अंतिम लक्ष्य कौन सा?

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्न: कोई अंतिम लक्ष्य भी होता है क्या?

आचार्य प्रशांत: विपुल, जब तुम कहते हो कि कुछ है अंतिम लक्ष्य, उस अंतिम का अर्थ है पूर्णविराम| दो-तीन चीज़ें, तुम लिख भी सकते हो| जब तुम कहते हो कि कोई चीज़ अंतिम है, तब तुम्हारा अर्थ होता है,

पहला – कि वो अंतिम, पूर्ण विराम है, उसके बाद कुछ नहीं|

दूसरा – सभी, उस अंतिम कि तुलना में, कोई महत्त्व नहीं रखते|

सही? तुम कह रहे हो कि अंतिम, पूर्ण विराम है और सब कुछ उस अंतिम से तुच्छ है|

सही?

अगर जीवन का कोई अंतिम लक्ष्य है, तो ज़ाहिर है कि वह अंतिम लक्ष्य कहीं भविष्य में होगा| “वह असली चीज़ है, सबसे ऊँची चीज़|” अगर वही असली चीज़ है, तो यह क्या है? उसे असली बता कर के तुम इसे क्या बता रहे हो-नकली, असली से कमतर? समझ रहे हो बात को? अगर असली चीज़ है उस अंतिम लक्ष्य को पाना, तो वो लक्ष्य कुछ भी हो सकता है। पर अगर असली चीज़ वहाँ पर है, कि उसको पाना, तो फिर अभी जो हो रहा है ये सब तो बेकार ही है।

और हम जीवन ऐसे ही बिताते हैं, कि असली चीज़ वो है, वो लक्ष्य, वो परिणाम। अगर असली चीज़ वो है, तो फिर ये जो हम रोज़ाना, हर समय, हर क्षण जी रहे हैं, ये हमें कैसा लगता है? उबाऊ, गैरमहत्त्वपूर्ण। भई महत्त्वपूर्ण चीज़ तो वो है – कभी परिणाम आएगा, अंक मिलेंगे, उपाधि मिलेगी। तो इसीलिए बाकी समय साल के कैसा लगता है? उबाऊ, क्षुद्र।

उपस्थिति अनिवार्य है तो कॉलेज आ गए। असली चीज़ तो परिणाम  है। और परिणाम न हों तो हम पढ़ाई करेंगे भी नहीं। अगर न आता होता तो हम पढ़ाई करते भी नहीं। जब परिणाम असली चीज़ है, अंतिम लक्ष्य; तो फिर कुछ और करने में मन कहाँ लगेगा? नतीजा होगा बोरियत। तुम हमेशा इंतज़ार करते रहोगे उस अंतिम के लिये। और जब तुम इंतज़ार कर रहे होते हो तो तुम्हें कैसा लगता है?

श्रोतागण:  अशांति छाई रहती है|

वक्ता: उबाऊ और नीरस और बेचैन और?

और ये सब ऐसी ही हमारी ज़िन्दगी है क्योंकि हम अंतिम लक्ष्य बना के बैठे रहते हैं। तो जब तक वो लक्ष्य मिला नहीं है, तब तक ऐसे ही घुटे-घुटे से रहोगे। क्योंकि अभी तो वो लक्ष्य मिला नहीं ना।

अंतिम का मतलब ही यही है, कि वो असली है, वो आखिरी है, बाकी सब उससे नीचे का है। उसकी तुलना में नीचे का; तुच्छ। कॉलेज में इसीलिए हैं क्योंकि डिग्री मिले और नौकरी मिले। देखो ना – पहला ही सवाल इंटरव्यू का था। अब डिग्री मिलेगी चौथे साल के अंत में। तो ये पचास साल कैसे बीतेंगे? इंतज़ार में। किसका इंतज़ार?

श्रोतागण: (धीमी आवाज़ में ) अंतिम का|

वक्ता: तो फिर अब क्या ताज्जुब है कि ये चार साल हमारे ऐसे ही बुझे-बुझे रहते हैं। घुसते हैं (इस कक्षा की तरफ इशारा करते हुए), तो मन करता है वहाँ जा के बैठ जाएँ (पीछे की तरफ)। मुझे तो अभी भी शक है कि एक-आध वहाँ अभी भी छुप के कहीं बैठे हुए हैं। अटेंडेंस के समय पर निकलेंगे, “हम भी थे।”

(छात्र मुस्कुराते हैं)

ज़िन्दगी हमारी ऐसे ही बीत रही है। तुम ये कक्षा की पिछली बेंच पर यूँ ही नहीं बैठ रहे, तुम ज़िन्दगी की पिछली बेंच  पर बैठ रहे हो।

तुम सारी क्रिया को चूकना चाहते हो क्योंकि यह आखिरकार उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है| महत्त्वपूर्ण चीज़ है वह अंतिम लक्ष्य। वो मिलेगा तो असली बात होगी। अभी जो हो रहा है, किसी काम का नहीं है। और मज़ेदार बात यह है कि ज़िन्दगी यहीँ है, अभी है। इसके अलावा कुछ नहीं है। तुम साँस अभी ले रहे हो, या अभी से पांच मिनट बाद में ले रहे हो। जी अभी रहे हो, और कह रहे हो असली चीज़ कहीं और है। क्या विरोधाभास है? हो गयी ना गड़बड़? वो अंतिम चीज़ कभी कुछ होगी? ख्वाबों की दुनिया।

हम होंगे कामयाब एक दिन, एक दिन। और वो भी जब तब कामयाब होंगे, तो इसका मतलब अभी क्या हो? नाकामयाब। तो जिए जाओ अपनी नाकामयाबी के साथ।

“पर सर, ये बात तो सच है, हम अभी नाकामयाब हैं।” तुम नाकामयाब महसूस ही इसलिए करते हो, क्योंकि तुमने यह मान रखा है कि हम कामयाब तब होंगे। तुमने कामयाबी को उसके साथ बाँध रखा है, अंतिम लक्ष्य के साथ; वो कुछ भी हो सकता है।

और दूसरी बात, जो अंतिम होता है, फिर उसके बाद कुछ होता भी नहीं है। उसके बाद कुछ और फिर होता भी नहीं है। वो फिर आखिरी होता है। जैसे कि अभी अगर तुम ट्रैन पर बैठो, कि तुम्हें लखनऊ जाना है, और लखनऊ आ जाए तो क्या उसके बाद भी ट्रेन में बैठे रहोगे? क्योंकि वो लक्ष्य था, अब आ गया तो उतरना पड़ेगा। तो जिस दिन अंतिम लक्ष्य  मिल गया उस दिन, मरना पड़ेगा। क्योंकि अब उसके बाद जीने का कोई अर्थ नहीं है। जब लखनऊ आ गया तो अब ट्रेन पे बैठे रहने का कोई अर्थ नहीं ना। क्योंकि वही अंतिम था। तो जिस दिन अंतिम मिल गया उस दिन मरना भी पड़ेगा। ख़तम। अब क्यों जी रहे हो, हो तो गया अंतिम.

इसका मतलब ये है, कि कभी अंतिम मिले ही ना, तो ज़्यादा अच्छा है। क्योंकि मिल गया तो ख़तम हो जाओगे। तुम्हें पता है, ऐसा होता भी है?

विकसित दुनिया में ज़्यादातर जो मानसिक रोगी  हैं, वो वही हैं जिन्होंने वो सब पा लिया जो वो चाहते थे। वो पागल हो गए उसके बाद। वो भूखे नंगे लोग नहीं हैं। तुम्हें लगे कि पागलखाने में ऐसे लोग होंगे, भिखारी जैसे। न। वो सब बड़े सफलता पाने वाले लोग हैं। उन्होंने पा लिया। और पा के पता चला कि ये तो अपमानित हो गए। फिर पागल हो जाता है आदमी।

कुछ अंतिम नहीं है। तुम यहाँ बैठे हो, मैं तुमसे कह रहा हूँ, तुम मुझे सुन रहे हो – यही जीवन है। इसके आगे इसका कोई लक्ष्य नहीं है। जो हो रहा है, वो पूरा है। वो अपना लक्ष्य खुद है। उसके आगे कोई लक्ष्य नहीं है। इसी को जीयो और पूरी तरीके से जियो। कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। समझ रहे हो?

अगर तुम इसमें पूरी तरह से हो, उतना काफी है।  अभी जो हो रहा है, उसको पूरे तरीके से करो। इसको पूरे तरीके से करोगे तो अगले पल जो हो रहा होगा वो बेहतर हो जाएगा अपने आप। फिर जो हो रहा होगा, वो और बेहतर हो जाएगा। और हो जाएगा। और अपने आप एक यात्रा होती रहेगी। बिना तुम्हारे मांगे होती रहेगी, बिना तुम्हारी योजना के होती रहेगी। तुमने कोई लक्ष्य नहीं बनाया होगा कि उस अंतिम को पाना है, तब भी होती रहेगी। ठीक है?



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: अंतिम लक्ष्य कौन सा?


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    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

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आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf                            

 

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