मौन ईश्वर स्वरूप है

SR_Generic_Hindiआचार्य प्रशांत: क्या मतलब है इस बात का कि ‘मौन, ईश्वर स्वरुप है?’

श्रोता: जहाँ तक समझ आ रहा है, ये जो कोलाहल है, ख़ासकर ये शब्द, शब्द मन में बहुत धारणाएँ, और विचार उत्पन्न करते हैं। एक शब्द बहुत सारे आवेग ले कर आती है मन में।

श्रोता: मौन मतलब ध्यान।

आचार्य जी : कौन ध्यान लगाएगा?

“मौन ब्रह्म स्वरुप है” – समझने के लिए, पहले मौन को देखेंगे। शब्द भर का अभाव मौन नहीं है। शब्द मौजूद नहीं हैं तो मौन हो गया। शब्द कानों में पड़ता है। मात्र एक इंद्रीय की बात नहीं है।

मौन का अर्थ है, मन की हलचल का रुक जाना।

मन की हलचल ही है, जो दुनिया के होने का एहसास कराती है। मन जब किसी हलचल में नहीं होता, जब आप बहुत गहरी नींद में सो रहे होते हैं, तब तो दुनिया नहीं रहती। और जब वो दुनिया रहती है, वो दुनिया जिसका एहसास इन्द्रियों से और मन से होता है, जब वो दुनिया रहती है, तब उस समय वो दुनिया ही आखिरी सत्य लगती है। सपने में, सपना आखिरी सत्य लगता है, जगते समय संसार आखिरी सत्य लगता है। मन, चला नहीं कि सपने और संसार, सत्य बन कर खड़े हो जाते हैं। मन, चला नहीं कि सपने और संसार ही सत्य बन कर खड़े हो जाते हैं। मौन है मन का न चलना ताकि सपनों से और संसार, दोनों से मुक्ति मिल जाए। जब सपने और संसार सत्य का छद्म रूप ले कर के सामने नहीं खड़े होते, तब मात्र सत्य होता है।

मैंने कहा, “तब मात्र सत्य होता है।” मैंने ये नहीं कहा कि, तब ‘आपके’ सामने सत्य होता है। ‘आपके’ सामने तो सदा जो होगा, वो या तो सपने होंगे या संसार होगा।

समझना ज़रूरी है। शब्द मन को भरता नहीं है, शब्द मन की सामग्री नहीं है। दृश्य मन की सामग्री नहीं है, स्पर्श मन की सामग्री नहीं है। शब्द, दृश्य, स्पर्श, घ्राण – ये सब मन ही हैं। इनके अलावा मन का कोई अस्तित्व नहीं है। जहाँ न ध्वनि है, न दृश्य है, न गंध है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, वहाँ मन भी कहाँ है? वस्तुतः जिसे हम शांत मन कहते हैं, वो मन का न होना है। तो जब न सपने होंगे, न संसार होगा, तब मन भी नहीं होगा, तब मात्र सत्य होगा, ‘एक सत्य’। सत्य को देखने वाले आप भी नहीं होंगे। तब एक सत्य बचता है, ब्रह्म। इसी कारण कहा गया है कि मौन ही ब्रह्म है।

श्रोता: जब मन नहीं, तब मौन है।

आचार्य जी: मौन सदैव है। ये न कहिये कि जब मन नहीं तब मौन है। जब मन है तब मन के लिए बस मन है। मौन तो सदा है ही। वो मन को उपलब्ध नहीं, या मन को उसकी प्रतीति नहीं, तो वो चला नहीं गया। ऐसे समझिये कि आप मेरे शब्द को भी इसीलिए सुन पा रहे हैं, क्योंकि उसके पीछे मौन है। तो मन की दुनिया का आधार भी मौन ही है। मौन कहीं चला नहीं जाता मन के होने से। बस, मन इतना मूढ़ होता है कि वो सोचता है, शब्द भर है, मौन कहाँ है? वो ये भूल जाता है कि शब्द सुनाई कैसे देगा, यदि शब्द के पीछे मौन न हो। इसको आप मन की मूढ़ता भी कह सकते हैं, और मजबूरी भी कह सकते हैं। उसका सारा ढांचा, मात्र हलचल को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। जहाँ हलचल नहीं है, वहाँ मन को लगता है कुछ है ही नहीं। मौन हलचल नहीं है, तो मन मौन को पकड़ नहीं पाता, जब कि मन की सभी हलचलों का आधार भी मौन ही है।

ये कभी मत सोचियेगा, कि दो अलग-अलग हिस्से हैं अस्तित्व के – मन और सत्य। और जब मन की हलचल रुकती है, तब सत्य शुरू होता है, और जहाँ संसार है, वहाँ सत्य नहीं है। ऐसा बिलकुल नहीं है।

संसार का स्रोत, संसार की बुनियाद भी सत्य ही है। और, जगा हुआ, शांत मन, मौन मन, वही है जो देखे भले ही संसार को,  पर दिखाई उसे सत्य ही दे। जो सुने शब्द को, पर सुनाई उसे मौन ही दे – सो है जगा हुआ मन। आत्मा के छोर से देखें तो आप कहेंगे कि ये जगा हुआ मन है। दुनिया के छोर से देखें, तो आप कहेंगे, “ये मिटा हुआ मन है।” मिटा हुआ मन बोलो, चाहे जगा हुआ मन बोलो, बात एक ही है। मिटा हुआ मन ही जगा हुआ मन है। तुम मिट मिट कर ही जगते हो। जो मिटने को तैयार नहीं, वो कभी जग नहीं पायेगा। समझ में आ रही है बात?

सत्य की ओर से देखो, तो जागृति है। सत्य में विलय, मन जा मिला स्रोत से। और दुनिया की और से देखो तो मौत है, ख़त्म हो गया बेचारा, कुछ नहीं है। दुनिया की नज़र में जो मिट जाना है, ख़त्म हो जाना है, वो यदि सत्य पर स्थापित हो कर देखो, तो जी उठना है, परम जागृति है। अंतर, दृष्टि का है। अंतर इसका है कि कहाँ से देख रहे हो, कौन देख रहा है। दुनिया की नज़र से देखोगे तो मौन का अर्थ है निष्क्रियता, न होना, हस्ती का ही विलुप्त हो जाना। केंद्र पर बैठ कर के देखोगे तो मौन है गहन आनंद, प्रेम की अनुभूति, गहरे से गहरा जुड़ाव।

मूढ़ मन, विक्षिप्त मन, मात्र इन्द्रियगत अनुभूतियों को पकड़ता है, मौन को पहचानता ही नहीं। किसी के प्रेम में हो, और पाओ कि जताना बहुत पड़ता है, कह कह के, बोल बोल के, मौन समझ में ही नहीं आता तो समझ लेना कि विक्षिप्तता है, और उस प्रेम की कोई कीमत नहीं।

किसी भी संवाद में शब्द से ज़्यादा महत्व मौन का है। शब्द वही भला है जो मौन में ले जाए। और तुम शब्द को अपने को मौन में ले जाने की अनुमति ही तब दोगे, जब तुम भीतर के मौन से जुड़े हुए होगे। मौन ही मौन को सुनता है।

जब मन, मन से मिलता है, जब शब्द से शब्द का संबंध बनता है। तो वो वैसा ही होता है जैसा संसार, कि पत्ते पर ओस की बूँद। कोई महत्व नहीं, कोई स्थायित्व नहीं, कोई नित्यता नहीं। जब मौन, मौन को सुनता है, तब बनी बात। तब तुम्हें लगेगा, कोई खिंचाव नहीं है, कोशिश नहीं करनी पड़ रही बात करने के लिये। तब ऐसा लग रहा है कि बात करनी क्या है? जैसे कोई खुद को खुद का हाल बताना चाहता हो। शब्दों की क्या ज़रुरत है? कोई दूसरा है ही नहीं, जिससे बात करनी है। ये है, एकत्य, गहरा जुड़ाव।

‘मौन, ब्रह्म है’, इसका अर्थ फिर से कह रहा हूँ ये मत लगा लेना कि शब्द ब्रह्म नहीं हैं। ‘मौन, सत्य है’ इसका अर्थ ये मत लगा लेना कि संसार सत्य नहीं। इसका अर्थ इतना ही है कि सुनो मौन में रह कर, और सुनो मौन को ही। देखो संसार को सत्य में रहकर, और फिर दिखे सत्य ही।

एक गीत है, पता नहीं किसने लिखा है। वैसे तो किसी फिल्म का है, “चुप तुम रहो, चुप हम रहें। खामोशी को, खामोशी से, बात करने दो”। लिखने वाले ने जो भी सोच कर लिखा, पर शब्द बहुत दूर तक जाते हैं, “खामोशी को खामोशी से बात करने दो।” और वो आपस में बात क्या कर रहे हैं? खामोश।

बात तो तब करी जाती है, जब अनजानापन हो। बात करना ही इस बात का सबूत है कि दूरी है, अनजाने हैं। बात करने को परिचय का प्रमाण मत मान लीजियेगा कि जानते हैं एक दूसरे को इसलिए बात कर रहे हैं। आम तौर पर हम ये समझते हैं कि बातचीत हम उनसे करते हैं, जो हमारे परिचित होते हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ, कि बातचीत अपरिचय का प्रमाण है। आप जिसको जान ही जाएँगे, आप जिससे मिल ही जाएँगे, आप पाएँगे “क्या कहना, क्या सुनना?”

कबीर कहते हैं, “जब तक मन में प्रेम नहीं है, तब तक मात्र वाद विवाद है, और जब प्रेम आता है, मात्र तब संवाद शुरू होता है।” जब प्रेम नहीं, तब विवाद, जब प्रेम तब संवाद। और याद रखियेगा, ये मौन संवाद है। ये आपके पूरेपन का, आपके प्रेमी के पूरेपन से मिलन है। पूर्ण, पूर्ण से मिल रहा है। उपनिषद् कहते हैं, “पूर्ण को पूर्ण से निकाल दो तो पूर्ण शेष रहता है, और जब पूर्ण पूर्ण से मिलता है, तो भी पूर्ण ही शेष आता है।” उपनिषद् इतना कह के रुक जाते हैं, कि पूर्ण से पूर्ण उद्भूत हुआ, और पूर्ण ही बचा। ये उद्भव की प्रक्रिया है, जिसके बारे में बात कर रहे हैं। कि कैसे एक अनेक में प्रस्फुटित होता है।

जो उलटी प्रक्रिया है, वो भी ठीक ऐसी ही है कि पूर्ण से पूर्ण निकलता  भी है, तो पूर्ण में पूर्ण समाहित भी हो सकता है। ये जो पहली प्रक्रिया है, ये जन्म की है – पूर्ण से पूर्ण का निकलना। ये सृष्टि की प्रक्रिया है। जो दूसरी प्रक्रिया है, वो प्रेम की प्रक्रिया है, और मृत्यु की प्रक्रिया है। पूर्ण का पूर्ण में वापस मिल जाना। उसी का नाम प्रेम है, और उसी का नाम मृत्यु भी है। प्रेम और मृत्यु एक हैं। संतों ने इसीलिए जब कहा है कि प्रेम के घर में तो सर कटा कर ही प्रवेश करते हैं, तो वो बात दूर तक जाती है। क्योंकि प्रेम और मौत एक है।

श्रोता: आचार्य जी, वो संसार की तरफ से मौत है।

आचार्य जी: हाँ, बढ़िया, बढ़िया। बिलकुल बढ़िया। संसार की तरफ से मौत है। कोई संसारी देखेगा तो कहेगा, “अरे, कुछ बचा नहीं।”

शरीर की मृत्यु, छोटी मृत्यु है। प्रेम, महा मृत्यु है। वो आखिरी मौत है। हम तो छोटी-मोटी मौत जानते हैं। छोटी-मोटी मौत में, पूर्ण मरा भी नहीं होता। प्रेम, आखिरी मृत्यु है, महा मौन है।

श्रोता: आचार्य जी, मौन रहना, और शांत रहना दो अलग चीज़ें हैं?

आचार्य जी: न, एक हैं, बिलकुल एक हैं। शब्द-हीनता ही मौन नहीं है। यद्यपि, जो मौन से, अपने आंतरिक सत्य से सम्प्रति हो जाता है, उसको शब्दों से कोई जुड़ाव नहीं रह जाता। लेकिन शब्द हीनता ही मौन नहीं है। मौन है, कि शब्द रहें या ना रहें, मैं मौन हूँ। जब होंठ नहीं चल रहे हैं, तब तो दुनिया भर को दिख ही रहा है, कि मैं मौन हूँ। जब मेरे होंठ चल भी रहे हैं, तब दुनिया को लग रहा है, कि मैं बोल रहा हूँ। पर मैं जानता हूँ कि मैं तब भी मौन हूँ। तुम सब को लग रहा है, कि कुछ कह रहा हूँ, कि होंठ चल रहे हैं। पर मैं जानता हूँ, कि कुछ कह नहीं रहा। मौन हूँ। रमण, इसीलिए मौन में दीक्षा देते थे। इससे बड़ा गुरु मन्त्र क्या हो सकता है? गुरु जब दीक्षित करता है, तो कुछ कह देता है, कुछ मन्त्र दे देता है। रमण, मौन देते थे।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: मौन ईश्वर स्वरूप है

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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११. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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  1. “किसी भी संवाद में शब्द से ज़्यादा महत्व मौन का है। शब्द वही भला है जो मौन में ले जाए। और तुम शब्द को अपने को मौन में ले जाने की अनुमति ही तब दोगे, जब तुम भीतर के मौन से जुड़े हुए होगे। मौन ही मौन को सुनता है।

    आचार्य जी, आपको अध्ने के बाद जो शांति मिलती है, वो कहीं और नहीं मिलती।

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
      ~~~~~~
      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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