धोखा मत खा जाना

सुन्न हो जाने की, संवेदना-शून्य हो जाने की दवाइयाँ, आप जीवन भर भी ले सकते हो। नंबनेस की हज़ार विधियाँ मौजूद हैं। और उन्हें आप जीवन भर ले सकते हो, और लेते लेते सो भी सकते हो, ख़त्म हो सकते हो, मर सकते हो। और पूरा जीवन आपको वो आवाज़ सुनाई नहीं देगी जो आपसे कह रही है कुछ गड़बड़ है, कुछ असहज है, कुछ खोट है। गाड़ी का कोई पुर्ज़ा है जो खट-खट कर रहा है। आप बहुत आसानी से उस बहाव में डूबे रह सकते हो।

जिन्होंने ये विधि सुझाई है कि अगर कहीं कुछ असहज लग रहा हो तो किसी दूसरी चीज़ में डूब जाओ; वो बड़े शातिर लोग रहे होंगे। आप ये बिलकुल कर सकते हो। और ये आप इतनी प्रवीणता के साथ कर सकते हो कि करते ही जाओ, करते ही जाओ, पूरा जन्म बीत जाए।

आप जगते हो, आपको जो दिखाई देता है, वो कष्ट देता है। आप निश्चित रूप से सोने की गोलियों का जीवन भर प्रयोग कर सकते हो। होश आपको कष्ट देता है, आप डूब सकते हो, ड्रग्स में, तरह तरह के नशों में। घर आके सूनापन सताता है, आप बिलकुल ये कर सकते हो कि मैं घर आऊंगा ही नहीं । दस बजे, बारह बजे तक मैं दफ़्तर में ही बैठा रहूँगा। जीवन आपको धर्म की याद दिलाता है, आप जीवन से अपने आप को काट सकते हो, किसी रिश्ते में डूब सकते हो। सड़क पर निकलूंगा तो दिखाई देगा कि कितना कुछ है जो करना मांगता है।

सड़क  पर निकलूंगा तो दिखाई देगा कि मैं अकेला नहीं, इतना बड़ा संसार है और उसके प्रति मेरा कोई धर्म है। बहुत कुछ है जो होना चाहिए, तो मैं सड़क पे निकलूंगा ही नहीं । मैं घर पर तथाकथित प्रेम के आँचल में घुस करके सोया रहूंगा । मैं कहूंगा, “मेरी पत्नी, मेरी माँ, मेरे बच्चे, मेरा भाई, यही मेरा संसार हैं । मेरा और किसी के प्रति क्या दायित्व? मुझे क्या करना है इस बात से कि आसमान पर धुआँ क्यों छाया हुआ है? मुझे क्या करना इस बात से कि ये सारे पेड़ जो कभी दिखते थे, अचानक कहाँ विलुप्त हो गए। मुझे क्या करना है इस बात से कि अचानक कसाईयों की दुकानें बढ़ती ही जा रही हैं। मैं तो घर में हूँ, घर मेरा प्रेम महल है। मैं डूबा हुआ हूँ प्रेम में बहाव में हूँ।”

और बहुत आसान है, घर में मधुर संगीत बज रहा है, पत्नी सुन्दर है तुम्हारी और युवा है, दोनों एक दूसरे में खोये हुए हो, मस्त हो। तुम कुछ अपनी और से कर रहे हो,  वो कुछ अपनी और से कर रही है। तुम घर को चीज़ों से भर रहे हो, वो उन चीज़ों को व्यवस्था दे रही है। तुम घूमने फिरने का आयोजन करते हो, वो खाने पकाने का आयोजन करती है। दोनों एक दूसरे में डूबे हुआ हो। और तुम बिलकुल कह सकते हो कि जीवन तो अभी स्वर्ग चल रहा है, हम डूबें हुए हैं। और ये डूबना इतना गहरा हो सकता है कि तुम्हें यही लगे, ये तो मैं उसी वास्तविक बहाव में हूँ, जिस बहाव को सच्चा कहा गया है। जिस बहाव को आध्यात्म कहा गया है। तुम इस, अपने सच्चे बहाव की तारीफ में कवितायें भी लिख सकते हो। तुम अपने फेसबुक स्टेटस पर डाल सकते हो, तुम होने दोस्तों को बता सकते हो। और जब बता रहे होंगे तो खुद तुम्हें ये यक़ीन होगा कि जो तुम बता रहे हो, सच ही बता रहे हो।

पर खोट रह जायेग । कुछ कमी है वो रह जाएगी। कैसे पता? ऐसे पता कि तुम दोनों जब अपने प्रेम महल से बाहर निकलोगे तो कुछ ऐसा तुम्हारे सामने पड़ेगा जो पोल खोल देगा। वो ज़रूरी नहीं है कि तुम्हारे रिश्तों में दरार का कारण बन के ही सामने आये। एक ज़रा सी बात है, तुम दोनों अपना स्वर्ग तुल्य सुख भोग करके अभी अभी रत रहने के बाद, खाने पीने के बाद, नहाने धोने के बाद, इक्कठे बाहर घूमने निकले हो। और एक नंगा भूखा बच्चा तुम्हारे सामने से गुज़र जाता है। क्या तुम्हें दिख नहीं गया, कि कुछ गड़बड़ तो है? दिख जाता है, पर मन पर एक दूसरे की माया कुछ ऐसे सवार है कि तुम्हें कुछ दिखाई नहीं पड़ेगा।

वो तुम्हारे ख्यालों में खोयी हुई है, तुम उसकी आँखों में खोये हुए हो, तुमको वो भूखा बच्चा दिखाई ही नहीं पड़ेगा। दिखते हुए भी नहीं दिखाई पड़ेगा। तुम उसका कोमल हाथ पकड़े प्यार की क़समें खाते हुए जा रहे होगे, सड़क के किनारे किसी पशु की कोमल गर्दन काटी जा रही होगी, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ेगा। यहाँ तक हो सकता है, कि उसका कोमल हाथ पकड़े हुए, तुम खुद खड़े हो जाओ मांस की दुकान पर, और उसके कोमल हाथ से ज़्यादा कोमल किसी जीव की गर्दन तुम कटवा दो। तुम्हें दिखाई ही नहीं पड़ेगा।

जिन्हें दिखना होता है, उन्हें दिख जाएगा। जो इतना डूबे न हों, जो इतने खोये न हों। सही शब्द का प्रयोग किया तुमने, ‘ईमानदारी’, जिनमें ज़रा ईमानदारी हो, उन्हें दिख जायेगा। वो कहेंगे, “न, कुछ गड़बड़ है, बहुत बड़ी गड़बड़ है। मैं जिस बहाव में हूँ, वो कोई गड़बड़ बहाव है। ऐसा नहीं कि वो मुझे गलत दिशा में ले जा रहा है, वो गलत तल पर है। ऐसा नहीं कि वो मुझे किसी गलत सागर में डुबो देगा, वो बहाव ही अम्लीय है, एसिडिक है।” आप किसी ऐसी नदी में डाल दिए गए हो, जिसमें तेज़ाब ही तेज़ाब है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो नदी किस सागर में जा कर मिलेगी।

उस नदी में डाला जाना ही तुम्हें ख़त्म कर रहा है, नष्ट कर रहा है। उस नदी में तुम्हारी मौजूदगी ही अभिशाप है तुम्हारे लिए। दिक्क्त बस इतनी है, कि क्योंकि तुम तेज़ाब की नदी में डाल दिए गए हो, इसलिए क्षण क्षण तुम घुलते जा रहे हो। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी संवेदना नष्ट होती जा रही है। जितनी देर तुम उस नदी में रहोगे, उतना तुम्हारे लिए असम्भव हो जाएगा ये जानना कि कुछ गलत है। क्योंकि जानने के जो तंतु हैं, जानने की जो आतंरिक व्यवस्था है तुम्हारी, ठीक उस व्यवस्था को ही वो तेज़ाब खाये जा रहा है। जितनी देर तक तुम उस नदी में हो, उतनी ये सम्भावना घटती जाती है, कि तुम कभी भी कह पाओगे, कि मैं गलत बहाव में हूँ, मैं गलत नदी में हूँ। नदी ने ही ये तय कर दिया है कि अब तुम जान नहीं पाओगे।

नदी तेज़ाब की है, कोई बड़ी बात नहीं कि इसमें तुम्हारे होश उड़ जाएँ। एक होश का उड़ना और दूसरे होश का उड़ना, अलग अलग हैं। समर्पण के क्षण में भी होश उड़ते हैं, सम्भोग के क्षण में भी होश उड़ते हैं। फ़र्क़ को समझना। सिर्फ इसलिए कि तुम्हारे होश उड़े हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि तुमको किसी कमी का एहसास नहीं हो रहा, धोखा मत खा जाना।


पूरा लेख पढ़ें: ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

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