तर माँगा है। मैं पूछ रहा हूँ, अंतर है या नहीं है।

श्रोता: ऊपर-ऊपर से देखें तो नहीं है, पर अनुभवी, जिसने अनुभव किया है, उसे पता है कि अंतर है। तर्क नहीं हो पा रहा है, पर अंतर तो है।

वक्ता: है? कितना महत्वपूर्ण अंतर है?

श्रोता: बहुत। वही महत्वपूर्ण है, वही महत्वपूर्ण है। इतना बड़ा अंतर कि जीवन भर चाहूँ उस धारा में रहूँ, एटर्निटी तक। है बहाव ही, पर ऐसा अंतर है कि मैं चाहता हूँ एटर्निटी तक रहे। अनुभवी को पता है अंतर।

श्रोता: आचार्य जी, अनुभव तो सबके अलग अलग होते हैं|

वक्ता:  मैं आपसे कह रहा हूँ, आप अपनी ही दुनिया में जा कर के बताईये।

श्रोता: हमारी दुनिया में तो कोई अंतर है नहीं। पहले तो मानते थे, लेकिन अब आपने थोड़ा जो बताया है, तो मुझे तो लगता है दोनों ही बराबर हैं। मेरा गृहस्थ बनना भी ऐसा ही है, और मेरा संत बनना भी ऐसा ही है।

श्रोता: इट इस अबाउट टू गो विद द फ्लो ऑफ़ लाइफ।

वक्ता: मैं आपसे पूछता हूँ, ये जिसे आप फ्लो ऑफ़ लाइफ कहते हैं, और ये काफी प्रचलित मुहावरा है – द फ्लो ऑफ़ लाइफ। ये फ्लो एक है या दो? जिसको आप कहते हैं, कि आई ऍम गोइंग विद द फ्लो, खूब सुना होगा ना आपने? कोई आपको सलाह भी देगा, आप उदास बैठे हो, कोई हितैषी आ गया, वो बोलेगा अरे क्या हुआ? आप कहेंगे ऐसा ऐसा है । वो कहेगा, “डोंट पोंडर सो मच, जस्ट गो विद द फ्लो।” ये फ्लो क्या चीज़ है, ये एक ही फ्लो है या दो हैं? चौराहे वाला फ्लो और रमैनी वाला फ्लो, ये एक ही है, या दो हैं?

श्रोता: एक ही हैं सर|

वक्ता: तो बाज़ार में जो पागल हो कर के गलियाँ  बक रहा है, और एक संत, जो आपा खो कर के रमैनी गा रहा है, दोनों एक हैं?

श्रोता: एनर्जी में तो दोनों में है। एक नेगेटिव है, एक पॉजिटिव है। हो सकता है उसका रीज़न ही ऐसा हो कि उसे गुस्सा आ गया हो।

वक्ता: बिलकुल। कारण हमेशा हैं। उसके पास कारण है । कारण तो हर गुस्से के पीछे होता है। उसके किसी ने पैसे चुरा लिए हैं, या उसका दिमाग खराब हो गया है, मस्तिष्क में कोई कीड़ा लग गया है, कारण कुछ भी हो सकता है । तो कारण हैं । मैं आपसे जानना चाहता हूँ, चौराहे पर एक आदमी खड़ा हो के आसमान को गालियां बक रहा है; और एक संत सुबह सुबह मौन में बैठा है । बहाव एक ही है या दो हैं?

श्रोता: सर एक सो रहा है, एक जगा हुआ है|

वक्ता: (मुस्कुराते हुए) ये कौन सा? स्लीपिंग फ्लो, और अवेक फ्लो कौन सा होता है?

देखिये, ये काम बहुत हुआ है। आध्यात्मिकता यही है, शब्दों का एक बोरा जो इंसान के सर पे फेंक दिया जाए। और उस बोरे में भरा होगा कि नहीं, सोये मत रहो, जग जाओ । तो फिर मैंने कोशिश की है बीच में बोलने की, कि जगे मत रहो, सो जाओ। तुम्हारा जगना ज़्यादा खतरनाक है।

शब्दों से क्या फ़र्क़ पड़ता है? ये सोना, जगना क्या है? ये तो इशारे हैं ना किसी ओर? जिधर को ये इशारे हैं, वहाँ जा के बताईय । दोनों में कोई अंतर है कि नहीं? बहाव एक ही होता है या दो होते हैं? आप बहे होंगे कई बार, बहने बहने में अंतर है कि नहीं?

और एक मध्य की अवस्था भी होती है, जहाँ आप बह नहीं रहे होते हो, जहाँ जम गए होते हो। उसकी बात बाद में करेंगे। पहले तो बहने और बहने का अंतर बताईये।

श्रोतागण: होता है

नहीं होता है

आप चाहे मिडिल में रहे या पॉजिटिव और नेगेटिव फीलिंग में

वक्ता: कोई ऐसा बहना भी होता है, जो न पॉजिटिव हो न नेगेटिव हो?

श्रोता: साक्षीभाव|

वक्ता: कोई पागल हो कर के गोली चलाये जा रहा है एक दल की और से। जिन पर गोलियां चला रहा है, वो कहेंगे बड़ा नेगेटिव काम कर रहा है। और जिनकी तरफ से गोलियाँ चला रहा है, वो कहेंगे?

श्रोतागण: पॉजिटिव काम कर रहा है|

वक्ता: तो पॉजिटिव नेगेटिव हटाइये। आपको क्या पता पॉजिटिव या नेगेटिव, वो तो इस पे निर्भर करता है कि आप उधर खड़े हैं कि इधर। आप नली के किस तरफ खड़े हैं, ये निर्धारित करेगा कि गोली सकारात्मक है कि नकारात्मक। पॉजिटिव नेगेटिव हटाइये, संत जब उठता है, और उसके मुँह से बोल फूटते हैं, तो वो सकारात्मक होते हैं कि नकारत्मक?

कोई आता है आपके घर, और चोरी की आहट होती है, आपको लगा है कि शायद किसी ने दीवार फांदी अभी अभी। और आप डंडा ले के, या बन्दूक उठा के तुरंत उसके पीछे भागते हैं, या पुलिस का नंबर डायल करने लग जाते हैं। ये भी, यकायक ही हो रहा है ना? अनायास?

और एक ज़ेन फ़कीर के घर कोई घुसता है। और ज़्यादा कुछ है नहीं, कुछ बर्तन हैं, कुछ कपड़े हैं, वो वो उठा लेता है, और जब बाहर जाने लगता है तो फ़कीर पीछे से प्रार्थना करता है कि टूटी हुई छत में से जो मुझे चाँद दिख रहा है, काश कि ये चाँद भी मैं इस चोर को दे पाता।

इन दोनों घटनाओं में, कोई अंतर है, या नहीं?

और दोनों ही घटनाएँ, सोच सोच के नहीं की जा रही हैं । जब कोई आपको थप्पड़ मारता है, और प्रतिवाद में आपका हाथ भी उठ जाता है, उसके ऊपर। तो आपको सोचना तो नहीं पड़ता। और जब आप किसी चोर के लिए प्रार्थना करते हैं, कि ये क्या दो चार टूटे फूटे बर्तन ले के गया । वो जो चाँद दिख रहा है मुझे, टूटे हुए खप्पर से, काश वो भी मैं इसको दे पाता ।

तो ये भी आपने कोई योजना बना के तो प्रार्थना नहीं करी है । इन दोनों प्रतिक्रियाओं में, अगर दोनों को प्रतिक्रिया कहा जा सके; इन दोनों प्रतिक्रियाओं में, कोई अंतर है या नहीं?

या ये कहोगे कि एक सकारात्मक काम हो रहा है, और एक नकारात्मक काम हो रहा है?

श्रोता: सर, फ़कीर को अच्छे या बुरे का पता अब नहीं है, वो उन सब से ऊपर उठ चुका है ।

वक्ता: देखिये, मत बताईये मुझे कि कैसे परिभाषित करेंगे उस अंतर को । आप उस अंतर के समीप जाईये, और फिर कहिये आपको जो भी कुछ कहना है । आप सवयं वो अंतर ‘हो’ जाईये । आप उस अंतर के निर्णयता मत बनिए । दूर से देख के कुछ नहीं बता पाएंगे ।

श्रोता: सर, फ़कीर की परवरिश में फ़र्क़ है

वक्ता: और जो वाल्मीकि है, जिसकी परवरिश एक तरीके की हुई थी । फिर कोई अनुभव आता है । फिर, आगे के उसके सारे अनुभव, चोरी चकारी, राहजनी और हत्या के हैं । उस से रामायण कैसे फूट जाती है अगर परवरिश से ही होना है तो? तुम बताओ, वहाँ जा के बताओ, दोनों में अंतर कितना बड़ा है?

श्रोता: सर, कितना बड़ा, कैसे बताऊंगा मैं? हो जाओगे वहाँ, तो बोल पाओगे । वो फ़कीर हो कर बताओ, जो कहता है कि काश में इसको चाँद भी दे पाता ।

(श्रोता हंसने लगते हैं)

वक्ता: ऐसे नहीं बोल पाओगे । ऐसे तो बस १०१ डायल करोगे ।

(श्रोता हँसते हैं)

श्रोता: वो जिस केंद्र पे हैं, वो जो भी करेंगे, दुनिया उस को कुछ भी कहे, वो सही ही होगा । व्यवहार में, दिखने में वो सही गलत, लोग उसका कुछ भी इंटरप्रिटेशन करें, वो जो करेंगे वो सही ही होगा ।

वक्ता: तो, “वो” क्या चीज़ है?

श्रोता: हमारी परछाई

वक्ता: “वो” क्या है? तुम्हारी परछाई, या तुम्हारा? तुम्हारी परछाई तो वैसे ही हो गयी जैसे तुम हो । तुम गंजे हो तो परछाई में बाल थोड़े ही आ जायेंगे? सोचो तो ।

श्रोता: करुणा का फ़र्क़ है सर

वक्ता: क्या चीज़ है करुणा? “क- रू- णा “,  करुणा क्या है?

श्रोता: कम्पैशन का फ़र्क़ है सर

वक्ता: हाँ, कम्पैशन क्या है? “क-म-पै-श-न”, ये है कम्पैशन? क्या है कम्पैशन?

श्रोता: सामने वाले की स्टेट ऑफ़ माइंड को हम अपने में फील करें ।

वक्ता: क्या, क्या, ये क्या चीज़ हैं, कैसे फील की जाती है? ठीक वैसे ही फील की जाती है? जैसे गुस्सा फील होता है?

श्रोता: हमें उसकी सर, लाचारी समझ में आती है कि किस स्टेट ऑफ़ माइंड में इसको भूख है तो ये चोरी कर रहा है।

वक्ता: ये बात अगर इतनी ही आसान है, तो एक-शून्य-शून्य, क्यों डायल हो जाता है जल्दी से? अगर ये बात इतनी ही आसान होती की ये, इसको भूख लगी होगी, ये लाचार है, इसलिए बेचारा चोरी करने आया है, तो ये बात तो फिर एक वाक्य की हो गयी । ये बात तो फिर बस बात हो गयी । तो फिर क्यों पुलिस को न्यौता दिया जाता है? मैं पुलिस को न्यौता दिए जाने को गलत नहीं ठहरा रहा । मैं जानना चाहता हूँ, इस बात में वज़न कितना है? या बस बात है? कि कह दिया, “क-रू-णा” ।

श्रोता: वजन है सर

वक्ता: कितना बड़ा वजन है?

श्रोता: सर जैसे गुड़ की मिठास नहीं बता पाते, वैसे हम भी नहीं बता पाएंगे

वक्ता: ये तो कबीर की बात है । गुड़ है आपके पास? कबीर का वक्तव्य तो गुड़ नहीं है । कबीर ने कह दिया गूंगे को ‘गुड़’, तो उससे गुड़ मिल गया क्या आपको? ना आप गूंगे हुए । (हँसते हुए)

श्रोता: सर पूरी स्पिरिचुएलिटी में इतना बैगेज है वर्ड्स का, मगर उसकी सिर्फ ज़रुरत है वहाँ जाने के लिए, ना कि उन शब्दों को पढ़ते रहने के लिए ।

वक्ता: तो वहाँ जा के बोलो|

श्रोता: तो जिसमें भी वो बहाव आया, वो स्पिरिचुएलिटी को अनुभव करने के लिए, न कि उसे पकड़ कर रखने के लिए

वक्ता: तो करो ना अनुभव । चाँद पर चढ़ कर बोलो । जिस चाँद को वो फ़क़ीर देख रहा था, तुम उस पे चढ़ के बोलो ना ।

श्रोता: सर जैसे हम कोई छोटे से छोटा काम कर रहे होते हैं, या कोई बड़ा काम है; जैसे कि कक्षा में पढ़ा रहे हो, बच्चों से बात कर रहे हो, शब्द बोल रहे हो । तभी अंदर एक आदमी है, या पता नहीं क्या है, जो भी है । कभी ऐसा लगता है कि मामला जमा नहीं है, खरा नहीं है । आपको बस अंदर से वो आता है, कि मामला जमा नहीं है ।

वक्ता: ये हमेशा पता चलता है कि मामला जमा नहीं है? हमेशा?

मामला अकसर नहीं जमता है, हर बार पता चलता है कि नहीं जमा? और हर बार एक सी तीव्रता से पता चलता है?

श्रोता: नहीं, हर बार नहीं। और तीव्रता भी हर बार वो नहीं होती।

वक्ता: शायद यही कारण है कि पहला बहाव क़ायम रह पाता है। क्योंकि पता ही नहीं चलता कि मामला जमा या नहीं ।

श्रोता: हाँ

वक्ता: ये मामले का न जमना, और ये आभास हो पाना कि नहीं जम रहा – किस पर निर्भर करता है? भई अगर नहीं जम रहा एक बार, तो जमता तो कभी भी नहीं होगा ना? क्या किसी और अनुभव से तुलना कर के बता रहे हो कि जमा नहीं?

श्रोता: ऐसा नहीं है कि जब मामला जमा था उससे तुलना कर रहा हूँ। क्योंकि जब नहीं जम रहा तब बस एक आभास है, बस पता है, कि नहीं जम रहा।

वक्ता: तुलनात्मक रूप से नहीं होता?

श्रोता: कुछ तो है, अब ये नहीं पता कि क्या है वो।

वक्ता: इसका मतलब तुलना की बात नहीं है। इसका मतलब ये नहीं है कि किसी और अनुभव से तुलना की जा रही है । ये कोई और चीज़ है।

श्रोता: वो बस फड़क रहा होता है । जैसे छोटी से छोटी बात ले लो, कि आप चल रहे हो पार्क में । बस वो फड़क रहा है । बहुत बार होता है, कि वो नहीं फड़क रहा होता।

वक्ता: पर जो भी कुछ हो रहा होता है, हम हमेशा उसके प्रति संवेदनशील क्यों नहीं होते? हमारा जो आतंरिक राडार होता है, उस फड़कन को हमेशा पकड़ क्यों नहीं पाता।

श्रोता: सोच। सोच उसपर हावी…

वक्ता: हाँ । क्योंकि पकड़ने के लिए मन शांत होना चाहिए।

श्रोता: सर मन की शान्ति से ज़्यादा, ईमानदारी होनी चाहिए। पहले मुझे लगता था कि ईमानदारी का मतलब कि आप दूसरे से सच बोल रहे हो। ईमानदारी उससे ज़्यादा ये होती है कि जहाँ पर आप हो, वहाँ पर आप खुले खड़े हुए हो या नहीं खड़े हुए, अपनी तरफ।

जैसे मैं अभी यहाँ बैठा हूँ, आपसे बात कर रहा हूँ । एक चीज़ होती है कि मैं आपको न सुन कर ये देखूं कि कौन खाँस रहा है, कौन बोल रहा है। बोलने को तो मैं सेशन में हूँ, लेकिन असल में आपकी बात पहुँच नहीं रही है। क्योंकि वो बच रही है कहीं न कहीं। और जैसे ही वो बात खुलती है, तो वो ऐसे चोट पहुँचाती है एकदम से एक और कवच गिरता है ।

वो जो मामला न जमने की बात होती है, वो तो रहती ही है।

जैसे कि मैं अपने घर गया हूँ, वहाँ पे बहुत से रिश्तेदार हैं। और जब मैं यहाँ वापस आऊँगा काम करने तो मेरे छः से सात घंटे ऐसे बीतेंगे कि हाथ कहीं टिक नहीं रहा है, चीज़ें गिर रही हैं। तो अंदर आपको समझ में आ जाता है कि मामला अभी खरा नहीं है।

वक्ता: तो अंतर होता है। कुछ कुछ भीतर से आपको ऐसा लग भी रहा होता है कि मामला जम नहीं रहा है, मिसफिट है। कहीं कुछ अटक रहा है। जैसे कहीं कोई घर्षण है, कोई चीज़ चुभ रही है। कुछ पूरा नहीं हो पा रहा, कुछ उलझन है।

जैसे किसी दांत में कोई दर्द हो। देखा है कभी? दांत में हल्का सा दर्द होता है तो कैसा लगता है? पूरा शरीर बाक़ी ठीक है, और अकसर याद भी नहीं आता कि कहाँ क्या गड़बड़ है। पर कुछ लग रहा होता है – गड़बड़  है, गड़बड़ है। फिर आप कहते हो अच्छा दांत में दर्द हो रहा है। या खाते वक़्त गले में जैसे कुछ फंस सा गया हो। छोटा सा कांटा। अब आप अपनी दिनचर्या में लगे भी हुए हो तो भी कुछ असहज सा अनुभव हो रहा है।

तो वो होता तो है। पर हम अपनी ही असहजता के प्रति इतने असंवेदनशील क्यों हो जाते हैं? इतने बेहोश क्यों हो जाते हैं? पता क्यों नहीं चलता कि दांत में दर्द हो रहा है? पता क्यों नहीं चलता कि कुछ है, अरे लगता है ये पैंट थोड़ी ज़्यादा टाइट है । पढ़ रहा हूँ, पर लगता है रौशनी थोड़ी कम है, इसलिए सर में हल्का हल्का दर्द हो रहा है। ये हमें पता क्यों नहीं लगता?

श्रोता: आचार्य जी, अगर शरीर को लें, जैसे आँख में कुछ लगा है, तो तुरंत पता चलेगा कि कुछ है। हाथ पर कुछ होगा तो इतनी जल्दी नहीं पता चलेगा। मैं किस स्टेट ऑफ़ माइंड में हूँ, वो बहुत मैटर करता है, कि मैं संवेदनशील हूँ या नहीं। अगर मैं बहुत कुछ सोच रही हूँ, तो उस समय नहीं रहेगी सेंसिटिविटी या मैं अगर सो रही हूँ, तब।

वक्ता: तो जागते समय अगर कुछ और सोच रहे हो, तो वो जो सोच है वो कोहरे की तरह छा जाएगी तुम्हारी संवेंदनशीलता पर। ठीक है ना?

तुम्हें दर्द हो रहा है अंगूठे में, पाँव के। और सामने कोई बहुत मनपसंद फिल्म चल रही है। तुम उस फिल्म में इतने रत हो सकते हो कि हो सकता है अंगूठे का होश खो दो। हो सकता है कि नहीं?

और अगर तुम सो रहे हो, तो नींद छा सकती है तुम्हारे ऊपर, उसी कोहरे की तरह। तुम्हारे अंगूठे में दर्द है, तुम सो जाओ, दर्द कहाँ गया? या दर्द बचा? तुम लुट गए हो, तुम क़ैद में हो, तुम सो जाओ, क़ैद कहाँ गयी?

सब कुछ जैसे किसी गहरी काली पर्त के नीचे, दब जाता है।

वो जो पर्त है, वो जो कम्बल है, जो ढक देता है, कोहरे की तरह। वो विचार भी हो सकते हैं, जागृत अवस्था में और सो गए हो तो नींद हो सकती है, सपने हो सकते हैं। पर, ढक देता है, इससे ये तो सिद्ध होता ही है ना कि कुछ है जो ढका जा रहा है । किसी चीज़ का होना तो साबित हो ही रहा है। जब विचार नहीं होते, जब वो मूवी खत्म हो जाती है, तो एहसास दोबारा शुरू हो जाता है। जिस चीज़ को विचारों की भीड़ के कोलाहल ने दबा रखा था, जिसकी झीनी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह छुप गयी थी, दब गयी थी; जब नक्कारखाने से बाहर आते हो, तो वो आवाज़ पुनः सुनाई देने तो लग जाती है।

पहले और दूसरे बहाव में अंतर उसी ईमानदारी का है, उसी संवेदनशीलता का है जिसमें तुम उस अंतर की आवाज़ को सुन पाओ। आवाज़ बहुत तीव्र कभी नहीं होने वाली, आवाज़ तो अपनी तीव्रतम अवस्था में हमेशा ही है। ना बढ़ सकती है, ना घट सकती है। फ़र्क़ सिर्फ इस बात का है, कि तुम जीवन नक्कारखाने में बिता रहे हो, या मौन में। फ़र्क़ सिर्फ इस बात का है कि तुम जीवन जागृति में बिता रहे हो? या नींद में।

नींद में हो, तो नींद उस आवाज़ को दबा देगी। नक्कारखाने में हो तो नक्कारखाना उस आवाज़ को दबा देगा। अंतर अगर नहीं दिखाई पड़ रहा तो समझ जाओ, या तो सो रहे हो, या फिर अगर जागे हुए हो, तो विचारों की भीड़ से घिरे हुए हो। अन्यथा मैं आपका ही हवाला ले कर के कह रहा हूँ, कि अंतर तो है। अपने अनुभवों को नहीं, आपके अनुभवों को साक्षी बना कर कह रहा हूँ, कि अंतर तो है।

लेकिन उस अंतर को भी मान्यता देने में, हमें बड़ा समय लग गया। और अभी भी हमने कोई हार्दिक मान्यता नहीं दी है । अभी भी हम थोड़े थोड़े अनिर्णीत से हैं। तर्कबाजी शुरू हो जाए, कोई आ के कुछ और कह दे, या कुछ माहौल बदल जाए, तो हम में से कई लोग दल बदल लेंगे। कह देंगे नहीं नहीं नहीं, वो ज़रा उस वक़्त  माहौल ऐसा हो गया था कि हमें कहना पड़ा कि अंतर है। वरना वास्तव में हमें लग नहीं रहा कि कोई अंतर वगैराह है।

श्रोता: आचार्य जी  इसको ना हम यूज़ करते हैं, सरवाइवल टूल की तरह हम लोग।

उदाहरण के लिये, अगर एक आदमी को कोई नुक्सान होता है, जो उसके लिए वस्तुगत है। तो वहाँ पर वो खुद को भी यही समझाता है, या बाहर से भी उसे यही इनपुट मिल रहा होता है कि काम में लिप्त हो जाओ, खो जाओ काम में।

किसी का पति मर गया है, कोई बात नहीं बेटे में रम जाओ, बच्चा तो है ना अभी तुम्हारे पास।

तो, मुझे नहीं पता कि ये कब सरवाइवल टूल से प्रोब्लेमैटिक हो जाता है।

वक्ता: और मज़ेदार बात जानती हो क्या है? सुन्न हो जाने की, संवेदना-शून्य हो जाने की दवाइयाँ, आप जीवन भर भी ले सकते हो। नंबनेस की हज़ार विधियाँ मौजूद हैं। और उन्हें आप जीवन भर ले सकते हो, और लेते लेते सो भी सकते हो, ख़त्म हो सकते हो, मर सकते हो। और पूरा जीवन आपको वो आवाज़ सुनाई नहीं देगी जो आपसे कह रही है कुछ गड़बड़ है, कुछ असहज है, कुछ खोट है। गाड़ी का कोई पुर्ज़ा है जो खट-खट कर रहा है। आप बहुत आसानी से उस बहाव में डूबे रह सकते हो।

जिन्होंने ये विधि सुझाई है कि अगर कहीं कुछ असहज लग रहा हो तो किसी दूसरी चीज़ में डूब जाओ; वो बड़े शातिर लोग रहे होंगे। आप ये बिलकुल कर सकते हो। और ये आप इतनी प्रवीणता के साथ कर सकते हो कि करते ही जाओ, करते ही जाओ, पूरा जन्म बीत जाए।

आप जगते हो, आपको जो दिखाई देता है, वो कष्ट देता है। आप निश्चित रूप से सोने की गोलियों का जीवन भर प्रयोग कर सकते हो। होश आपको कष्ट देता है, आप डूब सकते हो, ड्रग्स में, तरह तरह के नशों में। घर आके सूनापन सताता है, आप बिलकुल ये कर सकते हो कि मैं घर आऊंगा ही नहीं । दस बजे, बारह बजे तक मैं दफ़्तर में ही बैठा रहूँगा। जीवन आपको धर्म की याद दिलाता है, आप जीवन से अपने आप को काट सकते हो, किसी रिश्ते में डूब सकते हो। सड़क पर निकलूंगा तो दिखाई देगा कि कितना कुछ है जो करना मांगता है।

सड़क  पर निकलूंगा तो दिखाई देगा कि मैं अकेला नहीं, इतना बड़ा संसार है और उसके प्रति मेरा कोई धर्म है। बहुत कुछ है जो होना चाहिए, तो मैं सड़क पे निकलूंगा ही नहीं । मैं घर पर तथाकथित प्रेम के आँचल में घुस करके सोया रहूंगा । मैं कहूंगा, “मेरी पत्नी, मेरी माँ, मेरे बच्चे, मेरा भाई, यही मेरा संसार हैं । मेरा और किसी के प्रति क्या दायित्व? मुझे क्या करना है इस बात से कि आसमान पर धुआँ क्यों छाया हुआ है? मुझे क्या करना इस बात से कि ये सारे पेड़ जो कभी दिखते थे, अचानक कहाँ विलुप्त हो गए। मुझे क्या करना है इस बात से कि अचानक कसाईयों की दुकानें बढ़ती ही जा रही हैं। मैं तो घर में हूँ, घर मेरा प्रेम महल है। मैं डूबा हुआ हूँ प्रेम में बहाव में हूँ।”

और बहुत आसान है, घर में मधुर संगीत बज रहा है, पत्नी सुन्दर है तुम्हारी और युवा है, दोनों एक दूसरे में खोये हुए हो, मस्त हो। तुम कुछ अपनी और से कर रहे हो,  वो कुछ अपनी और से कर रही है। तुम घर को चीज़ों से भर रहे हो, वो उन चीज़ों को व्यवस्था दे रही है। तुम घूमने फिरने का आयोजन करते हो, वो खाने पकाने का आयोजन करती है। दोनों एक दूसरे में डूबे हुआ हो। और तुम बिलकुल कह सकते हो कि जीवन तो अभी स्वर्ग चल रहा है, हम डूबें हुए हैं। और ये डूबना इतना गहरा हो सकता है कि तुम्हें यही लगे, ये तो मैं उसी वास्तविक बहाव में हूँ, जिस बहाव को सच्चा कहा गया है। जिस बहाव को आध्यात्म कहा गया है। तुम इस, अपने सच्चे बहाव की तारीफ में कवितायें भी लिख सकते हो। तुम अपने फेसबुक स्टेटस पर डाल सकते हो, तुम होने दोस्तों को बता सकते हो। और जब बता रहे होंगे तो खुद तुम्हें ये यक़ीन होगा कि जो तुम बता रहे हो, सच ही बता रहे हो।

पर खोट रह जायेग । कुछ कमी है वो रह जाएगी। कैसे पता? ऐसे पता कि तुम दोनों जब अपने प्रेम महल से बाहर निकलोगे तो कुछ ऐसा तुम्हारे सामने पड़ेगा जो पोल खोल देगा। वो ज़रूरी नहीं है कि तुम्हारे रिश्तों में दरार का कारण बन के ही सामने आये। एक ज़रा सी बात है, तुम दोनों अपना स्वर्ग तुल्य सुख भोग करके अभी अभी रत रहने के बाद, खाने पीने के बाद, नहाने धोने के बाद, इक्कठे बाहर घूमने निकले हो। और एक नंगा भूखा बच्चा तुम्हारे सामने से गुज़र जाता है। क्या तुम्हें दिख नहीं गया, कि कुछ गड़बड़ तो है? दिख जाता है, पर मन पर एक दूसरे की माया कुछ ऐसे सवार है कि तुम्हें कुछ दिखाई नहीं पड़ेगा।

वो तुम्हारे ख्यालों में खोयी हुई है, तुम उसकी आँखों में खोये हुए हो, तुमको वो भूखा बच्चा दिखाई ही नहीं पड़ेगा। दिखते हुए भी नहीं दिखाई पड़ेगा। तुम उसका कोमल हाथ पकड़े प्यार की क़समें खाते हुए जा रहे होगे, सड़क के किनारे किसी पशु की कोमल गर्दन काटी जा रही होगी, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ेगा। यहाँ तक हो सकता है, कि उसका कोमल हाथ पकड़े हुए, तुम खुद खड़े हो जाओ मांस की दुकान पर, और उसके कोमल हाथ से ज़्यादा कोमल किसी जीव की गर्दन तुम कटवा दो। तुम्हें दिखाई ही नहीं पड़ेगा।

जिन्हें दिखना होता है, उन्हें दिख जाएगा। जो इतना डूबे न हों, जो इतने खोये न हों। सही शब्द का प्रयोग किया तुमने, ‘ईमानदारी’, जिनमें ज़रा ईमानदारी हो, उन्हें दिख जायेगा। वो कहेंगे, “न, कुछ गड़बड़ है, बहुत बड़ी गड़बड़ है। मैं जिस बहाव में हूँ, वो कोई गड़बड़ बहाव है। ऐसा नहीं कि वो मुझे गलत दिशा में ले जा रहा है, वो गलत तल पर है। ऐसा नहीं कि वो मुझे किसी गलत सागर में डुबो देगा, वो बहाव ही अम्लीय है, एसिडिक है।” आप किसी ऐसी नदी में डाल दिए गए हो, जिसमें तेज़ाब ही तेज़ाब है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो नदी किस सागर में जा कर मिलेगी।

उस नदी में डाला जाना ही तुम्हें ख़त्म कर रहा है, नष्ट कर रहा है। उस नदी में तुम्हारी मौजूदगी ही अभिशाप है तुम्हारे लिए। दिक्क्त बस इतनी है, कि क्योंकि तुम तेज़ाब की नदी में डाल दिए गए हो, इसलिए क्षण क्षण तुम घुलते जा रहे हो। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी संवेदना नष्ट होती जा रही है। जितनी देर तुम उस नदी में रहोगे, उतना तुम्हारे लिए असम्भव हो जाएगा ये जानना कि कुछ गलत है। क्योंकि जानने के जो तंतु हैं, जानने की जो आतंरिक व्यवस्था है तुम्हारी, ठीक उस व्यवस्था को ही वो तेज़ाब खाये जा रहा है। जितनी देर तक तुम उस नदी में हो, उतनी ये सम्भावना घटती जाती है, कि तुम कभी भी कह पाओगे, कि मैं गलत बहाव में हूँ, मैं गलत नदी में हूँ। नदी ने ही ये तय कर दिया है कि अब तुम जान नहीं पाओगे।

नदी तेज़ाब की है, कोई बड़ी बात नहीं कि इसमें तुम्हारे होश उड़ जाएँ। एक होश का उड़ना और दूसरे होश का उड़ना, अलग अलग हैं। समर्पण के क्षण में भी होश उड़ते हैं, सम्भोग के क्षण में भी होश उड़ते हैं। फ़र्क़ को समझना। सिर्फ इसलिए कि तुम्हारे होश उड़े हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि तुमको किसी कमी का एहसास नहीं हो रहा, धोखा मत खा जाना।

श्रोता: तो अगर चारों तरफ कैओस मचा हुआ है, और डिफेंस के तौर पे कोई एक दम सेंसिटिविटी सब भुला दे। डिफेंस के तौर पर। सो, वुड इट बी अ मार्क ऑफ़ हेल्थ?

वक्ता: इट्स अ मार्क ऑफ़ फ्रीजिंग। जम गए हो। पहला दिख गया है, कि ठीक नहीं। दूसरे में बह पाने की  हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। अब जम गए हो। अब दलदल बनेगी। पहले से तो पिंड छुड़ा लिया, दूसरे के सामने नतमस्तक नहीं हो पा रहे। ऐसे लोग आमतौर पर, जो सन्यास का प्रचलित रूप है, उसको ग्रहण कर लेते हैं । वो दुनिया छोड़ कर भागते हैं। ये तो दिख जाता है, कि जो कुछ हो रहा है, वो गड़बड़ है, बहुत गड़बड़ है। पर ये नहीं जान पाते कि इस गड़बड़ के मध्य, सही क्या है, सुंदर क्या है।

श्रोता: वो अपने आप को ये कहने लगते हैं, कि इस गड़बड़ का सुधार हम अकेले कैसे कर पाएँगे, तो पलायन करते हैं|

वक्ता: पलायन। ये जमना कितनी क़ीमत का है, ये आप जानो। इतनी क़ीमत तो है इसमें कि अब वो एक्टिव रूप से भागीदार नहीं हो रहे, उसी बहाव को और तीव्र करने में, और गहराने में। पर ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने सौंदर्य के नए धरातल खोज लिए हों । ऐसा भी नहीं है, कि उन्हें नया जीवन उपलब्ध हो गया हो। वो बस अभी भगोड़े ही हैं और भगोड़ा होना, कोई शान्ति तो नहीं दे देगा।

श्रोता: अगर पहले बहाव में कोई दिक्क्त ही नहीं हो, कि मान लीजिये बेहोशी में ही पूरा जीवन चला जाए?

वक्ता: हो सकता है। वही बात हमने कही कि दिक्क्त ये है कि, जो कर्म का सिद्धांत है, अगर उसको आप भविष्य से जोड़ के देखोगे तो वो सिद्धांत झूठा साबित हो जाता है। उसका ब्रेकडाउन हो जाता है।

कर्म का सिद्धांत कहता है कि अगर गलत जीवन जी रहे हो तो गलत परिणाम भुगतोगे। ये आवश्यक बिलकुल भी नहीं है। ऐसा बिलकुल हो सकता है कि तुम गलत जीवन जीते जाओ, जीते जाओ, जीते जाओ, और एक दिन मर जाओ। ऐसा बिलकुल हो सकता है, कि तुम नशे में डूबे डूबे डूबे डूबे, एक दिन? मर गए। कहाँ है परिणाम? या तो परिणाम उसी क्षण में था जिस क्षण तुम बेहोश थे, अन्यथा ये बहुत सम्भव है कि किसी आगामी क्षण में परिणाम हो ही न। इसीलिए, कर्म के सिद्धांत के प्रचलित होते हुए भी, लोग हर तरीके के कर्मों में उद्यत रहते हैं, क्योंकि वो देखते हैं अपनी आँखों से कि बुरा करने वालों के साथ ज़रूरी नहीं कि बुरा हो जाए।

श्रोता: इसलिए तो लोग गेरुए वस्त्र धारण कर के संत कहलाने लग जाते हैं। इसलिए मानने में बड़ी दिक्क्त होती है कि अगर कोई संत है तो वो जीन्स कैसे पहन सकता है। ये सब व्यावहारिक चीज़ें ही तो हैं। तो जहाँ, मान्यता व्यवहार की है, वहाँ तो लोग उन सिद्धांतों को और पुष्ट करेंगे ही। वही कर्म के संदर्भ के सिद्धांतों में भी बातें लागू हैं।

श्रोता: आचार्य जी, इन फैक्ट मोरैलिटी भी यही चीज़ है। मतलब आपको इतना सोचना क्यों पड़ रहा है, ये सब गलत है, ये सही है। अगर आप अंदर से सही हो, तो आपको पता है आप सही कर रहे हो।

वक्ता: ये जो ‘अंदर’ वाली चीज़ होती है ना, समझियेगा। वो आपके ही अंदर नहीं होती, वो सबके अंदर होती है, वो एक चीज़ है।

श्रोता: आपने कहा था, वो व्यक्तिगत नहीं होता|

वक्ता: वो व्यक्तिगत तो है नहीं। वो जो आवाज़ आप तक आनी है कि कुछ गड़बड़ है, कुछ अटका हुआ है, कुछ अबूझ है, वो आवाज़ सब तक आनी है। लेकिन कान अलग-अलग हैं। सब नहीं सुन पाएँगे उसको। आप सुन पाते हैं, नहीं सुन पाते हैं, वो इस पे निर्भर करता है कि आप नक्कारखाने में हैं, नींद में हैं, या मौन है, जगे हुए हैं। आवाज़ सब तक आ रही है, आपको इस स्थिति में होना पड़ेगा जहाँ वो आवाज़ सुनाई पड़े। आवाज़ सार्वभौम है। आवाज़ आत्मा की है, आवाज़ एक है ।

देखिये, वो चीज़ अतिसूक्ष्म है। जो परत है, जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, जो कम्बल है, जो ढक देता है, वो बड़ा शातिर कम्बल है। उसको बड़ी चतुराई से बना गया है। वो कोई भी नाम ले सकता है। वो अपने आप को साक्षी कह सकता है, वो दृष्टा कह सकता है, वो अपने आप को समर्पित कह सकता है, वो भक्त कह सकता है अपने आप को। वो साधक कह सकता है अपने आप को। वो कुछ भी कह सकता है। बात नामों की नहीं है। बात सिर्फ इस चीज़ से निर्धारित होनी है कि आपका जीवन कैसा है। जीवन अगर उचित है, तो वो आवाज़ आपको सुनाई दे जाएगी। तो वो सूक्ष्मतम अनुभव, जिसको अनुभव कहना भी ठीक नहीं है, आपको हो जायेगा।

श्रोता: हमारी वृत्तियाँ वैसी ही रहेंगी जैसी हैं?

वक्ता: वृत्तियाँ इस पर निर्भर करती हैं ना कि जीवन कैसा है| जीवन अगर उचित है तो आप वृत्तियों से शनैः शनैः निवृत ही होते जा रहे हो।

श्रोता: वो कंडीशनिंग ऑपरेट तो करेगी ना?

वक्ता: कंडीशनिंग का ऑपरेशन दो तरीके से हो सकता है। आप जान लें आपकी क्या कंडीशनिंग है, आप जानते जा रहे हैं, तो कंडीशनिंग जलती जा रही है। जो भी आपकी वृत्तियाँ थी वो जलती जा रही हैं। उसकी निर्जरा होती जा रही है। और दूसरा यह है कि जब वो हो रहा है, तो आप उसके साथ लग गए, आपने उसको बल दे दिया। आपने उसको और सघन कर दिया।

किसी भी स्थिति में, जो भी होता है, वो होता तो गुणों के माध्यम से ही है। और गुण का अर्थ ही होता है, संस्कार।

ऐसे समझियेगा: हर कर्म अभिव्यक्त तो गुणों के धरातल पर ही होता है। संस्कारों के माध्यम से ही होता है। कबीर बोलते हैं तो किस भाषा में बोलते हैं? जो भाषा उन्हें संस्कारों में मिली है, उसी में ना? राम का ही तो नाम लेते हैं? कबीर ने कभी क्राइस्ट का नाम लिया क्या?

तो कबीर की भी जो अभिव्यक्ति है, जो उनकी आत्मिक, हार्दिक बात है, वो भी प्रकट तो उनके संस्कारों के माध्यम से ही हो रही है ना? समझिएगा बात को| अब संस्कारों को ही हमेशा प्रकट होना है, गुणों को ही हमेशा प्रकट होना है। मीरा जो भी बोल रही हैं, वो स्त्रैण हैं । मीरा कृष्ण को पति ही तो बना रही हैं ना, पत्नी तो नहीं बना रही? क्यों? क्योंकि मीरा?

श्रोतागण: स्त्री हैं|

वक्ता: स्त्री हैं। अब स्त्री होना कोई आत्मा की तो बात है नहीं। आत्मा का तो कोई लिंग होता नहीं। स्त्री होना, तो जैविक संस्कार है ना मीरा का। तो मीरा की जो अभिव्यक्ति है लेकिन होगी वो स्त्री के ही रूप में। अब स्त्री हो कर के या तो आप ये कह सकते हो कि कृष्ण को ही पति बनाना है। या आप ये कह सकते हो कि मैं स्त्री हूँ, तो इसलिए मुझमें जितने भी स्त्रिओचित गुण होते हैं, मोह, ममता, वो सब मौजूद रहेंगे| आप समझ रहे हैं?

तो संस्कारों की अभिव्यक्ति दोनों काम कर सकती है – पहला, मैं स्त्री हूँ, और स्त्री का पति होता है, तो मेरे पति कौन होंगे? कृष्ण।

और दूसरा ये हो सकता है कि मैं स्त्री हूँ, मैं स्त्री हूँ, तो स्त्रियों का काम तो बच्चे पैदा करना है, तो बच्चे पैदा भी करुँगी। गुणों का ही खेल है। पर धरातल का अंतर है। दोनों बहाव हैं, पर दोनों बहावों में ये ही अंतर है।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं


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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

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