संदेह अपवाद, श्रद्धा स्वभाव

एक चिड़िया थी, आदमी ने उसका नाम रख दिया ‘डोडो’, प्रगारंतर में डोडो शब्द ही मूर्खता का पर्याय बन गया। वो चिड़िया विलुप्त हो गयी आज से कई सौ साल पहले। कैसे विलुप्त हो गयी? इतनी सहज विश्वासी थी कोई बुलाता था, उसके पास चली जाती थी। लोगों ने उसका माँस खूब खाया। आदमी ने उसे ख़त्म कर दिया, जब डोडो ख़त्म हो गयी, तभी आदमी ने कहा, “अब से डोडो शब्द का अर्थ होगा, मूर्ख।”

मूर्ख कौन है? वो चिड़िया या हम? ठीक है, उसके साथ इतना ही हुआ कि वो मारी गई, लेकिन जब तक जिंदा रही, नरक में नहीं जी। हम लगातार संदेहपन की आग में जलते हैं, नरक में झुलसते हैं, मूर्ख कौन है? डोडो या हम?

आज डोडो नहीं है, अब लौट के कभी नहीं आएगी, लेकिन जब तक थी, मस्त थी। आपने बड़ी तरक्की की है, आपका चिकित्सा विज्ञान खूब बढ़ गया है, आप एक सौ बीस साल जियेंगे, और आप जितना जियेंगे, उतनी लम्बी आपकी सजा होगी। किसी शायर का है कि “फलक पे जितने सितारे हों वो भी शर्माएँ, देने वाले मुझे इतनी ज़िन्दगी दे दे, गम उठाने के लिए मैं तो जिये जाऊँगा”।

आप जिए जाते हैं गम उठाने के लिए। वो जब तक जी, मौज में जी, फिर नहीं है, क्या हो गया?

क्या छिन जाएगा तुम्हारा अगर सीधे, सरल, सहज हो जाओगे तो? हद से हद इतना ही होगा ना कि जैसे डोडो मारी गई, तुम भी मारे जाओगे? मर लेना, कुछ बिगड़ नहीं गया उस मौत में। ऐसी ज़िन्दगी जो नफरत में, और शक में, और बेचैनी में लगातार, झुलस ही रही हो, ऐसी ज़िन्दगी से तो बेहतर है कि श्रद्धा में जियो, और जब समय आए, घड़ी आ ही जाए, तो उठ जाओ।

आज तुम प्रकृति के मालिक से बने बैठे हो, जिस पेड़ को चाहते हो काट देते हो, जिस जंगल को चाहते हो साफ़ कर देते हो, जिस प्रजाति के पीछे पड़ जाते हो, विलुप्त हो जाती है। पर तुम्हें क्या लगता है, वो दुःखी हैं इतना सब होने के बाद भी? दुःखी तुम हो। उनके जाने के बाद भी दुःख झेलने के लिए बचा कौन रहेगा? कौन बचा रहेगा? तुम।

इसीलिए सौ बार कहता हूँ, जिनको मार रहे हो, उनको छोड़ो, वो गये, वो जब तक जिए मौज में जिए, अब गये। तुम अपनी फ़िक्र करो। तुम किसी हालत में पेड़ को दुःखी नहीं कर पाओगे। जब तक जियेगा, अपने स्वभाव में जियेगा, उसके बाद तुम काट डालो। लेकिन एक बार पेड़ चले गए, तो तुम्हारा क्या होगा? ये सोचो। और ये तो छोड़ ही दो कि एक बार वो चले गए, जिस क्षण तुम उसे काट रहे हो, उस वक़्त तुम्हारे मन की क्या दशा है कभी गौर करो।

नुक्सान होता है, सह लो, लेकिन सहजता में जियो, सीधे रहो। कोई बड़ी बात नहीं हो गई है थोड़ा बहुत पैसा छिन गया, रुपया छिन गया, कोई दोस्त धोखेबाज़ निकला, किसी ने विश्वास तोड़ दिया, कोई बड़ी बात नहीं हो गई, पर तुम्हारा मन गन्दा हो गया तो बहुत बड़ी बात हो गई। बहुत, बहुत बड़ी बात हो गई, सब छिन गया, तुम्हारा विश्वास हज़ार बार टूटे, कोई बड़ी घटना नहीं हो गई, लेकिन अगर तुम्हारे मन में संदेह के कीड़े आ गए तो तुमने बड़ा नुक्सान कर लिया अपना। कुछ हो जाए, संदेह न करना। सहजता में जियो। मैं बुद्धि का दमन करने को नहीं कह रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ कि जानो कि तुम्हारा स्वभाव संदेह नहीं श्रद्धा है। संदेह अपवाद, श्रद्धा स्वभाव।



पूर्ण लेख पढ़ें: पूरी क़ायनात में सिर्फ़ आदमी ही बेघर है

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