मन सिर्फ भागना जानता है

अगर सिर्फ उसको देखो, जो अभी हो रहा है; यहाँ बैठे हुए हो, तो अपने आप से पूछो, कि पिछले आधे घंटे में कितनी देर तक यहाँ रहे हो, और कितनी देर तक कल्पनाओं में रहे हो।

हमने स्वस्थ मन कल्टीवेट नहीं किये हैं। ट्रेनिंग ने, एजुकेशन ने, कंडीशनिंग ने, हमारा मन ऐसा बना दिया है, जो स्थिर होना जानता नहीं है। वो सिर्फ भागना जानता है।

और हर भागना; भागने से ऐसा लगता है कि कुछ पाने के लिए कहीं जा रहा है; भागना कहीं पाने के लिए नहीं होता। भागना सिर्फ, जो अभी वास्तविकता है उससे एस्केप करने की प्रक्रिया है। आप भाग के कहीं जा नहीं रहे होते हो। आप भाग के किसी चीज़ से दूर जा रहे होते हो। मन के भागने को ये मत समझ लेना कि वो कुछ पाने जा रहा है कहीं। मन हमेशा, कुछ छोड़ के कहीं और जा रहा होता है। देखो, जाने के दो तरीके होते हैं ना? घर से निकले हो, तो एक तो ये कि मैं बाज़ार से कुछ लेने जा रहा हूँ, मुझे कुछ पाने जाना है कहीं। और दूसरा तरीका क्या होता है, कि घर से लड़ाई हो गयी तो मैं घर छोड़ के जा रहा हूँ। मैं कहीं को नहीं जा रहा, मैं बस घर छोड़ के जा रहा हूँ। ये दो तरीके होते हैं ना घर से निकलने के?

मन हमेशा दूसरे तरीके से निकलता है, घर से। भ्रम ये होता है कि कुछ पाने जा रहा है। तुम्हें, भ्रम ये होता है कि मन कहीं जा रहा है। तो वो कुछ पायेगा, उसको तुम इच्छाओं का नाम देते हो, कि इच्छाएँ हैं, इसलिए उधर को दौड़ रहा है। नहीं। इच्छाएँ भ्रम हैं। मन सिर्फ दौड़ इसीलिए दौड़ रहा होता है, क्योंकि जो रिएलिटी है, वास्तविकता है, उसमें नहीं जीना चाहते। और वो भी तुम्हारी ट्रेनिंग दे दी गयी है। ऐसा नहीं है कि छोटा बच्चा नहीं जीना चाहता या कि एक इंटेलीजेंट आदमी नहीं जीना चाहता। तुम नहीं जीना चाहते क्योंकि तुम्हारी ट्रेनिंग थोड़ी सी गलत हो गयी है।


पूर्ण लेख पढ़ें: कल्पनाएँ ही आलस्य हैं

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