मैं ही व्यर्थ अड़ा हुआ हूँ।

आप बार-बार खुद पी रहे हैं, और उसके बाद जा के भरे बाज़ार शिकायत कर रहे हैं, कि मुझे तो होश मिलता नहीं। होश तो आने को तैयार है, और नशा जाने को तैयार है। क्योंकि नशा स्वभाव नहीं। होश स्वभाव है। नशा तो चढ़ाना पड़ता है, कृत्रिम है, बनावटी है, बाहरी है। नशा चढ़ा भी लो कितना, तो भी तुम ये कभी पक्का नहीं कर सकते, कि नशा चढ़ा ही रहेगा। शराबियों की समस्या ही यही रहती है, वो कितना भी चढ़ाते हैं, उतर जाता है। बार बार नशा चढ़ेगा, बार बार यही लगेगा कि एक नहीं एक हज़ार है।

जान लो कि अपनी पात्रता को खुद कितना संकुचित करे बैठे हो। तो उसके बाद अगर कोई ये समाचार भी देगा कि अभी बहुत तपस्या है, बहुत साधना है, पेड़ के पत्तों जितना समय, उतने जन्म चाहिये, तो  लगेगा कि धन्य भाग। तो भी यही लगेगा कि किसी ने वरदान दे दिया।

अपनी क्षुद्रता का, अपनी वर्तमान पात्रता का, पता कैसे लगे? अपने जीवन को देख करके। देखो ज़िन्दगी को, सुबह से शाम तक क्या आज? देखो, पिछले चार दिन क्या किया? देखो, पिछले तीस साल क्या किया। तुम अपने एक घंटे को भी अगर गौर से देख लो, ईमानदारी से साफ़ साफ़ देख लो, तो उसके बाद दोष देने के लिए न अध्यात्म बचेगा न बाज़ार बचेगा। उसके बाद यही पाओगे कि मेरा ही हठ है। उसके बाद ये ही पाओगे कि मैं ही अड़ा हुआ हूँ, व्यर्थ अड़ा हुआ हूँ। हठ छोड़ने की देर है, जिस चीज़ के लिए मैं इतना उतावला हो रहा हूँ, मिल जाएगी।



पूर्ण लेख पढ़ें: क्रोध या बेईमानी?

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