तिनका कबहुँ न निंदिये

तिनका कबहूँ न निंदिये, जो पाँव तले होए।

कबहूँ उड़ आंखन पड़े, पीड़ घनेरी होए।।

~ कबीर 

आचार्य जी: एक ही है जो एक पूरे तंत्र के रूप में और अहं वृत्ति के रूप में दिखाई देता है। एक ही है – छोटे से छोटे में भी, बड़े से बड़े में भी, रूप कैसा हो, नाम कैसा भी हो, आकार कैसा भी हो, सब में। और उस एक को देखने वाला मन साक्षी यदा कदा ही होता है; उस एक को देख रही होती है अहम् वृत्ति। उसका जो पूरा विस्तार है उसको देखने वाली होती है अहम् वृत्ति, साक्षी नहीं।

जब कभी भी अहंकार देखता है तो हमेशा नाप-नाप के देखता है, तौल-तौल के देखता है। उसको अपने होने में इतनी शंका होती है, वो अपने होने को लेकर के इतना डरा हुआ होता है कि उसको लगातार दूसरों की माप चाहिये ही होती है। स्वयंसीमित है अहंकार और जो कुछ अपने आस पास देखता है उसको उसकी सीमाओं से ही जानता है। सीमाएँ निर्धारित करना उसके लिए बहुत जरूरी है, भेद-भाव करना उसके लिए बहुत ज़रूरी है, इसी में वो जिंदा रहता है।

जब केंद्र अहंकार का है, जिस से संसार देखा जा रहा है, तो उसमें भेद दृष्टि ही चलेगी। फिर कुछ ऐसा हो जाएगा जो उपेक्षा के काबिल लगेगा, कुछ ऐसा हो जाएगा जो महत्वपूर्ण लगेगा, अक्सर हमने इस बात की चर्चा की है कि हम जिन बातों को महत्वपूर्ण मान लेते हैं वही हमारे मन का बोझ हैं। निश्चित रूप से जब कुछ महत्वपूर्ण माना जा रहा है तो उसी के सामने ही कुछ महत्वहीन भी माना जा रहा है। महत्व देना और महत्व न देना यही अहंकार की आदत है। उसने यही सीखा है – यह कीमती है, यह कीमती नहीं है, ये उचित है, ये उचित नहीं है, यह करना ही है, ऐसा नहीं किया तो कोई बात नहीं।

तिनका, तिनका है ही नहीं। तिनके को तिनका बनाया किसने? देखने वाली आँख ने। किसने कह दिया कि तिनका, तिनका है? तो, जब कबीर कह रहें हैं कि ‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ तो शुरुआत यहाँ से मत कीजिये कि छोटी से छोटी चीज़ की भी उपेक्षा मत कीजिये, अक्सर इसी रूप में इसका अर्थ किया जाता है कि जब कबीर कहें कि ‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ तो कबीर कह रहें हैं कि जो लघु है, जो छोटा है या जो उपेक्षनीय है, उसको भी इज्ज़त दीजिये – नहीं कबीर ये नहीं कह रहे हैं। कबीर कह रहें हैं कि कुछ भी छोटा है ही नहीं।

इसका ये अर्थ नहीं है कि कबीर कह रहें कि सब कुछ बड़ा है। कबीर कह रहें हैं कि न कुछ छोटा है, न कुछ बड़ा है, सब बस वही एक है जिसे तुम छोटा कहो तो बेवकूफी की बात है, परन्तु यदि उसे विराट कहो तो उतनी ही बेवकूफी की बात है। क्योंकि छोटा कहना या विराट कहना दोनों ही नापने तौलने वाली बातें हैं, और यह अहंकार का कर्तापन है कि नाप लो, तौल लो, कोई सीमा दे दो, ताकि तुम्हारे मन मैं समा सके; परिभाषित कर दो, नाम दे दो।

‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ क्योंकि तिनका वही है, तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा। तुम्हें दिखाई इसीलिए नहीं दे रहा है क्योंकि तुम उसे साक्षी होके देख नहीँ पा रहे। तिनके को देखते हो अपने अहंकार के केंद्र से, और अहंकार मुर्दा होता है, बोध नहीं होता है उसके पास। अहंकार तिनके को ऐसे ही देखेगा जैसे समय ने उसे सिखाया है, जैसा परिस्थितियों ने उसे सिखाया है। कोई यदि ऐसी सभ्यता हो जिसमें तिनकों की पूजा की जाती हो तो वहाँ आप पाएँगे कि वहाँ तिनका निंदिये तो छोड़िये, तिनकों को मंदिर मैं बैठाया जाता है, तिनकों की आरती उतारी जाती है, क्योंकि तिनका तिनका है ही नहीं।

तिनके को, तिनका, अहंकार ने बनाया है। जब अहंकार तिनके को तिनका बना सकता है तो वही अहंकार तिनके को देवप्रतिमा बना के उसकी पूजा भी कर सकता है। बात समझ में आ रही है? बात निंदा करने की नहीं है, बात उसे कुछ भी अर्थ देने की है। तुम जितने भी अर्थ दोगे वो उलटे पुल्टे ही होंगे क्योंकि उन सारे अर्थों के बीच मैं कौन बैठा हुआ है?

श्रोता: अहंकार।

आचार्य जी: तो बात कुछ बनेगी नहीं। आगे कह रहें हैं कबीर “कबहूँ उड़ आँखन पड़े, पीड़ घनेरी होए”। नहीं, इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कुछ तुम्हें पीड़ा देता हो वो बड़ा कीमती हो जाता है, बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है, उसकी ओर ध्यान देना आवश्यक है। इसका अर्थ बस इतना ही है कि हम ऐसे पागल हैं, हम ऐसे लातों के भूत हैं, कि जिनमें थोड़ी भी संवेदना जागृत  तभी होती है जब कष्ट मिलता है।

तुम गलत समझ रहे थे, तुम चूक कर रहे थे, ग़लतफ़हमी में जी रहे थे – यह समझ नहीं पाओगे जब तक पीड़ा न मिले। और पीड़ा मिल भी रही है तो इससे कोई पक्का नहीं हो गया कि समझ ही जाओगे। कितने लोगों की आँखों में धूल पड़ती रहती है, रेत जाती रहती है, तिनके, लकड़ियाँ ही पूरी घुस जाती होंगी, उससे क्या उनको समझ में आ गया कि लकड़ी, लकड़ी नहीं है और तिनका, तिनका नहीं है? हाँ, इतना हमें समझ में आ जाता है शायद दुःख कदाचित कि जो भी पाँव के नीचे है वो तुच्छ नहीं हो जाता। पर यह भी समझ में आ जाना कोई बात बड़ी नहीं हुई, यह कोई समझना हुआ ही नहीं।  

इतना इससे बस आपको इशारा मिल जाएगा कि तिनका वो नहीं है जो मैं उसे समझता था, क्या? तुच्छ, क्षुद्र, उपेक्षा योग्य, तिनका वो नहीं है ये पक्का हो गया। मैंने इस तिनके की कोई औकात नहीं समझी ये तिनका आँख में घुस कर के बड़ा कष्ट दे रहा है। तो ये तो पक्का हो गया कि तिनका वो नहीं है जो मैंने इसे समझा। क्या समझा था मैंने तिनके को? “हैसियत क्या है तेरी।” वो नहीं है तिनका लेकिन तिनका सौ बार आँख में पड़े यह भी इस बात कि आश्वश्ती नहीं है कि उससे सत्य दिख जाएगा आपको।

हमारी आँखों में तिनके जीवन भर पड़ते रहते हैं, किसको दिख गया? किसके आँखों मैं तिनका पड़ा और वो अचानक बोल उठा “हे राम! जान गया मैं तुझको? तू तिनका है ही नहीं। अरे आँख, मेरी आँख है ही नहीं।”  कौन बोल पड़ा? हाँ, ये है कि तिनके का आँख में पड़ना परम का सन्देश है एक तरीके का, कि थोड़ा ध्यान से देखो कि कहीं कोई चूक कर रहे होगे इसीलिए पीड़ा मिल रही है।

इस पूरे तंत्र में इस पूरी व्यवस्था में बड़ी सुंदर व्यवस्था चल रही है, इसमें पीड़ा आपको मिलती ही नहीं है अगर आप कहीं न कहीं कोई चूक न कर रहें हों। आँख का दर्द हो चाहे मन का दर्द हो, कैसी भी पीड़ा से अगर आप गुज़र रहे हैं तो कहीं न कहीं नासमझी कर रहे हैं, उसके बिना पीड़ा मिलती नहीं। जगत का संचालक इसी रूप में अपना क्लेम अभिव्यक्त करता है। वो सन्देश देता है आपको अपना कि बेटा बात को समझो। तुम जो सोच रहे हो मामला वैसा है ही नहीं। थोड़ा चेतो।

कबीर ये बिलकुल नहीं कह रहें हैं कि तिनका इसीलिए कीमती है क्योंकि किसी दिन आँख मेें पड़ जाएगा, ये अर्थ मत कर लीजियेगा कि छोटी से छोटी चीज़ भी किसी दिन बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है इसीलिए छोटी से छोटी चीज़ भी कीमती है। ये तो बड़ी व्यापारी बुद्धि का अर्थ हुआ कि चीज़ छोटी है पर एक दिन मेरे काम आ सकती है इसीलिए इसे इज्ज़त दो।

  श्रोता १: जैसे, किसी बच्चे को कहते हैं कि इसे कुछ मत कहो बड़ा होकर ये बिल गेट्स बनेगा?

आचार्य जी: बिलकुल।

श्रोता २: कबीर की जो रचनाएँ हैं, उन्हें मुख्यतः तीन श्रेणियों मैं बांटा गया है साखी, सबद और रमैणी। साखी में जो रचनाएँ हैं वो उपनिषदों में जो परम है, उससे सम्बंधित रचनाएँ है। इसीलिए साखी सबसे महत्वपूर्ण है। यहाँ भी ये जो बता रहे हैं तिनका, दरअसल उसको किसी रूप में देखने की बात कबीर नहीं कह रहे हैं, वो कह रहें हैं कि साक्षी रूप मैं देखो। चाहे कोई भी वस्तु हो, अगर तुम उसे किसी रूप मैं देखोगे, उसके लाभ के रूप में, हानि के रूप में, महत्व के रूप में, कम महत्व के रूप में तो उसको सही तरीके से देख ही नहीं सकते।

इसीलिए ये प्रश्न तो तिनके का नहीं बल्कि किसी भी चीज के लिए है। वो छोटा है, या कष्टकारी होने के कारण यहाँ बड़ा बताया गया है। छोटा होना या बड़ा होना महत्वपूर्ण है ही नहीं। कबीरदास की जितनी भी साखियाँ हैं उनमें कहीं न कहीं संकेत यही है जो कि उपनिषदों का संकेत है, परम का संकेत है, कि हर चीज़ परम है और उसको साक्षी भाव से देखो। अर्थात उसके बारे मैं उसके निष्कर्ष से प्रभावित हुए बिना देखना।

श्रोता १: एक और बात कही जाती है कि हानि या लाभ। मगर लाभदायक किसके लिए?

श्रोता २: साक्षी भाव में तो ये प्रश्न ही नहीं आता कि हानि है या लाभ है, यहाँ हानि और लाभ की तो बात की ही नहीं जाती। कहा जाता है कि कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, अनपढ़ थे, गंवार थे, मगर उनकी रचनाओं को साखी अर्थात साक्षी रूप में रखा गया और ईश्वर को साक्षी रूप में देख पाना सबसे विशुद्ध सत्य है और किसी मूढ़ के बस में नहीं है।

आचार्य जी: बात दूर तक जाएगी जिसका मतलब ये है कि तिनका छोटा है तो निंदनीय नहीं और बड़ा है तो?

श्रोता १: बड़ा है तो प्रशंसनीय नहीं।

आचार्य जी: छोटा है तो निंदनीय नहीं और बड़ा है तो प्रशंशनीय नहीं। और इसमें कोई नैतिकता की बात नहीं कि आप अच्छे बच्चे हैं या आप किसी का दिल नहीं दुखाना चाहते, तो आप उसको कुछ सान्तवना सी दे रहे हैं कि नहीं नहीं, कोई बात नहीं कि तुम तिनके हो तो क्या हुआ एक दिन तुम भी बड़े हो जाओगे। ये बात उसकी नहीं है, ये बात हमारी सामान्य नैतिकता की नहीं है। ये बात कबीर की साक्षी दृष्टि की है जो साफ़ साफ़ देख रही है कि तिनके को तिनका कहना ही भूल है, वो तिनका नहीं है।

और तुम्हारे सामने हिमालय खड़ा हो और तुम उसके सामने झुक जाओ कि मेरे नगपति, मेरे विशाल, तेरी विशालता के सामने मैं क्या? तो यह भी उतना ही बड़ा पागलपन है क्योंकि वो हिमालय  विशाल है ही नहीं।

श्रोता २: मेरे आधार पर विशाल है।

आचार्य जी: तुम अपने आप को कुछ मानते हो, तुमने अपनी इन्द्रियों के माध्यम से एक संसार में विश्वाश करना शुरू कर दिया है जहाँ पर तुमको कुछ छोटा कुछ बड़ा दिख रहा है, भेद-बुद्धि काम कर रही है। नहीं तो तिनका, तिनका नहीं है और पहाड़, पहाड़ नहीं है। उसमें से कोई सम्मान का हकदार नहीं है और कोई उपेक्षा का नहीं है।

श्रोत: इसपर एक बड़ा अच्छा सा चित्र प्रस्तुत हो रहा है। ये ऐसे है कि आप यहाँ पर हैं, तिनका यहाँ पर है, और पहाड़ यहाँ पर है। आप क्या कर रहे हैं, पहाड़ को नीचे खिंच रहें हैं और तिनके को ऊपर खिंच रहे हैं और दोनों घटनाओं में आप ये कह रहें हैं कि तू ही मैं। सारी चीज़े एक ही स्तर पर हैं और उसमे कहीं भी श्रेष्ठता और निम्नता नहीं है।

आचार्य जी: दो कोई मत खींचो, तुम, पहाड़, तिनका – तीनो को एक शून्य मेें जाने दो। क्योंकि उन दोनों को अपने में लोगे तो अपने को बचा लोगे। इन तीनों को  ही इक्कठे एक शून्य में  जाने दो, ये कह रहे है कबीर। क्योंकि पहाड़ है, और तिनका है, और तुम हो और तीनो एक ही तत्व है। तीनो अहंकार तत्व हैं – पहाड़ का होना, तिनके का होना और तुम्हारा होना, तीनों एक ही बात है। इन तीनो मैं से कोई एक साबूत नहीं बच सकता। तुम यदि यह सोचो कि पहाड़, पहाड़ न रहे तिनका, तिनका न रहे पर मैं, मैं ही रहूँ – यह नहीं हो पाएगा। जाएँगे तो तीनों जाएँगे।  .

तो, ऐसे हैं कबीर। यह जो हमने लिया जिससे शुरू किया ये कबीर के सबसे लोकप्रिय दोहों मैं से एक होगा और इसका आमतौर पर लोक संस्कृति में नैतिकता के आरंभिक पथ के रूप में लिया जाता है। और, ऐसे हैं कबीर जो एक जरा सी चीज़ से पता नहीं क्या कह जाते हैं। तो, जैसे कबीर कह रहे हैं कि तिनके को तिनका मत समझ लेना, वैसे ही कबीर के साधारण शब्द को साधारण मत समझ लेना। जैसे कबीर को तिनके में राम दिखाई देते हैं वैसे ही कबीर के साधारण शब्दों में भी ओंकार ही उच्चारित होता  है। यह पूरा अनहद है।

श्रोता १: कबीर जब कहते हैं तो इनके पीछे की जो सोच है, वो वैसे भी बहुत अलग होती है। चाहे वो जब कहते हैं कि “निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए” तो निंदा को प्रसंशा कि हिमालय देवात्मा है क्योंकि वो बड़ा है, बड़ा होने के कारण आपने उसको महत्व दे दिया। तो निंदक को पास रखना और बड़ा होने के कारण महत्व देना, इन सब के सम्बन्ध में गलत धारणाएँ हैं और कबीर इसे ही सही करने की कोशिश कर रहे हैं। छोटा है, बड़ा है, सही है, गलत है – ये विचार ही साक्षी भाव का अभाव है

श्रोता २: जब किसी चीज़ को श्रेष्ठ या निम्न कहा गया है तो दूरी को महत्व दिया जा रहा है। और उससे भी ज्यादा उस बिंदु को महत्व दिया जा रहा होता है जहाँ से ये दूरी मापी गयी है।

आचार्य जी: देखो, दुनिया को जो हम समझते हैं अगर दुनिया वैसी ही होती, जरा ध्यान दीजियेगा इस बात पर, हम सब होशियार हैं बहुत होशियार हैं। सबको पता है ये सब क्या है हमें सब को पता है। दुनिया अगर वैसी ही होती तो हमें इतने झटके क्यों लगते। एक ज़रा सी बात है जो कबीर पूछ रहें हैं, “तिनका, तिनका होता तो आँख में कैसे चुभ जाता? धूल, धूल होती तो गले में कैसे फँस जाती?” निश्चित रूप से ये सब कुछ वो है ही नहीं जो तुम समझ रहे हो। तिनके का आँख में जाना?

वो अंग्रेजी की कविता सब ने सुनी ही होगी “फॉर वांट ऑफ़ अ शू-नेल दी बैटल वास लॉस्ट”। ये सब बातें क्या इशारा कर रही है? कि ये इतना तो बता ही रही हैं कि ये सारा चक्र वो नहीं है जो तुम इसे समझ रहे हो। क्या है? ये भी जान जाओगे अगर ध्यान दो। ये पूरा चक्र क्या है ये भी समझ जाओगे अगर ध्यान दो। लेकिन दिन-रात जो पीड़ा मिल रही है, जो ठोकरें मिल रही है उस से इतना तो चेतो कि ये वो नहीं है जो मैं इसको मानता रहता हूँ।

मैंने तो कल्पना कर रखी है कि मैं बहुत होशियार हूँ। दुनिया के कल पुर्जों से वाकिफ हूँ। पर अगर मैं इतना ही जानता होता और  इतना ही समझदार होता तो दिन-प्रतिदिन आहत क्यों होता? एक एक दिन में पाँच पाँच बार, शायद मैंने कम बोल दिया शायद पचास-पचास बार हम आहत होते हैं – चाहते कुछ हैं मिल कुछ और जाता है। पास जाते हैं, पर्दा उठाते हैं दृश्य वहाँ कुछ और होता है। हम इतने होशियार होते तो ये सब क्यों होता?

अपेक्षाएँ दिन रात टूटती, पर फिर भी बनती हैं। तुम इतने जानकार होते तो तुम्हारे साथ ये सब घटनाएँ घट रही होंती? मैं बहुत साधारण सी बात पूछ रहा हूँ?

श्रोता: जीवन चलते रहने का नाम है।

आचार्य जी: चलते रहने का नाम, बड़ी अच्छी बात है, सुनने मैं अच्छा लग रहा है। पर क्या ठोकरें खा खा के चलने का नाम जीवन है?

श्रोता: ठोकरें खाने से ही तो सीखते हो।

आचार्य जी: ठोकरें खा के क्या सीखते हो? ठोकरें लगनी कभी कम भी तो हों और फिर कभी बंद भी तो हों। ठोकरें तो दिन रात लग रहीं हैं। इतनी सी भी अपेक्षा पूरी नहीं होती कि चाय वैसी ही आ जाए जैसी चाहते हैं (सभी हँसते हैं), होती है क्या? अगर ये पूरा तंत्र वैसा ही होता जो तुम इसे समझते हो तो कम से कम तुम्हें तुम्हारे मन मुताबिक चाय तो दे देता। चाय भी पता नहीं कहाँ से आ रही है। उसकी अपनी पूरी एक प्रक्रिया है जिसको तुम नहीं जानते, और तुम बड़े होशियार हो। निश्चित रूप से चाय वो है ही नहीं जो तुम उसे समझ रहे हो। यहाँ मामला कुछ और है।

बड़ी साफ़ बुद्धि का आदमी चाहिये, कोई उसके लिए तीक्ष्ण धार नहीं चाहिये। बहुत साफ़ मन का आदमी चाहिये, उसको दो चार बार ठोकर लगेगीं, वो खड़ा हो जाएगा वो कहेगा “ठहरो, इतनी ठोकरें लग रही है इसका मतलब देखने में ही भूल है।” इसका मतलब ये नहीं है कि रास्तों में पत्थर ज्यादा पड़े हैं। अगर कदम कदम पर ठोकर लग रही है तो इसका मतलब है “देखने में ही भूल है।” ये आँखें ही कुछ गड़बड़ कर रही हैं, इन्हें साफ़ करना पड़ेगा। वो रुक जाएगा।मन

और इसके लिए बहुत ऊँची आई.क्यू. नहीं चाहिये, इसके लिए एक साफ़ मन चाहिये जो अड़ा हुआ न रहे, जिसमें गुरूर न रहे कि  हमारी आँखें गलत कैसे देख सकती है? जो चुपचाप स्वीकार कर लें कि इतनी चोट लग रही है, घुटनों से हाथ से, नाक से, दिल से, हर जगह से खून ही खून बह रहा है, छत विक्षत हूँ पूरा, ऊपर से लेकर नीचे तक चोट का सूजा हुआ पिंड भर हूँ मैं – जैसे इतने पिटे गए हैं कि कहीं लाल, नीले, पीले, काले, सूजे सूजे से हैं। ऐसी मेरी अवस्था है, थमना पड़ेगा, मैं क्यों ऐसे ही चला जा रहा हूँ और उसपर से दावा मेरा क्या है?

श्रोता: कि मुझे साफ़ साफ़ दिखता है।

आचार्य जी: मैं तिनके को तिनका और पत्थर को पत्थर बोलता हूँ। कबीर हमारी पूरी दृष्टि की ओर इशारा कर रहें हैं कि तुम देख ही नहीं रहे, तुम मात्र कल्पना कर रहे हो, धारणा में बैठे हो। अपनी इस पूरी प्रक्रिया के साक्षी हो जाओ, चोट लगनी बंद हो जाएगी।

श्रोता: हम तो ढंग से अहंकारी भी नहीं हैं।

आचार्य जी: एक बात समझना वहाँ पर, अहंकार चोट में ही फलता फूलता है। तो अहंकार खुद चाहता है कि उसे चोट लगे। अगर ये सोच रहे हो कि अहंकार चाहता है कि उसे चोट न लगे तो चूक कर रहे हो। अहंकार चाहता है कि उसे चोट लगे। हम ऐसे बीमार हैं जो ठोकरों की मांग करते हैं। इसीलिए पाओगे कि जब भी कभी तुम्हारी ओर मदद करने को, ठोकरों से बचाने को कोई कबीर बढ़ता है तो तुम उस कबीर को ठुकरा देते हो। समझ मैं आ रहा होगा कि क्यों नहीं पढ़े जाते। क्योंकि वो तुम को ठोकरों से बचा देंगे, और ठोकरें यदि गईं तो तुम्हे भी जाना पड़ेगा।

जब भी कभी पढ़ने में, इसको पढ़ कर के जो कहता हूँ कि थोड़ा लिख लो, लिखने में मन न लगे तो साफ़ साफ़ समझ जाना कि कौन है जो बाधा बन के खड़ा हो रहा है। वही बाधा बन के खड़ा हो रहा है जो दर्द में ही जीवित रह सकता है। उसका दर्द यदि हटा दिया तो वो ख़त्म हो जाएगा। आनंद में, प्रेम में, अहंकार घुल जाता है ; इसीलिए अहंकार दर्द को आमंत्रित करता है, प्रेम को ठुकराता है “प्रेम आ गया तो मैं जिंदा कैसे बचूंगा?” तो तुमने जो कहा कि हम अपने प्रति संवेदनशील नहीं हैं। अहंकार की कोई संवेदनशीलता होती ही नहीं।

श्रोता: मगर दर्द तो हो रहा है ना। ये बात तो ठीक है कि जब मैं ध्यानपूर्वक नहीं देख रहा हूँ, तब मैं उस दर्द को आमंत्रित कर रहा हूँ। लेकिन वो जो तिनका गया आँख में तो मुझे दर्द हो रहा है।

आचार्य जी: जब जब दर्द हुआ है तुमने क्या कहा है?

श्रोता: मुझे दर्द हुआ।

आचार्य जी: और चूंकि मुझे दर्द हो रहा है, इसीलिए दर्द देने वाला कौन है?

श्रोता: कोई बाहरी।

आचार्य जी: तुम्हारे और संसार के बीच कि सीमा और गहरी हुई है। आनंद में तुम्हारे और संसार के बीच की सीमा घुलती है, हलकी होती है। दर्द में तुम्हारे और संसार के बीच की सीमा और गहरी होती है। जब तुम प्रेम में होते हो तो पत्थर, पत्थर नहीं होता पानी, पानी नहीं होता और रेत, रेत नहीं होती। तो फिर अंतर नहीं पड़ता कि तुम कहाँ लोट रहे हो, कहाँ गिर पड़े हो। तुम्हारे मुँह में या आँख में या वस्त्रों में कहाँ रेत घुसी है। कहाँ अंतर पड़ता है? सीमाएंँ गईं।

कौन तुमको देख रहा है? कौन तुम्हारे बारे में क्या विचार रख रहा है? तुम कहाँ परवाह करते हो? तुम आधे कपड़ों में नाचना शुरू कर देते हो, चलना शुरू कर देते हो, ये आनंद में होगा। आनंद सीमाएँ गिराता है, दुःख सीमाों को पक्का करता है इसीलिए दुःख अहंकार की सामग्री है। दुःख अहंकार का भोजन है। अहंकार दुःख ही दुःख मांगता है, उसे चाहिये।

पर, जिसको वो सुख कहता है, हम अच्छे से जानते हैं कि वो क्या है? वो उस दुःख की धारा का अस्थायी रूप से थम जाना है। सिर्फ अस्थायी रूप से थमना है ताकि वो फिर से पुनर्जीवित होके बह सके। द्वैत का यही तो नियम है ना। तो भले तुम ये कहो ज़ोर से कि मैं सुख चाहता हूँ पर तुम इक्कठा दुःख ही करोगे। इक्कठा तुम दुःख ही करोगे। जो तुम चाह रहे हो उस चाह का मूल तत्व सुख नहीं है, दुःख है। हाँ, दुःख की धारा जहाँ कहीं थोड़ी हलकी पड़ती है, पतली पड़ती है तब तुमको ये आभास होता है कि मैं दुःख की अपेक्षा में, दुःख की तुलना में…?

श्रोता: सुखी हूँ।

आचार्य जी: तुम्हारी हर कोशिश सिर्फ दुःख इक्कठा करने की है और कोई कोशिश नहीं है। अहंकार दुःख पर ही जिंदा रहता है। तुम्हें दुःख चाहिये नहीं है, उसे बोध चाहिये तुम्हारी दया नहीं, यही अंतर करुणा और दया में होता है। दया, दुःख को असली मानती है, दया सोचती है कि ये दुःख में पीड़ित है।

श्रोता: मान्य बनाती है।

आचार्य जी: हाँ। करुणा जानती है कि ये दुःख में पीड़ित नहीं है, इसने दुःख इकट्ठा कर रखा है, क्योंकि ये दुःख में ही जिंदा रहेगा। करुणा, बोध देती है।

श्रोता: क्या इसका कोई सम्बन्ध लिंग से भी होता है?

आचार्य जी: एक लिंग दूसरे के बिना होता है? तो मैं कहूँ कि होता है, यदि एक लिंग से होगा इसका सम्बन्ध तो?

श्रोता: दूसरे की वजह से होगा।

आचार्य जी: एक लिंग हो सकता है क्या यदि एक ही लिंग हो?

श्रोता: यह एक जो सीमा होती है लिंग की उसको और मजबूत कर देती है। और उस समय जो हम कहते हैं  “तुम नहीं समझोगे”। ये बात कि “ तुम नहीं समझोगे” ये इस सीमा को और गहरा कर देता है।

आचार्य जी: देखो, वास्तविक रूप में जो कहा जा रहा है ना कि तुम्हें समझ में नहीं आएगा तो ये बात ठीक ही है। क्योंकि हम सब अपनी अपनी दुनिया में जीते हैं। अहंकार अपना संसार आप है, तो कुछ हद तक ये बात बिलकुल ठीक है कि उसको दूसरा व्यक्ति कभी ठीक-ठीक अनुभव नहीं कर सकता। कोई व्यक्ति बिना बात ही कलप रहा है, बिलख रहा है, इसको दूसरा व्यक्ति कुछ भी कर ले अनुभव नहीं कर सकता, भले ही वो किसी छोटी बात पर बिलकुल बेवकूफी के मुद्दे पर पागल हो रहा हो। लेकिन उसके लिए तो उसकी पीड़ा असली है और उस पीड़ा को उसके अतिरिक्त और कोई नहीं जान रहा। तो ये बात ठीक भी है।

लेकिन इसको इस रूप में कहा जाना चाहिए कि “तुम अनुभव नहीं करोगे”, “तुम नहीं समझोगे” नहीं। क्योंकि समझा तो जा सकता है कि तुम जो कर रहे हो ये क्या है। हाँ, अनुभव नहीं कर सकता। जो अनुभोक्ता है वो तो उधर ही है, वो इधर नहीं है।

जब भी कभी अपने आप को दुखी देखो, उदास, अकेला, प्रेम से खाली तो बस इतना ही कहना कि और कितना चढ़ाना है अभी अहंकार? दुनिया को दोश मत देना। तुम्हारी भूख मिट नहीं रही है, तुम्हें अभी बहुत बड़ा महल चारों ओर अपने खड़ा करना है, बड़ी ऊँची-ऊँची दीवारें, ये कह के कि ये मेरा महल है। यही तो मेरे अहंकार का महल है ना, ऊँची दीवारें होनी चाहिए। उनका ईंट, पत्थर, सीमेंट सब दुःख है। जितना तुम्हारा दुःख भारी होगा उतनी ही मोटी मोटी और ऊँची तुम्हारे महल की दीवारें होंगी।



 सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: तिनका कबहुँ न निंदिये (The small is not what it appears)

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

 

 

2 टिप्पणियाँ

  1. “इस पूरे तंत्र में इस पूरी व्यवस्था में बड़ी सुंदर व्यवस्था चल रही है, इसमें पीड़ा आपको मिलती ही नहीं है अगर आप कहीं न कहीं कोई चूक न कर रहें हों। आँख का दर्द हो चाहे मन का दर्द हो, कैसी भी पीड़ा से अगर आप गुज़र रहे हैं तो कहीं न कहीं नासमझी कर रहे हैं, उसके बिना पीड़ा मिलती नहीं।”

    हम अपने ही नर्क बन बैठते हैं। अपनी अक्ल लगाते हैं और दिन रात उलझे रहते हैं।

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
      ~~~~~
      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
      ~~~~~
      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
      ~~~~~~
      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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