जिसे सत्य का पता है उसके लिए सारे तथ्य सार्थक हो जाते हैं

तुम जिन शब्दों में दिन रात खेलते-कूदते रहते हो, तुम जिन शब्दों में लगातार जी रहे हो, जो शब्द तुम्हारे मानस-पटल पर दिन-रात उभरते रहते है तुम्हें उनका ही कुछ नहीं पता। तुम्हें पैसे का पता है? बताओ पैसा क्या है, समझाओ? तुम बार-बार कहते हो कैरियर, समझाओ बात, ठीक से समझाओ बात कैरियर क्या है। तुम कहते हो तरक्की, प्रगति, समझाओ ठीक-ठीक तरक्की माने क्या? तुम कहते हो परिवार, थोड़ा बता दीजिये, परिवार माने क्या? और बात साफ़-साफ़ करियेगा, छुपाने की नीयत से नहीं, खोलने की नियत से करियेगा।

तुम्हें कुछ नहीं पता, तुम्हें परमात्मा का क्या पता होगा। जिसे परमात्मा का पता हो उसे सब पता चल जाता है। जिसे सत्य का पता है उसके लिए सारे तथ्य सार्थक हो जाते है। फिर सारे तथ्य, सत्य की रोशनी में चमकने लगते है। जिसे सत्य का नहीं पता उसके लिए जितने तथ्य है वो सब मुर्दा है। उनका कोई अर्थ नहीं।

जिसे सत्य का पता है वो देखेगा पदार्थ को, शरीर को देखेगा। आँखे शरीर ही देखेंगी, शरीर तथ्य है। पर अब उसके लीए शारीर जो है, वो उसके लिए कभी नहीं हो सकता जिसे सत्य का कुछ पता नहीं। जो सत्य को जाने बिना शरीर को देख रहा है, उसके लिए शरीर सिर्फ एक मुर्दा इकाई है। थोड़ा सा माँस, कुछ किलो माँस।

आश्वस्ति से बचिये, सर्टेनिटी  से बचिये। इस भाव से बचिये कि ऐसा तो है ही। साफ़-साफ कह रहा हूँ आपसे, आप जैसा भी समझते हो कि है, वैसा तो नहीं है। नहीं कुछ मामलो में वैसा नहीं है या हर मामले में वैसा नहीं है? हर मामले में वैसा नहीं है। आप जहाँ कहीं भी सोचते है कि ऐसा है, ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है। शुरू में आपको ये बात अजीब सी लगेगी, लेकिन जैसे-जैसे ज़रा सी श्रद्धा के साथ इस पर आगे बढ़ेंगे आपको दिखता जाएगा, कि हाँ हम जो भी, जैसा भी समझते थे वैसा तो नहीं था, वैसा तो नहीं था। और फिर आपके लिए और सरल होता जाएगा, अपने विश्वास पर अविश्वास करना।



पूर्ण लेख पढ़ें: ‘मैं जानता हूँ’-सबसे अधार्मिक वचन

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