अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है

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प्रश्न: यहाँ मुद्दा जो है, जो मैंने उदाहरण दिया था दिये को बुझाना| तो अंततः दबाना तो नहीं है| तो कैसे बुझाना है?

वक्ता: वो बुझाने का अर्थ कुछ करना नहीं है| उस बुझाने का अर्थ ही है ये कि जान लेना कि ये रौशनी झूठी है| उन्होंने कहा ना कि मिट वही सकता है जो है ही नहीं| अब अगर रौशनी होती तो मिट कैसे जाती? उस दिये के बुझने का मतलब ये नहीं है कि कुछ कर दिया| उस दिये के बुझने का मतलब है ये जान लिया कि रौशनी झूठी है| दिया वास्तव में नहीं बुझ गया| दिया वास्तव में बुझ गया तो अर्थ ये होगा कि पहले जल रहा था| जल कभी भी नहीं रहा था वो|

रौशनी झूठी है| बस ये| क्या रौशनियाँ होती हैं हमारी जिन्दगी में?

श्रोता१: जैसे कि मेरी एक इच्छा है फ़ोन लेना|

वक्ता: क्या रौशनियाँ हैं हमारी जिन्दगी में? कौन से लोग हैं? कौन सी घटनाएँ हैं जो हमारी ज़िंदगी को रौशन करते है? वो कौन आया, रौशन हो गयी महफ़िल जिसके नाम से? गाना भी है, “मेरे घर में जैसे सूरज निकला है शाम से”| तो कौन सी रौशनियाँ हैं? बड़ी-बड़ी रौशनियाँ हैं? तो निर्वाण का अर्थ है यही जान लेना कि रौशनी है ही नहीं| ये फ्यूज़ बल्ब हैं| इनमे से कभी कुछ नहीं होगा| ये फुस्स पटाखे हैं? न इनमे रौशनी निकलेगी, न आवाज होंगी| ये सिर्फ उम्मीदों पर रखे हैं हमको| इनमें कुछ और नहीं है|

जिस दिन तक दिवाली नहीं आती उस दिन तक फुस्स पटाका भी बिकता है, संभाला जाता है| जिस दिन तक दिवाली नहीं आती उस दिन झालर जिसमे फ्यूज़ ही फ्यूज़ बल्ब हो वो झालर भी…?

श्रोता१: रखे जाते हैं|

वक्ता: एक तो कुछ लोग सोचते हैं कि कोई चीज़ है ही नहीं| दूसरा परिपेक्ष भी ले सकते हैं कि हर चीज़ क्षणिक है|

वक्ता: है ही नहीं|वो चीज़ वो नहीं है, जो मैं उसे सोच रहा हूँ| ऐसा नहीं है कि कप नहीं है| पर ये कप है, उम्मीद नहीं हो सकता| ये वो नहीं है जो मैं सोच रहा हूँ| ऐसा नहीं है ये नहीं है| लड़की तो है, पर ये प्रेम नहीं हो सकती| बंदा है, पैसा है, पैसा रखा है| हाँ, मनी  है| पर वो सेल्फ वर्थ  नहीं हो सकती| ये वो नहीं है, जो मैं इसे सोच रहा था| है तो|

श्रोता२: ये तो वही हुआ जैसे नेति वाले उसमें हम अर्थ जोड़ लेते हैं|

वक्ता: हाँ| निर्वाण का अर्थ है: वो बुझ गयी| वो जो रौशनी मुझे दिखाई दे रही थी वो बुझ गयी| चीज़ है, पर उसमें से जो रौशनियाँ निकल रही थी| देखिए रौशनी के मिटने का ये अर्थ नहीं अँधेरा हो गया| रौशनी के मिटने का अर्थ ये है कि सब पहले से ही रौशन है| कोई भी रौशनी अँधेरे के सन्दर्भ में ही सार्थक होती है| जब अँधेरा ही नहीं तो रौशनी कहाँ?

कोई भी रौशनी अँधेरे के सन्धर्भ में ही तो कोई अर्थ रखती है ना? निर्वाण का अर्थ ये नहीं है कि; इसीलिए वो बार-बार बोल रहे है दिया बुझ गया| तो इमेज  बड़ी दिलीप कुमार वाली आ रही है – देवदास, मर गया, दिया बुझ गया| ये वो नहीं है| इसको ऐसे समझो कि रौशनी ही रौशनी है, सिर्फ रौशनी है| अब क्या करेगा दीया? दीयों की ज़रूरत ही नहीं|

श्रोता३: सर, दो चीज़े इसमें हो सकती हैं उदाहरण के लिए जो पहला हमें लग रहा है कि हमें ऐसा लग रहा है कि इतनी डार्कनेस है कि छोटे से दीये से क्या होगा? तो उस रौशनी का कुछ है ही नहीं| दूसरा ये है कि सुबह सवेरा हो गया|

वक्ता: हाँ, बस-बस शाबाश| बहुत बढ़िया| तो निर्वाण का मतलब है कि दिख गया| सवेरा होना भी ना बाहरी घटना है| और पास आओ| आँख खुल गयी| आँख खुल गयी| निर्वाण बस इतना ही है कि आँख खुल गयी| दीया है, ठीक है, पर ये वो नहीं है जो मैं सोच रहा था| प्रकाश की ज़रूरत ही नहीं है दिये के रूप से|

श्रोता१: सर ऐसे केस में तो अगर हम दिये को लेकर चले कि चलो उसने इतने समय तक प्रकाश दिया| उदाहरण के लिए हम ले तक गुरु थे अभी खुद की आँख खुल गयी| तो अब गुरु का महत्व नहीं रह जाएगा?

वक्ता४: अब ये सिम्बॉलिज्म  बहुत दूर तक जा रहा है पर फिर ये इस तरीके का हो गया समझ लो कि जैसे कुछ लोग चिराग ले के सूरज को ढूँढने निकलते हैं| सुना है? कि एक सज्जन थे वो इतने होशियार थे कि सूरज को ढूँढने निकले थे; क्या लेकर के? – दिया लेकर के| अब निर्वाण का क्या अर्थ होगा इसमें? आँख खोल ली तो अब कोई अँधा ही होगा जो सूरज को ढूँढने  निकले दिया लेकर के|

कोई अँधा ही होगा? आँख खुल गयी; दिये की जरुरत ही नहीं रही| दिया कभी काम नहीं आ रहा था तुम्हारे| तुम सोचो कि जब तक रौशनी नहीं थी तब तक तो दिया काम आ रहा था? दिया कभी नहीं काम आ रहा था| सच तो ये है कि दिया आँख बंद रखने में सहायक था|

श्रोता५: और दूसरे में ये बताने के लिए कि तुम्हारी आँख थी|

वक्ता: हाँ| दिया जो है आँख बंद रखने में सहायक था| दिया तुम्हें लगातार बनाए हुआ था| आप को कुछ मिला हुआ था जिंदगी में करने के लिए| आप क्या कर रहे हो? – आप दिया लेकर के सूरज खोज रहे हो| जहाँ आँख खुली वहाँ सीकिंग बंद हो गयी| तो दीया बड़ी खतरनाक चीज़ होती है| इसीलिए दिया वही है जो आज हम बात कर रहे थे – उमीदें, डेमोक्रेसी, रोल मॉडल्स, फ्रीडम, रिबेलियन, सत्याग्रह| ये सब दियें हैं|

निर्वाण का मतलब ये नहीं है कि भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल गयी| निर्वाण का मतलब है इन दियों से मुक्ति मिल गयी| अँधेरा तो है ही नहीं| ये दियों के कारण ही अँधेरा फैला हुआ है| आज ये बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा कि आपके कोर्ट्स में न्याय मिल ही नहीं सकता| तो आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे| आप अटके इसलिए रहते हो, बीस-बीस साल मरते इसलिए रहते हो क्योंकि वो उम्मीद होती है कि बीस साल बाद ही सही कोर्ट से फैसला आ जाएगा| दिया जल रहा है| दिया कायम है| दिया जल रहा है ना?

आपको दिख ही जाए कि आप जिन काम-धंधो में, जिन लोगों के साथ उलझे हुए हो जीवन भर आपको उनके साथ कुछ नहीं मिलेगा| है ना? “मिलेगा सूरज ना तुम्हें जिंदगी भर जो चढ़ते रहे मोम की सीढियों पर”| आपको दिख ही जाए “कि इस व्यक्ति के साथ या इस स्थिति में मुझे कभी कुछ नहीं मिल सकता” तो उसी दिन आपकी आँखे खुल जाए| आप फंसे ही इसलिए हो क्योंकि उम्मीद है कि यहीं, इसी स्थिति में कुछ ना कुछ ठीक हो जाएगा| यही दियें हैं|

निर्वाण का मतलब है उम्मीद का बुझ जाना| समझ रहे हैं? कुछ नहीं मिलेगा| ये फालतू हैं, ये अंधे रास्ते हैं| इनमे कुछ नहीं है| और वो उम्मीद इसलिए नहीं चली गयी है कि आप नाउम्मीद हो गए हो| वो उम्मीद इसलिए चली गयी क्योंकि आपको रौशनी ही दिख गयी|

श्रोता१: सर जो हम पाने की कोशिश करते हैं|

वक्ता: सीकिंग  ख़त्म हो गयी|

श्रोता२: उसके बाद क्या हम सिचुएशन्स  पर वर्क करना छोड़ देंगे?

वक्ता: बहुत कुछ करेंगे| नहीं भी कर सकते हैं| कुछ कहा नहीं जा सकता| पर ये पक्का है कि जो भी करेंगे आँख खोल के करेंगे|

श्रोता२: मतलब, कुछ पाने के लिए नहीं करेंगे| सिर्फ..

वक्ता: मौज में करेंगे| अब क्या पाना है? आँख खुल गयी, सूरज चमक गया, रौशनी-रौशनी है| अब कौन सा दिया? और कैसी खोज? हो गया काम ख़त्म| नाचो गाओ ऐश करो| एक बार को कल्पना ही करो चलो काफी मस्ती का काम नथिंग टू डू| जस्ट नथिंग टू डू| कम्पलीट लक्ज़री, बेड रेस्ट| कुछ करने को ही नहीं है यार|

श्रोता४: आचार्य जी , क्या लग्ज़री का मतलब यही होता है ?

वक्ता: दिमाग पागल हो जाएगा| दिमाग को कुछ चाहिए करने के लिए| तुम सोचो ना दिन कैसा होगा? नथिंग टू डू| जस्ट नथिंग| बुद्ध की कहानी भी तो यही है| जब उनकी ट्यूब लाईट  जली तो एक हफ्ते तक वो ऐसे ही सन हो के बैठे रहे| “अरे करें क्या? समझ में तो आ गयी बात| जस्ट नथिंग टू डू| सब कुछ पहले से ही परफेक्ट है| जो होना है हो ही रहा है| मैं करूँ क्या?”

और फिर यही आदमी अगले चालीस साल तक बूढ़ा होकर भी सोचो पच्छत्तर  साल अठत्तर साल का बूढ़ा घूमता भी रहा| न माइक है, ना सोशल मीडिया है, ना रिकॉर्डिंग है| और बोलता भी रहा, बोलता भी रहा| एनर्जी भी बहुत आती है| जब कुछ करने को नहीं होता , तब  बहुत कुछ है जो तुम कर सकते हो| 

श्रोता२: ऊर्जा का निकास बंद हो जाता है|

वक्ता: ऊर्जा का निकास बंद  हो जाता है, फ़ालतू इधर भी भागना है, फ़ालतू उधर भी भागना है|

देखो ना आप| देखो आप अपनी आदतें ही बदलो, आप किसी से मिलते हो “आप आजकल कर क्या रहे हो?” अब किसी बुद्ध के लिए बड़ा मुश्किल है आपको जवाब देना| वो क्या बोले? “बिलकुल कुछ भी नहीं” आप कहो “बड़ा ही असभ्य जवाब है|”

श्रोता२: सुबह से शाम तक तुम्हारा रुटीन क्या है?

वक्ता: तुम्हारारुटीन क्या है? “तो, आप दिन कैसे बिताते हो ?” “मैं नहीं बिताता, दिन खुद बीत जाता है | मैं  बस वहाँ  होता हूँ | ये कौन सी सी बात है , मैं कैसे दिन बिताता हूँ ? घड़ी है, चल रही है; दिन बीत गया|”

श्रोत४: आचार्य जी, ओशो ने एक टर्म यूज़  किया था कि अभिनय करो| कुछ नहीं है करने को हो तो अभिनय करो|

वक्ता: वो अभिनय भी करना नहीं है| अभिनय हो जाता है अपने आप| या ये कहो जो कुछ करना होता है आप जान जाते हो कि वो अभिनय ही है| इसका मुझसे कुछ लेना-देना नहीं है| तो उसमे भी कोई डूइंग  नहीं है कि बड़ी उसमे आपकी स्टेक्स अटैच हैं या कुछ हैं, “अरे ठीक है| इट्स ओके|” अभिनय का मलतब, अब वहीँ है ना बात कही क्या जाती है? बन क्या जाती है?

अभिनय का मतलब ये भी हो जाता है नकली हो जाओ| अरे क्या है? हमने भी कई बार डिस्कस किया है रोल प्लेयिंग| कई बार किया है| अब वो उसके मतलब बड़े नये-नये निकल जाते हैं| जो सोचे भी न हो, दिमाग में न आए लोग ऐसे-ऐसे मतलब निकाल लेते हैं| “काम कर लिया? – हाँ|” बाद में पता चला काम तो करा नहीं| बोले “ करा नहीं पर एक्टिंग  तो कर सकते है ना? हम सिर्फ रोल -प्लेइंग कर रहे थे ” क्या मतलब है इस बात का?

क्यों घूम रहे हो फलाने के साथ तुम में कोई दोस्ती तो है नहीं आपस में? साफ़-साफ़ दिखता है तुम उससे चिढ़ते  हो, वो तुमसे चिढ़ता है फिर भी घूम रहे हो इक्कठे, क्यों? “आप ही ने तो कहा था अभिनय  करो| मैं अभिनय कर रहा था| हम अभिनय कर रहे हैं| जीवन एक अभिनय है, इसे  ज्यादा  गंभीरता से मत लो |”

श्रोता४: ये जो उन्होंने कहा ना वो मैंने भी पढ़ा था कि व्हाई डोंट यू हैव सर्टेन थिंग? उन्होंने काफ़ी सारे जवाब दिए थे सुनना, संतोष|  तो फिर उस सन्दर्भ  में उन्होंने कहा था कि ये अभिनय करना है| इन व्यक्तित्वों का अभिनय|

वक्ता: ऐसे सवालो का जवाब देना ही नहीं चाहिए कि क्यों कर रहा हूँ| आप कुछ भी बोलोगे वो मिस-इन्टरप्रेट ही होगा| वो जो कर रहे थे उनके अलावा नहीं समझ पाओगे| ठीक कृष्ण वाली बात है| आप कैसे समझाओगे कि कृष्ण ने क्यों कहा कि उसको तुम मार दो और ख़त्म करो? नहीं समझा पाओगे भाई| और जो कुतर्की आदमी होगा वो ये और बोल देगा कि तुम फालतू जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हो| तुम हिन्दू हो तो इसीलिए तुमको कृष्ण ने जो भी बदतमीजियाँ करीं वो भी जस्टिफाई करनी है|”

श्रोत४: आचार्य जी, स्टूडेंट्स को उदाहरण दिया था स्टूडेंट्स, जस्टिफाई  करने की कोशिश कर रहे हैं |

वक्ता: हाँ बिलकुल| अब कैसे पता वो जिस झरने की बात कर रहे हैं| कोई यहाँ आ के बैठ के कह सकता है “अरे झरना माने झरना| तुम झरने पर अपना अर्थ क्यों थोप रहे हो?” एक तरफ तो कहते हो फैक्ट को फैक्ट की तरह देखो| तुम इमेजिन कर रहे हो कि झरने का मतलब ये और वो और सत्तर बातें| “झरना है झरना| और कुछ नहीं है |” क्या जवाब दोगे? कुछ नहीं दे सकते? झरना ही तो है|

और वो जब बोल रहा है वहाँ पर कि “भेंड़िये ने भेंड़  से बोला कि आजा खा लूँगा”| ये वो बोलेगा “एक वुल्फ है और एक लैम्ब है और कोई और मीनिंग नहीं है| कहानी ख़त्म| बाकि सब तुम्हारी कल्पना है|” क्या जवाब दोगे? बोलो “हाँ ठीक है| इतना ही है बेटा|”

श्रोता३: आचार्य जी, जो लोग अचीवमेंट कर रहे हैं लाइफ में, वो लोग ये रीज़न भी दे सकते हैं कि सब कुछ हमने पा लिया लाइफ में, ये उसका एक्सप्रेसन है|

वक्ता: अगर मात्र एक्सप्रेशन होता तो तुम भूखे क्यों होते? अगर मात्र एक्सप्रेशन होता तो तुम्हारी

नब्ज़ क्यों कांपने लगती नॉन-अचीवमेंट पे? अगर मात्र एक्सप्रेशन है तो फिर अचीवमेंट और नॉन-अचीवमेंट| पर तुम्हारी तो नॉन-अचीवमेंट में हार्ट-अटैक हो जाता है तुमको| बिल्कुल हो सकता है ये कि कोई अंदर से मस्त है और बाहर-बाहर सिर्फ एक्सप्रेस कर रहा है| पर फिर जो एक्सप्रेस कर रहा है उसको कोई बेचैनी थोड़ी होंगी| वो कहेगा “जो मिला है वो तो मिला ही हुआ है|”

पर तुम्हारी तो हालत खराब हो जाती है| पसीने छूट जाते हैं| मर ही जाते हो — हार्ट अटैक  से लोग मर ही रहे हैं —हार्ट अटैक  के मारे| टाइप ए ,टाइप बी पर्सनालिटी  पढ़ा होगा? ये सब टाइप ए वाले वहीं हैं सुपर अचीवर| ये मरते ही हार्ट अटैक से हैं| ये टाइप, ए टाइप बी पर्सनालिटी  डिटेक्ट  ही ऐसे हुई थे कि जो लोग हृदयाघात से ज्यादा मर रहे थे उनमे पाया गया कि इन सब में एक कॉमन बीहेवियरल  पैटर्न है| ये सब गो गेटर  हैं| तो उनको टाइप ए पर्सनालिटी का नाम दिया गया| एक कॉमन  चीज़ थी उन सब में जो हार्ट अटैक  से मर रहे थे| गो गेटर्स हैं|

श्रोता३: सर ये भी तो हो सकता है कि सब कुछ अचीव हमने कर लिया है लेकिन एक्सप्रेस कर रहे हैं|

वक्ता: ये कर नहीं लिया है| तुमने नहीं अचीव कर लिया है| इस शब्द के साथ बहुत समय तक रहना पड़ेगा| तुमने कुछ नहीं अचीव कर लिया है| तुम खुद अपना कलंक हो| जब वो कहते हो कि अचीवमेंट अॉलरेडी  है उस अचीवमेंट  में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है| बहुत कुछ है पर उसमें, तुम्हारा कुछ नहीं है| तुम तो खुद बोझ हो| तुम्हें ही तो हटना है| तुम अपना विषाद खुद हो| तो तुमने नहीं अचीव कर लिया, “देखो कितना इसमें स्कोप है ये करने का| मैं सुपर अचीवर हूँ| मैंने ही सब अचीव किया|”

तुमने नहीं कुछ अचीव कर लिया| तुम क्या हो? तुम अपने कन्सेप्शन्स  का पिटारा हो| वो क्या अचीव करेगा? उसको क्या मिला हुआ है? तुमने कुछ नहीं अचीव कर लिया| जब कहा जाता है कि फ्रीडम  इज़  माई नेचर; तो वो तुम्हारा नेचर नहीं है| याआई एम् लव; तुम थोड़ी लव हो| अपनी शक्ल देखो| तुम कहाँ से लव हो? वो ‘आई’ दूसरा है| वो तुम नहीं हो| चिदानंद रूपः शिवोअहम् शिवोअहम्| अब ये लग रहे हैं शिव? लग रहे हैं आनंद रूपम? मुँह पर  घंटे बज रहे हैं| चिदानंद रूपम्, कहाँ से भाई? शिवोअहम्, कहाँ से? कैसे?

ये अहंकार को बढ़ाने वाली चीज़े हैं बस| तुम वो नहीं हो| नहीं समझ में आ रही बात? जिसे सब मिला ही हुआ है वो तुम नहीं हो जिसे मिला हुआ है| तुम शिवोअहम् नहीं हो| तुम नहीं हो चिदानंद रूपम्| तुम्हारा हटना है चिदानंद  रूपम्| जब तुम नहीं रहते, तब शिव रहते हैं| जब तुम गायब हो जाते हो, तब आनंद रहता है| तुम जब तक हो तब तक शिव कहाँ से आएँगे? तुम बड़े ताकतवर हो| तुम उनकी सीट छेक के बैठे हो| वो कैसे आएँगे?

तुम्हें हटना होगा| तो वो आएँगे, बैठेंगे| वो होता है ना बस में जा के लेडीज़ सीट पर बैठ जाते हैं| अब वो लेडीज़ सीट पर क्यों बैठे हैं? “कि इस सीट पे आके कोई लेडी बैठेगी|” अभी तुम बैठे हो तो वो कैसे बैठेगी? पर ये मन का तर्क है| तुम उसी की सीट पर बैठ गये हो| अब वो आएगी भी तो कैसे बैठेगी? जो स्थान शिव का है वो तो तुम्हारे अहंकार ने घेर रखा है| शिव आएँगे भी तो कहाँ बैठेंगे? तुम्हारा अहंकार हटे तो शिव के लिए कोई जगह बने| तुम नहीं हो, अपने आप को मत समझ लेना| “मैं हूँ”, गजब हो जाएगा|

श्रोता५:

वक्ता: उन्ही से किसी ने पूछा था एक बार कि “आर यू एन्लाईटेन्ड ?” बोले “टिल दा टाईम आई ऍम देयर आई कैन नॉट बी  एन्लाईटेन्ड |” बात समझ में आ रही है? जब तक ‘मैं’ हूँ तब तक निर्वाण कहाँ से आ गया? निर्वाण का अर्थ ही है खुद से मुक्ति| आप के रहते निर्वाण कहाँ से आ जाएगा? होता है| यहाँ भी हुआ है| आप कौन है?  “मैं आनंद रूप हूँ|” आप कौन हैं?  “मैं मुक्ति रूप हूँ “और, आप कौन है? “मैं शास्वत हूँ|”

श्रोता४: सर जब मैं हूँ ही नहीं तो एक्सप्रेस कौन करेगा?

वक्ता: तुम नहीं करोगे| वो होता है एक्सप्रेशन| अपने आप होता है| जैसे कि कोई छोटा बच्चा हो और उसके सामने उसका खुंड बाप बैठा हो| और वो डर के ऐसे सड़ा हुआ बैठा है बच्चा| और बाप ज्यों ही हटा; वैसे ही वो छोटा बच्चा नाचने लग गया, एक्सप्रेस करने लग गया| तुम वो बाप हो| (सभी श्रोतागण हँसते हैं) तुम हट  जाओ| अपने ही के बाप हो तुम| तुम हट जाओ| बच्चा खुद नाचना शुरू कर देगा| एक्सप्रेशन हो जायेगा| बहुत सारे छोटे बच्चे बहुत खुश होते हैं जब उनकी माँ दूर हो जाती है| वो बाद में जब लौट के आएगी तो यही कहेगा “कि आई मिस्ड यू|” पर अंदर-अंदर ही कहेगा “कि यार ये नेक्स्ट कब जाएगी तू|”

श्रोता४: जब हम स्कूल में थे| तो मम्मियाँ घूमने के लिए जाती थी| तो पीछे सब कज़न्स गाना गाते थे “चले गये थानेदार अब डर काहेका” बड़ा गाना गाते थे|

वक्ता: और क्या रौब मचती है घर में फिर तो पूछो मत| रौनक आती है असली जब ये टरते हैं|

श्रोता४: मुझे तो ना फिर घर के काम करने में भी मजे आते हैं| जब कोई होता नहीं है घर में|

वक्ता: अरे, सब हो जाता है| दिन में होली रात दिवाली रोज मानती मधुशाला| उसको हटाओ, एक्सप्रेशन अपने आप हो जाएगा| है ना जो बड़े बाबू जी बैठे हैं – डर, फियर, अथॉरिटी, ग्रीड, आई ऍम समथिंग, ये हटाओ फिर एक्सप्रेशन देखो मौज का रहेगा| हटाओ, हटने दो, वो खुद ही हटना चाहते हैं| तुम उसको जिन्दा रखते हो वेंटिलेटर पर| वो खुद ही मर जाना चाहता है| उसको जिन्दा रखना छोड़ो| अपने आप मौज आ जानी है|

आज तक गुस्सा कर के कोई खुश नहीं हुआ| नफ़रत कर के किसी को आनंद नहीं अनुभव हुआ| तुम खुद नहीं चाहते कि तुम्हें गुस्सा आए| तुम खुद नहीं चाहते तुम नफ़रत करो| ये सब चीज़े खुद अपने आप हट जाएँ क्योंकि तुम खुद इनको नहीं चाहते हो| पर तुम इन्हें पालते हो| क्यों? मन में वैहम गया है कि गुस्सा करने से मेरी अहमियत बढ़ती है| मन में एक वहम बैठ गया है कि नफ़रत करना ज़रूरी है अगर मुझे अपना प्यार सिद्ध करना है| तुम जानते हो हम नफ़रत अक्सर क्यों करते हैं? क्योंकि हम किसी को अपना प्यार सिद्ध कर रहे होते हैं|

श्रोता४: जितना नफ़रत करोगे उतना प्यार होगा|

वक्ता: हाँ| बीवी के साथ हो तो माँ के विरुद्ध एक-दो बातें बोल दो वाइफ खुश हो जाएगी| माँ के साथ हो तो बीवी के विरुद्ध दो-तीन बातें बोल दो माँ बहुत खुश हो जाएगी| हमारी नफ़रतें हमारे प्यार के कारण जन्मती हैं| बात समझ रहे हो ना? हम खुद लेकिन चाहते नहीं है| नफ़रत करके कौन खुश रहा है? आपको बड़ा आनंद आता है किसी से नफ़रत करके? जो नफ़रत करता है वो खुद परेशान हो जाता है|

तो ये सब चीज़े खुद मर जाना चाहती हैं| तुम मरने दो ना| तुम इन्हें जिन्दा रखे हुए हो| इन्हें जाने दो| फिर देखो बच्चा कैसे नाचेगा| कल्पना करो ना, हम सब यहाँ बैठे हुए हैं और सब के बगल में एक बाबू जी खड़े हुए हैं बड़े वाले| सनकी किस्म के| “अनुशासन  में रहियो|” उन बाबू जी को जाने दो| उनका समय हो गया| कहो, “महाराज पधारो, जाओ|” समझ रहे हो ना? जाने दीजिए|

श्रोता४: आचार्य जी ऐसा तो होता ही है कि सब चाहते हैं कि ये सारी चीज़े चली जाएँ पर एक एस्केप वेलौसिटी  चाहिए होती है| वो मिलिती नहीं|

वक्ता: कोई एस्केप वेलोसिटी  चाहिए ही नहीं| और अगर चाहिए एस्केप, जिन लोगो को ये लग रहा हो कि उसके लिए जो एनर्जी  चाहिए वो मिलती नहीं है| उसका एक फॉर्मूला  बताए दे रहा हूँ, अमल करना हो तो कर लेना| थोड़ा सा रिस्की  है| खुद ऐसी स्थितियाँ पैदा करो जिस में सच सामने आ जाए| अपने आप जो ये झूठे कमजोर बंधन हैं ये टूट जाएँगे| जिन बातों पर, जो सच की बातें हैं और जिनको अवॉयड  करते हो उसपे सीधे-सीधे चर्चा कर लो| या तो बात खुल जाएगी, गाँठ हट जाएगी मामला अच्छा हो जाएगा या टूट जाएगी| दोनों ही स्थितियों में तुम मुक्त हो जाओगे|

हम सब जान-बूझ करके उस तरफ देखते ही नहीं है| उन बातों को जीवन से दूर रखते हैं जहाँ पर सच सामने आ जाए| वो है ना बात निकलेगी तो फिर दूर तक जाएगी| वैसी बातें हम छेड़ते ही नहीं|

श्रोता३: कम्प्रोमाइज़  कर लेते हैं|

वक्ता: नहीं, छेड़ते ही नहीं| हम ये भी नहीं कहते साफ़-साफ़ कि हम कम्प्रोमाइज़  कर रहे हैं| हम उनको दबा देते हैं| वो कहते हैं ना, “स्वीपिंग अंडर द कारपेट|” उनको छुपा कर के रख देते हैं| उनकी खुल के चर्चा कर लो| बोलो “वी वांट टू टॉक समथिंग|” ऐसा नहीं है कि लड़ने आए हो| प्यार से ही बात करो, “आओ बात करते हैं|”

श्रोता५: आचार्य जी, हम रीज़नस अलग-अलग देते हैं कि अगर संतुष्ट हो गए तो अचीवमेंट कैसे होंगी? काफी लोग बोलते हैं|

वक्ता: ये वैसी ही बात है कि “अगर स्वस्थ हो गए तो दवाई कैसे खाऊँगा?अगर स्वस्थ हो गए तो दवाई कैसे खाओगे? क्या तर्क है| बात तो बिलकुल ठीक है कि स्वस्थ हो गए दवाई कैसे खाओगे| पर उसने पहले ही मान कर रखा है कि अचीवमेंट करने लायक चीज़ है|

श्रोता५: जिनते भी लोग हैं इसी चीज़ से घबराते हैं कि अचीवमेंट करने  लायक चीज़ नही है तो करेंगे क्या?

वक्ता: करेंगे क्या? काटेंगे कैसे? ये बहुत बोरिंग हो जाएगी| करेंगे क्या? अब उन्हें कौन बोले कि बहुत कुछ है यार|

श्रोता३: ऐसा लगता है कि उसका जीवन सार्थक नहीं रहेगा| करेंगे तो क्या करेंगे?

वक्ता: कुछ मत करो| कुछ मत करो| अच्छा ठीक – ठीक  बताओ अभी क्या कर रहे हो? वाकई बताओ अभी क्या कर रहे हो? क्या असल में कुछ किया जा रहा है? खयाल ले के आए होगे कि कुछ करने जा रहे हैं, वो ख्याल हटाओ| अभी क्या कर रहे हो? तो ठीक है| हो रहा है अपने आप| करना क्या है? और न भी हो रह हो तो फ़िक्र क्या है?

तुम कर के भी क्या कर लेते हो? करके भी कर क्या लेते हो? इससे अच्छा चुप-चाप बैठ जाओ| होने दो जो हो रहा है| भाई बहुत कुछ है|

श्रोता५: कुछ तो करना पड़ता हैं ना| अब जैसे अगर  हम डिनर प्रिपेयर  कर रहे हैं तो हम उसकी पहले से तैयारी कर रहे हैं|

वक्ता: आपको तैयारी इसीलिए करनी पड़ती हैं क्योंकि?

श्रोता५: तैयार नहीं हो|

वक्ता: आप तैयार नहीं हो|

श्रोता५: जैसे अगर डिनर प्रिपेयर  करना है मुझे तो मुझे पता होगा ना, प्लैनिंग  तो करनी पड़ेगी ना|

वक्ता: और सोचिए कितना मजा आए कि बिना प्लैनिंग  के डिनर प्रिपेयर  करो|

श्रोता५: कुछ सामान   लाना होगा|

वक्ता: और नहीं है सामान तो उसके बिना ही करो|

श्रोता५: फिर नहीं होगा|

वक्ता: नहीं है फिर तो खाली पेट है| कितना मजा आएगा?

श्रोता५: वो मज़ेदार नहीं होगा |

वक्ता: वो शायद ज्यादा मज़ेदार होगा| प्रयत्न कर के देखोख़ाली पेट तो बैठोगे नहीं ना? क्या करोगे फिर रात में जब बारह-एक बज जाएगा? तो क्या करोगे?

श्रोता२: जो होगा उससे बनाएँगे |

श्रोता५: बाहर जाएँगे|

वक्ता: बोलो बोलो बोलो| क्या करोगे?

श्रोता५: बेटा चिल्लाएगा|

वक्ता: बेटे को क्या करोगे?

श्रोता५: ज्यादा से ज्यादा बाहर जाएँगे|

वक्ता: अधिक से अधिक नहीं|

श्रोता५: या कुछ टेक अवे  मंगवा लेंगे|

वक्ता: रात में एक बज गए| टेक अवे  तो आएगा नहीं| भूख खूब लग रही है| नींद आएगी नहीं| खाली पेट होगे तो क्या करोगे?

श्रोता५: जो होगा उसी से कुछ बनेगा ना|

वक्ता: मान लो चलो वो भी नहीं है| इतनी बुरी हालत है कि कुछ है ही नहीं खाने को| तो क्या करोगे? निकलोगे घर से बाहर| कुछ खोजोगे| और मैं बता रहा हूँ दिल्ली रात में बड़ी मस्त हो जाती है| कुछ नया होगा उस दिन| जिस दिन प्लानिंग करके सब्जी नहीं खरीदोगे ना उस दिन बहुत मज़ा आएगा|

श्रोता५:  हम हर रोज  यही करते हैं ?

वक्ता: क्यों नहीं? हम ऐसा हर रोज़  करते हैं | इसकी आदत खराब हो गयी| घर ही नहीं जाता अब ये| हमे कोई पता होता है कि क्या होगा? अब क्या मिलेगा? कभी महाराज की कृपा होती है कुछ बना देते हैं| कभी उनका मूड  खराब होता है तो नहीं बनाते| हम तो छोड़ दो| हमारे जो साथ वाले भी ऐसे ही हुए जा रहे हैं| एक दिन वो रात में लौटे ढाई बजे तो यहाँ पर राहुल जी और अमृत, “हमने अभी खाना नहीं खाया है|” फिर रात के ढाई बजे हम उनको ले कर के गए| एक जगह गए वहाँ ठीक नहीं था फिर दूसरी जगह गए वहाँ से खाना खाया|

तुम जानते होहो रहा है ना| उन्होंने कोई प्लान बनाया था कि आज तीन बजे खाएँगे रात में? और आ के अपना चार, साढ़े चार, पाँच बजे सोए| सुबह साढ़े आठ आप लोग पधार गए| फिर उठता हूँ किसी तरीके से आके बैठ जाता हूँ चलो बात करें| चलता है ना| क्या करना है प्लानिंग  कर के? क्या हो जाएगा? काम चल रहा है ना? ठीक है|

और इसी चलने में, समझिये बात को, थोड़ी बहुत प्लानिंग  अपने आप हो जाती है| वो भी प्लानिंग  करनी नहीं पड़ती| बैठे-बैठे हो जाती है| अभी बात करते-करते कोई बड़ी बात की प्लानिंग  हो जाएगी| आया था एक्टिविटी डिस्कस मेरे पास था राजम| वो बात करते-करते प्लानिंग  हो गयी की इसी की एक्टिविटी बना दो| कुछ तो उसका नाम भी सोच लिया अजीब सा|प्लानिंग  हो गयी | और वो प्लानिंग  भी कोई प्लानिंग  नहीं है क्योंकि बड़ी सहजता से हो गयी|

अब कहने को तो प्लानिंग ही है क्योंकि अभी फ्यूचर के लिए डिसाइड किया है कि एक एक्टिविटी बनेगी| और पता नहीं कब बनेगी? हो सकता है दो महीने लग जाए| पर मैं उसको प्लानिंग  मानता ही नहीं| वो प्लानिंग  है ही नहीं| बात समझ रहे हो ना? न उसमें कोई डर है, न उसमें कोई वहम है| न पाने की इच्छा है| बस एक बात ठीक लगी तो कर डालनी है| हाँ, उसके करने में समय लग जाएगा|

अनप्लान  तरीके से जिये थोड़ा सा| कम से कम जहाँ बहुत जरूरत नहीं है वहाँ तो प्लान मत करिये| जहाँ फंस ही गये हो, जहाँ वो है वहाँ कर लो प्लान अब, ठीक है| क्या करोगे? सत्तर चीज़े हैं वहाँ, कर लो| कुछ लोग होते हैं उनको यहाँ बुलाओगे तो पूरा कैलेंडर देखते हैं, कहते हैं, “मैं तीसरे सप्ताह बुधवार को आऊँगा”,  तो अब कुछ कर नहीं सकते ना उनका, वो कैलेंडर लोडेड  ही हैं| अब जब इतना लोडेड  हैं तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी प्लानिंग| और लोडेड क्यों हैं ये भी देख लो थोड़ा सा|

अचीवमेंट बुरी चीज़ नहीं है|

ये बस इतना है कि आप अचीव न करने के लिए मुक्त हों| समझ रहे हो बात को? ये कोई अचीवमेंट की भर्त्सना करने का सेशन नहीं है| बस इतना कि मैं अचीव न करने के लिए भी मुक्त महसूस करता हूँ|मैं दौड़ना चाहता हूँ , मैं दौडूंगा भी लेकिन मैं दोषी महसूस नहीं करूंगा जब मैं बाहर निकल जाऊँ| समझ रहे हो बात को? दिस इज़ कम्पलीट फ्रीडम| द फ्रीडम टू अचीव| द फ्रीडम नॉट टू अचीव; द फ्रीडम टू समटाइम्स अचीव, समटाइम्स नॉट टू अचीव|

श्रोत२: कोई इसे रक्षात्मक प्रतिक्रिया की तरह इस्तेमाल कर सकता है|

वक्ता: यह हो सकती है एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया| बिलकुल| असल में अधिकांश लोग इसे रक्षात्मक प्रतिक्रिया की तरह इस्तेमाल करेंगे| लेकिन फिर आप एक चालाक मन के साथ क्या कर सकते हैं? वो तो कुछ भी कर सकता है| किसी भी बात का कोई भी इस्तेमाल कर सकता है| तुम उसकी बात ही क्यों करो?

श्रोता१: सर जब आपके अंदर इतना फ्रीडम होगा ना तो दूसरा क्या सोचेगा? कैसे हावी होगा?

वक्ता: हाँ| क्या? कैसे? आप क्या उसको समझाओगे?

श्रोता३: बचाव, अटैक कर रहा है तभी तो डिफेन्स आएगा ना| सिर्फ उतना ही थोड़ी|

श्रोता४: अनासक्ति वाली बात है, जो शायद पिछले बुधवार को डिस्कस हुई थी| इच्छा ही नहीं रहेगी तो अटैचमेंट भी चला जाएगा|

वक्ता: यू आर फ्री टू…ठीक है तुम्हें उचित लग रहा है गो अहेड विथ आल यौर एनर्जी कि हाँ ये चीज़ करने लायक है करो| वो दिखने में अचीवमेंट जैसा ही लगेगा, करो| फिर वो कम्पल्ज़न न बन जाए| हाँ, अब नहीं है तो ठीक ड्रॉप आउट के लिए भी फ्री हैं; कम्पलीट फ्रीडम| एव्री एक्शन इज़ हैप्पेनिंग इन एन एनवायरनमेंट ऑफ़ फ्रीडम –  अचीवमेंट, नॉन अचीवेमेंट, डूईंग, नॉट डूईंग, एव्री थिंग|


सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: अभिनय का मतलब नकली होना नहीं है (Role-playing does not mean to be fake)


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

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आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf

 

 

           

                                  

 

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