समय वो दीवार है जिसके पार मनुष्य देख नहीं पाता

जिसके घर में नाच गाना, आयोजन चल रहा है, बड़ी महफ़िल सजी हुई है कि कुछ हासिल हो गया है, उसको दुआएँ दें, उसके लिए प्रार्थना करें, वो दुःख के दरवाज़े पे खड़ा है, उसने अपने लिए ज़हर बिलकुल घोट लिया है| बस मन को समय बहकाता रहता है, समय वो दीवार है जिसके पार मनुष्य देख नहीं पाता| अगर हमारे पास आँखे होती जो समय के आगे देख पाती, तो हमे दिखाई देता कि

आज जहाँ पर ख़ुशी का आयोजन हो रहा है वहाँ उस आयोजन ने ही तैयारी कर दी है कल के मातम की| और आज जहाँ मातम बन रहा है वहाँ मातम बन ही इसलिए रहा है क्योंकि कल वहाँ ख़ुशी का आयोजन हुआ था|

चक्र है, कोई न कहे कि सुख, दुःख का कारण है या दुःख, सुख का कारण है, वो बस दोनों साथ साथ हैं, उनके बीच में समय बैठा रहता है ये हम देख नहीं पाते| सुख है, दुःख है, बीच में समय का अंतराल है, तो इस कारण हम अपने आप को दिलासा दे लेते हैं, भुलावा दे लेते हैं, कि “आज मज़े ले लो ना| दुःख कब आएगा? अरे छ: महीने बाद आएगा| आज तो जन्म की ख़ुशी मना लो, मृत्यु कब होगी? कुछ समय बाद होंगी ना|” सुख और दुःख के सिरों के बीच में समय बैठा हुआ है, और समय बड़ा छलिया है|

जब कहा जाता है कि योगीजन समय के पार देखना शुरू कर देते हैं, त्रिकाल दर्शी हो जाते हैं, तो उसका मतलब समझिए| उसका मतलब यही होता है कि समय उनको बेवकूफ नहीं बना पाता| उसका मतलब ये होता है कि वो द्वैत के दोनों सिरों को अलग अलग नहीं देखते, एक साथ देखते हैं|

समझ रहे हो बात को?

वो हँसते हुए चेहरे में आँसू देख लेते हैं और जिन आँखों में आँसू  हैं उन में हँसी भी देख लेते हैं| उन्हें पता है कि ये सब क्या चल रहा है? समझ रहे हो? उठती हुई लहर में वो गिरती हुई लहर देख लेते हैं| लहर में समुद्र, और समुद्र में सारी लहरें एक साथ देख लेते हैं| रात को देखते हैं तो उन्हें दिखाई पड़ता है कि दिन है और दिन को देखते हैं तो रात को भूल नहीं जाते हैं| तमाम वैविध्य के पीछे मन की जो मूल वृति है वो उनके समक्ष सदा प्रकाशित रहती है, और वो बह नहीं जाएँगे , वो भूल नहीं जाएँगे|



पूर्ण लेख पढ़ें:  दुःख में याद रहे, सुख में भूले नहीं

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