आदमी तो बीच का है, जो सीमाओं के भ्रम में जीता है।

तुमसे कहा जाए, “जाओ, सत्य को खोज कर ले आओ। ये चारों तरफ तुम्हें पेड़-पौधे, जंगल अभी दिख रहे हैं, ये पानी है, और हवा है, इसमें जाओ सत्य को खोज कर ले आओ।” तो तुम कर लो खूब खुदाई, तुम छान लो पानी को, तुम्हें नहीं मिलेगा। और तुम वापस आ जाओगे। इतना सूक्ष्म है इतना विरल है, सब कुछ देख लिया, खोद लिया, छान लिया, खोज लिया, नहीं पाया, और फिर आ करके बैठोगे, और अपने चारों ओर देखो, तब कहोगे, “उसके अलावा और है क्या?”

सूक्ष्म इतना, कि पकड़ में न आए, और वृहद इतना कि उसके बाहर कुछ नहीं। ठीक वही बात यहाँ पर कह रहे हैं जीसस कि एक छोटे से छोटे बीज की तरह है, जो समस्त बीजों में सबसे छोटा हो। पर वो ऐसा है कि जब उसे बो दिया, तो उससे जो वृक्ष पैदा होता है, उससे बड़ा कोई वृक्ष नहीं और उस वृक्ष में आ कर के, अस्तित्व पूरा शरण लेता है। जीसस तो इतना ही कह रहे हैं कि आकाश के पक्षी आ कर के उसमें  घोसला बनाते हैं, आकाश के पक्षी ही नहीं, ज़मीन के पशु भी, और मनुष्य भी, सब उसमे शरण पाते हैं। छोटे से छोटा है, और बड़े से बड़ा है। और ये वो दोनों अतियाँ हैं जिन्हें हम पकड़ नहीं सकते।

एक सीमा से कुछ छोटा हो जाए, किसी और आयाम में पहुँच जाए, हम उसे नहीं पाएँगे। और कुछ ऐसा हो जाए, जो बिल्कुल ही असीम है, तो भी हम उसे नहीं पाएँगे।

आदमी की मजबूरी ये है कि देख पाने के लिए, अस्ति कह पाने के लिए, उसे सीमाएँ चाहिए। जिसकी सीमा नहीं, आदमी को उसका संज्ञान भी नहीं मिल सकता। जो सूक्ष्मतम हो गया, वो भी असीम हो जाता है, क्योंकि उसकी अब कोई सीमा नहीं बची, बिंदु की कोई सीमा नहीं होती, और जो वृहदतम हो गया, वो भी असीम हो गया, क्योंकि अनंत की कोई सीमा नहीं होती। आदमी दोनों को ही नहीं जान सकता। आदमी तो बीच का है, जो सीमाओं के भ्रम में जीता है।



लेख पढ़ें: वह छोटे से छोटा है, और बड़े से बड़ा

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