आनंद है प्रसन्नता के तनाव से मुक्त हो जाना।

मक्खी को गुड़ में प्रसन्नता है, हत्यारे को हत्या में प्रसन्नता है, शराबी को शराब में प्रसन्नता है, कामी को काम में प्रसन्नता है, लोभी को दाम में प्रसन्नता है। और आनंद है प्रसन्नता के तनाव से मुक्त हो जाना।

प्रसन्नता हमेशा एक ख़ाहिश है, एक मांग है, “मुझे प्रसन्न होना है।” आनंद है, इस मांग से ही मुक्त हो जाना कि मुझे प्रसन्न होना है। आनंद है, बिलकुल निरभार हो जाना। कुछ चाहिए नहीं, स्वयं को दिलासा देने के लिए, कुछ चाहिए नहीं, स्वयं को पूरा करने के लिए। कुछ चाहिए नहीं, अपने से जोड़ने के लिए। जो ही स्थिति है, उसी में हम साबुत हैं, सलामत हैं, पूर्ण हैं – ये आनंद है।

प्रसन्नता चीज़ मांगती है, घटना मांगती है, आनंद नहीं मांगता, बेशर्त होता है। और प्रसन्नता धोखा देती है, लगातार नहीं टिक सकती। और आनंद चूंकि बेशर्त होता है, इसीलिए लगातार हो सकता है। प्रसन्नता की शुरुआत भी दुःख से है, और अंत भी दुःख में। तुम अगर दुःखी नहीं हो, तो तुम खुश नहीं हो सकते। और जितना गहरा तुम्हारा दुःख है, खुश होने की तुम्हारी सम्भावना उतनी ही बढ़ गयी है।

तुम्हारा बच्चा मिल नहीं रहा दो घण्टे से, तुम्हारे दिमाग में तूफ़ान चल रहे,  तुम बौरा गए, पगला गए, दो घंटे से कोई खबर नहीं आयी। और फिर वो तुम्हें अचानक मिल जाता है, तुम्हारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहेगा। दुःख जितना गहरा, प्रसन्नता उतनी ही ऊंची। और प्रसन्नता चूंकि टिकती नहीं है, इसीलिए उसे अंततः फिर दुःख बन जाना है।

जिन्हें प्रसन्नता चाहिए हो, उनके लिए एक साधारण सा नुस्खा है, अपने आप को खूब दुःखी कर लो, थोड़ी ही देर में खुश होना ही पड़ेगा। अनिवार्यता है। कोई सतत दुखी नहीं रह सकता। दुःख को पलट कर सुख बनना ही पड़ेगा। और कोई सतत सुखी नहीं रह सकता, सुख का अंत दुःख में होगा ही।

आनंद है, सुख-दुःख के इस चक्र से मुक्ति। तुम, न अब सुख में सहारा खोज रहे हो, न दुःख के दरिया में डूबे जा रहे हो। सुख आता है, दुःख आता है, दोनों आते हैं, चले जाते हैं, तुम दोनों के प्रति निरपेक्ष हो, दोनों का स्वागत कर रहे हो। दोनों के लिए द्वार खुले हैं। उनके आने के लिए भी, उनके चले जाने के लिए भी। सुख आया, कर लिया सुख का अनुभव, दुःख आया, कर लिया दुःख का अनुभव। तुम उन्हें रोक भी नहीं रहे, कि हमें दुःखी नहीं होना, या हमें सुखी नहीं होना। और हम उन्हें बाँध भी नहीं रहे कि अब सुख आया है, तो टिका रहे। जाता है तो ठीक है, जाए।



पूर्ण लेख पढ़ें: प्रसन्नता और आनंद में क्या अंतर है? स्वभाव क्या?

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