मुक्ति और लापरवाही

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)

श्रोता १: आचार्य जी, अभी पहला सूत्र था “बंधनमुक्त”। इस मनोभाव की वजह से, अगर ये मनोभाव धीरे-धीरे हमारे अन्दर आ रहा है तो क्या हमारा व्यवहार थोड़ा घुमक्कड़ जैसा नहीं हो जाएगा? कि हम किसी चीज़ की परवाह नहीं करेंगे बिल्कुल, हर चीज को हलके लेते जाएँगे, चाहे फिर जीवन में वो कोई भी प्रसंग हो या हमारी जीविका से सम्बंधित  हो, या हमारे सम्बन्ध से सम्बंधित हो। बंधन तो फिर हर जगह ही दिखाई देगा ओर दिखता ही है, तो क्या मैं एक घुमक्कड़ व्यक्ति नहीं हो जाऊँगा?

आचार्य प्रशांत: हाँ। पर क्या ये भी बंधन नहीं है कि धारणा पकड़ रखी है कि घुमक्कड़ होने में कुछ बुराई है? समझियेगा बात को। क्या मैं घुमक्कड़ नहीं हो जाऊँगा? इस कथन से आशय है कि घुमक्कड़ी को मैं जानता तो नहीं, मुझे बस उसके होने का अंदेशा है। जब आप उसे जानते नहीं तो उससे डर क्यों अभी से? आपको अभी से उसमें कुछ हानि क्यों दिखाई दे रही है? “कहीं मैं घुमक्कड़ तो नहीं हो जाऊँगा? कहीं मैं घुमक्कड़ तो नहीं हो जाऊँगा?”

(हँसते हुए)

क्या ये बंधन नहीं है?

हाथों पर बेड़ियाँ पड़ी हों तो बात बहुत छोटी होती है, वो बेड़ियाँ स्थूल होती हैं, दिखाई देती हैं, आप उन्हें काट दोगे, आँखों के सामने हैं। आँखों के पीछे जो बेड़ियाँ होती हैं वो ज्यादा खतरनाक होती हैं, उनको धारणाएँ कहते हैं। इसी धारणा से मुक्त होना है। यायावर घूमने में, घुमक्कड़ी में न अच्छा है, न बुरा है। न वो हो जाने को आदर्श बना लेना है, न उससे दूर जाने को आदर्श बना लेना है। कभी वो जीवन में आती है, स्वागत है उसका। जब जो जीवन में आता है वो कभी विदा भी हो जाता है, एक दिन होगा जब आपके पाँव घूमने के लिए उद्दत होंगे, एक दिन होगा जब आपके चलते पाँव कहीं ठहर जाएँगे। क्या अच्छा है इसमें, क्या बुरा है?

मुक्त हो कर के घूम लिए तो मुक्ति और मुक्त हो कर के ठहर लिए तो भी मुक्ति। न घूमते रहना बड़ी बात है, न ठहर जाना बड़ी बात है। न गति में कुछ है, न अगति में कुछ है। न स्थिरता में कुछ है, न चलायमान होने में। मुक्त गति करो, मुक्ति; मुक्त थमे रहो, मुक्ति।

पर हम ऐसे अमुक्त हैं कि मुक्ति को भी धारणाओं के पीछे से ही देखते हैं, “अगर मुक्ति ने मुझे घुमक्कड़ बना दिया तो मुक्ति बुरी है।” क्यों? क्योंकि बचपन से ही मुझे बताया गया है कि जो घूमते फिरते रहते हैं वो कहीं के नहीं हो पाते, कोई घोंसला नहीं बनता, कोई ठिकाना नहीं बनता, समाज में कोई स्थान नहीं बनता ओर वो प्रगति नहीं करते। जो ज़रा एक जगह पाँव जमा देते हैं, थम जाते हैं, स्थापित हो जाते हैं, वो बढ़ते हैं जीवन में ओर समाज में आगे। तो मुक्ति हो सकता है मुझे घुमक्कड़ बना दे, ओर ये मैंने पहले ही मान रखा है कि घुमक्कड़ होना?

श्रोता : बुरा है।

आचार्य जी: बुरा है। यदि मुक्ति घुमक्कड़ बनाती है ओर घुमक्कड़ होना बुरा है, तो घुमक्कड़ी के साथ-साथ मुक्ति भी गलत हो गई। आप देख रहे हैं क्या होता है? मुक्ति को प्रथम स्थान दीजिये, उसके बाद जो हो वही अच्छा। उसके बाद आप कहीं ठहर गए तो ठहरना अच्छा, उसके बाद आप चल पड़े तो चलना अच्छा। समझ रहे हो? कोई वर्जना नहीं होती है। और पहले से छवियाँ मत बना लो कि जो मुक्त होता है वो इधर-उधर बिचरता ही रहता है।

ये भी सब किस्से कहानियों की ही बाते हैं कि रमता जोगी, कि वो रमण कर रहा है, इधर से उधर जा रहा है, रमण का अर्थ ये नहीं होता कि पाँव चल रहे हैं, रमण का अर्थ होता है आनंदमग्न होना – रमे हुए हैं, जहाँ हैं वहीँ रमे हुए हैं, पाँव चले तो भी रमे हुए हैं, पाँव नहीं चल रहे तो भी रमण है। हम रमण को भ्रमण समझ लेते हैं। भ्रमण ही है भ्रम।

छवियों में मत रहो, मुक्ति किसी तरीके की कोई बाध्यता थोड़े ही दे देगी। जो मुक्ति बाध्यता दे, वो मुक्ति हुई क्या? मुक्ति अगर ऐसी है कि वो मजबूर कर दे घूमने फिरने के लिए, तो फिर वो मुक्ति है या मजबूरी है?

श्रोता: मजबूरी।

आचार्य जी: ओर मजबूरी मुक्ति हो सकती है?

श्रोता: नहीं।

आचार्य जी: तो कहाँ से धारणा ले आए हो कि जो मुक्त होता है वो तो टहलने निकल जाता है ओर जब तक विश्व भ्रमण न कर ले वापस नहीं आता। मुक्ति के साथ कोई बाध्यता नहीं आती। मुक्ति के साथ कोई मजबूरी नहीं आती, मुक्ति बेशर्त होती है, इसके साथ कोई कंडीशन या शर्त नहीं जुड़ी होती। लोग आते हैं कि देखिये वैसे तो मुझे पता है कि बोधस्थल बहुत अच्छी जगह है पर मेरा तो ऐसा है कि मुझे शादी-ब्याह करना है।

अच्छी जगह है अगर तो वो तुम्हें मजबूर करेगी क्या? और अगर कुछ तुम्हें मजबूर कर रहा है तो वो अच्छा कैसे हो सकता है। पर धारणाएँ हैं। पहले से ही मान के बैठे हो कि बोध का मतलब होता है कि गार्हस्थ्य में तो प्रवेश करना ही नहीं है, कि आचार्य जी के पास जाने का मतलब ये होगा कि अब छड़े के छड़े। क्यों भाई? एक प्रकार के बंधन से छूट के दूसरे में फँसना है? घर में बैठे हो तो ये मजबूरी है कि करो, और आचार्य जी के साथ हैं तो ये मजबूरी है कि न करो। तो आचार्य जी और घर में अंतर क्या हुआ?

तुम जाग्रत रहो। इसे बोधस्थल कहते हैं हम। तुम बोधवंत रहो, उसके बाद कुछ करो तो बहुत अच्छा, कुछ न करो तो वो भी बहुत अच्छा। जो ही करोगे, वही अच्छा। ठीक है? तो परिणाम की पहले से चिंता मत करो कि मुक्ति मिल गयी तो इस तरह कि झंझटें आ जाएँगी। मुक्ति कोई झंझट है? मुक्ति है झंझटों से मुक्ति। तो मुक्ति अपने आप में नया झंझट थोड़े ही बनेगी। पर मुक्ति से बचने के लिए माया कि ये अच्छी तरकीब है कि मुक्ति को ही झंझट के रूप में दर्शा दो। दिखा दो कि अगर मुक्ति आई तो उसके साथ ये सब आ जाएगा।

“देखो अगर तुम गए ओर तुमने शास्त्र वगैरह पढ़ लिए तो नंगे पाँव घूमने पड़ेगा।” अच्छा? “देखो ब्रह्मचर्य का मतलब होता है कि कभी फिर किसी स्त्री के नज़दीक मत जाना।” हैं? ये कौन सा ब्रह्म है जो बीच में से ही बाँट देता है? हमने तो सुना था पूरे होने को ब्रह्म कहते हैं। लिंग के आधार पर भेदभाव कर रहा है ये ब्रह्म। दिल्ली मेट्रो है कि अलग कम्पार्टमेंट बना देगा। पर लोगों को बड़ा खौफ रहता है, “देखिये हमको तो मज़े करने का शौंक है, हम तो ज़िन्दगी जीना चाहते हैं इसीलिए हम ज़रा ये आध्यात्म वगैरह से दूर रहते हैं।” अच्छा! क्या बात कही है आपने। तो आध्यात्मिकता का मतलब है मुर्दा हो जाना, और जीना है तो अनाध्यात्मिक होना पड़ेगा?

बहुत आते हैं, “देखिये भाईसाहब हम तो सीधे सादे आदमी हैं, ये सब श्लोक, टीका, टिपण्णी, दोहा वगैरह हमें समझ में नहीं आता।” अच्छा। तो सीधा वो है मतलब जिसको ये सीधे सीधे वक्तव्य समझ में न आते हों। दुनिया की हर चालाकी तुम्हें समझ में आती है, हर तरीके की साजिश में तुम शरीक हो। हर फर्जी चाल, टेढ़ी चाल चलनी तुम्हें आती है ओर जब उपनिषद् पढने का समय आता है तब तुम कहते हो, “नहीं नहीं, ये हमें समझ में नहीं आ रहा ये क्या कह रहे हैं।” तुम्हेंं समझ में नहीं आता? वाकई? तुम्हें दफतर की राजनीती समझ में आ जाती है, तुमको कबीर का सहज दोहा समझ में नहीं आता। पर, हमने खूब छवियाँ तय कर रखी होती हैं ना पहले से ही।

श्रोता 2: हम एक छवि बनाते हैं और उसे जांचते हैं।

आचार्य जी: अभी पिछले कुछ हफ़्तों में एक दो बार मैं यहाँ टी-शर्ट पहन के आ गया सेशन लेने, दो चार लोगों ने पूछ लिया “कोई नया शास्त्र है?” “कुछ बात बदलेगी क्या?” अरे कौन सी गीता में लिखा है कि टी-शर्ट पाप है? बताओ मुझे? कहाँ लिखा है? पर गीता से बचने के लिए ये अच्छा बहाना है “मुझे तो टी-शर्ट पसंद है ओर कृष्ण पहनते नहीं थे” तो अगर टी-शर्ट बचानी है तो गीता से बच के रहो। बहुत आते हैं “देखिये हम तो आज के ज़माने के लोग हैं, ये सब पुरानी बातें कभी उपयोगी रही होंगी, हमें तो समय के साथ कदम मिला के चलना है।” अच्छा, तुमने पहले ही तय कर लिया कि यहाँ जो कुछ लिखा है वो काल सापेक्ष है, वो कभी प्रासंगिक था?



सत्र देखें: आचार्य प्रशान्त: मुक्ति और लापरवाही

आचार्य प्रशान्त – Acharya Prashant


आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

  • अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  •   आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

  •    जागृति माह

   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का            हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

  •  आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट:  https://goo.gl/fS0zHf                            

 

Advertisements

2 टिप्पणियाँ

  1. “रमण का अर्थ होता है आनंदमग्न होना – रमे हुए हैं, जहाँ हैं वहीँ रमे हुए हैं, पाँव चले तो भी रमे हुए हैं, पाँव नहीं चल रहे तो भी रमण है। हम रमण को भ्रमण समझ लेते हैं। भ्रमण ही है भ्रम।”

    आचार्य जी, आपसे मिलने कि इच्छा हो रही है, किस प्रकार आपसे मिलना हो सकता है?

    Like

    • यह सन्देश आपतक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
      ___

      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
      ~~~~~
      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      ~~~~~
      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
      ~~~~~
      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
      ~~~~~
      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
      ~~~~~
      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
      ~~~~~~
      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
      ~~~~~
      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
      ~~~~~
      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
      ~~~~~~
      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
      ~~~~~~
      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
      ~~~~~~
      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
      __

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

      Like

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

w

Connecting to %s