आस्तिक और नास्तिक

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प्रश्न: आचार्य जी, अभी भजन की बात करी हमने, मैं कबीर जी के श्लोक की किताब पढ़ रहा था, उसमें लिखा भी हुआ है कि जो व्यक्ति प्रभु का भजन नहीं करता वो बुद्धिहीन होता है, उसका जीवन अपवित्र होता है, तो हम ये बोल सकते हैं की इस संसार में जितने भी नास्तिक हैं, उनका जीवन अपवित्र है?

आचार्य प्रशांत: हाँ, बिलकुल बोल सकते हो, पर नास्तिक कोई होता ही नहीं है। लोग अलग अलग तरह से आस्तिक हैं। नास्तिक कोई नहीं होता। जब तुम कहते हो, “अस्ति,” तो तुम किसकी अस्ति बता रहे हो, आस्तिकता का अर्थ है – तुमनें हाँ भरी, “अस्ति” – है। तो तुम किसको कह रहे हो कि “है”?

ज़रूर अपने मन की ही किसी छवि को कह रहे हो कि है। परमात्मा को तो यह कह पाना कि, “है,” बड़ी असम्भव बात है। ये ज़मीन है, ये कुर्सी है, ये कैमरा है, ये खम्बा है, ये सब “हैं”। परमात्मा को अस्ति कैसे बोल दोगे? अस्ति तो उस चीज़ को बोलोगे, जो सीमित है। अस्ति तो उस चीज़ को बोलोगे जो सामने है, दृष्टव्य है, इन्द्रियगत है। तो, जो आस्तिक बोलते हैं, वो भी अंततः अस्ति बस अपने आप को बोल रहे हैं। मैं हूँ, तो मेरे पास कोई परमात्मा की छवि है। यही हाल नास्तिकों का है। वो भी जब बोल रहे हैं, “न अस्ति”, तो वो किसका निषेध कर रहे हैं? परमात्मा का तो निषेध किया नहीं जा सकता। तुम बिलकुल ये कह सकते हो कि यहाँ पर एक कप नहीं है, “कप न अस्ति”। कप के बारे में कहा जा सकता है कि वो है, या नहीं है। परमात्मा के बारे में कैसे बोल दोगे, “न अस्ति?” तो, नास्तिक भी जब कह रहा है कि ‘नहीं है’, तो वो कह रहा है कि ‘मैं हूँ और मेरा कथन है कि परमात्मा नहीं है।’

दोनों ही स्थितियों में, दोनों एक बात पर तो राज़ी हैं, क्या? “मैं हूँ।” तो दोनों ही क्या हुए?

तुमने ये तो मान लिया ना कि तुम हो? और ‘तुम हो’ से श्रृंखला शुरू होती है, जिसकी आखिरी कड़ी का नाम है, परमात्मा। तुम इतना ही मान लो यदि, कि और कुछ नहीं है संसार, बस मेरा ही प्रक्षेपण है, “मैं तो हूँ,” तो तुम आस्तिक हो।

आस्तिक सभी हैं, बस अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। असली आस्तिक कोई नहीं है। सब? अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। निर्वैयक्तिक आस्तिक कोई नहीं है। सबके पास आस्तिकता की व्यक्तिगत परिभाषाएँ हैं। असली आस्तिकता होती है जब सिर्फ वो बचे जो वास्तव में है, जिसका वास्तव में “अस्तित्व” है। तुम बचो ही न ये कहने के लिए कि “अस्ति” या “न अस्ति”। अस्तित्व मात्र बचे, तब हुए तुम आस्तिक। वो हुई विशुद्ध आस्तिकता। वैसे आस्तिक विरले होते हैं।

तुम तो अस्तित्व से अपने आप को काट के बोलते हो, “परमात्मा है।” “परमात्मा अस्ति, परमात्मा घूम रहा है वहाँ पर, घास के ऊपर, वो उधर, पूर्व दिशा में वहाँ खड़ा हुआ है,” ऐसे बोलोगे ‘अस्ति’? और थोड़ी देर में तुम्हें नहीं दिखा, तो बोलोगे, “न अस्ति”। ये आस्तिकता, नास्तिकता का खेल ही बचकाना है। तुम बात किसकी कर रहे हो? उसकी जिसकी बात ही नहीं की जा सकती! तुम हाँ या ना किसको बोल रहे हो? जो हाँ या ना दोनों के पार है! और तुम देख भी नहीं रहे कि हाँ या ना बोलने में बस एक की सत्ता को तुम स्वीकार कर रहे हो, किसकी सत्ता को? अपनी।

चलो ठीक है, कोई बात नहीं। तुमनें इतना तो मान लिया कि तुम हो? बस तुम हो तो परमात्मा है। बात ख़त्म । क्योंकि तुम हो यदि, तो तुम्हारी झिलमिल ही सही, मिलावटी ही सही, अपूर्ण ही सही, चेतना तो है ना? उसी चेतना ने बोला ना? कि ये है और ये नहीं है। कितनी भी तुम्हारी मिलावटी चेतना हो, वो ये तो प्रमाण देती ही है, कि विशुद्ध चेतना भी हो सकती है। और विशुद्ध चेतना का नाम ही परमात्मा है।

गंदा जल भी तो गंगा जल का ही प्रमाण होता है। कि नहीं होता? अगर पानी गंदा हो सकता है तो? साफ़ भी होता ही होगा? तो तुम अगर बेवकूफी की बात कर सकते हो, कि ‘अस्ति’ या ‘न अस्ति’, तो पक्का है कि बोध भी कुछ होता ही होगा? अगर तुम इतनी अबोध बात कर रहे हो, कि परमात्मा है और परमात्मा नहीं है, दो जने ज्ञानी बैठ कर के, शास्त्रार्थ लड़ा रहे हैं । एक कह रहा है मैं आस्तिक, एक कह रहा है मैं नास्तिक; जब तुम इतनी अबोध बात कर सकते हो, तो फिर बोध भी ज़रूर होता होगा ।

खलिल जिब्रान की कहानी है कि जिसमें दो गुणी ज्ञानी मिलते हैं, एक होता है आस्तिक, एक होता है नास्तिक। और दोनों में बड़ी लड़ाई, तू-तू मैं-मैं हो जाती है, मार पिटाई हो जाती है, एक दूसरे के शास्त्र फाड़ डालते हैं। लेकिन एक दूसरे को तर्क दिए जा रहे हैं, एक दूसरे की बातें काटे जा रहे हैं। अगले दिन ये देखा जाता है कि जो नास्तिक है, वो मंदिर में सर नवा रहा है और जो आस्तिक है वो मंदिर को पीठ दिखा रहा है। ऐसी तो हमारी नास्तिकता, आस्तिकता हैं – धारणाएँ हैं।

धारणा माने समझते हो? जो कुछ तुमने धारण कर लिया हो। जो तुम धारण करते हो वो बदलता रहता है। अभी ये वस्त्र धारण किया है, पहले कुरता पहन के आया था। जो धारण किया था वो बदल गया, धारणा बदल गयी। पर धारणा बदल भी रही है, इससे इतना तो साबित होता है कि धारण करने वाला कोई ज़रूर मिल जाएगा। हो गए आस्तिक। वो तो है ना जो धारण कर रहा है? धारणा दो कौड़ी की, पर धारण करने वाला तो कोई हुआ? और, जो धारण करने वाला है, वो होगा कितना भी अनाड़ी, अशुद्ध, पगला, उसकी स्थिति बताती है कि उससे पीछे भी कुछ है।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: आस्तिक और नास्तिक

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

2 टिप्पणियाँ

  1. “आस्तिक सभी हैं, बस अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। असली आस्तिक कोई नहीं है। सब? अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। निर्वैयक्तिक आस्तिक कोई नहीं है। सबके पास आस्तिकता की व्यक्तिगत परिभाषाएँ हैं। असली आस्तिकता होती है जब सिर्फ वो बचे जो वास्तव में है, जिसका वास्तव में “अस्तित्व” है। तुम बचो ही न ये कहने के लिए कि “अस्ति” या “न अस्ति”। अस्तित्व मात्र बचे, तब हुए तुम आस्तिक। वो हुई विशुद्ध आस्तिकता। वैसे आस्तिक विरले होते हैं।”

    आस्तिकता और नास्तिकता पर ऐसे वचन पहली बार सुने। इन शब्दों ने मेरी धारणाएँ ख़त्म कर दी हैं, जो आस्तिकता और नास्तिकता को ले कर थीं।

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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