न संदेह न संशय

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)

सर्वभावं न सन्देहः सर्वं नास्ति न संशयः। सर्वं तुच्छं न सन्देहः सर्वं माया न संशयः ॥ २१.३०॥

नेदं नेदं सदा नेदं न त्वं नाहं च भावय। सर्वं ब्रह्म न सन्देहः सर्वं वेदं न किञ्चन ॥ २१.२३॥

भूतं नास्ति भविष्यं नास्ति। शरीरं नास्ति स्थानं नास्ति ॥ 

अशुद्धं शुद्धमद्वैतं द्वैतमेकमनेककम्। सर्वं नास्त्येव नास्त्येव अहमेव हि केवलम् ॥ २५.११॥

सर्वं नास्त्येव नास्त्येव अहमेव चिदेव हि। एवं वद त्वं तिष्ठ त्वं सद्यो मुक्तो भविष्यसि ॥ २५.४९॥

– ऋभु गीता

वक्ता: दो बातें कहते हैं रिभु हमसे। दो बातें हैं जो कही जा रही हैं। पहली “सर्वम् नास्ति न संशयः ” ये सबकुछ नहीं है इसमें कोई संशय नहीं है। ये सब नहीं है, नहीं है, नहीं है। और दूसरी ओर कहते हैं कि “सर्वम् ब्रह्म् न संशयः “। साथ ही हमसे ये भी कहते हैं कि हालांकि ये सत्य है कि “सर्वम् नास्ति” लेकिन मंत्रो में सर्वोतम मंत्र है “सर्वम् ब्रह्म्”। ये हमारी जिंदगी के लिए सबक है। नकारने का नेति-नेति कहने का “इदम् नास्ति”  कहने का फल होता है एक विधायक, सकारात्मक समझ। रास्ता तो आपका नकारात्मक का है, न कहने का है|

पर उस न करने में ईमानदारी रही है, चालाकी नहीं, तो ये जो न कहने वाला मन है ये बड़ी गहराई से और बड़ी सरलता से सत्य को हाँ कहता है। बात को समझियेगा| और अगर ये ‘न’ कहने पर ही अटक गया है तो बात अभी बनी नहीं। “सर्वम् नास्ति” ठीक है, लेकिन जीवन “सर्वम् नास्ति” में नहीं जिया जा सकता है। क्योंकि एक तरफ तो आप कह रहे हो कि सर्वम्, सर्वम् का अर्थ है कि बहुत कुछ है – नानात्व है जो आपको दिखाई दे रहा है और दूसरी ओर आप कह रहे हो, “नास्ति”, दिखाई दे रहा है तो कैसे नहीं है?

और अगर नहीं है तो, वो कुछ और होगा अन्यथा आप कहते कैसे “सर्वम्, इदम्, न-न” – ये आते कहाँ से शब्द? तो काटने भर से काम नहीं चलेगा| कोई ये न समझे कि ऋभु गीता सिर्फ काटती है। वो काटती नहीं है, वो सत्य को प्रतिष्ठापित करती है। उसका काम यही भर नहीं है कि वो भ्रम को हटा दे। भ्रम का हटना और सत्य का चमकना एक ही घटना है एक साथ घटती है। आप ये नहीं कह पाएँगे कि बादल छट गये, चमकता सूर्य अभी भी नहीं दिख रहा है| कैसे होगा ये? कैसे होगा? “सर्वम् नास्ति” कहने की परिणिति है ये कह पाना कि “सर्वम् ब्रह्म”।

बादलों के छंटने और सूरज के आलोकित होने में न दूरी है, न अंतर है, न समय है, एक साथ है। और बादलो का छटना किसी महत्व का नहीं अगर उनके पीछे से सूरज चमके न। तो फिर क्यों कहा “सर्वम नास्ति?” फिर ये जानने का महात्म क्या रह गया? फिर कहाँ आनंद है? ज्ञान भली-भूत होता है उस अज्ञेय के प्रति श्रद्धा में जिसे ब्रह्म कहते है। समझियेगा बात को|

ज्ञान आपको अज्ञेय द्वार पर ले जाकर खड़ा कर देता है, अगर वास्तव में ज्ञान है तो।

अज्ञेय के द्वार पर खड़ा करता है। आप ज्ञान और उस मंदिर में भीतर घुसते है, आप सर झुका कर के श्रद्धा में। उसी अज्ञेय का नाम है ब्रह्म। नेति-नेति करके आप उस मंदिर की सीढ़ियों तक तो पहुँच जाएँगे , द्वार तक तो पहुँच जाएँगे पर मंदिर में प्रवेश नहीं पाएँगे, क्योंकि प्रवेश पाने के लिए उसी सर को झुकना पड़ेगा जिस सर ने नेति-नेति करी। जिस बुद्धि ने, जिस चेतन्य ने, जिस चिन्मयता ने आपको उस मंदिर तक पहुँचाया उसी को समर्पित होना पड़ेगा, तभी “सर्वम् नास्ति”, “सर्वम् ब्रह्म्” बनेगा। अन्यथा आप “सर्वम् नास्ति” पर अटक के रह जाएँगे और अगर आप “सर्वम् नास्ति” पर अटक के रह गए तो जीवन बड़ा रूखा बड़ा बोझिल हो जाएगा। आप जियेंगे कैसे? कैसे जियेंगे? आ रही है बात समझ में? जब तक कोई गहरी आतंरिक अनुभूति न होने लगे कि मैं विराट का अविभाज्य अंश ही नहीं उसकी सम्पूर्णता हूँ तब तक आप चैन नहीं पाएँगे।

आप अगर पाते हैं  कि आपकी ज़िंदगी में क्षुद्रता, संकीर्णता, तनाव, खिंचाव बहुत है तो साफ़ समझ लीजिए कि बुद्धि तो है आप के पास, समर्पण जरा नहीं है। बुद्धि, संसार का माया जाल तो काट सकती है पर माया के श्रोत तक आपको नहीं पहुँचा सकती। आप अधर में टंगे रह जाएँगे, माया तो कटेगी और ब्रह्म मिला नहीं इसी को क्या कह गये है कबीर माया मिली न राम” । इससे तो भला ये होता कि माया के सपनों में ही डूबे रहते, भ्रम में ही खेलते रहते। माया तो गई, अब दिखाई दे जाता है कि ये जो इन्द्रियगत आकर्षण है, इसमें कुछ रखा नहीं है, ये तो दिख जाता है पर किस में कुछ रखा है ये समझ नहीं आता है। बड़ी दुविधा की स्तिथि है माया मिली न राम। माया को ज्ञान ने काटा पर समर्पण था नहीं तो राम तक पहुँचे नहीं। उसी राम को ब्रह्म कहा गया है, एक ही है। आ रही है बात समझ में?

“सर्वम् ब्रह्म” तक जाना जरूरी है, नकार में मत जीने लग जाना। सब कुछ नकारोगे तो नकारते नकारते अंतत: जीवन को भी नकार दोगे। आधयात्मिकता, सत्य, जीवन का नकार, जीवन के प्रति इनकार नहीं है, जीवन की सम्पूर्णता है। जीवन को पूरा जीने का सन्देश है।

अब ये घास है| नास्ति, नास्ति करते रहोगे तो तुम्हारे लिए बहुत आसान हो जायेगा घास की हत्या करते जाओ। नहीं है, जब है ही नहीं तो इसकी हत्या कर दो और अगर कहोगे “सर्वम् ब्रह्म” तो ये घास क्या हो जाएगी? ये पूजनीय हो जाएगी। ये अंतर है दोनों दृष्टियों में, “सर्वम् नास्ति” और “सर्वम् ब्रह्म” में। आ रही है बात समझ में? “सर्वम् नास्ति है तो न ये घास कुछ है, न मैं कुछ हूँ, न हत्या है, न हिंसा है। और अगर “सर्वम् ब्रह्म” है तो मैं जो हूँ वही ये है। तो कौन किसको मार रहा है और मारने का विचार फिर कहाँ। आ रही है बात समझ में?

मैंने कहा था ना “आत्मा से मन है, मन से विचार है, कर्म है”। विचारो और कर्मो का ही नाम शब्द है। आत्मा से उठते है शब्द और वो शब्द जो आत्मा से उठे हुए हैं जब वो दोबारा इन्द्रियों पे पड़ते हैं वो इन्द्रियों को बड़ा शांत कर देते है। बात समझ आ रही है? ऐसे समझ लो जैसे, जैसे ग्रूव्स  मिल जाएँ, जैसे खाने मिल जाए, जैसे की दो चीज़ें एक दूसरे के लिए बनी हुई हो और वो करीब आ गयी हो। उनका मिलना पक्का है और वो ऐसे मिल जाएँगी जैसे की वो कभी अलग नहीं थी। क्योंकि वह है ही एक दूसरे की,  उनमे कोई विशेष अंतर नहीं है।

जब ये जो महावाक्य कानों में पड़ते है तो मन इनका विश्लेषण भले न कर पाएँ, बुद्धि इनका थाह भले न ले पाए लेकिन इसके बाद भी कुछ होता है भीतर जो अचानक से कह देता है कि बात ठीक है क्योंकि वो जो कह रहे हैं वो बात तुम्हारा स्वभाव ही है। बुद्धि की पकड़  में नहीं आ रही है बात लेकिन फिर भी तुम जान रहे हो बात ठीक है, बात ठीक है। “क्यों ठीक है?” तुमसे कोई पूछे, तुम बता नहीं पाओगे।

तुमसे कहा जाए कि  “सर्वम् नास्ति न संशयः न संशयः”, तुमसे कहा जाए, “बताओ क्यों ठीक है?” तुम बता नहीं पाओगे| लेकिन कुछ है तुम्हारे भीतर जो गवाही देता है कि ठीक है, ठीक है, बिलकुल ठीक है। इसलिए कह रहा था, बात समझ रहे हो ना? क्यों ठीक है समझा पाने का तरीका नहीं लेकिन ठीक है ये लगने लग जाता है। कुछ है उसमे जो ठीक है।

कोई पागल हो गया है| वो भूल गया है पानी का नाम, स्मृति का लोप हो गया है| ठीक? स्मृति का लोप हो गया है, न वो खुद को जानता, न संसार को जानता, पानी को भी नहीं जानता| न खुद को जानता है, न संसार को जानता है, पानी को भी नहीं जानता, न भाषा को जानता है| पा, नी, ज, ल, ये शब्द ही उसकी व्याकरण से गायब हो गया है। इन सब को नहीं जानता तो क्या वो प्यास को भी नहीं जानता? जवाब दो? इन सब को नहीं जानता तो क्या वो प्यास को भी नहीं जानता?

अब प्यास को तो जानता है पर ये नहीं जानता कि कैसे मिटेगी प्यास। नहीं जानता ना? स्मृति गयी, बुद्धि भी गयी। तुम उसे पानी दे देते हो, उसे कुछ नहीं पता उसे क्या दिया गया| अचानक अनायास उसके हाथ एक चीज़ आ गयी है। प्यासे के हाथ एक चीज़ आ गयी है और प्यासे को कुछ पता नहीं उसके हाथ में क्या आया गया है, बिलकुल नहीं पता है। तुम यहाँ तक कह सकते हो कि उसकी इन्द्रियों तक का लोप हो गया है तो वो पानी को देख भी नहीं पा रहा है।

न उसने पानी का कभी नाम सुना है, न उसे पानी जैसे किसी चीज की स्मृति है लेकिन प्यास तो है उसके पास और ज्यों ही अब इस अनजानी चीज़ को, बिलकुल अनजानी चीज़ है उसके हाथ में उसे ये भी नहीं पता| उसे ये भी नहीं पता इसे पीना होता है। कोई कहेगा होंठो तक ले जाओ, कोई सहारा देगा कि होंठ तक ले जाओ जैसे बच्चे को देना पड़ता है कि इसको खाते है चलो मुँह तक ले जाओ। आप उसे सहारा देते है कहते हो, “पियो इसको|” मुँह में डालता है, क्या होगा? क्या होगा? बुद्धि उसकी पकड़ पाएगी की प्यास क्यों बुझी? उसके अतीत से कोई गवाही आएगी कि प्यास क्यों बुझी? लेकिन प्यास तो बुझ जाएगी ना।

यही काम मंत्र करते है| तुम्हे मंत्र का कुछ पता नहीं क्या है, क्यों है लेकिन वो किसी ऐसे श्रोत से निकला है कि वो तुम्हारी प्यास बुझा देगा। तुम्हें पता भी नहीं होगा, उसने क्यों बुझा दी और कैसे बुझा दी पर वो तुम्हरी प्यास बुझा देगा।

भला हो कि वो जो पागल व्यक्ति है वो पानी का नाम जान ले। भला हो कि वो ये भी जान ले कि पानी कहाँ रखा है और किस प्रकार हासिल किया जाता है, बहुत अच्छा हो। पर अगर उसे ये सब नहीं भी पता हो और सिर्फ संयोगवश उसे पानी मिल गया है, पानी तब भी उसके काम आ जाएगा। इसीलिए पूछा जाता है कि कैसा लगा? तुम्हे भी शायद संयोगवश पानी मिल गया है। तुमने माँगा नहीं, तुम्हे पानी का कुछ पता नहीं लेकिन तुम्हें एक बात का तो पता है ही, किसका? प्यास का। अब संयोगवश पानी मिल गया है तो प्यास तो बुझेगी ना, फिर भी बुझेगी।

ये करके देखना अजीब सा लगेगा| बुद्धि कहेगी, “पागल हो गये हो क्या।” तनाव में कभी गा के देखना “अहमेव ही केवलम् अहमेव ही केवलम्, सर्वम् ब्रह्म सर्वम् नास्ति ” कुछ देर तक बुद्धि विद्रोह करेगी कहेगी, “पागल हो गये हो, काम करो ना, जो समस्या है उसको हल करो, सॉल्व करो ये तुम मंत्र वंत्र क्या गा रहे हो, कुछ और करो किसी से बात करो, किसी को मेल करो, किसी को फ़ोन करो, किसी से जा के लड़ जाओ, किसी से जा के कुछ और करो और फिर थोड़ी देर में कहोगे ये क्या हो गया, समस्या के किसी हल की जरुरत ही नहीं रही।

मैं कोई नुस्खा नहीं दे रहा हूँ,  न ही ये कह रहा हूँ कि कुछ भी हो तो यही करना शुरू कर दो कि सड़क पर गाड़ी  ख़राब हो गयी और तुम रास्ते में बैठ कर गा रहे हो “सर्वम् ब्रह्म सर्वम् ब्रह्म”, उससे गाड़ी नहीं चालू हो जाएगी।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, ऋभुगीता पर: न संदेह न संशय (Perfect certainty)


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf                            

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s