ध्यान की विधियों से भी पहले आता है ध्यान

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्नकर्ता : आचार्य जी,  जैसे सत्य तक पहुँचने की बात हो रही थी, आपने कहा था कि सत्य उपलब्ध ही है ओर ओशो बोलते हैं, कभी गोरख जी को पढ़ते हैं तो उनका ये कहना है कि आप एक विशेष  प्रक्रिया से गुजरोगे तब आप सत्य तक पहुँच पाओगे, ध्यान करना पड़ेगा, बिना ध्यान के आपका विवेक जागृत नहीं होगा, आप सत्य तक नहीं पहुँच पाओगे, और एक तरफ से आप बोलते हैं कि “है ही”, अष्टावक्र भी बोलते हैं कि “है ही सत्य”। ये दोनों बातें बहुत अलग लगती हैं।

आचार्य प्रशांत: अलग अलग नही हैं। वो जो कह रहे हैं कि करना पड़ेगा, वो तुम कर ही रहे हो। वो कहते हैं, उदाहरण के लिए कि, जब तक अहंकार पक नहीं जाता, जब तक अहंकार एक प्रौढ़ता तक नहीं पहुँच जाता, तब तक अहंकार गिरता नहीं है। ठीक।

तो लोग आए  मेरे पास कि देखिये ओशो ने तो ये कहा है कि अहंकार का सघन होना ज़रूरी है। जब अहंकार सघन होता है, मणिभ होता है, उसी के बाद अहंकार विगलित होता है। मैंने कहा बिलकुल ठीक कहा है, तो बोले आप फिर क्यों बोले कि अभी हो सकता है? मैंने कहा क्योंकि तुम्हारा अभी सघन हो चूका है। यहाँ कौन है दुनिया में जिसका अभी सघन नहीं है? यहाँ कौन है दुनिया में जिसका अहंकार अभी ही चरम पर नहीं पहुँचा है?

वो कहते हैं, “The Ego must reach the climax (अहंकार को अपने चर्मोत्कर्ष तक पहुँचना चाहिये).” मैं कह रहा हूँ, “The Ego is always at the climax, only the ego is at its climax (अहंकार हमेशा अपने चर्मोत्कर्ष पर होता है, केवल अहंकार ही चर्मोत्कर्ष पर होता है। Nothing else ever reaches a climax (अहंकार हमेशा अपने चर्मोत्कर्ष पर होता है, केवल अहंकार ही चर्मोत्कर्ष पर होता है। कोई भी और चीज चर्मोत्कर्ष पर नहीं पहुँचती )।” तो वो जो कहते हैं कि करना पड़ेगा, मैं तुमसे कह रहा हूँ “वो तो हो ही रहा है”। वो कहते हैं, “ध्यान नहीं तो सत्य नहीं”। मैं तुमसे आज यही तो कह रहा था कि ध्यान के क्षण तो तुम्हे उपलब्ध होते ही हैं, तुम उन्हें तोड़ देते हो। तुम उन्हें इज्ज़त नहीं देते।

जब मैं तुमसे कह रहा हूँ कि होगा कोई जिसकी संगत में तुम्हारे मन से चिंताएँ उतर जाती होंगी, भविष्य उतर जाता होगा, और बोझ उतर जाता होगा, क्या इसी को ध्यान नहीं कहते? मन का ठहर जाना, मन से चिंताओं का और विचारों का हट जाना, क्या यही ध्यान नहीं है? तो ध्यान तो तुम्हें सहज रूप में रोज़ ही घटित होता है, पर तुम उस ध्यान को लगने नहीं देते। तुम उस ध्यान की बेईज्ज़ती करके उसे भगा देते हो। वो कह रहे हैं, “ध्यान करो”, मैं तुमसे कह रहा हूँ “ध्यान तो रोज़ ही लगाते हो।” कौन है जो बिना ध्यान के जी लेगा? वो कह रहे हैं साधना करो, मैं कह रहा हूँ, “साधना तो चल ही रही है” वो कहते हैं अहंकार को पकने दो, मैं कह रहा हूँ “अहंकार तो पका ही हुआ है”। कोई विरोधभास  नहीं है।

श्रोता १: ध्यान कि टेक्निक्स का क्या रूल है सर?

आचार्य जी: कोई भी तकनीक तुम तभी आज़मा पाओगे न, जब स्वयं ध्यान में हो। तुम गाड़ी कब चला पाते हो? बिना ध्यान के गाड़ी चला लोगे?

श्रोता १: जी नही।

आचार्य जी: तो गाड़ी चलाने के लिए पहले क्या चाहिए?

श्रोता १: ध्यान।

आचार्य जी:  तुम अच्छा खाना कब पका पाओगे? जब पहले क्या हो?

श्रोता १: ध्यान में।

 आचार्य जी: ध्यान में रह कर तुम रसोई में उतरे तो खाना कैसा बनेगा?

श्रोता: अच्छा।

आचार्य जी: स्वादिष्ट बनेगा। ठीक। तुम एक अच्छा लेख कब लिख पाते हो? जब पहले क्या है?

श्रोता: ध्यान।

आचार्य जी:  तुम किसी से प्रगाढ़ता से कब मिल पाते हो? जब पहले क्या है?

श्रोता: ध्यान।

 आचार्य जी: तुम खेल भी कब अच्छा पाते हो, जब पहले क्या है?

श्रोता: ध्यान।

आचार्य जी: कुछ भी अच्छा तब होता है जब उससे पहले क्या है?

श्रोता: ध्यान।

आचार्य जी: तो ध्यान भी अच्छा कब होगा, जब उससे पहले क्या हो?

श्रोता: ध्यान। लेकिन, आचार्य जी यहाँ पर विधि की बात हो रही है।

आचार्य जी: ध्यान की विधि भी तो ध्यान में ही तो जान पाओगे, ओर ध्यान में ही तो आज़मा पाओगे। ध्यान समस्त विधियों से पूर्ववर्ती है। ध्यान पहले आता है, ध्यान की विधियाँ बाद में। पर तुम्हारी धारणा ये है कि मैं ध्यान की विधियाँ आजमाऊंँगा तो ध्यान फलित हो जाएगा। तुम सोचते हो ध्यान, ध्यान कि विधियों का अंजाम है, फल है, परिणाम है। तुम ये नहीं देखते हो कि कुछ भी करने से पहले चाहिए होता है ध्यान। ध्यान फल नहीं है, ध्यान जड़ है। ध्यान मूल है। मुझे ध्यान की विधियों से कोई विशेष आपत्ति नहीं है। तुम ध्यान में होओ, उसके बाद तुम्हे जितनी विधियाँ आज़मानी हैं आज़माओ। फिर तो तुम स्वयं ही जान जाओगे कि कौन सी विधियाँ उपयोगी हैं। पर अगर तुम ही ध्यानस्त नहीं तो तुम ये भी तो बता दो कि तुम विधि चुनोगे कैसे? जवाब तो दो? तुम यदि ध्यान में नहीं हो, तो तुम अपने लिए एक शर्ट भी चुन सकते हो सही?

श्रोता 2: नहीं।

आचार्य जी: अब ध्यान की तो हज़ारों विधियाँ हैं, बिना ध्यान में हुए तुम अपने लिए शर्ट नही चुन सकते, बिना ध्यान में हुए तुम अपने लिए ध्यान की विधि कैसे चुन लोगे? फिर तो तुम यही करोगे, किसी ने बता दिया “बेटा ये करो”, तुम करे जा रहे हो। और उसने जो बताया वो हो सकता है कि एक ख़ास स्थिति के लिए उचित भी हो। पर जीवन में तो स्थितियाँ लगातार बदल रही हैं, इसीलिए जीवन में ध्यान की विधियाँ भी लगातार बदलती रहनी चाहिए। क्या वो बताने वाला गुरु प्रति क्षण तुम्हारे साथ रह कर के तुम्हे नयी नयी विधियाँ इजाद करके देता रहेगा? क्या जीवन की प्रत्येक स्थिति में तुम कोई ध्यान की किताब देख कर के विधि चुनोगे? “भीड़ भरे बाज़ार में हूँ, ओर सामने कपड़े की दुकान है, पीछे चाट का ठेला, अभी कौन सी विधि लगेगी?”

ध्यान कि विधियाँ अनंत हैं, जैसे जीवन में स्थितियाँ अनंत हैं। और हर स्थिति में कौन सी विधि सार्थक होगी, ये तुमको ध्यान में ही पता चलेगा, इसीलिए ध्यान आधार है, ये हमार सौभाग्य है कि ध्यान जो आधार है वो हमें खोजना नहीं पड़ता, वो हमें उपलब्ध है। मैं सिर्फ ये निवेदन कर रहा हूँ कि जो ध्यान तुम्हें उपलब्ध ही है, तुम उसका अनादर मत करो।  ध्यान तुम्हें उपलब्ध है, ध्यान के क्षणों को इज्ज़त दो, उनसे भागो मत, डरो मत।

श्रोता 2: आचार्य जी, लेकिन ओशो बोलते हैं कि “जब तुम ध्यान करोगे, तो विवेक जागृत होगा”।

आचार्य जी: और विवेक अगर जागृत नहीं है तो तुम ध्यान क्यों करोगे, तुम पतंग क्यों नहीं उड़ाओगे? बिना विवेक के जागृत हुए तुम ध्यान की तरफ जाओगे ही क्यों? जिसका विवेक नहीं जागृत है, विवेक का अर्थ है, नित्य ओर अनित्य में भेद कर पाने कि क्षमता। सही निर्णय ले पाने की क्षमता। ध्यान सही निर्णय है न, सदा? जिसका विवेक पहले ही जागृत नहीं है, वो ध्यान का निर्णय लेगा ही क्यों? वो ध्यान के अतिरिक्त बाकी सारे निर्णय ले लेगा। ध्यान पहला है, और ध्यान और विवेक एक हैं। विवेक से ध्यान नहीं आ जाएगा। ध्यान है तो विवेक है। ध्यान है तो पूरा जहाँ  है।

श्रोता 3: विधि, आचार्य जी, एक अवस्था होती है जहाँ ध्यान सही ढंग से लगे?

आचार्य जी: यहाँ पर बैठना ध्यान की एक विधि है। तुम यहाँ, क्या बेध्यानी में आ गए?

श्रोता: जी नहीं।

आचार्य जी: तो ध्यान पहले था ना? बस उस ध्यान के सामने हाथ जोड़ के खड़े हो जाना है कि “तू जो भी है, हे अज्ञात, जैसे तू मुझे इस भवन में ले आया, वैसे ही मुझे तू जीवन भर संचालित करते रहना। यहाँ तुम आए हो ये ध्यान का ही तो फल है, बिना ध्यान के तुम यहाँ कैसे आ जाते?

श्रोता 3: ध्यान के साथ साथ ओर भी चीज़ें शामिल  हैं।

आचार्य जी: जैसे कि?

श्रोता 3: विचार।

आचार्य जी: तुम्हे कोई भी विचार यहाँ नहीं ला पाएगा। मन से निकाल दें कि आप विचार कर कर के यहाँ आपाएँगे। दो तरह के विचार नहीं होते। ये न सोचें कि एक विचार होता है जो यहाँ आने से रोकता है और दूसरा यहाँ ले कर के आता है। हर विचार आपको यहाँ आने से रोकेगा ही। कोई सीधे-सीधे रोकेगा, कोई ज़रा छुपे-छुपे रोकेगा। यहाँ तो आपको ध्यान ही लाता है, यहाँ तो आपको ईश्वर कि अनुकम्पा ही लाती है। आप यहाँ आए हो, ये प्रमाण है इस बात का कि ध्यान आप में पूर्व अवस्थित है, कि ध्यान आपकी सहज अवस्था है जिसमे आप सदा से विद्यमान हो। अपने आप उठ के नहीं आ गए हो यहाँ पर। यहाँ तुम ध्यान के पैरों चल के आए हो। देखो, अपमान किया ना ध्यान का, लाया तुम्हे यहाँ ध्यान है ओर तुमने कहा “नहीं, और भी कई बातें थी।” इसी को मैं कहता हूँ कि हम बड़ा तिरस्कार करते हैं।

श्रोता 3: आचार्य जी, बस ये कहना चाहते हैं कि मैंने जो बात कही इसमें हमारे मन में तमाम विचार, तमाम कूड़ा करकट जैसे जम जाते हैं। जो विधि की बात ओशो ने कहा जैसे गत्यात्मक ध्यान, कि इन कूड़ा कर्कटों को एक तरफ फेंकने।

आचार्य जी: मैं तुमसे फिर कह रहा हूँ तुम ओशो की तरफ क्यों जाओगे?

श्रोता 3: क्योंकि हमें दिख रहा है कि कूड़ा करकट है।

आचार्य जी: ये भी ध्यान है।

श्रोता 3: ये ध्यान है?

आचार्य जी: हाँ। बिना ध्यान के कैसे देख लोगे? बिना पूर्ववर्ती ध्यान के तुम गुरु की तरफ जा कैसे सकते हो? गुरु ही तो तुम्हारे भीतर से गुरु की ओर ले आता है। वही तो ध्यान है।

श्रोता 3: फिर भी हमारा ध्यान कूड़ा करकट में उलझ जा रहा है।

आचार्य जी: जो तुम देख रहे हो कि जब तक उलझ रहे हो, तब तक ध्यान में हो, और जिस क्षण तुमने कहा कि ये देखना दो कौड़ी का है, हम इसे कोई कीमत नहीं देते। उस क्षण देखना बंद और उलझना शुरू। जब तक उलझाव को देख रहे हो, तब तक तुम उलझाव से पृथक हो, उलझे नहीं। जैसे ही तुमने कहा कि ये देखना वेखना बहुत हुआ, देखने में क्या रखा है? रस तो उलझने में है, उस क्षण देखना बंद।

मैं तुमसे बार बार कह रहा हूँ, जीवन में जो भी कीमती है वो हासिल करने की बात नहीं है। बस उसको महत्त्व और इज्ज़त देना सीखो। वो तुमको मिला हुआ है। बिना मांगे मिला हुआ है। प्रेम की कोई विधि नहीं हो सकती। सम्मान की कोई विधि नहीं हो सकती। सत्य की कोई विधि नही हो सकती। ध्यान की भी कोई विधि नहीं हो सकती। ध्यान की विधि लगा कर, जानते हो तुम क्या बोलते हो? मैं इतना होशियार हूँ कि मैं विधि की रस्सी से ध्यान को खींच लाऊँगा। विधि माने तरीका, जरिया। मैं इतना होशियार हूँ कि मैं जरिया लगाऊँगा और ध्यान को खींच लाऊँगा। अहंकार देख रहे हो कितना घना है इस बात में कि मैं तरीका लगाऊँगा, तरीका माने चतुराई। ध्यान तुम्हे चतुराई से नहीं मिलता, ध्यान तुम्हें सहज होके, निर्मल होके, झुक के मिलता है। उसमे विधियाँ लगाओगे, चालाकियाँ करोगे तो करते रहो।

श्रोता 4: सर, जो ध्यान अभी जिसकी बात हुई, उसको मैं महसूस भी करता हूँ, बहुत अच्छे क्षण  होते हैं जीवन में। ये ध्यान क्या हमारे पूरे जीवन को संचालित कर सकता है? कभी-कभी लगता है कि लक्ष्य हम बनाएँ, और उनकी तरह कुछ हो, और जिसको हम पेंशन भी बोलते हैं, उसी से सम्बंधित प्रश्न है, ध्यान की स्थिति में कभी कभी क्या हमें आगे का रास्ता दिखने लग जाता है जिससे हम कुछ कार्यवाही ले सकते हैं लाइफ में, या फिर हमें खुद ही बेतरतीब लक्ष्य चुनने पड़ते है कि अब ये ठीक है, अब वो ठीक है।

आचार्य जी: ध्यान सब कुछ कर सकता है। और ध्यान कि स्थिति में दो नहीं रह जाते। तुम ये नहीं कहोगे कि ध्यान का केंद्र एक बात बोल रहा है और मैं खुद कुछ और करना चाहता हूँ, मेरे दूसरे लक्ष्य हैं। ध्यान का मतलब ही ये होता है कि योग हुआ। तुम उतावले न हो योगभ्रष्ट होने को, तो योग हुआ। अब एक ही बात निकलेगी, एक संयुक्त स्वर फूटेगा, अब दो बातें नहीं रहेंगी कि ध्यान वाला केंद्र कुछ बता रहा है ओर अहंकार वाला केंद्र कुछ और बता रहा है। दो बातें नहीं रहेंगी। अन्यथा तो हमेशा दो बातें रहती हैं जैसे रावण के दस सर। ध्यान में ही ऐसा होता है कि भीतर से सिर्फ एक पुकार उठती है, अन्यथा तो बहुत शोर मची रहती है, चीख  पुकार, कोई कुछ बोल रहा है भीतर से, कोई कुछ और बोल रहा है। दाएँ चले तो आवाज़ आई, अब बायें चलो। ध्यान का मतलब होता है अब भीतर मौन है ओर उस मौन की ही एकमात्र आवाज़ है – निर्विकल्पता,  दो नहीं।

श्रोता 4: आचार्य जी, मैं राम हूँ या रावण हूँ?

आचार्य जी: राम की भी इच्छाएँ होती हैं, रावण की भी इच्छाएँ होती हैं। राम की राम जैसी, रावण की रावण जैसी। तुम सीता भी हो सकती हो।

श्रोता 4: आचार्य जी, लेकिन असीमित हैं वो तो।

श्रोता 4: ये निर्भर करता है कि…

आचार्य जी: राम की ही असीमित होती हैं। रावण की तो बड़ी सीमित होती हैं। जैसे उसके छोटे छोटे सर, वैसी ही उसकी छोटी छोटी इच्छाएँ। कभी चाहा होगा कि मंदोदरी मिल जाए, फिर सीता मिल जाए। राम अकेले हैं कि जिनकी इच्छा असीम है क्योंकि राम असीम हैं। आध्यात्मिक व्यक्ति की बड़ी प्रबल इच्छाएँ होती हैं। वो पूरे से नीचे में मानता नहीं। रावण की तो छोटी छोटी। “अभी ज़रा सेल लगी है, वो वाली साड़ी, 3 मंज़िला का 4 मंज़िला कर लेते हैं।” लंका में दो-चार द्वीप ओर जोड़ लें क्या? ये जितनी राक्षस्नियाँ हैं, इनका पेडिक्योर, मेनिक्योर करा दो। तो रावण की तो इस तरीके की होती हैं।

श्रोता 4: आचार्य जी, जैसे दिखाया था रामायण में, उसमे राम की इच्छा कुछ भी नही थी। वो बहुत सरल इंसान थे।

आचार्य जी: ये लो। वो बिना इच्छा के ही अयोध्या से वहाँ लंका पहुँच गये? यही तो कहा था चौदह साल बाहर रहना, ये थोड़े ही कहा था विश्व भ्रमण करके आना।

श्रोता 4: नही आचार्य जी, जैसा उनको बोला गया वैसा ही किया।

आचार्य जी: कहाँ किया? उनको बोला गया था कि वहाँ जाओ, द्वीप में घुस जाओ? उनको बोला गया था क्या कि रीछ ओर भालू ओर बन्दर, ये पकड़ पकड़ के सेना बनाना? राम वही है जो बहुत ऊँचा कर जाए। अयोध्या जानती हो न कहाँ है? सरयू नदी। और वो जानती हो कहाँ है लंका? पैदल पैदल टहल रहे थे। चौदह साल बहुत कम पड़ते हैं। इतना नहीं आसान है। लोग यहाँ पर छोटा मोटा कुछ कर देते हैं तुम बोलते हो उद्यमी हो गए, वहांँदेखो दो निकले हुए हैं, इतनी बड़ी सेना बना दी ओर इतनी बड़ी पूरी सल्तनत फतह कर ली। और सेना भी किसकी थी?

श्रोता: बंदरों की।

आचार्य जी: और दस सर वाले को हरा दिया। तो, “राम की इच्छा नहीं होती”, ये तुमसे किसने कह दिया? ये बात ऐसा होने या वैसा होने की नहीं है। मैं तुमसे फिर कह रहा हूँ। ये बात दिल की है। दिल तुम्हारा राम का है या रावन का है? हो सकता है राम भी एक कदम चले पूर्व की ओर और रावण भी एक कदम चले पूर्व की ओर। दूर से देखोगी तो लगेगा कि एक ही काम तो कर रहे हैं। दोनों की एक सी इच्छा है और एक सा कर्म है। पर फिर भी बहुत अंतर होगा, क्योंकि राम, राम के केंद्र से संचालित हो रहे हैं। और रावण, रावण के केंद्र से। तो ये मत पूछा करो कि क्या कर रही हूँ? ये देखा करो, कहाँ से कर रही हूँ? क्या हो कर कर रही हूँ? किस केंद्र से कर रही हूँ? मैं हूँ कौन जो कर रही है?

श्रोता 4: आचार्य जी, एक सत्र जो हुआ था, उसमे राम और कृष्ण की बात की गई थी। आपने कहा था कि “राम मर्यादा पुरुष हैं ओर मर्यादातीत  कृष्ण हैं।” तो इसे हम अपनी ज़िन्दगी में कैसे देख सकते हैं?

आचार्य जी: राम या कृष्ण आए थे तुम्हारी ज़िन्दगी से अपनी ज़िन्दगी जोड़ने? राम, कृष्ण वही है जिन्हें अपना पता है, वो नहीं देखने जाते कि किसी और की बात सुनें या देखें उसने क्या किया, उससे जोड़ें। स्वयं से बचने का उपाय है कि किसी को आदर्श बना लो। राम किसी से पूछ के गए थे सीता को ढूँढने? पूछा था पिताजी से? यदि जीवित हों तो बताएँ? वो हैं ही नहीं। राम-कृष्ण बाहर नहीं हैं, अन्दर हैं तुम्हारे। जब तुम इधर-उधर की झंझटों को कीमत देना छोड़ देती हो, तब तुम्हारे भीतर से जो बोले वही राम है, वही कृष्ण है। तो उन्हें आदर्श बनाने की कोई ज़रुरत नहीं है।

आदर्श तो सब बाहर होते हैं और आदर्शों को तो तुम अपने अनुसार नचा सकती हो, चुन सकती हो। जब मन करे दूसरों की सुनने का, दूसरों से प्रभावित हो जाने का, तो कह दो राम भी तो धोबी से न हुए थे प्रभावित। धोबी की सुनी  होती है। धोबी माने समाज, समाज जब कहे कि गड़बड़ है तो बीवी को घर से निकाल दो। लो, बन गये राम आदर्श। जब एक साथ पांच छह लड़कियाँ छेड़नी हो तो कृष्ण बन जाओ। बन गए कृष्ण आदर्श। तो आदर्शों को तो तुम अपने अनुसार नचा लोगी। मज़ेदार बात तो तब है जब कृष्ण ओर राम तुम्हारे भीतर बैठ कर तुम्हें नचाएँ। तुम उनकी ताल पर नाचो, उन्हें अपने अनुसार नचाने की चेष्टा मत करो।

श्रोता 5: आचार्य जी, एक दो बार आपने बोला कि आकर्षण के नियम के बारे में कोई बात नहीं करनी चाहिए, ये बिलकुल बेकार है। एक बार पूछना चाहूँगा कि आप उसके विपरीत क्यों हैं।

आचार्य जी: मैं जानता ही नहीं वो क्या है। क्या है वो? मैं क्यों पढूं उसको? भई नियम हो तो जाने ना, है ही नहीं।

श्रोता 5: तो  इसमें “इसके बारे में बात करो” भी तो एक नियम है?

आचार्य जी: वो नियम है “मूर्खता का नियम” उसकी बात कहिये तो करें।

श्रोता 6: आचार्य जी, आपने कहा था कि सत्य इतना बढ़िया है, जैसे पृथ्वी के केंद्र के जैसे या जैसे आसमान ने कैसे। बहुत सरल है लेकिन वो तो मुझे बहुत कठिन लगता है।

आचार्य जी: देखो, न सरल है, न कठिन है। मैं बार बार तुमसे कह रहा हूँ मौजूद है। मौजूद है, है तुम्हारे जीवन में। इसीलिए तो आज एक नहीं चार सूत्र दिए। ओर अभी तीन चार ओर देने के लिए तैयार था, फिर टोका टाकी कर दी कि नहीं इतने ही बहुत हैं। मौजूद है, कठिन तब जब कठिनता से पाना पड़े। आसान तब जब आसानी से पाना हो। न कठिनता से पाना है, न आसानी से पाना है, मैं बार-बार कह रहा हूँ कि मिला हुआ है, कि मिला हुआ है, मौजूद है।

श्रोता 6: दिखता नहीं।

आचार्य जी: दिखता भी है। तुम उसे कीमत नहीं देते।

श्रोता 4: जैसे उन्होंने बोला कि और भी विचार होते हैं। इसी तरह वो आते तो हैं ही, हम उसको देखते ही नहीं हैं।

श्रोता 7: सर विचारों के बारे में एक बात करनी है, मैंने आपके वीडियोज़ देखे, उसमे था कि विचार हमारे तो हैं नहीं, हमारा शरीर नहीं है, तो हमारा असल क्या है?

आत्म निरिक्षण के बारे में हमें कुछ बताया था, विचार से पृथक कैसे अपने आप को महसूस करें?

आचार्य जी: तुम विचार से पृथक हो। तुम पहले ये समझाओ कि तुम उससे जोड़ते कैसे हो अपने आप को?

श्रोता 7: क्योंकि उसमें फिर महसूस हो जाता है। हम अभिज्ञात अपने आप हो जाता है।

आचार्य जी: कैसे कर लेते हो?

श्रोता 7: कोई भी अवस्था हो, उसमें अगर कुछ भी ऐसा होता है जो हमारे अनुसार नहीं है तो हमें ऐसा लगता है।

 आचार्य जी: तुम ये सब बता पा रहे हो ना? इसका मतलब ये सब देखा है ना?

श्रोता 7: देखा तो है।

 आचार्य जी: देखा है ना? क्या विचार स्वयं को देख सकता है?

श्रोता 7: यानी कुछ तो है जो विचार को देख रहा है।

आचार्य जी: ज़ाहिर सी बात है।

श्रोता 7: अगर फिर हमेशा वहीँ रहे तो कोई समस्या ही नहीं है जीवन में?

 आचार्य जी: शाबाश।

वो आता है, बार बार आएगा, अब जब आए तो?

श्रोता: स्वागत करना।

आचार्य जी: स्वागत करना। आदत तुम्हारी यही होगी कि उसे फिर से लौटा दो, अपमान करके। अब जब भी आए तो उसे इज्ज़त देना, प्यार से बैठाना।



 सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, ओशो पर: ध्यान की विधियों से भी पहले आता है ध्यान

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यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
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जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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११. बोध-पुस्तक
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2 टिप्पणियाँ

  1. “बिना पूर्ववर्ती ध्यान के तुम गुरु की तरफ जा कैसे सकते हो? गुरु ही तो तुम्हारे भीतर से गुरु की ओर ले आता है। वही तो ध्यान है।”
    ये बातें कोई कबीर ही कर सकता है| धन्य हुआ|

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    • यह सन्देश आपतक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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