परम जाग्रति का नाम है श्रद्धा

देखो, दो तरह के जागने होते हैं। एक तो जागना ये होता है कि आँखें बंद थी, सोये पड़े थे, जग गये, वो जागना भी महत्वपूर्ण है। उस जागने में क्या हुआ? उस जागने में मन अपनी एक हालत से दूसरी हालत में चला गया। सो रहा था, जाग्रति में आ गया, उसकी कीमत है, बिलकुल है। एक दूसरा जागना भी होता है, जिसमें वो सब कुछ जो तुम साधारण जागने में करते हो, तुम उसे करना छोड़ ही देते हो। ऐसा नहीं कि वो कर पाने कि तुममें काबीलियत नहीं रही।

सोता हुआ आदमी, उदाहरण के लिए ज्ञान नहीं पा सकता, सोता हुआ आदमी उदाहरण के लिए तर्क नहीं कर सकता। तुम्हें नींद से उठना पड़ेगा तभी तुमसे कोई तर्क किया जा सकता है, तभी तुम्हें कोई ज्ञान दिया जा सकता है। तो नींद से उठना ज़रूरी है ताकि तुम्हें ज्ञान मिले, ताकि तुम्हें तर्क मिले, अपने होने का एहसास मिले, नींद में अपने होने एहसास बड़ा क्षीण पड़ जाता है। तो ज्ञान, तर्क, अस्मिता, इनके लिए नींद से उठाना ज़रूरी है। और फिर होता है एक ज़बरदस्त रूप से उठ बैठना, जिसमे ज्ञान, तर्क, अस्मिता, रहते हुए भी तुम उनका उपयोग नहीं करना चाहते। वो दूसरी जाग्रति है, वो परम जाग्रति है, उस परम जाग्रति का नाम है श्रद्धा।

एक आदमी बिस्तर पर सोया पड़ा है। उसमें तो कुछ है ही नहीं, वो मन की ऐसा अवस्था में है जहाँ पर मन अपने ही दायरों में चक्कर काट रहा है। सोते हुए आदमी के लिए बस भूत होता है, वर्तमान जैसा कुछ होता नहीं। मन का एक दायरा है, मन उसी में चक्कर काट रहा है। फिर हुई जाग्रति, जाग्रति में तुम्हें साधन उपलब्ध होते हैं, इन साधनों का नाम है विचार, वितर्क, ज्ञान, इन साधनों का उपयोग करना है परम जाग्रति के लिए, असली जाग्रति के लिए। और असली जाग्रति जब होती है तब ये साधन छोड़ दिए जाते हैं।

ज्ञान की अपने आप में कोई कीमत नहीं है, ज्ञान सिर्फ तुम्हें जाग्रति से परम जाग्रति में ले जाने का साधन है। ज्ञान इसीलिए है ताकि ज्ञान का उपयोग करके ज्ञान को छोड़ सको। अस्मिता इसीलिए है ताकि मैं, मैं को पहचाने और मैं की व्यर्थता को जान कर के मैं का त्याग कर दे। साधारण जाग्रति से ज्यादा बड़ी जाग्रति है श्रद्धा। श्रद्धा अँधा होने का नाम नहीं है, कि कोई कहे अन्धविश्वास है श्रद्धा। श्रद्धा में तो तुम्हारी आँखें पूरी तरह खुल जाती हैं। शरीर की आँखें जब खुलें तब साधारण जाग्रति, और मन कि आँखें जब खुल जाएँ तो परमजाग्रती, उसका नाम है श्रद्धा।



पूर्ण लेख पढ़ें: श्रद्धा है बुद्धि के आगे की बेवकूफ़ी

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