मूर्तिपूजा और विधियों का महत्व; भक्ति व ज्ञान में अंतर

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प्रश्नकर्ता: मुझे मूर्ति, ध्यान – इनमें आस्था है, क्या यह मुझे ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करेगा?

आचार्य प्रशांत: जब तक तुम अपने आप को देह समझते हो, जब तक अहम् , रूप से जुड़ा हुआ है, अभिज्ञात है, तब तक परम भी तुमको मूर्त रूप में ही दिखाई देगा। निराकार की उपासना उन्हीं के लिए उचित है, जो इस स्थिति पर पहुँच गए हैं कि वो अपने आप को निराकार समझने लगें। तुम अपने आप को तो देह समझते हो। दुनिया में तुम्हें रूप, रंग, देह, आकार, दृश्य, इनके अलावा कुछ दिखाई नहीं देता तो तुम परम की उपासना करोगे कैसे? क्योंकि तुमने तो सिर्फ रूप, रंग, आकार, दृश्य, ही जाना है।  हाँ, जब मन थोड़ा और, और समीप आये स्रोत के, तब तुम्हें ये हक़ मिलता है कि अब तुम निराकार, निर्गुण, को पूजो। उससे पहले तो मजबूरी है, मूर्तिपूजा करनी ही पड़ेगी। और मूर्ति की पूजा भी इसीलिए कि जाति है ताकि एक दिन मूर्ति से आगे बढ़ के अमूर्त को देख सको।

वेद कहते हैं कि उसकी कोई प्रतिमा नहीं हो सकती। तो ये मत समझना कि मूर्तिपूजा किसी धर्म में विशेष रूप से अनुकरणीय है। ऐसा कुछ नहीं है। वेदांत का जिसने क, ख, ग, भी पढ़ा है, वो अच्छे से जानता है कि वहाँ मूर्ति जैसी कोई चीज़ नहीं होती – इस्लाम में नहीं होती, सिक्खों में नहीं होती, वेदांत में भी नहीं होती। लेकिन जब हम ये कहते हैं, तो हमें इसके साथ साथ मन के तथ्य को भूलना नहीं चाहिए। जब मुझे इन्द्रियों के तल पर ही जीना है, जब अभी मैं इन्द्रियों से उठने की स्थिति में ही नहीं हूँ, तो फिर मुझे इन्द्रियों से ही रास्ता बनाना पड़ेगा।

संसार में रूप, रंग, ध्वनि, इन्द्रियगत जितना कुछ हो सकता है, मुझे तो वही वही आकर्षित करता है, वही वही दिखाई देता है। तो फिर मुझे उसी से गुज़र कर के आगे बढ़ना पड़ेगा। इस कारण मूर्तिपूजा की विधि बनाई गयी। वो एक तरीका है, एक औज़ार  है। अंत नहीं है, याद रखना अंत तो वही है कि तुम निर्गुण में पैठ जाओ। शून्य में समा जाओ। मूर्ति पूजा तो सिर्फ एक ज़रिया बनाया गया है कि एक दिन तुम इस मूर्ति के आगे भी निकल जाओगे ।

प्रश्नकर्ता: ज्ञान और भक्ति में क्या अंतर है?

आचार्य प्रशांत: ज्ञान और भक्ति, दोनों ही अहंकार के काम हैं। समझना इस बात को।  ज्ञान और भक्ति दोनों अहंकार के काम हैं। भक्ति कहती है “पाना है और उससे गले मिल जाना है।” ज्ञान कहता है, “जानना है और जान जान के, जो कुछ नकली है, उसको हटा देना है। मात्र सत्य शेष रहे।” तो जानने वाला शेष है।

ज्ञान और भक्ति दोनों मार्ग हैं। किसके मार्ग हैं? उन मार्गों पर कौन चल रहा है? अहंकार। ठीक है, उस अहंकार की दिशा ठीक है कि वो मार्ग उसे ले जाएगा स्वभाव तक, शून्यता तक। पर वो मार्ग है अहंकार का ही। जो जंगल है, वो अहंकार का ही जंगल है। जिसमें से वो रास्ता जा रहा है। तो इसलिए, जहाँ पर वो रास्ता ख़त्म होता है, वहाँ पर न ज्ञानी रहता है ना भक्त रहता है। भक्त अगर भक्त ही रह गया, तो समझ लो पूरा अहंकार बचा रह गया। क्योंकि भक्त होने का मतलब ही है अहंकार। मैंने भक्ति की। ठीक है, ये सद्बुद्धि का अहंकार है। लेकिन आप जंगल में जा रहे हैं, सही रास्ते पर जा रहे हैं, रास्ता सही हो सकता है, लेकिन सही रास्ते पर चलते हुए भी आप हैं तो जंगल में ही ना?

आप सही रास्ते पर जा रहे हैं, इस रास्ते पर चलते रहें तो जंगल से बाहर निकल जाएँगे। पर जब तक आप उस रास्ते पर चल रहे हैं, तो आप कहाँ हैं? जंगल में ही तो हैं ना? और जो चलता ही रह गया, कि मैं तो भक्त हूँ, तो वो कहाँ रह जाएगा जीवन भर?

 श्रोतागण: जंगल में।

वक्ता: वो जंगल में ही रह जाएगा। यही हालत ज्ञानी की है। उसको संसार को देखना है, मन को देखना है, जो नकली है उसका निषेध करना है। और वो जीवन भर यही करता रह गया कि कहाँ-कहाँ नकली है, वो ढूंढ के लाओ, चुन चुन के मारूँगा। तो फिर तो कोई बात नहीं बनी।

ज्ञानी को नेति नेति से मुक्त होना पड़ेगा, अपने ज्ञान से मुक्त होना पड़ेगा। ज्ञानी को ज्ञानी से मुक्त होना पड़ेगा। और भक्त को अपने आराध्य के प्रेम से मुक्त होना पड़ेगा, अंततः। भक्त को भक्ति से मुक्त होना पड़ेगा, भक्त को भक्त से मुक्त होना पड़ेगा।

बड़ा मज़ेदार खेल है। रास्ते से मुक्ति चाहिए तो, रास्ते पर चलते जाओ। रास्ते से मुक्ति चाहिए, तो रास्ते को पकड़ लो और चलते जाओ उस पर। एक दिन तुम पाओगे कि न रास्ता बचा, न तुम बचे, न मंज़िल बची। लेकिन ये तभी संभव होगा जब तुम रास्ते को कभी? छोड़ो नहीं। न छोड़ना है रास्ते को, और न रास्ते पर ही खड़ा हो जाना है। चलते जाना है। अंततः, चलने वाला ही शेष नहीं रहेगा। न रास्ता रहेगा न मंज़िल रहेगी।

प्रशनकर्ता: बहुत से तरीके बनाए गए हैं, इन तरीकों का क्या महत्व है?

आचार्य प्रशांत: तरीके चाहिए, लेकिन बड़ी बात ये है कि कभी मत भूलना हर तरीका देखो एक किस्म की चालाकी है। हर तरीका अपने आप में एक चालाकी है। कभी मत भूलना कि उसके साथ चालाकियाँ तो चलेंगी नहीं। उसके सामने तो ज़रा बच्चे जैसे रहोगे तो काम हो जाएगा। और होशियारी दिखाओगे, तो रहो, तो वो कहता है “रहो होशियार।” अब हमने बक्शी है होशियारी तुम उसका इस्तेमाल करना चाहते हो, करो, पूरी छूट है। तुम्हारी ही दी हुई होशियारी, करो इस्तेमाल भाई। तुम्हें ख़ुशी मिल रही है।

तो उपाय चाहिए भी, और उस तक कोई उपाय पहुँचता भी नहीं। अब इन दोनों बातों को कैसे एक करें? ये बात भी ठीक है कि अहंकार को उपाय चाहिए। और दूसरी बात ये है कि हर उपाय एक प्रकार की चालाकी है। और उस तक कोई उपाय पहुँचता नहीं। इन दोनों बातों को सुलझाएँ  कैसे?

इनको ऐसे सुलझाएँ कि उसी से पूछो कि उपाय बता दे। उससे कहो, देखो हम उपाय खोजेंगे, तो तुम रूठोगे। (श्रोतागण हँसते हैं) क्योंकि हमारा उपाय तो हमारे छोटे से मन से निकलेगा। और उसमें हमारी सारी वृत्तियाँ सारी वासनायें बैठी होंगी। हमने खोजा उपाय, तो काम बनेगा नहीं। तो तुम ही बता दो उपाय। उपाय बेशक़ इस्तेमाल  करो, पर उसी से पूछो, उपाय बता दो।

इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ ये हुआ कि तुम्हारा गहरा बोध ही तुम्हें उपाय बताएगा। तुम्हारा गहरा बोध ही तो उसकी मौजूदगी है ना? वो कैसे मौजूद है तुम्हारे भीतर? बोध बन के। कैसे मौजूद है तुम्हारे भीतर? प्रेम बन के। तो बेशक़ उपाय का इस्तेमाल करो, पर ऐसा उपाय जो तुम्हारे गहनतम बोध से निकला हो। जो तुम्हारे गहनतम समर्पण से निकला हो। ऐसा उपाय जो प्रेम में पगा हुआ हो। मात्र वही उपाय अच्छा होता है। शिव सूत्र कहते हैं, गुरु – उपाय, गुरु है ही वही जो उपाय करना जाने। लेकिन गुरु है ही वही जो अपने शिष्यों को उपाय दे गहरे बोध से। गुरु है ही वही, जो बड़ा प्रेमपूर्ण हो कर के उपाय दे। जिसने तुम्हें जो विधि दी, वो उसके प्रेम से आ रही है। किताबों में लिखी हुई विधियाँ काम नहीं आएँगी तुम्हारे। वो तो खोजी कभी किसी ने कि ऐसे कर लो और वैसे कर लो। तुम्हारा मन, तुम्हारा मन है। अपनी तरह का अकेला। अद्वितीय। उसके लिए तो तुम्हारे जैसी ही कोई विधि चाहिए। उसके लिए, तो बड़ा आवश्यक है कि तुम पढ़ लो अपने आप को। और जब पढ़ लो अपने आप को तो समझ जाओगे कि मुझे क्या करना चाहिए।

तुम्हें क्या करना चाहिए, इसी का नाम उपाय है। उपाय, क्या है? इस क्षण में मेरे लिए क्या करणीय है। जो कुछ भी मेरे लिए अभी करणीय है, उसी का नाम उपाय है। उपाय, कोई विशेष रास्ता नहीं होता। प्रति क्षण परिस्थितियों को, तुम जो समुचित जवाब देते हो, जो समुचित प्रतिक्रिया देते हो, वही उपाय है। तुम्हारा जीवन, प्रति क्षण के कर्म, श्रद्धा से निकलें तो यही उपाय हो गया, परम को पाने का। और कोई विशेष उपाय नहीं चाहिए कि आधे घंटे के लिए ये करो, और आधे घंटे के लिए वो करो। और फलानी जगह पर चले जाओ, फलाने तीर्थ में नहा लो, कि हज कर आओ, न प्रतिदिन जो जीवन जी रहे हो, प्रतिक्षण जो विचार हैं, और जो कर्म हैं, वही तो उपाय है। तुम्हें क्या लगता है, कि तुम्हारी खबर सिर्फ उन दिनों में रखी जा रही है जिन दिनों में तुम तीर्थाटन कर रहे हो? या तुम्हारा हिसाब किताब उस सिर्फ समय देखा जा रहा है जब तुम मंदिर में या प्रार्थना में या नमाज़ में मौजूद हो?

श्रद्धा अनवरत चले, प्रार्थना निरंतर रहे, यही उपाय है। उपाय कोई विशेष विधि नहीं होती है, जीवन ही उपाय है। तुम कैसा जीवन जी रहे हो, इसी का नाम उपाय है, यही विधि है। यही साधन है, यही तकनीक है।

श्रोता: ऐसा दिखता है कि दिन ब दिन, प्रतिक्षण, गड्ढे की जो गहराई है वो बढ़ती जा रही है। तो जो उपाय की बात आयी, वो आया कि आप कुएँ से बाहर निकलो, फिर उसके बाद उपाय आएगा। अब, हर एक बढ़ते क्षण के साथ, गहराई बढती जा रही है जिसमें मैं फंसा हुआ हूँ, और मैं अपने आप को फंसा रहा हूँ। सिर्फ फंसा नहीं हुआ हूँ। क्या, मतलब मैं बिलकुल शुरुआत की बात कर रहा हूँ, क्या उससे उपाय निकल जाएँगे?

वक्ता: बिल्कुल। उसके अलावा और कोई तरीका ही नहीं है। देखो, गड्ढा भी भ्रम है, मेरा फंसा होना भी भ्रम है। बाहर निकलने के लिए सर्वप्रथम ये गहरी श्रद्धा होनी चाहिए कि बाहर निकलना सम्भव है, कि किसी बड़ी ताक़त ने साज़िश ही नहीं कर दी है मुझे फंसाने की, कि कोई तय कर के नहीं बैठा है कि मुझे इसमें फंसे रहना है। बाहर निकलने के लिए, सबसे पहले तुम्हें ये पता होना चाहिए, कि बाहर निकलना, मुक्ति में जीना, तुम्हारा स्वभाव है। जैसे ही तुम्हें ये पता लगेगा, तुम में ताक़त आ जाएगी कुएँ से बाहर निकलने की।

कुएँ में तुम फंसे ही क्यों हो? कुएँ में तुम इसी कारण फंसे हो क्योंकि तुम्हारी अपने बारे में धारणाएँ गलत हैं। तुमने ये सोच रखा है कि कुएँ जैसा कुछ होता है, और मैं उसमें फंस सकता हूँ। न कोई कुआँ है, न फंसने का कोई सवाल है। हम कुओं में नहीं, हम अपनी ही धारणाओं में फंसे हुए हैं। मैं कह रहा हूँ, सबसे पहले अपनी इस धारणा को देखो, और गहरी श्रद्धा के साथ इस धारणा को तोड़ दो। क्योंकि फंसे रहना तुम्हारा स्वभाव नहीं। तुम्हें तो मुक्त आकाश में उड़ना है। उड़ना छोड़ो, तुम पूरे पूरे मुक्त आकाश ही हो। कौन सा कुआँ तुम्हें रोक सकता है? कब फांस लिया किसी ने आकाश को?

सबसे पहले ये विश्वास मन से हटाना पड़ेगा, ये रोग मन से हटाना पड़ेगा, कि मैं फंसा हुआ हूँ। तुम फंस सकते ही नहीं। फंसना ही भ्रम है। जैसे ही तुमने ये जाना, कि मेरी ये स्थिति जिसमें मैं फंसा हुआ अनुभव करता हूँ, और जिसमें मुझे ये लगता है कि दिन-ब-दिन स्थिति बदतर ही होते जा रही है, जैसे ही तुमने ये जाना कि न, ज़रूर कुछ गड़बड़ है, ये जो पूरा मैंने विचार बना रखा है, ये जो मैंने पूरा इस स्थिति का आंकलन कर रखा है, जो मेरा पूरा अध्ययन है इस स्थिति की – “कि मेरी अभी स्थिति क्या है?” ये रीडिंग गड़बड़ है। बात वो है ही नहीं जो मैं सोच रहा हूँ। जैसे ही तुम्हारे दिमाग में उठी ये बात, त्यों ही तुममें ताक़त आ जाएगी, सब गड़बड़ को, ऐसे ठुकरा देने की, कि हटो, तुम नकली हो।

श्रोता: तो एक बात ये आ रही है कि जब भ्रम, भ्रम दिखेगा, उसके लिए ज़रूरी है कि जो और गहराई, और गहराई बढ़ रही है, उसमें ठहराव आये।

वक्ता: वो इस अर्थ में भ्रम है, सिर्फ इस अर्थ में भ्रम है कि मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ, और कोई ला कर के, पतले से धागे से मुझे बाँध दे। और मैं यूँ बैठा हुआ हूँ, और मैं चारों तरफ कह रहा हूँ कि मुझे कोई सहायता कर सकता है, मुझे कोई बचा सकता है? मेरा स्वभाव है मुक्ति, ज्यों ही मुझे ये याद आएगा, मैं पाउँगा कि पूरी ताक़त है मेरे अंदर, कि बस मुझे इतना करना है और सारे धागे टूट जाएँगे। तो वो जो कुआँ है, वो वास्तविक तभी तक है, जब तक तुम अपने स्वभाव को भूले हुए हो, और अपने बारे में गलत धारणाएँ बनाये हो। या मैं यूँ कहूँ कि तुम्हारा अहम् किसी फ़ालतू धारणा के साथ जुड़ा हुआ है। देखना कि कुओं में मेंढक ही फंसते हैं। और मेंढक तुम हो नहीं। देखना कि निश्चित रूप से, अहम् ने अपने आप को किसी मेंढक के साथ जोड़ रखा है। कहीं न कहीं, मन में ये भ्रान्ति बैठा दी गयी है, कि तुममें मेंढक जैसा कुछ है। जैसे ही ध्यान में आओगे, अपने रूप को देखोगे, या जैसे ही किसी ऐसे के संपर्क में आओगे जो मेंढक नहीं है, जिसको देखने से ही याद आ जाता है कि ये तो मेंढक नहीं है, खुले आसमान का पंछी है, वैसे ही तुम्हें भी याद आ जाएगा कि मैं भी मेंढक कहाँ हूँ? वो उड़ रहा है, अरे याद आया, वैसे उड़ना तो मेरा भी स्वभाव है। उसके पंख तुम्हें अपनी परवाज़ की याद दिला देंगे। और यही काम होता है, सतसंग का।

समझ में आ रही है बात? मेंढक तो कभी कुएँ से निकल नहीं सकता। तो मेंढक को क्या उपाय बताया जाए? यहाँ पर तो उपाय यही है कि तू मेंढक?

श्रोतागण: नहीं हो।

वक्ता: हो ही नहीं, तो उपाय क्या बताया जाए? बस याद करो, और नकली को ठुकरा दो।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: मूर्तिपूजा और विधियों का महत्व; भक्ति व ज्ञान में अंतर

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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