तुम्हें खेलने के लिए भेजा गया है।

तुम्हारे हर आँसू, तुम्हारी हर मजबूरी की वजह यही है कि तुमने अपनी ज़रूरतें फैला ली हैं। जो तुम्हें चाहिए नहीं वो भी तुम्हें इकठ्ठा करना है। और जब तुम्हें इतना सब कुछ इकठ्ठा करना है, तो वो तो तुम्हारी तथाकथित तरक्की से ही आएगा, और तुम्हें भिखारी बना कर के ही आएगा। भीख मांगोगे, कि अभी इतना और इकठ्ठा करना है। कह गये हैं ना कबीर, “जिन्हें कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह” “चाह गयी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह, जिनको कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह” कुछ न चाहिए से आशय यही है कि जो तुम्हें चाहिए ही है, वो मिला हुआ है और मिलता ही रहेगा।

धरती के बच्चे हो, धरती दे देगी तुम्हें, हवा दे देगी तुम्हें, पेड़ दे देंगे तुम्हें, नदी दे देगी तुम्हें। जब इन्होने तुम्हें जन्म और जीवन दे दिया, तो क्या तुम्हे पोषण नहीं दे देंगे? क्या जन्म और जीवन तुम्हारी अपनी तरक्की से आया? क्या तरक्की कर करके तुम पैदा हुए? जब अस्तित्व तुम्हें जन्म दे सकता है तो अस्तित्व तुम्हारा पोषण भी करेगा। तुम्हें यकीन क्यों नहीं आता? इतने श्रद्धाहीन क्यों हो?

पर नहीं, तुम्हें लगता है कि धोखे से जन्म हो गया है, और किसी बड़ी अजीब और दुश्मन दुनिया में आगया हूँ। और यहाँ मुझे किसी प्रकार बस अपनी रक्षा करनी है। पूरा वातावरण मेरा विरोधी है, मेरा शत्रु है, मुझे मारने पर उतारू है, मुझे अपने आप को बचाना है, नहीं ऐसा नहीं है। तुम इस वातावरण के विरोध में नहीं पैदा हुए हो, तुम इस वातावरण में ही पैदा हुए हो। अगर ये धरती, अगर ये अस्तित्व तुम्हारा विरोधी होता तो तुम पैदा कैसे हो जाते? तुम सांस कैसे ले पाते? सब कुछ इकठ्ठा है, ये पूरा आयोजन हुआ है, ताकि तुम हो सको, तुम हो इस पूरे कि वजह से, ये तुम्हारा दोस्त है, इसपर भरोसा करो।

तुम क्यों डरते हो? तुम क्यों इकठ्ठा करते हो? तुम क्यों परवाह करते हो कल क्या होगा? जैसे तुम्हारा आज आया है, वैसे ही कल भी आ जाएगा। इंतज़ाम हो जाएगा। तुम्हें बचा के रखने की कोई ज़रुरत नहीं है। तुम्हें कल की परवाह करने की कोई ज़रुरत नहीं है। समझ है ना? बोध है ना? काफी है। वो असली है, उससे सब हो जाएगा। और वो तुम्हें मुफ्त मिला है तोहफे की तरह। तुम्हें क्या अर्जित करना है? तुम्हें क्या कमाना है? तुम्हें कौन सी तरक्की करनी है? तुम्हें तो सबसे बड़ा उपहार मिला है, बोध का उपहार, जानने का उपहार। तुम्हें वास्तव में करने को कुछ है नहीं। तुम्हें खेलने के लिए भेजा गया है। अगर कोई ईश्वर है और इंसान को बनाते समय उसने कुछ भी इंसान से बोला है, तो मैं समझता हूँ, बस दो शब्द बोले हैं, “जाओ खेलो।” इसके अतिरिक्त ईश्वर ने तुमसे कुछ बोला नहीं।

ये दुनिया तुम्हारे खेलने का मैदान है, खेलो। और तुमने दुनिया को युद्ध का मैदान बना लिया। जिस जगह पर खेलना था, वहाँ पर तुमने हिंसा और रक्तपात कर दिया। जहाँ तुम्हें प्रेम के गीत गाने थे, वहाँ तुम युद्ध की दुदुम्भी बजाते हो। क्योंकि तुमने तरक्की करनी है, क्योंकि तुम डरे हुए हो। खेलो।

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