अनुभव में गहराई

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आचार्य प्रशांत: ओशो के शब्द हैं –

मेरे प्रिय प्रेम,

नहीं, प्यासे नहीं रहोगे। देर है, अंधेर नहीं। और, देर भी है तो स्वयं ही के कारण। प्यास पकेगी, तभी तो कुछ होगा। फिर, कच्ची प्यास को छेड़ना उचित भी नहीं है। पकने दो प्यास को, गहन होने दो, तीव्र होने दो। झेलो पकने की पीड़ा। झेलनी ही पड़ती है, क्योंकि निर्मूल्य कुछ भी नहीं है। मूल्य चुकाओ, गुज़रो जीवन से, दुःख से, संताप से, नरकों से, स्वर्गों की आशा में। क्योंकि किसी और प्रकार के भवन पृथ्वी पर बनते ही नहीं हैं। और हवा के झोंके जब उन्हें गिरा दें, तो रोओ। टूटो और स्वयं भी उनके साथ ही गिरो। तैराओ नावें कागज़ों की महासागरों में, क्योंकि आदमी किसी और भांति की नावें बनाने में समर्थ ही नहीं है। और फिर लहरों के थपेड़े उन्हें डुबा दें, तो पछताओ जैसे कि सुखद स्वप्न टूट जाए, तो कोई भी पछताता है। और ऐसे ही यात्रा होगी। और ऐसे ही अनुभव शिक्षा देंगे। और ऐसे ही ज्ञान जगेगा और पकेगी प्यास। और तुम स्वयं को दांव पर लगा उसे खूब खोजोगे, जोकि समस्त प्यासों के पार ले जाता है। वो तो निकट ही है, बस तुम्हारी ही स्वयं को दांव पर लगाने की देर है।

श्रोता:

१. ये जितनी बातें ओशो कह रहे हैं, वो सब तो द्वैत के आयाम में आती हैं, तो उनमें फँस कर, या उनसे गुज़र कर क्या जाना जा सकता है?

२. अनुभव से क्या अर्थ है, अनुभव शिक्षा कैसे देंगे?

३. दांव पर लगाने की क्या बात है?

 

आचार्य जी: आखिरी पंक्ति में ओशो कहते हैं, “जो कि समस्त प्यासों के पार ले जाता है, वह तो निकट ही है। बस तुम्हारी ही स्वयं को दांव पर लगाने की देर है” – लेते हैं तीनो को एक एक कर के।

ये शंका उठेगी, ये तो कहने वाले ने स्वयं ही देख लिया था। जब कहते हैं, “बनाओ भवन ताश के,” तो साथ ही कहते हैं, “क्योंकि पृथ्वी पर अन्य किसी प्रकार के भवन बनते ही नहीं हैं।” इसी तरीके से, एक अन्य जगह पर भी, जोड़ देते हैं, कि “करो ऐसा क्योंकि और कुछ मानव मन के लिए कर पाना सम्भव ही नहीं है।” आपने कहा, “ये सब तो द्वैत की बातें हैं- नरकों से गुज़रना, स्वर्ग की आशा में, इत्यादि।”

तो बातें और किसकी हो सकती हैं? बात तो जब भी होगी, द्वैत की ही होगी ना? दो तरह की भूलें हो जाती हैं। एक तो ये मान लेना कि द्वैत के ही किसी सिरे में, द्वैतात्मक ही किसी पदार्थ में, अद्वैत नीहित है, और उसको अद्वैत का ही नाम दे देना। और दूसरी भूल ये कि ये कह देना कि मात्र द्वैत ही द्वैत है। दोनों भूलें हैं।

इंसान जो भी कुछ करेगा, द्वैतात्मक ही होगा। कहते हैं कि “पीड़ा से गुज़रो, पकने दो, ये सब समय की बातें हैं, इनमें समय लगता है। आशा झेलो, संताप झेलो, निराशा झेलो, हार जीत, मिलना, बिछुड़ना।” यही सब तो सिखाएगा ना? और आप के लिए इसके अतिरिक्त कोई विधि भी नहीं है। क्योंकि आप और हो कौन? आप वो हो, जो द्वैत से उम्मीद रखता है। ये परिभाषा है आपकी।

जीव माने प्यास। जीव माने वो, जो सोचता हो कि उससे बाहर कहीं है उसकी तृप्ति। बच्चा पैदा होते ही रोता है। आदमी की परिभाषा ही यही है, कि वो है और संसार है। आदमी की परिभाषा ही यही है, कि वो पैदा होता है और आँख खोलते ही संसार को पाता है। संसार की ओर हाथ बढ़ाता है। किसी बच्चे का हाथ आपने आत्मा की ओर बढ़ते हुए देखा है क्या? किसी चीज़ ही की ओर तो हाथ बढ़ाता है ना वो? और चीज़ माने संसार। और दूसरे की ओर हाथ बढ़ाना ही तो प्यास है। दूसरे की और प्यास बढ़ाना ही तो द्वैत है। हमारी परिभाषा ही यही है कि हमारे लिए सब कुछ बाहरी है। साँस भी लेते हैं तो बाहर से लेते हैं। भाषा भी है तो बाहरी है। शरीर ही पूरा का पूरा बाहरी है, मन ही पूरा का पूरा बाहरी है।

द्वैत के केंद्र पर मानो हम ही खड़े हुए हैं। अद्वैत, द्वैत से हट जाने, या द्वैत से भाग जाने का नाम नहीं है।

आत्मज्ञान, आत्मा को जान लेने का नाम नहीं है। ये जो मन है मेरा, ये क्या है? ज़रा सी ही बात, कहाँ को जाना चाहता हूँ? क्या पाना चाहता हूँ? कैसे संयोगों पर चलता हूँ? किधर को खिंच जाता हूँ? क्या अच्छा लगता है, क्या बुरा लग जाता है? कैसी प्रतिक्रिया कर बैठता हूँ? यही है आत्मज्ञान। तो आत्मज्ञान का अर्थ ही हुआ कि द्वैत का जो पूरा खेल खेल रहे हो, उसको जान गए। उसको जानोगे कैसे, अगर खेल से ही बचते रहे? बच बच के भी खेल के बाहर तो आ नहीं पाओगे? हाँ, खेल को स्थगित करते जाओगे।

ओशो कह रहे हैं, “तुम्हें इससे गुज़रना होगा। और अगर ये पीड़ा देता है, तो उस पीड़ा को झेलना होगा।” तो हिम्मत के साथ, श्रद्धा के साथ, गुज़रो। संसार से गुज़रना माने अपने आप से गुज़रना। वो गुज़रना, तुम्हारी अनिवार्यता है। गुज़रोगे नहीं, तो ऐसा नहीं होगा कि जहाँ खड़े हो गए हो वहाँ खड़े खड़े स्वस्थ हो जाओगे! हाँ, ये भ्रम ज़रूर पाल लोगे कि मैं तो स्वस्थ हूँ। ये भ्रम ज़रूर पाल लोगे कि मुझे तो संसार प्रभावित नहीं करता। 

पाँच लोग बैठे हों जैसे आप बैठे हुए हैं। पाँचों को ये हक़ मिल जाता है कि दावा कर दें कि उनसे अच्छा धावक कोई नहीं। बैठे बैठे, आप अपने आप को ही इस धोखे में रख सकते हैं, कि आपसे बेहतर कोई नहीं दौड़ पाएगा। आप दौड़ पाते हैं या नहीं, ये तो तभी पता चलेगा ना, जब आप दौड़ें!

संघर्षों में आप प्रवेश नहीं कर रहे, क्रोध की स्थिति से आप अपने को अछूता रख रहे हैं, जहाँ मन में लालच उठ जाए, कि वासना उठ जाए, ऐसे माहौल की छाया से भी दूर हैं, कोई आरज़ू नहीं कर रहे, कोई लक्ष्य नहीं बना रहे; आप को कैसे पता चलेगा कि आप के भीतर क्या छुपा हुआ है? और जो छुपा हुआ है, वो मात्र इस कारण विगलित नहीं होने वाला कि उसको आपने अभी प्रस्तुत नहीं होने दिया। वो बैठा रहेगा भीतर। वो आएगा, कभी और सामने आएगा, और जब सामने आएगा, तब आप पाएँगे, कि भीतर बैठे बैठे, वो और ताक़तवर हो चुका था।

हिम्मत का मतलब ही यही होता है कि आदमी के अवचेतन में जो कुछ बैठा होता है, उसे सामने आने दें, ताकि चेतना के मूल में जो है, वो भी सामने आ सके, सहारा देने के लिए।

समझियेगा इस बात को!

दो हैं, जिनसे आप अपरिचित हैं। एक अपने मन की गहराइयों से, और दूसरा अपने मन के आधार से। आपको ये नहीं पता, कि आपके मन में क्या-क्या छुपा हुआ है। कहने वाले कहते हैं कि आम आदमी को एक प्रतिशत, दो प्रतिशत, पाँच प्रतिशत पता होता है, अपने ही मन का। चैतन्य मन उतना ही होता है। तो, एक तो आपको अपने मन का नहीं पता; तहखाने में क्या क्या सामग्री है, जो जमा है और सड़ रही है। और दूसरा आपको ये नहीं पता, कि मन आया कहाँ से?

पता हमें जिसका है, वो हमारी ज़रा सी चेतना है, सीमित चेतना। वो हमारी सीमित चेतना है, थोड़ी सी, उसका हम कहते हैं कि पता है। वो हमारे ज्ञान का संसार है, छोटा सा। लेकिन जो हमारी सीमित चेतना है, वो भी उठती मन की गहराईयों से है, उन्ही तहखानों से। हम ज़रा उन तहखानों में घुसते हैं, तो वहाँ अँधेरा पाते हैं, वहाँ साँप-बिच्छू पाते हैं। वहाँ कीचड़ होता है, कंकाल होते हैं। डरने लग जाते हैं हम, और नीचे जाते ही नहीं। हम कहते हैं “पड़ा रहने दो, कौन देखे इनको। गंदगी ही तो है। गंदगी में और प्रवेश कर के मिलेगा क्या? तो, छोड़ो!” वहाँ बहुत कुछ ऐसा है, जो आपको डराता है। आप उस डराने वाले से लगातार बचना चाहते हैं। उस डराने वाले से, तो आप बच लेते हैं, लेकिन साथ ही साथ फिर आप अपरिचित रह जाते हैं, डर से बचाने वाले से।

पहले जब आप अपने भीतर प्रवेश करेंगे, तब आप उसको पाएँगे जो डराता है। पर, अगर हिम्मत रखी, और प्रवेश करते ही गए, गहरे जाते ही गए, तो फिर वो मिलता है, जो डर से बचाता है। जो उससे ही नहीं मिला जो डराता है, वो उससे कैसे मिलेगा जो डर से बचाता है?

तो इसलिए, ओशो जब आपसे कह रहे हैं कि डर का स्वागत करो, और पीड़ा का स्वागत करो, और जीवन के तमाम उतार चढ़ावों का स्वागत करो; तो वो वस्तुतः आपसे ये कह रहे हैं, कि जितने तरह के दूषण हो सकते हैं, विकार हो सकते हैं, मलिनताएँ हो सकती हैं, उन सब से मिलते चलो, क्योंकि उनसे मिलने के बाद ही वो मिलता है जो निर्मल कर देता है, और निर्दोष कर देता है, और निर्विकार कर देता है। ये विचित्र है ज़रा सा, पर ऐसा ही है कि कोई मौजूद है आपको डर से बचाने के लिए, ये आपको सिर्फ तब पता चलेगा, जब आपको गहरा डर उठेगा!

कोई मौजूद है आपको गिरने से, और दुर्घटना से, और चोट से बचाने के लिए, ये आपको सिर्फ तब पता चलेगा, जब आप दुर्घटना के क्षण में होंगे, और जब आप गिर रहे होंगे। श्रद्धा और जगती कैसे है? ऐसे ही तो! गिर रहे होते हैं, गिर रहे होते हैं, आप गिर रहे होते हैं, तो अतल गहराई है, और अचानक जैसे दो हाथ आपको थाम लेते हैं, अब ना पता चलेगा कि अकारण, अजन्मे, अनजाने, अनर्जित, दो हाथ, न जाने कहाँ से आके आपको बचा सकते हैं। अरे, बचाएँगे तो तब ना, जब पहले तुम नष्ट होने के लिए तैयार हो? जब नष्ट होने की घड़ी आएगी, तभी तो ये जानोगे ना? कि नष्ट होके भी नष्ट नहीं हुए। तभी तो अपनी अमरता का पता चलेगा, तभी तो अपनी ताकत का पता चलेगा! तभी तो बचाने वाले के जलाल का पता चलेगा!

तुम खुद ही अपने आप को बचाए  बैठे हो, तो और कौन बचाएगा? तब तो तुम ही अपने हो गए परमात्मा! ये अलग बात है कि जितना तुम अपने आप को बचाते हो, तुम अपने दुःख को बचाते हो। संतों ने सदा समझाया है, नष्ट हो जाने दो अपने आप को, उसके बाद देखना कि बचे कि नहीं। जो कुछ भी नष्ट हो सकता है, उसे हो ही जाने दो नष्ट। उसके बाद देखना कि क्या बचता है? 

अनुभव और अनुभोगता की जो आपने बात करी, वो एक हैं। ये कहा जाए कि अनुभोगता को जानो, या ये कहा जाए कि खूब अनुभव लो, वाकई एक ही बात है। आम आदमी अनुभव का दीवाना तो रहता है, लेकिन गौर से देखिये तो वो अनुभव ले नहीं पाता। अनुभव डरा देते हैं! वो सिर्फ उन अनुभवों की तरफ जाता है, जो अनुभव उसके अनुकूल पड़ते हैं। जो अनुभव आपको हिला देते हों, जो अनुभव आपके ढर्रों और ढांचों को तोड़ देते हों, आप उनकी और कभी जाते हो क्या? आप कहाँ पाए जाते हो? आप वहीं पाए जाते हो, जहाँ आप के अहंकार को, जहाँ आपकी मूल वृत्ति को संबल मिलता हो।

जब कहा जाता है कि अनुभवों से गुज़रो, तो साथ ही यह कहा जा रहा है, कि अनुभवों से गुजरने की हिम्मत रखो। गुज़र ही नहीं पाओगे अनुभवों से, बिना परमात्मा के सहारे के।

जिसे आप अनुभोगता कहते हैं, वो अनुभव से डरता है। अजीब बात है, नाम है ‘अनुभोगता’, पर अनुभव से वास्तव में डरता है। और अनुभव जितना लेता जाएगा, अनुभोगता उतना हटता जाएगा, मिटता जाएगा। अगर आप वाकई अनुभवी हैं, और ईमानदारी से आपने अनुभव किये हैं, तो आपके अनुभव ही आपको काट देंगे, मिटा देंगे। पर आम तौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। ज़्यादातर लोग जो अपने आप को अनुभवी कहते हैं, उनके अनुभव उन पर और, काई की तरह, मैल और मिट्टी की तरह, चढ़ते जाते हैं। वो इसीलिए है क्योंकि उन्होंने वाक़ई अनुभव कभी लिए ही नहीं। उन्होंने समय काटा है। या अनुभव उन्होंने सिर्फ उस दिशा के लिए हैं, जो दिशा उन्हें मुनासिब पड़ती थी, जो दिशा उन्हें बचाती थी, जो दिशा उनके अहम् को और पुख़्ता करती थी।

अन्यथा, अनुभव लेने का अर्थ है, जीवन के प्रति पूरा खुलापन। ये तो समर्पण जैसी बात हुई। ज़िंदगी के प्रवाह में अपने आप को आपने असुरक्षित अब बह जाने दिया है। ये तो परमात्मा पर पूरी श्रद्धा की बात हुई। जो अनुभव वाक़ई लेगा, जो वाक़ई अनुभवी है, वो अनुभव के पार निकल जाएगा।

फिर आपने पूछा कि अपने आप को दांव पर लगाना क्या है? ओशो कह रहे हैं, कि अगर उसे पाना हो जो तुम्हें बचा सकता है, तो तुम्हें अपने आप को दाँव पर लगाना होगा।

अहंकार व्यापारी जैसा होता है। उसका दुनिया से हमेशा लेना देना चलता रहता है। उसका दुनिया से हमेशा लेना देना चलता रहता है। उसके लिए दुनिया एक बाज़ार है। वो कहता है, “कम दो, ज़्यादा लो, मुनाफ़ा बनाओ। कुछ करते रहो।” खरीदता लेकिन सिर्फ वो ऐसा कुछ है, जिसका उसे पहले से ज्ञान हो, किसी भी अन्य व्यापारी की तरह। वो कहता है, “इस चीज़ का मुझे पता है। मैं इसकी कीमत लगा सकता हूँ। ये मेरे दायरे के भीतर है।” तो उसको वो ले लेगा। और किसी ऐसी चीज़ को वो बदले में छोड़ देने के लिए, सौदा कर लेने के लिए तैयार हो जायेगा, जो उसकी दृष्टि में ज़रा कम मूल्य की है।

इस तरीके से, ये जो मन है, जीव है, अहंता है, ये इक्कठा करती चलती है। इक्कठा करना इसकी प्रकृति है। ये भी पा लूँ, वो भी पा लूँ, वो भी पा लूँ। लेकिन ये हमेशा क्या इक्कठा करेगी? वो सब कुछ जो इसके व्यक्तिगत पैमानों पर मूलयवान है। जो मुझे लगा कि कीमती है, वो मैंने संग्रहित कर लिया। मुझे क्या लगेगा कीमती है? वो, जो पहले से ही मेरे दायरे का है। जिसका मुझे ज्ञान है। जो मेरे अनुभव का है, जो मुझे नुक़सान नहीं पहुँचाता, जो मुझे बनाये रखता है।

तो, ले देकर अहंकार क्या इक्कठा करता है? अहंकार स्वयं को ही इक्कठा करता है। तो अहंकार किसकी मांग करता है? अहंकार अपनी ही मांग करता है, “ज़रा और देना, ज़रा और देना, ज़रा और देना!” जैसे मिट्टी पर मिट्टी चढ़ाई जा रही हो। जैसे बर्फ़ की कोई सिल्ली हो जो और मोटी होती जा रही हो। अब एक तो बात ये हुई, और दूसरी बात ये है कि अहंकार एक वेदना है, एक छटपटाहट है, जो अपने आप से ही आज़ाद होना चाहती है। जो चिल्लाती है मिट जाने के लिए, बंद हो जाने के लिए।

विरोधाभास देखिये! एक ओर तो आपकी पीड़ा ही यही है कि आप हैं। और दूसरी ओर आपके कर्म सारे हैं, जो आपको और बढ़ाए दे रहे हैं। पीड़ा आपकी यह है कि आप हैं। आप जितने हैं, आप उतने में ही बड़ी पीड़ा हैं। और जीवन आप ऐसा जी रहे हैं कि जितने आप हैं, उसको आप दूना, तीना, और करे जा रहे हैं। तो, आदमी का जन्म इसीलिए कहा जाता है, कि व्यर्थ जाता है। व्यर्थ ही नहीं जाता, उलटा जाता है। आप जिस स्थिति में पैदा हुए थे, उससे बदतर स्थिति में मरते हैं। जैसे कोई किसी बाज़ार में उतरे, अपने सर पर क़र्ज़ ले कर के। और इस उम्मीद में, कि क़र्ज़ मिटा देंगे। और बाज़ार से जब बाहर आये तो उसके ऊपर, चौगुना क़र्ज़ हो। हम ऐसे जीते हैं।

जन्म लेते ही इस बात की पीड़ा रहती है, कि हमारे ऊपर क़र्ज़ है क्यों? जन्म होता ही इस ख़ातिर है, कि कुछ गँवा दो, कुछ घटा दो, कुछ खो दो! क्या खो दो? जिसके ऊपर ऋण है, उस ऋण को घटा देना चाहता है। तो जन्म होता ही इसीलिए है, कुछ घटा दो। और आप उसको बढ़ाये चले जाते हैं। तो ये बड़ी विरोधाभासी बात है, कि अहंकार व्यापारी जो भी कुछ करता है, अपनी ही स्थिति को बढ़ाने के लिए करता है। तो, अगर वो ऋण में है, तो ऋण को और बढ़ाएगा। अगर वो ऋण में है, तो ऋण को और बढ़ाएगा।

मिट जाने का मतलब होता है, तुम जिस स्थिति में हो, उसको जाने दो। सौदा तुम जो भी करोगे, उसमें कुछ अर्जित ही करोगे, कुछ खींच ही लोगे। अपने आप को और बढ़ा ही लोगे। तुम ये भी अगर कहो कि तुम अपनी नज़र में, अपने आप को मिटाने वाली वस्तु का सौदा कर रहे हो, तो भी वो वस्तु तुम्हें बढ़ा ही देगी, क्योंकि वो तुम्हारे ज्ञान के भीतर की है। अपने को दाँव पर लगाने का मतलब हुआ, कि सब कुछ बेच डाला, सब कुछ दे डाला, किसी ऐसे के प्रति जिसका कुछ पता नहीं। ये है, दांव पर लगाना, कि जैसे जुआ खेला हो। कुछ ऐसा करा हो, जिसका अंजाम पूर्वनियोजित नहीं है। हम नहीं जानते कि क्या मिलेगा, और कर गुज़रे। हम नहीं जानते कि क्या मिलेगा, और कर गुज़रे।

और याद रखियेगा, बेहोशी में और समर्पण में अंतर होता है। नहीं जानते का अर्थ ये नहीं होता, कि मात्र चैतन्य रूप से नहीं जानते। वृत्ति भी जब आपसे कारनामे कराती है, तो आप चैतन्य रूप से नहीं जान रहे होते कि आप क्या कर रहे हो, और आप कर गुज़रते हो। उसको समर्पण नहीं कहते, उसको बेहोशी कहते हैं। समर्पण का अर्थ है, कि जो कुछ जाना जा सकता था, उसके भीतर वो है ही नहीं हम जिसके सामने सर झुका रहे हैं। मैं जो जानता हूँ, मात्र उस दायरे के भीतर नहीं है, ऐसा नहीं कह रहा। जो कुछ जाना जा सकता है, वो उस दायरे में ही नहीं है, वो अज्ञेय है। और तब भी अपने आप को दे डाला। न तो ऐसा है कि जानते हैं, और ऐसा भी नहीं है कि आगे जान लेने की उम्मीद है। फिर भी अपने आप को दे डाला। ये है दांव पर लगाना।

इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। अपनी होशियारी से और चुनाव इत्यादि कर के, तो जो भी फैसला आप करेंगे, वो आपको महफ़ूज़ रखेगा। और आप जितने महफूज़ रहेंगे, उतने बेचैन रहेंगे।

प्रश्न: ये जो नष्ट होने की प्रक्रिया है, क्या ये जीवन भर चलती रहती है? या एक ऐसा क्षण आ जाता है, जब हम कह देते हैं कि अब तो पूरे ही नष्ट हो गए?

वक्ता: देखिये मोनिका जी, क्यों पूछ रहे हैं हम ये? ताकि सुरक्षा मिल जाए। ताकि इसका उत्तर कुछ बता दें।

ज़िंदगी भर चलती रहे तो चलती रहे, और न चले ज़िंदगी भर, तो न चले। पर ये अभी ये जान लेने से बस अपने आप को हम ढांढ़स बंधा देंगे, कि हमें पता है। ज्ञान बड़ा सहारा है। प्रश्न तो हम ये कर रहे हैं ना कि नष्ट होना लगातार चलता रहेगा या नहीं? प्रश्न में, तो जैसे ये भावना छुपी है कि हम नष्ट होने को तैयार हैं, बल्कि आतुर हैं। लेकिन ये सवाल वास्तव में सुरक्षा की मांग से उठ रहा है। कोई है जो नष्ट नहीं होना चाहता, वो ही ये सवाल कर रहा है। तो इस सवाल को ही नष्ट हो जाने दीजिये। अभी जिस स्थिति में हम बैठे हैं, उस स्थिति में बैठे बैठे, आगे का अंदाज़ लगा लेना बड़ा मुश्किल है।

खरगोश को अगर जिराफ हो जाना हो, तो बताईये, ऊँचे पेड़ का पत्ता कि घास? क्या पसंद आएगा? अभी से कैसे बताएँ? आज उसको जो पसंद आता है, कल पसंद नहीं आएगा। आज वो जिसको नष्ट होना बोलता है, कल हो सकता है, उसी में मौज पाए। भविष्य को ले कर के, सारी शंकाएँ, सिर्फ मन की सुरक्षा की मांग होती हैं। हम कहते हैं, एक दिन ऐसा आएगा जब मैं ऐसा हो जाऊँगा। वो दिन जब आएगा, तब आप आप ही नहीं रहेंगे। तो आपको कैसे पता कि आज आपको जो भाता है, उस दिन भी भाएगा?

इस यात्रा की खूबी ये है कि इसमें यात्री बदल जाता है। आज जो कुछ यात्री को डराता हो, कल भी डराएगा, ज़रूरी नहीं। आज जो अक्षुण्य है, कल भी अक्षुण्य रह जाएँगे, ज़रूरी नहीं। तो कल के बारे में इसीलिए कुछ भी पूछना, औचित्यहीन है। कयोंकि हम ये नहीं जानना चाहते हैं कि कल वस्तुतः कैसा होगा? गौर करियेगा। हमारी उत्सुकता इसमें होती है, कि कल जैसा होगा उसे मैं पसंद करूँगा या नहीं। हमारी उत्सुकता वस्तुनिष्ठ नहीं है। ऑब्जेक्टिव  नहीं है। हमारी उत्सुकता इसमें है, कि कहीं मुझे तो कोई चोट नहीं लग जाएगी, मुझे कोई नुक़सान, कोई घाटा इत्यादि तो नहीं हो जाना है, कल की हालत में? अब आपको क्या पता कि आज आपको जो घाटे की बात लगती हो, कल उसी में मस्त मुनाफा दिखाई दे?

खरगोश को जिराफ हो जाना है, आज उसको आप बताएँ, कि वो ऊँचे से ऊँचे पेड़ की ऊँची से ऊँची पत्ती है, वही तेरा आहार बनेगी, तो वो किसी कोने में जाएगा, दुबक जाएगा, और खूब रोएगा। कहेगा, “वो तो मिलने से रही। मुझे तो ये जो निचली घास है, यही मिल जाए बड़ी बात होती है। और मुझसे अब कहा जा रहा है, कि मेरा भक्ष्य होगी वो, मीटरों ऊपर लगी पत्ती।” गहरी उदासी उसे जकड़ लेगी। उदास होना उसका तर्कयुक्त है, अगर कल उसे खरगोश ही रह जाना होता। कल उसे जिराफ हो जाना है, और जिराफ के लिए, क्या घास, और क्या ऊँची पत्ती? सब एक बराबर। तो कल की छोड़िये। कल की बिलकुल छोड़ दीजिये।



सत्र देखें: आचार्य प्रशान्त, ओशो पर: अनुभव में गहराई (On Osho: Depth in experience)

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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