कल्पनाएँ ही आलस्य हैं

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आचार्य प्रशांत: क्या है आलस्य?

हम चीज़ों को, उनके लक्षणों के आधार पर भ्रमित कर लेते हैं। हम चीज़ को उसके नाम से भ्रमित कर लेते हैं। अच्छा, दाल क्या है? दाल का नाम है दाल? क्या दाल का नाम है दाल?

मैं कहूँ, “पानी”, तो इससे प्यास बुझ जाएगी? “आलस्य” सिर्फ एक शब्द है। पानी या दाल, सिर्फ एक शब्द हैं। हम पानी को बहुत गहरे से समझते हैं, ठीक है ना? पानी की ध्वनि नहीं है पानी। पर क्या तुम आलस्य को उतनी गहराई से समझते हो? कि आलस्य क्या है। या तुमने आलस्य के लक्षणों को आलस्य  मान लिया है? कोई आदमी बैठा है, उठ नहीं रहा है, तुमने इसको आलस्य  मान लिया? क्या ये आलस्य है?

ये, आलस्य से सम्बंधित एक लक्षण हो सकता है, पर आलस्य , वाक़ई है क्या? तुम किस चीज़ को आलस्य कहते हो?

श्रोता: जिसको हम करना चाह रहे हैं, और कर नहीं पा रहे हैं।

वक्ता: तुम आलसी  कहाँ हो? चाह तो दौड़ रही है। मन तो कर्म कर रहा है, पूरी ताक़त के साथ। क्या है आलस्य?

अच्छा, जिस काम को करने में तुम्हें मज़ा आता है, वहाँ भी आलस्य महसूस करते हो? “कौन करे?”

तब लगता है ऐसा? तो बताओ, क्या है आलस्य?

आलसी से आलसी आदमी भी, जो काम उसको मज़ा देता है, वो करते वक़्त वो, कैसा हो जाता है?

श्रोता: उर्जावान, उत्साहित|

वक्ता: उर्जावान, उत्साहित, कूद-फांद मचा रहा है, दौड़ रहा है, चेहरे का रंग ही बदला हुआ है। भले ही पांच दस मिनट के लिए मिला वो काम, पर वाह! मुस्कुरा रहा है। जो काम तुम करते हो, वो करते वक़्त तुमने किसी को बोर्ड देखा है?

या क्रिकेट खेलना बहुत अच्छा लगता है, या कुछ खाना तुम्हें बहुत अच्छा लगता है। जो करना अच्छा लगता है, वो करते समय आलस्य रहती है क्या? क्या है आलस्य?

तुम बताओ? बिलकुल ध्यान के साथ। कल्पना कर के नहीं, समझ के बताओ, क्या है आलस्य?

श्रोता: किसी चीज़ के बारे में पहले से ही सोच कर के, उसको अपने दिमाग में जीवंत रूप में ले लेते हैं

वक्ता: कितनी बढ़िया बात कही है। यदि तुम कुछ भी करने में ध्यानस्थ हो, डूबे हुए हो, सड़े से सड़ा काम हो; इतना गंदा काम हो कि एक लाइन में लगे हो और धूप है, और चिड़चिड़ाहट है। हर तरह की परेशानी है, अब गर्मी बढ़ेगी। और कई बार ऐसा मौका आता है, ट्रैफिक में खड़े हो, हेलमेट लगा रखा है। और जाम है। फंसे हो, कभी इस तरह से?

श्रोता: यस सर|

वक्ता: और याद है कैसी हालत होती है? धुंए की गंध, ऊपर से वो (सूर्य) बरस रहा है, और यहाँ हॉर्न मार रहे हैं, कोई गाली भी दे रहा है बीच बीच में। इस मौके पर भी, ऐसे समय पर भी, अगर तुम उस चीज़ को पूरी तरह से समझने की कोशिश शुरू कर दो।

मान लो तुम्हे एक प्रोजेक्ट मिला हो, और वो प्रोजेक्ट ही यही है कि एक ऐसे आदमी को समझ के लाना है जो ट्रैफिक जाम में फंसा है। ट्रैफिक जाम की स्थिति का वर्णन करना है, यही तुम्हारा प्रोजेक्ट है। तो अब क्या तुम बोर होओगे?

ट्रैफिक जाम में दो लोग फंसे हुए हैं। एक आदमी, जो बस फंसा हुआ है, उसे कहीं और जाना है, काम उसका कहीं और है, जाम में बस फंस गया है। एक आदमी ये है।

दूसरा आदमी कौन? जो जाम में फंस गया है, और जाम को देख रहा है। प्रोजेक्ट है उसके पास, कि जाम को देखना है। वो आएगा और रिपोर्ट लिखेगा इस पर कि जाम की स्थितियों का वर्णन करना है। ये दूसरा जो है, क्या ये बोर होगा?

ये बोर नहीं होगा।

और पहले आदमी की क्या दुर्गति है? पसीना दोनों के गिरेगा, धूप दोनों को लगेगी। लगेगी या नहीं लगेगी? धुंआ दोनों की नाक में जा रहा है। ये दूसरा आदमी, क्या बोर महसूस करेगा?

ये दूसरा आदमी, एक एक चीज़ को नोट कर रहा है। कि ये करीब करीब आधा किलोमीटर लम्बी लाइन लग गयी है, वो इस बात को भी मेंटली नोट कर रहा है। वो नोट कर रहा है कि तापमान कम से कम बयालीस डिग्री है। वो नोट कर रहा है, कि किस तरीके से गाली-गलौज का मौहौल  भी बन जाता है। वो ये भी नोट कर रहा है, कि ये ट्रैफिक लाइट खराब है, इसलिए ये सब गड़बड़ हो रही है। वो ये सब नोट कर रहा है, क्या वो बोर है? क्या वो बोर है? स्थिति बाहर की उसके लिए भी उतनी ही खराब है। पर बोर कौन है? पहला आदमी।

माने क्या है ये? बोरडम क्या है? कहाँ से आयी? बोरडम क्या है?

जब आप जो भी कुछ कर रहे हो, उसमें मौजूद नहीं हो – वह बोरडम है।

और वह बोरडम ही आलस्य है, और कुछ नहीं है। जब आप वर्तमान में मौजूद नहीं हो, आपका ध्यान नहीं है, तब जो घटना घटती है, उसको आलस्य कहते हैं। आप घटिया से घटिया स्थिति में भी फंसे हो, पर यदि आपका ध्यान उसमें है, तो आप एक्टिव हो, आपका मन जागरूक हैं। फिर आप ये नहीं कहोगे कि मैं आलसी हूँ। आप आलसी नहीं हो, आप सिर्फ इनअटेंटिव हो। याद रखियेगा।

ध्यान के अभाव का परिणाम होती है तथाकथित बोरडम और आलस्य। बात आ रही है समझ में?

बैठे यहाँ हो, और तुम्हारा ध्यान चला जाए कि तीन कितनी देर में बजेगा, तो तुम पाओगे, कि अचानक पूरी दुनिया बोरिंग हो गयी है। और तुम खुद ही नहीं रेस्टलेस हो रहे हो, तुम अपने अगल बगल वालों को भी कर रहे हो। हो रहा है ना, ऐसा ही?

(छात्र हँसते हैं)

ये आलस्य ही है; ध्यान का अभाव।

मैं बाइक पर हूँ, और मैं उस जाम में होते हुए भी, हूँ कहीं और। मुझे ये याद आ रहा है, कि मुझे इतने बजे वहाँ पहुंचना था, जाम की वजह से देर हो रही है। अब वो जाम बहुत बुरा लगेगा मुझे। दूसरी और, यदि मैं जाम में हूँ, तो उसी जाम में पूरे तरीके से हो जाओ। ऑब्ज़र्व करने लग जाओ, खुद को, गाड़ियों को, कि लोग कितने हैं। लोग ज़्यादा नहीं हैं, पर एक एक आदमी के साथ बारह सौ किलो स्टील चल रहा है। एक आदमी ने इतनी जगह घेर रखी है, क्योंकि उसे गाड़ी में बैठना है। क्या ये है जाम का कारण? ये जो लोग गलत साइड लिए आ रहे हैं, क्या ये हैं जाम का कारण? क्या, ये जो गलत पलानिंग की गयी, यह है जाम का कारण?

अब ये क्या कर रहा है आदमी? ये जाम को समझ रहा है। ये इरीटेट नहीं हो रहा। ये उस स्थिति में भी ध्यान में है। बात समझ रहे हो? अब ये बोर नहीं हो सकता। कितनी धूप हो, कुछ हो, ये अब उस धूप को भी समझ रहा है। अच्छा बेटा, तो जाम का एक कारण तो ये भी है कि जब धूप लगती है तो लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं! और गाली दे रहे हैं। और गाली दी तो दो लोगों ने लड़ना शुरू कर दिया गाड़ी खड़ी करके, और उससे जाम और बढ़ गया।

अब ये आदमी बोर नहीं हो रहा, अब इसके लिए जो पूरा जाम है, वो बिलकुल जीवंत हो गया है। एक कहानी बन गया है। और ये उस कहानी को समझ रहा है। वो कह रहा है अच्छा, जब जाम बहुत लम्बा हो जाता है, और उसमें अगर चार सौ गाड़ियां फंसी हैं, तो क्योंकि वो बीस मिनट – आधे घंटे से फंसी हुई हैं, तो एक दो गाड़ियों का पेट्रोल भी ख़त्म हो जाता है। चार सौ में से एक दो के साथ तो ऐसा होगा ही! और जब पेट्रोल ख़त्म हो गया तो क्या होगा?

श्रोता: वहीं खड़ी रहेगी

वक्ता: वहीं खड़ी रहेगी। तो जाम का और क्या हाल होगा? और बुरा होगा। अब वो समझ रहा है| और इस समझने में, अब बोरडम कहाँ बची? और अब उसको न तो खिसियाहट छूट रही है।

स्थितियाँ  कैसी भी हों, अगर उन स्थितियों को समझना शुरू कर दो, कल्पनाएँ नहीं, समझना। कल्पना तो ये होती है, कि मैं जाम में खड़ा हूँ और कल्पना कर रहा हूँ, कि कब खुले और घर पहुँचू, लड्डू खाऊँ। और जितनी देर लगती जा रही है, मैं उतना ही ज़्यादा चिड़चिड़ा होता जा रहा हूँ, बेचैन होता जा रहा हूँ। तो एक तो तरीका ये है, कि कल्पना में मैं हूँ।

कल्पनाएँ  ही आलस्य  हैं।

कल्पना को छोड़ कर के, आप ध्यान से किसी चीज़ को देख रहे होते हो तो उसमें फिर बड़ी रूचि आती है। सब कुछ इंटरेस्टिंग है। दिक्क्त उसकी नहीं है जो न-इंटरेस्टिंग हो, दिक्क्त उसकी है जो ध्यान नहीं दे पा रहा। एक बहुत ही घटिया पिक्चर आप देख रहे हो, बहुत ही घटिया पिक्चर। आमतौर पे आप क्या करोगे? कभी गए हो ऐसे हॉल में?

श्रोता: सर, ‘घटिया’ मतलब?

वक्ता: आहा! जो तुम्हें घटिया लग रहा हो। जो तुम्हें पसंद न आ रहा हो। ‘तुम्हें’ घटिया लग रहा है, ठीक है? अभी तुमने जाना नहीं कि घटिया क्या है। पर तुम्हारा मन तुमसे बार बार बोल रहा है “बड़ी बोरिंग पिक्चर है, पैसे खराब हो गए”। डेढ़ सौ रूपये का टिकट लिया, बेकार गया।

श्रोता: ऐसा नहीं है। बोरिंग तो हमारी मन की दशा  पर निर्भर करता है।

वक्ता: क्या ऐसा कभी होता नहीं है? कि तुम पिक्चर देखने गए और उसे बोरिंग न डिक्लेअर किया हो? क्या कभी ऐसा हुआ नहीं है?

श्रोता: हुआ है|

वक्ता: होता है? और कभी ऐसा नहीं हुआ कि मूवी देखने गए हो, और कहा हो कि वाह!

श्रोता: ऐसा ज़्यादा हुआ है|

वक्ता: ऐसा ज़्यादा हुआ है। मूवी इंटरेस्टिंग है, तो इंटरेस्टिंग है। जब इंटरेस्टिंग नहीं है, तो क्या ये नहीं पता किया जा सकता कि क्यों इंटरेस्टिंग नहीं है? तो क्या ये प्रोजेक्ट अब इंटरेस्टिंग नहीं हो गया? कि ज़रा मुझे देखने तो दो, कि इस डायरेक्टर ने गड़बड़ करी कहाँ कहाँ पर? अच्छा, ये नया एक्टर है, इसको डायलॉग डिलीवरी नहीं आ रही, यहाँ पर चूक हो गयी इससे। अब क्या ये मूवी बोरिंग रह गयी? अब ये रह गयी क्या बोरिंग? “अच्छा, तो मैं देख रहा हूँ, कि जब पिक्चर बोरिंग किस्म की होती है, तो जो लोग होते हैं, वो ज़्यादा अंदर बाहर करना शुरू कर देते हैं। बीच में आम तौर पर इतना नहीं उठते, न पॉपकॉर्न के लिए न वॉशरूम के लिए; पर जब पिक्चर बोरिंग किस्म की होती है, तो देखो कितना ज़्यादा अंदर बाहर हो रहा है।”

अब क्या ये पूरी स्थिति बोरिंग रह गयी है? जब तुमने ये जाँचना शुरू कर दिया। अच्छा, ये नयी एक्ट्रेस आयी है। पहले टीवी सीरियल की थी, और इसने टीवी सीरियल वाली अपनी आदतें यहाँ पर भी कंटीन्यू की हैं, इसलिए ये अपने कैरेक्टर में नहीं आ पा रही।

श्रोता: कोई चीज़ हमें बोरिंग तभी लगती है, जब हमने पहले देख ली हो|

वक्ता: और अब समझ न रहे हों। अब समझ न रहे हों। पहले की कल्पना मन में लेके बैठे हैं, ऐज़म्पशनस! जो भी चल रहा है, उसे समझ लिया तो अब वो बोरिंग नहीं रह सकता। बात समझ रहे हो? जो भी चल रहा है, उसे समझ लिया, तो अब वो बोरिंग रह सकता है?

श्रोता: सर, अगर हम ट्रैफिक में फंसे हों, और हमें किसी ज़रूरी मीटिंग के लिए जाना हों, तो ट्रैफिक को देखेंगे या मीटिंग के बारे में सोचेंगे?

वक्ता: तो क्या हो जायेगा मुझे ये बताओ? तुम सोचो ना। तुम करते यही हो, कि पंद्रह मिनट बाद तुम्हारी मीटिंग है, तुम्हारा एग्जाम शुरू हो रहा है। कोई बात है, तुम्हें घर पहुंचना है, कोई बात है।

श्रोतागण: सोचते रहते हैं|

वक्ता: वास्तविकता क्या है? तुम अभी पहुँच गए एग्जामिनेशन रूम में, या तुम पहुँच गए अपने घर? तुम कहाँ पे खड़े हो? तुम एग्जामिनेशन रूम में हो, या तुम ट्रैफिक में हो? तुम कहाँ पर हो?

श्रोता: ट्रैफिक में

वक्ता: एग्जामिनेशन रूम, तुम्हारी कल्पना है। जो भी तुम्हारी इम्पोर्टेन्ट मीटिंग है, वो कल्पना है। सोचने से साकार नहीं हो सकती। देयर इस ओनली वन रिएलिटी विच इस, दैट यू आर इन द मिड्ल ऑफ़ ट्रैफिक। उस रिएलिटी से भागना कैसा? पर मन हमें ये कहता है, कि खूब चिंता करो। खूब कल्पना करो, शायद उससे कुछ हो जाए। उससे कुछ हो नहीं सकता। उससे इतना ज़रूर हो सकता है, कि तुम उसको भी नहीं समझोगे, जो वास्तविकता है उस समय की।

तुम यहाँ बैठे हो। एक तो ये, कि मन तुमसे कहे, कि कुछ काम है, कहीं जाना है। मोबाइल का बिल नहीं पे किया तो कट रहा है, या प्रीपेड, कुछ काम है। और वो तीन साढ़े तीन बजे ही होना है। तो एक तो ये, कि मन उधर है। मन उधर है, तो क्या वो काम होना शुरू हो गया? मोबाइल की चार्जिंग होनी शुरू हो गयी क्या, जो तुम उसके बारे में सोच रहे हो? क्या शुरू हो गयी?

लेकिन एक काम ज़रूर हुआ, कि अब तुम यहाँ पर बैठ कर के, तुम वो भी नहीं समझ पा रहे, जो वास्तविकता में हो रहा है।

कल्पना बस एक काम करती है, कि तुम्हें देती तो कुछ नहीं, जो है तुम्हें वो भी पाने नहीं देती।

बात आ रही है समझ में? तुम क्यों सोचना चाहते हो उस मीटिंग के बारे में, जो पंद्रह मिनट बाद है?

श्रोता: सर ये बात तो सही नहीं कि कल्पना छीन लेती है, कल्पना बहुत कुछ देती भी है

वक्ता: जैसे?

श्रोता: आप ट्रैफिक में खड़े हो, और आपके बराबर में एक बी एम् डब्ल्यू है। अब मेरा स्टेट ऑफ़ माइंड वहाँ से हट गया कि मैं ट्रैफिक में हूँ। अब मेरा स्टेट ऑफ़ माइंड वहाँ पे चला गया, कि अगर मैं मेहनत करूँ, तो मैं भी इस पोजीशन में पहुँच सकता हूँ। फिर मैंने देखा वो बंदा लैपटॉप पर काम कर रहा है। मेरे पास एच पी का लैपटॉप है, उसके पास एप्पल का है। अब मेरा स्टेट ऑफ़ माइंड वहाँ पर चला गया कि एप्पल में क्या क्या फीचर्स हैं। तो कल्पना ने मुझे राह दिखाई।

वक्ता: ठीक है, ठीक है। बी एम् डब्ल्यू, काल्पनिक है या ‘है’?

श्रोता: है|

वक्ता: वो आदमी काल्पनिक है, या है?

श्रोता: है|

वक्ता: वो लैपटॉप काल्पनिक है, या है?

श्रोता: है|

वक्ता: तुम कल्पना में कहाँ हो?

श्रोता: नहीं सर, पर मैं तो अपने लिए कल्पना ही कर रहा हूँ ना?

वक्ता: पहले जानना पड़ रहा है ना, कि है? यदि तुम कल्पना में हो, तो तुम्हें बी एम् डब्ल्यू दिखाई पड़ेगी क्या? तुम्हारे बगल में खड़ी होगी बी एम् डब्ल्यू, तुम कल्पनाओं में खोये हो, तुम्हें क्या वो दिखाई पड़ेगी?

मैं जो कहना चाह रहा हूँ, उसको समझो।

यदि तुम कल्पना में हो, तो तुम्हारे यहाँ इधर बी एम् डब्ल्यू खड़ी है, और इधर भैंसा गाड़ी खड़ी है। क्या तुम्हें वो दोनों ही दिखाई देंगे? तुम्हें बस ये दिखाई देगा, कि वो कब खुले, और मैं कब घर पहुंचू। क्या ऐसा होता नहीं है? क्या ये अनुभव नहीं है हमारा? क्या हमें वही नहीं दिखाई पड़ता जो हमारे आसपास है?

ये जानने के लिए, कि इसमें एक आदमी है, पहले तो गाड़ी दिखाई पड़े। फिर गाड़ी में आदमी दिखाई पड़े, और फिर आदमी का लैपटॉप दिखाई पड़े, और फिर लैपटॉप का ब्रांड भी दिखाई पड़ जाए कि एप्पल है।

(छात्र हँसते हैं)

तुमने क्या ये समझा कि इतना जानने के लिए कितना ध्यान देने की ज़रुरत है?

एक काल्पनिक आदमी क्या ये ध्यान दे सकता है? जो आदमी कल्पना में खोया है, क्या वो इतना ध्यान दे सकता है?

श्रोता: सर, मेरी कल्पना स्टार्ट ही वहाँ से हो रही है|

वक्ता: ये कल्पना नहीं है। ये ध्यान है। ध्यान में ही तुम्हें दिखाई पड़ेगा कुछ भी।

देखो, दो हिस्से हैं, तुम्हारी कहानी के।

पहला हिस्सा वो है, जहाँ पे तुम बी एम् डब्ल्यू को, आदमी को, फिर लैपटॉप को, फिर एप्पल को देख रहे हो। यहाँ तक तो जो तुम देख रहे हो, वो है वास्तव में। इसके बाद, तुम्हारे मन की हरकत चालू होती है।

वो कहता है, ये सब मैंने चारों चीज़ें देख लीं, अब मुझे सपनो में जाने दो। अब वो कह रहा है, कि मेरे पास भी बी एम् डब्ल्यू है, और मेरे पास भी लैपटॉप है, और मैं भी बैठा हूँ ए सी चला कर के। अब वो खो गया। अब इसके बाद वो बी एम् डब्ल्यू चली गयी।

गयी। गयी की नहीं गयी?

ये खड़े हैं, पीछे से आया पुलिस वाला|

श्रोता: (हँसते हुए) कर दिया चलान|

वक्ता: तो यहाँ तक तो तुम हो हकीकत में, तुमने देख लिया कि बी एम् डब्ल्यू और एप्पल है। और उसके बाद जो हो रहा है, वो है मन की उड़ान। और उसके लिए मिलता है पीछे से?

वक्ता: लेकिन वही वो तरीका है जीवन व्यतीत करने का जिसके हम आदि हो गए हैंयही वो तरीका है। ट्रैफिक की बात, इसकी बात, उसकी बात, ये सब भी बातें जो हम कर रहे हैं, काल्पनिक ही हैं।

अगर सिर्फ उसको देखो, जो अभी हो रहा है; यहाँ बैठे हुए हो, तो अपने आप से पूछो, कि पिछले आधे घंटे में कितनी देर तक यहाँ रहे हो, और कितनी देर तक कल्पनाओं में रहे हो।

हमने स्वस्थ मन कल्टीवेट नहीं किये हैं। ट्रेनिंग ने, एजुकेशन ने, कंडीशनिंग ने, हमारा मन ऐसा बना दिया है, जो स्थिर होना जानता नहीं है। वो सिर्फ भागना जानता है।

और हर भागना; भागने से ऐसा लगता है कि कुछ पाने के लिए कहीं जा रहा है; भागना कहीं पाने के लिए नहीं होता। भागना सिर्फ, जो अभी वास्तविकता है उससे एस्केप करने की प्रक्रिया है। आप भाग के कहीं जा नहीं रहे होते हो। आप भाग के किसी चीज़ से दूर जा रहे होते हो। मन के भागने को ये मत समझ लेना कि वो कुछ पाने जा रहा है कहीं। मन हमेशा, कुछ छोड़ के कहीं और जा रहा होता है। देखो, जाने के दो तरीके होते हैं ना? घर से निकले हो, तो एक तो ये कि मैं बाज़ार से कुछ लेने जा रहा हूँ, मुझे कुछ पाने जाना है कहीं। और दूसरा तरीका क्या होता है, कि घर से लड़ाई हो गयी तो मैं घर छोड़ के जा रहा हूँ। मैं कहीं को नहीं जा रहा, मैं बस घर छोड़ के जा रहा हूँ। ये दो तरीके होते हैं ना? घर से निकलने के।

मन हमेशा दूसरे तरीके से निकलता है, घर से। भ्रम ये होता है कि कुछ पाने जा रहा है। तुम्हें, भ्रम ये होता है कि मन कहीं जा रहा है तो वो कुछ पायेगा, उसको तुम इच्छाओं का नाम देते हो, कि इच्छाएँ हैं, इसलिए उधर को दौड़ रहा है। नहीं। इच्छाएं भ्रम हैं। मन सिर्फ दौड़ इसीलिए दौड़ रहा होता है, क्योंकि जो रिएलिटी है, वास्तविकता है, उसमें नहीं जीना चाहते। और वो भी तुम्हारी ट्रेनिंग दे दी गयी है। ऐसा नहीं है कि छोटा बच्चा नहीं जीना चाहता या कि एक इंटेलीजेंट आदमी नहीं जीना चाहता। तुम नहीं जीना चाहते क्योंकि तुम्हारी ट्रेनिंग थोड़ी सी गलत हो गयी है।



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