आपकी मुक्ति हर मायने में पूरी है

आप चुन रहे हैं और आपके चुनाव का आदर किया जा रहा है| आप जो भी चुनाव करेंगे अस्तित्व उसका आदर करेगा| आपके चुनाव के अनुरूप आपको फ़ल मिल जाएगा, जीवन मिल जाएगा, लेकिन अस्तित्व आ कर आपसे ये नहीं कहेगा कि कोई और चुनाव करो| जो भी आप चुनना चाहते हैं उसकी आज़ादी पूरी-पूरी है| आज़ादी इतनी गहरी है कि उसमे स्वयं अस्तित्व भी खलल नहीं डाल सकता| जिस दिन तक आपकी इच्छा गुलाम बने रहने की है, स्वयं अस्तित्व भी आपको विवश नहीं कर सकता कि गुलामी छोड़ दो|

जिस दिन तक आपने मन बना रखा है कि “मुझे भ्रम में जीना है” उस दिन तक कोई ताकत, वो परम ताकत भी आपको विवश नहीं कर सकती क्योंकि आपका बंधन में रहने का मन भी स्वयं उसी की माया है, स्वयं उसी की लीला है| तो आपका यदि मन कर रहा है अभी कि “मैं बीमार रहा आऊँ, कि मैं भ्रम में रहा आऊँ” तो आपकी इच्छा का आदर किया जाएगा| ध्यान दीजिए, मैं नहीं कह रहा हूँ कि कोई बाहरी व्यक्ति आ कर के प्रभावित नहीं कर सकता| मैं कह रहा हूँ स्वयं परम भी, पूर्ण अस्तित्व भी, वो भी कहेगा, “ठीक तुझे जैसे रहना है रह|” वो भी बदलाव के लिए, योग के लिए सामने तभी खड़ा होगा जब आप अनुमति देंगे|

आपकी अनुमति के बिना ‘वो’ भी आपके पास नहीं आ सकता| याद रखिएगा आख़िरी ‘हाँ’, या आख़िरी ‘न’ आपको बोलनी है; आपकी मुक्ति हर मायने में पूरी है| जब तब आप नहीं कहते, “हाँ, स्वीकार है” स्वयं परम भी आपसे मिल नहीं सकता; और तो छोड़ दीजिए कि कोई इंसान आपको मिल लेगा या पा लेगा या बदल देगा, स्वयं परम भी न आपको बदल सकता है, न मिल सकता है; जब तक आप नहीं कह देते| आपको अपनी पूरी जानकारी में, जानते बूझते हाँ कहना पड़ेगा, और याद रखिएगा वो बेहोशी की ‘हाँ’ नहीं हो सकती|

आपको जो भी ऊँचे से ऊँचा चैतन्य संभव है उतने चैतन्य में आपको हाँ बोलना पड़ेगा, ठीक वैसे, जैसे बेहोशी में दी गयी कोई भी सहमति मायने नहीं रखती, चाहें कुछ खरीदने कि, चाहें शादी ब्याह की| आपको होश में परम को हाँ कहना पड़ेगा, यही आपकी गहरे से गहरी मुक्ति है| इसीलिए समझने वालो ने कहा है मुक्ति हमारा स्वभाव है| इतनी गहरी है हमारी मुक्ति कि स्वयं परम हम से नहीं मिल सकता जब तक हम न चाहें, इतनी बड़ी मालकियत है हमारी|

कह रहे हैं कबीर, “कबिरा आप ठगाइए|” दूसरी जगह कह रहे हैं कबीर, “जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश| माया तो ठगनी बड़ी, ठगत फिरत सब देश|” हाँ, है ‘वो’ जिसमें माया को ठग लेने की काबीलियत है, वो माया जो दुनिया को नचाती है, उस माया को वो नचा देगा| पर वो जो पूरी माया को नचा सकता है, वो जो मन को, भटके हुए मन को वापस उसके घर में ला सकता है, वो भी ये कर नहीं सकता बिना उस मन की सहमति के| उस मन को कहना पड़ेगा, “मैं प्रस्तुत हूँ ठगे जाने के लिए, आओ मुझे ठगो|”



पूर्ण लेख पढ़ें:  तुम्हारी सहमति के बिना ठगे नहीं जा सकते तुम

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