हर काम के साथ परिणाम की उम्मीद क्यों?

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प्रश्न: सर, हर प्रयास के साथ हम कुछ न कुछ उम्मीद क्यों लगाए रहते हैं?

आचार्य प्रशांत: ऐसा है नहीं।

(छात्र हँसते हैं)

ऐसा है ही नहीं।

क्या नाम है?

श्रोता: कुशाग्र।

वक्ता: कुशाग्र। फिर वही पूछूँगा, प्रेम में होते हो, किसी से गले मिल रहे हो, तो कुछ उम्मीद भी रख रहे हो क्या? जब कार्य ही खुद में परिणाम है, जब आप कार्य में गहराई और पूर्णता से हैं, तब वहाँ कोई उम्मीद नहीं होती।

तुम शाम को खेलने जाते हो, जब खेल रहे हो, तो क्या यह उम्मीद कर रहे हो कि खेलने के आधे घंटे बाद मुझे कुछ इससे मिल जाएगा। खेलना अपने आप में ही तो अपना परिणाम है ना? खेलने से इसके आगे तो कोई और अपेक्षा नहीं? खेल अपना परिणाम खुद है। उससे, इससे आगे तो तुमने कोई उम्मीद नहीं रखी?

तो ऐसा है नहीं कि तुम जो भी कुछ करते हो, उससे तुम आगे की अपेक्षा करते हो। हाँ, तुम्हारे निन्यानवे दशमलव निन्यानवे प्रतिशत कर्म ऐसे हैं, जो पूर्ण और गहरे नहीं होते, उनमें आगे के लिए अपेक्षाएँ बसी होती हैं। और आगे के लिए अपेक्षाएँ तभी बसी होती हैं, जब अभी जो कर रहे हो, उसमें कोई आनंद न हो। अगर अभी जो हो रहा हो, वो पूर्ण हो और उसमें पूरा संतोष हो, तो तुम्हारे मन में आगे के लिए अपेक्षा आएगी ही नहीं, बिलकुल नहीं आएगी। आगे के लिए अपेक्षा आने का अर्थ ही यही है कि अभी जो हो रहा है, वो पूर्ण नहीं है – कुछ है जो कमी है, कुछ है जो छूट रहा

तो, ऐसा मत सोचो कि जीवन ऐसा होना चाहिए। कोई ज़रूरी नहीं है कि ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाए कि अभी जो कुछ हो रहा है उसमें तो कोई मज़ा नहीं, और आगे की उम्मीदें पाल रखी हैं। पर तुम्हें तो बताया ही यही गया है कि दुनिया उम्मीद पर चलती है। दुनिया उम्मीद पे नहीं चलती है, दुनिया अभी है। अभी है। उम्मीद पर सिर्फ कल्पनाएँ चलती हैं। उम्मीद क्या है? कल्पना ही है ना? उम्मीद एक कल्पना ही तो है ना कि आगे कुछ हो जाएगा।

तो तुम देखो, कि तुम्हारी सारी अपेक्षाएँ पैदा कहाँ से होती हैं। तुम्हारी सारी अपेक्षाएँ पैदा ही इसीलिए होती हैं, क्योंकि तुम इस क्षण से बुरी तरह से असंतुष्ट हो। जब इस क्षण से कोई संतुष्टि नहीं मिल रही तो तुम आगे के लिए उम्मीदें पालते हो। जो अभी में पूरा पूरा डूबा होगा, उसको वक़्त कहाँ है जो आगे के लिए सोचे?

श्रोता: तब हम भविष्य के बारे में कब सोचेंगे?

वक्ता: तुम देखो, कि तुम भविष्य के बारे में क्यों सोचते हो फिर समझ जाओगे कि – सोचें? न सोचें? कि क्या करें? कि क्या न करें?  मुझसे जल्दी से निर्णय मत मांगो, पहली चीज़ मैंने यही कही थी कि निर्णय मैं नहीं दूँगा।

तुम देखो पहले कि जो तुम्हारा मन है, वो भविष्य या भूत में क्यों घूमता रहता है? वो इसलिए घूमता रहता है, क्योंकि वर्तमान में वो होना नहीं चाहता। इसलिए वो या तो याद्दाश्त में जाता है, या अपेक्षा में जाता है। या तो याद्दाश्त में जाएगा जो भूत में है, या अपेक्षा में जाएगा जो भविष्य में है। और भूत और भविष्य दोनों ही कल्पनाएँ हैं। दोनों ही सिर्फ छवियाँ हैं। दोनों में, कोई हक़ीक़त नहीं। मर गए, ख़त्म हो गए। एक ख़त्म हो चुका है, और एक अभी आया ही नहीं।

जो है सो अभी है। यहाँ तक कि उनके बारे में सोच भी तुम अभी ही रहे हो। वो कल्पनाएँ भी अभी ही हो रही हैं। उनका अस्तित्व नहीं है। भूत और भविष्य दोनों ही काल्पनिक हैं। लेकिन फिर भी हम वहीँ जाना चाहते हैं। अब तीसरे साल  में आ गए हो, ये हो गया है। मिलते हैं विद्यार्थी कई बार, “सर, अब तो क्या है, कक्षाओं में क्या है, अब तो हम परलोक की तैयारी कर रहे हैं।

(छात्र हँसते हैं)

हाँ, ये कैंपस की चारदीवारें हैं, अब इनसे बाहर निकलेंगे, दूसरे लोक में पहुँचेंगे। तो अब परलोक की तैयारी चल रही है। अच्छी बात है।

तुम इस दुनिया में होते ही कब हो? पहले वर्ष   में घुसते हो, तो चौथे  वर्ष  की प्रतीक्षा कर रहे होते हो। वहाँ भविष्य बैठा हुआ है। कक्षा बारहवीं में होते हो तो सोच रहे होते हो दाखिला कहाँ मिलेगा और आगे भविष्य बैठा हुआ है। तुम जहाँ पर भी हो, उससे एन + वन, एन + टू, एन + थ्री  पर तुम्हारा चित्त है।

श्रोता: तो सर, आप ये कहना चाहते हो कि हम काम के बारे में नहीं सोचें?

वक्ता: (हँसते हुए) मैं कुछ नहीं कहना चाहता। मैं तुम्हारे सामने बस एक स्थिति पैदा करना चाहता हूँ जिसमें तुम यह समझ सको कि ये लक्ष्य वगैराह, चीज़ें क्या हैं?

मेरा काम, बस यहाँ पर कुछ ऐसा मॉहौल बनाना है, जिसमें तुम्हें ये समझ में आये कि ये लक्ष्य, ये आकांक्षा, ये भविष्य, ये सब मन में कब फंसते हैं। जब तुम बहुत बहुत खुश थे, जब तुम बहुत बहुत खुश थे, तब क्या तुम भविष्य के बारे में सोच रहे थे? उस मोमेंट में? (छात्रों में हलचल बढ़ती है) ठीक उस मोमेंट में?

जो तुम्हारा आनंद का क्षण था, गहरे आनंद का, क्या तुम तब सोच रहे थे ख़ुशी के बारे में? या वो क्षण ही काफी था? वो काफी था ना?

श्रोतागण: जी सर।

वक्ता: बस इसी से समझ लो कि यदि पूर्णता में, यदि आनंद में आदमी भविष्य के बारे में सोचना बंद कर देता है, तो भविष्य की सोच कब शुरू होती है? ठीक तब, जब उसे अभी बहुत दुःख लग रहा होता है। क्योंकि अभी जो है वो बड़ा दुःख देता है। बड़ी उलझन देता है। तो इसीलिए मैंने एक कल्पना रची है आगे के लिए, कि आज तो बड़ा खराब है, कल काश सुन्दर हो जाए। ये समझ लो बस।

मैं तुमसे कुछ नहीं कह रहा हूँ कि तुम सोचो कि “न सोचो कि क्या करें”। पर समझो बात को कि तुम क्यों सोचते हो आगे के बारे में। और आगे के बारे में सोच के होगा क्या ये भी देख लो। क्योंकि आगे का तो कोई अंत नहीं। एन कोई भी हो, एन + वन, लाया जा सकता है। उसमें बस एक दिन लगता है, फिर आगे की कोई सोच नहीं बचती। उस दिन के बाद कोई भविष्य नहीं बचता। लेकिन मन में तुम लगातार भविष्य में जीते हो।

और भविष्य में जीना नहीं जीने के बराबर है। क्योंकि एक वास्तविकता है, एक ही वास्तविकता, जो कि कहाँ है?

श्रोतागण: वर्त्तमान में।

वक्ता: भविष्य में जीना, जीवन को पूरी तरह से चूकना है। मर जाओगे, फिर कहोगे, “चूक गए।“

(छात्र हँसते हैं)

जीवन यहाँ था और हम सोचते रहे कि वो वहाँ है।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: हर काम के साथ परिणाम की उम्मीद क्यों?


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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf                            

 

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