‘संभोग से समाधि’ की बात क्या है?

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्न: आचार्य जी, ओशो की किताब है, जिससे उन्होंने शुरुआत की थी -‘सम्भोग से समाधि की ओर’। ग्यारहवीं में था जब मैंने पहली बार पढ़ी थी। तब से तीन बार पढ़ चुका हूँ, पर हर बार सोचता हूँ, कि ओशो सेक्स मुक्ति की बात करते हैं, लेकिन वो कहते हैं कि तुम सेक्स को समझ कर ही उससे मुक्त हो सकते हो। हर रोज़ हम सेक्स को समझने की कोशिश करते हैं, मन में ये धारणा होती है कि इससे मुक्त हो जाएँगे, लेकिन नहीं हो पाते। और दैनिक जीवन में कहीं न कहीं आ कर वो हमसे टकरा जाता है। तो इसके बारे में मुझे जानना है।

आचार्य प्रशांत: क्या?

प्रश्नकर्ता: कि हम क्या करें?

वक्ता: सेक्स इधर से, उधर से आ के इसलिए टकरा जाता है, क्योंकि जब उससे आप को, और आपको उससे टकराना चाहिए, तब उसके प्रति असहज हो जाते हैं हम। कि जैसे कोई पुराना हिसाब अभी बाकी हो। तो लेनदार आपसे गाहे बगाहे टकराता ही रहे।

किसी से पैसे ले रखे हैं, और लौटा रहे नहीं। अब उससे बीच-बीच में हो जाती है भिड़ंत। गए थे मंदिर, सोचा था जाएँगे पूजा अर्चना करेंगे, वहाँ मिल कौन गया? लेनदार। तो वो मंदिर भी एक तरफ, मूर्ती भी एक तरफ, फूल भी एक तरफ, देवी भी एक तरफ। अब वो लेनदार खड़ा हो गया है। ऐसा ही हमारे साथ सेक्स के सम्बन्ध में होता है। पुराना कुछ है, जो अभी चढ़ा हुआ है, जैसे ऋण चढ़ा होता है। तो वो सामने आता रहता है, आता रहता है, आता रहता है, आता ही रहेगा।

बाज़ार गए थे, प्रफ्फुलित घूम रहे थे, और अचानक एक तरफ को नज़र पड़ी, देखा वो खड़ा हुआ है। चाहा नहीं था, वो खड़ा रहे, पर अनायास खड़ा हुआ है।

ऐसा ही हमारे साथ होता है। बच्चे के साथ घूम रहे हैं, वो कुछ खा रहा है, गुब्बारे खरीद रहा है, और अचानक सेक्स आ गया। आपने इच्छा नहीं की थी। आपकी मांग नहीं थी, सेक्स आ गया। दूर कहीं से आ गया, कहीं को नज़र पड़ी, और आ गया। किसी दिशा से कोई संवेग उठा, और आ गया। और वो आया नहीं कि आप झुक गए, वो आया नहीं कि आप जान गए कि हार। क्योंकि ऋणी हैं, हिसाब बकाया है।

समझ रहे हो?

सेक्स की बात ओशो को बड़ी प्रमुखता के साथ इसीलिए करनी पड़ी, क्योंकि हम सब हैं ही सेक्स रोगी। कोई पागल हो, जिसके दिमाग में गुड़ ही गुड़ नाचता हो, तो उसे चिकित्सक कोई दवाई भी देगा तो गुड़ में मिला कर ही देगा। देखा है ना? अरे, हम ही तो वो पागल हैं। सिरप नहीं पीते क्या आप? वो और क्या है? सिरप में दवाई कितनी होती है? कितनी होती है?

श्रोता: पाँच प्रतिशत।

वक्ता: और बाकी क्या होता है? चाशनी। सिरप माने? चाशनी।

तो कोई पागल है, जो मीठा ही चाहता है, मीठा ही मीठा, मीठा ही मीठा, जैसे गुड़ की मक्खी। तो उसको अगर दवाई भी देनी है तो कैसे दी जाएगी? सिरप बना के दी जाएगी, गुड़ में मिला कर दी जाएगी। उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। हम सब यौन रोगी हैं, हमारे मन में लगातार वासना का ही, कामवासना का ही, उपद्रव मचा रहता है।

हम सब सेक्सुअली ऑब्सेस्सड  हैं। ये पूरी सभ्यता, भाषा, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, धर्म, आदमी का पूरा जीवनमंडल, सेक्स से आक्रांत है। तो इस स्थिति में कोई यदि आपकी चिकित्सा करना चाहे, तो उसे सेक्स के प्रश्न को सम्बोधित करना ही पड़ेगा। और वो उन्होंने किया।

क्या है ये सेक्स का सवाल?

थोड़ी देर पहले ही हमने ये कहा था कि हम एक तलाश हैं। हम एक प्यास हैं। हम पैदा होते ही हैं अधूरे। और लगातार इस कोशिश में रहते हैं कि कुछ मिल जाए जो आंतरिक रिक्तता को भर दे। हज़ारों हज़ार चीज़ें हैं जो हमारे भीतर की रिक्तता को भरने का वादा करती हैं।

रिक्तता घाव जैसी होती है। बड़ी टीस देती रहती है हर समय। उस टीस से ज़रा सी भी अगर मुक्ति मिल जाती है तो अच्छा लगता है। या ये कह दीजिये कि उस टीस का जो लगातार अनुभव होता रहता है, उस अनुभव में यदि कोई अंतराल आ जाता है, कोई गैप  आ जाता है, तो उस गैप  को ही हम सुकून का नाम देते हैं।

शरीर के तल पर किसी दूसरे की मौजूदगी, वासना के माध्यम से थोड़ी देर के लिए विचारों का थम जाना, ये भी हमारे लिए बहुत बड़ी बात हो जाती है कि जैसे कोई दिन भर आक्रान्त रहा हो, उसे पल दो पल का चैन मिले। कि जैसे कोई दिन भर का भूखा हो, और उसे एक निवाला मिल जाए कहीं ज़रा रात में, उसी को अपना सौभाग्य माने।

भीतर की जो आध्यात्मिक प्यास है, वही तमाम तरह की इच्छाओं के रूप में प्रदर्शित होती है। देखने में ऐसा लग सकता है कि आप किसी की देह के दीवाने हैं, वास्तव में आपको चैन चाहिए। चैन जब तक नहीं मिला हुआ है, तब तक आपकी बेचैनी आपका पीछा करेगी। आप अपने आप को दिलासा देना चाहेंगे कि सब ठीक चल रहा है। और बेचैनी वही लेनदार की तरह कभी यहाँ कभी वहाँ अपनी शक्ल दिखाएगी, आपको हैरान कर जाएगी। आप अपने भ्रम में जीना चाहेंगे, कुछ ऐसा हो जाएगा जो आपके भ्रम को चोट पहुँचाएगा, आपको बुरा लगेगा।

आपके सामने फिर दो विकल्प होते हैं। एक तो ये कि आप अंधे हो जाएँ, आप कह दें, कि मैंने देखा ही नहीं। और दूसरा ये है कि ईमानदारी से मान जाएँ कि हाँ, कुछ गड़बड़ तो है। जिसने ये मान लिया, कि कुछ गड़बड़ है, उसका मानना ही इस बात का द्योतक है कि गड़बड़ के आगे भी रास्ता है, दुनिया है, संसार है। गड़बड़ से आगे जो होता है ना, वो ही गड़बड़ को स्वीकार कर पाने की ताकत देता है। अन्यथा स्वीकार ही नहीं करेंगे, झूठ बोले जायेंगे। तो अपनी सारी बेचैनी, उलझन, इस सबसे ये जानिये, सीखिए, कि कुछ और है जो आवाज़ दे रहा है। जितना उसकी तरफ बढ़ते जाएँगे, उतना उलझनें गिरती जाएँगी, कम होती जाएँगी।

कोई सीधा रास्ता है नहीं, किसी भी झंझट से मुक्ति का, ख़ास तौर पर अगर वो झंझट आदत बन चुका हो। अगर आपकी परेशानी आपकी लत बन चुकी है, व्यसन बन गयी है, आपकी पहचान का हिस्सा बन गयी है, तब तो उससे मुक्ति और मुश्किल हो जानी है। पूछिए क्यों? क्योंकि कुछ अगर आपके लिए लत जैसा बन गया है, तो वो इतना एहसास कराएगा अपने आप को, कि आप एक और लत में पड़ेंगे। उस लत का नाम होगा, छूटने की लत। और छूटने की लत, किसी और लत का समाधान नहीं हो सकती! आप फँसे ही रह जाएँगे। छूटने की लत भी तो इतना ही करती है ना, कि दिमाग में लगातार विचार बनाए रखती है? क्या विचार? कि मुझे छूटना है, छूटना है।

पहले एक विचार चलता था, अब दूसरा विचार चलता है। विचार तो बना ही रह गया, बल्कि विचार दुगना हो गया। एक विचार आता है, “वासना, वासना, वासना।” दूसरी और से विचार की लहर आती है, “बचना, बचना, बचना।” और लहर, लहर से मिले, भले ही विपरीत दिशा से! तो इसका मतलब, ये नहीं कि एक लहर दूसरी को खा जाएगी, दबा देगी। दो लहरें जब मिलती हैं, तो अकसर उनका आवेग जुड़ भी जाता है। दूना, तिगुना भी हो जाता है।

आप को जिसकी आदत है, आप को जिस की लत लग गयी है, उससे छूटने का एक ही तरीका है, कि आप उससे आगे निकल जाएँ। उससे जितना संघर्ष करेंगे, उतना उसी के तल पर अटके रह जाएँगे, चिपके रह जाएँगे। यदि वासना परेशान करती है आपको तो ये जान लीजिये, कि वासना से युद्ध कर कर के किसी ने वासना नहीं छोड़ी। वासना उनकी छूटी, जिनके लिए वासना अप्रासंगिक हो गयी। जिनके जीवन में ऐसा कुछ आ गया कि उसके बाद उनको वासना का होश ही नहीं रहा। कि आप जाएँ उनके पास और बात करें देह के रोमांच की, और वो कहें, “कि अच्छा रुको, ये कर लेंगे बात जो तुम कर रहे हो! शायद, बड़ी आकर्षक होगी। लेकिन अभी कुछ और है, बहुत बड़ा और बहुत महत्वपूर्ण। उसकी बात करनी है! ये बात ख़त्म कर लें, फिर तुम्हारी बात पर आ जाएँगे।”

हाँ, सेक्स बड़ा उत्तेजक है, बिलकुल है! तुम्हारे लिए है, हमारे लिए भी है, आ जाएँगे उस पर। पर अभी कुछ और है, कुछ और है अभी जो खींचता है, कुछ और है अभी जो कीमती है, कुछ और है अभी जो ज़रूरी है, उसको निपटा लें। और वो इतना ज़रूरी होगा, जितना कीमती होगा, उतना ही बड़ा होगा, अनंत होगा, जो अनंत है वो कभी निपट सकता नहीं। जो छोटा है, अल्प है, क्षुद्र है, वही निपटता है। जो अनंत है वो कभी निपटेगा नहीं।

तो ये मज़ेदार बात हो गयी। आपने सेक्स को ठुकराया नहीं, आपने इतना ही कहा, “तू प्रतीक्षा कर। अभी कोई और है, ज़रा उसको पहले निपटा लूँ।” और ये जो कोई और है, ये इतना बड़ा है, इतना बड़ा है, कि कभी निपटेगा नहीं। प्रतीक्षार्थी प्रतीक्षा में ही रह जाएगा। वो द्वार के बाहर दस्तक देता रह जाएगा, आप भीतर मंदिर में हो, आप भीतर उसके साथ हो, जिसे अनंत कहते हैं।

उलझिएगा नहीं। पीछे छोड़ दीजियेगा। दोनों बातों में अंतर समझते हैं ना? उलझना नहीं है, पहलवानी नहीं करनी है। ब्रह्मचर्य साधने नहीं निकल पड़ना है। उसको पा लो जिसको पाने के लिए व्याकुल ही हो। अपने आप को झोंक दो पूरे तरीके से परमात्मा की राह में, परमात्मा के काम में। कोई उससे आज तक गुज़र नहीं पाया। ब्रह्म अनंत है, ब्रह्म के अलावा एक दूसरा भी है जो अनंत है! माया। कोई उससे गुज़र नहीं पाया, कि गुज़र जाऊँगा। हाँ, ये हो सकता है कि आप ‘गुज़र’ जाएँ।

(श्रोतागण हँसते हैं)

गुज़र तो जाएँगी, पर गुज़र नहीं पाएँगी। बहुत गुज़र गए। साहब जीवन भर ब्रह्मचर्य साधते रहे, और फिर? गुज़र गए। गुज़र गुज़र के भी गुज़र नहीं पाए। इसी को कहते हैं, पुनर्जन्म का फेर। बार बार गुज़र जाते हैं, लेकिन फिर भी गुज़र नहीं पाते। तो ये सब छोड़िये। सेक्स को मूल्य दीजिये, अच्छी बात है। कीमती है, मनोरंजक है, आकर्षक है। और कहिये “तू बहुत बढ़िया है, क्या बात है? तू सबसे ऊपर है, सबसे ऊपर है। वाह। बाकी सब चीज़ें छोड़ दें तेरे लिये।” और जब वो बिलकुल फूल के कुप्पा हो जाए, तो कहिये, “बस रुक इधर! तुझसे, एक है जो ऊपर है, उसको निपटा लें।” परमात्मा अनिपट है। (मुस्कुराते हुए) क्या है? अनिपट!

वो इतनी बड़ी समस्या है, इतनी बड़ी उलझन, ऐसी पहेली, जो कभी…? निपटेगी नहीं। उसको कोई सुलझा ही नहीं सकता। तो घुस जाओ ऐसी पहेली में जो कभी सुलझेगी नहीं। अनंत काल तक रहे आओगे उस पहेली में। माया बाहर खड़ी पानी पीती रहेगी, देखती रहेगी कि ये इधर से छोटे तो हमारे पास आएँ। आप छूटने से रहे। और कोई तरीका नहीं!

कबीर कहते हैं ना, वो बाज़ार में बैठी है। वो हाट में बैठी है और हाथ में क्या है उसके? फंदा। फंदा ले कर के हाट में बैठी हुई है। वो लगातार प्रतीक्षा में ही है, कि जब तुम आओ बाज़ार में, तुम खिंचे चले आओ। तुम कहो कि चीज़ें चाहिये तेरी, और वो गले में डाल दे फंदा। तो तुम जाओ बाज़ार। बिलकुल जाओ बाज़ार। बाज़ार जाए बिना, निस्तार नहीं है। दुनिया ही बाज़ार है, लेनदेन चल ही रहा है। कबीर ही होता है कोई, जो कहता है कि लेना ना देना, मगन रहना। बाकी तो सब के लिए लेनदेन चल ही रहा है। जाओ। लेकिन कोई ऐसी दुकान पकड़ लो, कि जहाँ फंस ही जाओ! कि अब करें क्या, फंस गए!

माफ़ी मांग लो! “देवीजी, आप थोड़ा, क्या बताएँ फंस गए।” एक दिन ऐसा आएगा, याद रखना, तुमसे नहीं छूटेगी माया; जब माया तुम्हें छोड़ देगी निराश होके। कहेगी, कि ये फंसा ही रहेगा, दूसरा शिकार ढूँढ़ते हैं। ये तो फंसा ही रहेगा, दूसरा शिकार ढूंढते हैं।

ये खूब होगा! तुम जाओ किसी नए शहर में। वहाँ कोई गाइड इत्यादि बन कर के, गाइड माने पथ प्रदर्शक। गाइड माने क्या? गुरु जैसा, मार्गदर्शक! वहाँ कोई गाइड इत्यादि बन के तुम्हें लूटने को आमादा हो। और तुम उससे कहो, कि बस चलते ही हैं तुम्हारे साथ। तो बहुत खुश होगा, सोचेगा लो चलने को तैयार हो गया। बस चलते ही हैं तुम्हारे साथ, बस एक मिनट को, ज़रा सर झुका के आते हैं, चरण स्पर्श कर के आते हैं, ये मंदिर रहा। वो बाहर इंतज़ार करेगा, कहेगा ठीक है। कहेगा? ठीक है। अभी गया है अंदर, भीतर, प्रणाम कर के आ जायेगा। उसके बाद इसको खूब लूटेंगे।

अब तुम अंदर गए, और अंदर रम ही गए, मौज ही आ गयी। अब वहाँ नाच रहे हो, गा रहे हो, भजन हैं, और कीर्तन है। और लोट गए, और समाधि हो गयी, और घंटे बजा रहे हो। घंटे ही हो गए। अब वो बाहर कब तक इंतज़ार करेगा वो कहेगा, “और बाकी इतने बेवक़ूफ़ घूम रहे हैं, उनको पकड़ते हैं। इसका कब तक इंतज़ार करें?” ऐसे मिलेगी मुक्ति। यही तरीका है। मंदिर में रहे आओ, लूटने वाले बाहर रहेंगे, इंतज़ार करते रहेंगे। फिर वो खुद ही नाउम्मीद हो कर के तुम्हें छोड़ देंगे। बस ऐसे मिलेगी मुक्ति।

श्रोताआचार्य जी, ओशो ऊर्ध्वगमन की बात करते हैं अपनी किताब में। उसके बारे में जानना था कि वो क्या है? और,  जैसा कि उसमें भी लिखा हुआ है, वो गहरे अनुभव की बात करते हैं, कि पुनर्जन्म में आपका गहरा अनुभव है, तो आने वाले जनम में आप मुक्त हो जाएँगे। उसके बारे में कुछ बताईये।

वक्ता: पूर्व जन्म में आपका जो कुछ भी है, उसे देह कहते हैं। पहले से आप जो कुछ भी ले कर के आये हो, उसको देह कहते हैं। एक तो ये कि क्या खाया, किस माहौल में रहे, मन कैसा रखा? व्यायाम किया कि नहीं किया? और दूसरा होता है देह का बीज, देह की अभियोजना, देह की जो मूल परिकल्पना है। जो उसकी मूल रचना है, समझ रहे हो? उदाहरण के लिए, ये जो आपकी नाक है, इसका आकार, इसकी आकृति, ये आप ले के पैदा हुए हो। आप कर लो कितनी भी कसरत आप नाक नहीं बदल सकते अपनी। सत्यम भी नहीं बदल सकता, कितनी भी दौड़ लगा ले। समझ में आ रही है बात?

तो, आप, कुछ है जो ले कर के पैदा हो रहे हो। कुछ है जो आप ले कर के पैदा ही हो रहे हो। उसी को ओशो कह रहे हैं कि पूर्व जनम में अगर आपके गहरे अनुभव रहे हैं तो, इस जनम में अपेक्षतया सरलता से आप मुक्ति पा सकते हो। ऊर्ध्वगमन हो सकता है। ऊर्ध्वगमन माने, मुक्ति की तरफ बढ़ना। शब्दों में मत पड़ियेगा। ऊर्ध्वगमन माने? मुक्ति की तरफ बढ़ना। अधोगमन माने? ग़ुलामी की तरफ बढ़ना, और कुछ भी नहीं। आप अपनी वृत्ति में ही और लिप्त होते जाएँ, तो ये क्या हुआ? गिरना। गिरना माने? अधोगमन।

और आप आज़ादी की तरफ बढ़ रहे हो, तो ये क्या हुआ? ऊर्ध्वगमन। ऊर्ध्वगमन माने उठना, कि जैसे कोई पृथ्वी के आकर्षण से उठ कर के, आकाश में तैरना शुरू कर दे। ये ऊर्ध्वगमन हुआ। इतना ही है।

तो, कुछ लोग पैदा ही होते हैं, बड़ी घनी वृत्तियों के साथ। सागर में कुछ लहरें उठती हैं एक आकार की, कुछ लहरें उठती हैं दूसरे आकार की। कुछ पैदा होते हैं, दूसरे प्रकार की वृत्तियों के साथ। ऐसा बिलकुल होता है, कि कुछ लोगों के लिए, कुछ बातें अपेक्षाकृत आसान होती हैं, कुछ लोगों के लिए ज़रा मुश्किल होती हैं। लेकिन बस अपेक्षाकृत तरीके से। क्योंकि यदि पैदा हुए हो, तो ‘अहम्’ के साथ तो पैदा हुए ही हो। आयाम का अंतर नहीं है। अहम् तो है ही। परिमाण का अंतर हो सकता है, मात्रा का अंतर हो सकता है। पर चीज़ वही है। कितनी है, इसमें अंतर हो सकता है।

तो, जो भी पैदा हुआ है, उसे वृत्तियों से, वासनाओं से, इच्छाओं से, भ्रमों से, और बेचैनी से तो पार पाना ही पड़ेगा! हाँ, उसके सामने उसकी व्यक्तिगत चुनौतियाँ कैसी आती हैं, ये उसकी वृत्तियों पर और संयोगों पर निर्भर करेगा।

ये बात आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि आप दूसरों की अपेक्षा कितने पानी में हो? कोई चुल्लू भर पानी में भी डूब के मर सकता है। अगर मर ही रहे हो, तो इस बात से फर्क पड़ता है क्या कि छः फ़ीट के स्वीमिंग पूल में डूब के मर रहे हो, या अथाह सागर में? तुम्हें तो कष्ट मिल ही रहा है ना? तुम्हारी तो जान जा ही रही है ना? हो सकता है, तुम्हारी वृत्ति दूसरों से ज़रा कम सघन हो; लेकिन उसके बाद भी बहुत सम्भव है कि तुम डूब जाओ और दूसरा तर जाए। तो इस बात पर बहुत ज़ोर रखने की कोई ज़रुरत नहीं है। अपनी अपनी देखो।

सब भवसागर में हो, ‘गहरी नदिया, नाँव पुरानी’। कोई नाँव के अगवाड़े बैठा है, कोई नाँव के पिछवाड़े बैठा है। जो अगवाड़े बैठा है वो थोड़े ही कहेगा कि दूसरे किनारे के हम ज़्यादा पास हैं, हम बच जाएँगे! चौड़ी नदी है, और जर्जर नाँव, और होशियारी तुम्हारी इतनी कि जो नाँव के आगे बैठे हुए हैं ज़रा, वो खुश हो रहे हैं कि डूब तो रही है नाव, पर हम पीछे वालों से बेहतर हालत में हैं। हम तट के ज़रा ज़्यादा क़रीब हैं। ये बेवकूफ़ी है।

जो ही पैदा हुआ है, वही भवसागर में डूबने सी हालत में है। सब अपनी अपनी स्थिति देखो, और तरने का प्रबंध रखो। तरने का प्रबंध कबीर बता गए हैं- ‘केवटिया से मिले रहना’। दूसरों को देख कर के ख़ुशी मनाते रहना, ये तो नहीं कह गए हैं? कि वो बुढ़वा, वो तो पक्का डूबेगा। एक तो बूढ़ा है, ऊपर से पीछे बैठा है। वो नहीं तरेगा।

मैं ज़रा फिर, जिस बिंदु से शुरू किया था, वहीं आपको वापस ले आता हूँ। गुड़ में मिला कर के अगर गोली दी जा रही है, तो हो सकता है कि पचास ग्राम गुड़ हो, और एक ग्राम गोली। आप के लिए एक पुड़िया बनायी गयी, पचास ग्राम की। इक्यावन ग्राम की, ठीक है यार। उसमें पचास ग्राम गुड़ था। और पानी एक ही ग्राम था, दवाई एक ही ग्राम थी। उसको देख कर के इस भ्रम में मत पड़ जाना कि चिकित्सा गुड़ से होती है। उस पुड़िया को देख कर के ये मत सोच लेना कि चिकित्सा गुड़ से होती है। और इस भ्रम में पड़ना आसान है, क्योंकि जब आप पुड़िया को देख रहे हैं, तो उसमें अधिकाँश आपको क्या दिखाई दे रहा है?

श्रोता: गुड़।

वक्ता: गुड़। तो आप किसी को दिखाएँ, कि देखिये चिकित्स्क ने ये पुड़िया दी है इलाज के लिए। और वो देखे तो उसे गुड़ ही गुड़ दिखाई देगा। तो ये भ्रम उठना आसान है कि इलाज माने? गुड़

जबकि तथ्य ये है कि गुड़ आपको इसीलिए दिया गया था, क्योंकि आप गुड़ के मरीज हो, आप गुड़ के दीवाने हो, आपको गुड़ की लत लगी हुई है। अब ये अजीब हालत हो गयी ना।

गुड़ में डाल के आपको दवाई क्यों दी गयी? क्योंकि आपकी बीमारी है गुड़! गुड़ में डाल के क्यों दी गयी दवाई? क्योंकि आपकी बीमारी है गुड़। आप हर समय गुड़ ही गुड़ खाते रहते हो, तो इसीलिए दवाई भी गुड़ में डाल के दी गयी। लेकिन आपने दवाई को देखा, और आपने कहा, कि नहीं नहीं नहीं, मेरा तो इलाज है गुड़। मेरी तो दवाई है गुड़! गुड़ क्या थी और दवाई को देख कर के आपको क्या लग गया कि गुड़ तो क्या है? दवाई।

यही ओशो के साथ हुआ है। सेक्स आपकी बीमारी है। तो उन्होंने इसीलिए सेक्स का नाम लिया। उन्होंने कहा, “सम्भोग से समाधि तक।” नतीजा ये निकला है, कि बहुत सारे सेक्स से आसक्त लोगों को ये लगने लग गया है कि ओशो ने सेक्स को ही इलाज बना दिया। उन्होंने इलाज नहीं बना दिया पागलों! अब बहुत सारी दुकानें हैं, जो गुड़ बेच रही हैं। कह रही हैं, यही तो ओशो बेचते थे। और कह रही हैं, बस उन्नीस बीस का अंतर है, ओशो से एक ग्राम का अंतर है, बाकी तो सब वही है। बहुत सारी दुकानें हैं, जो अब विशुद्ध सेक्स बेच रही हैं, ओशो के नाम पर। और उनसे पूछो, ये वही है, जो ओशो ने सिखाया है? कहेंगे बिलकुल वही है। बस एक प्रतिशत, दो प्रतिशत का अंतर है। वो इक्यावन ग्राम का कुछ बेचते थे, हम पचास ग्राम का बेचते हैं। इतना ही सा अंतर है।

आ रही है बात समझ में?

और मन को ये खूब भायेगा! गुड़ के रोगी को कहो, “गुड़ ही तुम्हारी दवाई है।” ये तो!



सत्र देखें: आचार्य प्रशान्त, ओशो पर: ‘संभोग से समाधि’ की बात क्या है? (On Osho: From Sex to Superconsciousness)

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

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  1. “आप को जिसकी आदत है, आप को जिस की लत लग गयी है, उससे छूटने का एक ही तरीका है, कि आप उससे आगे निकल जाएँ। उससे जितना संघर्ष करेंगे, उतना उसी के तल पर अटके रह जाएँगे, चिपके रह जाएँगे। यदि वासना परेशान करती है आपको तो ये जान लीजिये, कि वासना से युद्ध कर कर के किसी ने वासना नहीं छोड़ी। वासना उनकी छूटी, जिनके लिए वासना अप्रासंगिक हो गयी। जिनके जीवन में ऐसा कुछ आ गया कि उसके बाद उनको वासना का होश ही नहीं रहा।”

    हम दिन-रात वासनाओं से घिरे रहते हैं। वासनाओं से निकलने का यही एक मात्र साधन है। धन्यवाद, आचार्य जी इन शब्दों के लिये।

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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