डर, बंधन और मुक्ति

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प्रश्न: सर, हम जीवन में कोई भी प्रयास करते है, जैसे कि सफलता की तरफ उठाया गया कोई भी कदम , तो उससे हम हमेशा डरते क्यों है?

आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम प्रयास पर कम और उसके परिणामों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे होते हो। तुम्हें इस बात से तो बहुत कम सरोकार होता है कि क्या है और क्या हो रहा है? तुम्हारा मन उड़ – उड़कर बैठा होता है कि इसका परिणाम क्या होगा? जब परिणाम की इतनी चाहत हो जाती है, जब परिणाम ही सर्वोपरि हो जाता है, तो फिर डर आएगा ही आएगा। क्योंकि परिणाम हमेशा दो तरह का हो सकता है – इच्छा के अनुकूल और इच्छा के विरुद्ध। जिसे डरना न हो वो ये सोचना ही छोड़ दें कि कल क्या होगा।

तुमने मुझसे बेटा एक बात पूछी, अगर मैं सोचना शुरू कर दूँ कि मैं जो कह रहा हूँ इसका तुम पर परिणाम क्या होना है, तो मैं क्या तुमसे कुछ भी कह पाऊँगा? और जो फिर मैं तुमसे कुछ कहूँगा भी, पता है वो क्या होगा? वो मैं सब जो जांचा और परखा है वही कहूँगा। फिर जो मैं आजतक इतने सालो से और लोगों से बोलता आया हूँ वही मैं तुम पर दोहरा दूँगा कि तब उन लोगों से बोला था, उनको अच्छा लगा था, बात समझ में आ गयी थी, वही बात मैं तुम्हें भी दे दूँ। और, तुम्हें क्या अच्छा लगेगा अगर मैं इस तरीक़े से बात करूँ तुमसे?

जो भी व्यक्ति परिणाम मे जियेगा, वो हमेशा कुछ भी करते हुए अटकेगा, हिंचकेगा, झुंझलाएगा, पर तुम करो क्या? तुम्हारी मजबूरी यही है कि तुम्हें बचपन से घुट्टी ये पढ़ाई गई है कि परिणाम अच्छा होना चाहिये।

श्रोता: हमेें, सर यही कहा गया है ना कि अंत भला तो सब भला।

आचार्य जी: अंत भला तो सब भला, ऑल इज़ वेल, दैट इन्डस वैल। ऑल इज़ वेल तो बहुत बढ़िया बात है पर तुमसे ये नहीं कहा गया कि ऑल इज़ वेल, ऑल इज़ वैल के आगे शर्त लगा दी गयी ऑल इज़ वे इफ इट इन्डस वैल, अब ये तो बड़ी दिक्कत हो गयी। ऑल इज़ वेल तो बहुत – बहुत शुध्द बात है, परम सत्य है कि गलत कभी कुछ होता ही नही जो ही है बहुत बड़ीया है, अद्भुत है। पर तुमसे ये नहीं कहा गया, तुमसे ये कहा गया, “सब भला, यदि अंत भला” और ये बताओ अंत कभी आता नहीं, अंत कभी आता है? अंत कभी आता नहीं तो भला भी कभी कुछ होता नहीं।

श्रोता: आचार्य जी, मुक्ति कैसे मिले?

आचार्य जी: कुछ है ना भीतर जो कह.रहा है कि मुक्त होना है, तभी ये सवाल पूछ रहे हो। कुछ है ना जो कह रहा है कि फिलाल कुछ ठीक नहीं है, तभी ये सवाल पूछ रहे हो। कुछ है जो बंधन का और बीमारी का एहसास करा रहा है, तभी ये सवाल पूछ रहे हो। वो जो है, वो तुम्हारी मुक्ति ही है; वो मुक्ति ही है जो मुक्ति को पुकार रही है।

तुम जब बीमार होते हो तो तुम्हें अच्छा नहीं लगता ना? कौन होता है वो जो कहता है कि अच्छा नहीं लग रहा? वो स्वास्थ्य होता है। स्वास्थ्य पुकारता है कि बीमारी हटाओ। तो, स्वास्थ्य ही स्वास्थ्य को आवाज़ देता है। बात को समझो। मुर्दा कभी कहेगा कि बीमारी हटाओ। कभी किसी मुर्दे को कहते हुए सुना कि यार, ये जो मेरा हाथ है ना ये जऱा टेढ़ा पड़ा हुआ है, ये सीधा कर देना दर्द सा हो रहा है। या अभी ठंड बहुत लग रही है ए. सी. तो चला दो कम – से – कम, थोड़ी देर मे तो वैसे ही जला दोगे अभी तो ठंडक दे दो, कभी किसी मुर्दे को कहते हुए सुना।

तो ये एहसास भी कि मैं बीमार हूँ, मैं अस्वस्थ हूँ, कुछ ठीक नहीं है, बेड़ियाँ हैं, बंधन हैं, ये एहसास भी तुम्हारे प्राणो से उठता है। वही तुम्हारी मुक्ति है, वही बुला रही है। तो ये धारणा बिल्कुल छोड़ दो कि मुक्ति पानी है, मुक्ति तुम्हारे भीतर ही बैठी है, वही इस वक्त खड़े होकर के आवाज़ दे रही है। ये जो तुम बोल रहे हो ना ये “मुक्ति,” ये तुम्हारी मुक्ति की ही आवाज़ है, समझे! मुक्ति क्या आवाज़ दे रही है? वो ये नहीं कह रही है कि मुझे पाओ, वो कह रही है कि मुझे प्रकट होने दो। मेरे ऊपर ये तुमनें इतना धूल, धूसर लाद रखा है, इसको साफ करो।

मुक्ति पानी नहीं है मुक्ति भीतर बैठी है, वो लगातार आवाज़ देती है। आनन्द पाना नहीं है, मिला ही हुआ है वो भी लगातार आवाज़ देता है। प्रेम पाना नहीं है, वो है, वो भी पुकारता है। ये सब पाने की चीजें नहीं होती हैं, ये तो तुम्हें उपलब्ध ही हैं। तुम्हें बस वो सब हटा देना है जो तुमनें फालतू ही इक्टठा कर लिया है – कचरा। वही ताकत जो तुमसे ये सवाल बुलवा रही है ना, वही ताकत तुम्हें बताएगी कि तुम्हारी जिन्दगी मे वो क्या – क्या है जो तुम्हारा बंधन है, उस सबसे मुक्त हो जाओ।

जवान हो, होशियार हो, आँखें हैं तुम्हारे पास, सब दिखेगा। तुमको साफ – साफ दिखाई पड़ेगा कि किन फालतू बंधनों को पकड़कर बैठे हुए हो। बंधन हटाने हैं? मुक्ति पानी नही हैं? मुक्त तो तुम हो ही, बंधन बस बेहोशी का नतीजा है। तुम भोले होते हो, तुम्हें ये सूझता भी नहीं कि नासमझ लोग तुम्हारे दिमाग मे नासमझी भर रहे है, तुम संदेह भी नही कर पाते। ये भोलापन है तुम्हारा। और तुम्हारे भोलेपन में तुम्हारे दिमाग में बहुत सारा कचरा भर दिया जाता है, लगातार भरा ही जा रहा है। ऐसा नहीं है जो भर रहे है उनकी नीयति खराब है, उनकी नीयति नहीं खराब है, वो बस नासमझ हैं।

पर तुम नासमझ रह आए हो, ये कोई जरुरी नहीं है। तुम गौर से देखो कि तुमनें दिमाग में जो कुछ भी पाल रखा है, वो क्या है? और जो कुछ भी ऐसा पाओ, जो तुम्हें सीमित करता है, जो तुम्हें छोटा करता है, जो डराता है, तुरन्त उसको छोड़ दो, तुरन्त त्याग दो, यही मुक्ति है। सिर्फ इसीलिए कि बहुत सारे लोगों ने बहुत समय तक कुछ कहा है वो बात ठीक नहीं हो जाती। उसको जाँचो, उसको परखो, उसको अपनी मुक्त दृष्टि से देखो। सिर्फ इसीलिए कि परम्परा, समाज एक प्रकार से चलते रहे है, वो बात ठीक नहीं हो जाती। बल्कि ज्यादा संभावना इसी बात की हो जाती है कि बहुत सारे लोग यदि कुछ कर रहे हैं, तो वो बात मूर्खता की ही होगी।

तो तुम्हें लकीर का फकीर हो जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यही तो बंधन है कि होता आया है तो ठीक ही होगा, कि जीवन ऐसा ही तो होता है। नहीं, जीवन ऐसा ही नहीं होता है, जीवन वो है जो तो उसे तुम अपने होश में जानो वही जीवन है। अरे! जिन्होंने बनाये उन्होंने बनाये और तुम जब तक उन नियमों पर चले तुम चले। अब तो तुम्हारे पास एकमात्र नियम होना चाहिए तुम्हारी चेतना का – वही करुँगा जो समझूँगा, क्योंकि अब बच्चा नहीं।

आचार्य जी: मैंने कहा था ना, कोई तुम पर ताकत चला नहीं सकता जब तक तुम्हारे भीतर या तो डर न हो, या तो लालच न हो। जब भी पाओ कि कोई तुम पर हावी हो रहा है, जब भी तुम पाओ कि तुम्हारे ऊपर किसी ताकत का कब्ज़ा हो रहा है तो समझ जाना कि तुम लालची हो या डरे हुए हो। लालच को हटाओ, और डर को हटाओ, और कोई डर तुम पर चल नहीं पाएगा। तुम्हें लड़ने की जरूरत नहीं है सामने वाले से। जब सामने वाला आए तुम्हें डराने तो उससें मत लड़ो, अपने भीतर देखो कि मेरा लालच कहा है। अपना लालच हटा दो, कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दूसरे तुम्हारा नुकसान नहीं करते, तुम्हारा अपना मन ही तुम्हारा नुकसान करता है।

श्रोता: सर, क्या हमारे माँ-बाप हमारे लिये बंधन है?

आचार्य जी: बेटा! अगर वो खुद मुक्त हो तो तुम्हें मुक्ति दे पाएँगे। दिये से दूसरा दिया जलता ही है, पर अंधेरा किसी को रोशनी नहीं दे पाएगा। अगर तुम्हें कुछ समझ आया है तो तुम्हारा दायित्व है कि उनको भी समझाओ। कोई जानबूझकर किसी और को बंधन में नहीं डालता, याद रखना दिया कोशिश भी कर ले तो भी अंधेरा नही फैला सकता। सागर कोशिश भी कर ले तो भी ये नहीं कर पाएगा कि अब मेरे पास पानी नहीं है। बादल कोशिश भी कर ले तो भी अपने आप को बरसाने से रोक नहीं सकता क्योंकि उसके पास पानी है, बरसेगा। तो अगर कोई बादल बरस नहीं रहा, अगर कोई नदी तुम्हें पानी दे नहीं पा रही, तो इसका अर्थ जानते हो क्या है? बादल के पास पानी नहीं, नदी के पास पानी नहीं।

तुम्हें ये कहने की कोई जरूरत नहीं कि उनकी नीयति खराब है, उनकी नीयति नहीं खराब है, उन बेचारो के पास अपना ही कुछ नहीं है। जिसके पास अपना नहीं है वो कैसे किसी दूसरे को दे पाता तो वो नहीं दे पाए। नहीं दे पाए, उन्होंने कोई अपराध नहीं कर दिया, ये मजबूरी है उनकी। अरे! उन्हें ही नहीं मिला तो तुम्हें कैसे देते। पर, तुम्हें अगर प्रेम होगा तो तुम ये शिकायत नहीं करते फिरोगे कि माँ-बाप मुझे कुछ दे नहीं पाए। तुम कहोगे “ठीक, आप दे नहीं पाए तो क्या हुआ अब मुझे मिला है मैं आपको दूँगा।”

तुम ये नहीं कहोगे कि अरे वो तो जीवन भर अंधेरे मे रहे है, अब मैं उनसे रोशनी की बात कैसे करूँ? उन्हें बुरा लगेगा। तुम कहोगे नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं, मुझे मिली है ना रोशनी और, मैं जानता हूँ रौशनी बहुत खूबसूरत होती है तो मुझे मिली है तो उन तक भी पहुचनी ही चाहिये। तुम इस उलझन मे नहीं पड़े रहोगे कि उन्होंने मुझे जो बताया वो बंधन है कि नहीं है कि क्या है। अरे, सीमित इंसान है अपनी सीमा मे वो जितना तुम्हे दे सकते थे उन्होंने दिया ही होगा। अब क्यों शिकायत करते हो कि इतना ही दे पाए। जितना उन्हें ज्ञान था, उन्होंने तुम्हें दे दिया। जितना उनके पास प्रकाश था वो दे पाए, जितना उनके पास अंधेरा था वो अंधेरा भी उन्होंने तुम्हें थमा दिया है।

इसमें नीयति की खोट नहीं है, इसमें मजबूरी बस है। और, मजबूरी पर शिकायत नहीं करते। मैं तुम्हारे पास आऊँ कि मुझे कुछ खाना दो और तुम्हारे पास एक ही रोटी हो, वो भी सूखी और तुम उसमें से मुझे आधी दे दो तो क्या मैं शिकायत करूँ कि मुझे आधी ही रोटी दी, वो भी सूखी? क्या मैं शिकायत करूँ? अरे भाई आपके पास थी ही इतनी तो माँ-बाप भी तो साधारण इंसान ही है ना, उनको जितनी समझ थी उसके अनुसार उन्होंने तुम्हारा पालन – पोषण किया। जिस रूप में उन्होंने जीवन को जाना वही उन्होंने तुम्हें बता दिया। अब शिकायत क्यों करते हो?

कह दो, “ठीक, वो जितना कर सकते थे उन्होंने किया अब हम कुछ करके दिखाएँगे।” तुम्हारी भी भूमिका कहीं शुरू होगा की नहीं होगी, या बस लेते ही रहोगे उनसें। कभी देने का भी कार्यक्रम शुरू होगा या नहीं। तो अब वो स्थिति आ गयी है जब तुम अब दाता बनो। तुम कहो, “ठीक, आपने हमारे लिए बहुत कुछ किया, धन्यवाद! अब हम भी तो कुछ करें, हमें कुछ दिख रहा है कोई रोशनी मिल रही है वो हम आप तक लेकर के आएँगे। आप हमें अनुमति दीजिये। एक दिन आपने हमारी ऊँगली पकड़ी थी और हमें चलना सिखाया था, आज हम आपको रोशनी दिखाएँगे कि आप चल पाएँ और ये प्रेम है, यही प्रेम है।

ये नहीं प्रेम है कि आप अंधे है तो पड़े रहीये, आपको अंधा ही रहना चाहिए। पर, बेटा ये कर पाने के लिये तुम्हें लालच त्यागना होगा क्योंकि हो सकता है कि ये जब तुम करो तो वो नाराज़ हो जाएँ, हो सकता है तुम्हारे सुझाव में कोई कमी आ जाए, हो सकता है कि तुम्हें कुछ बातें बर्दाश्त करनी पड़े, पर अगर प्रेम है तो तुम बर्दाश्त करोगे क्योंकि प्यार कहता है कि कोई बात नहीं तुम्हारे भले के लिये मैं तकलीफ़ सहने को तैयार हूँ।मुझे मालूम है आज आप मुझसे नाराज़ हो रहे है, मुझे मालूम है कि आपको ये लगता है कि मैं बदतमीज़ी कर रहा हूँ, पर मैं बदतमीज़ी नहीं कर रहा हूँ, मैं चाहता हूँ आपको, इस खातिर आपसे ये कुछ बातें कह रहा हूँ।”

प्रेम, कष्ट सहने को भी तैयार हो जाता है और प्रेम थोड़ा सा कष्ट देने को भी तैयार हो जाता है।

माँ, बच्चे को नहलाती है, बच्चा रोता है जोर – जोर से, माँ क्या ये कहे कि ये रो रहा है कि इसे कैसे नहला दूँ। तुम इन्जेक्शन,.टीका लगवाने जाते हो बच्चा रोता है जोर – जोर से तो क्या ये कहोगे कि अरे नहीं नहीं रो रहा है कैसे टीका लगवा दें। प्रेम में कई बार कष्ट देना भी पड़ता है, उसके भले के लिये ही तो तुम कुछ बातें कहोगे। हो सकता है उससे घर वाले आहत हो जाएँ, पर तुम ये मत सोचना कि मैं तो बेकार आदमी निकला, मैंने तो घर वालों को आहत कर दिया। तुमनें आहत करा है क्योंकि तुम्हें उनसें प्यार है और यदि प्यार है तो तुम्हें आहत करना ही पड़ेगा। तुम ये नहीं कह सकते कि आप अपने अंधेरों मे जियो, तुम हाथ पकड़ोगे और उन्हें लेकर आओगे रौशनी की तरफ। हो सकता है वो मना भी करे, प्रतिकार कर सकते है पर तुम रुक नहीं जाओगे, तुम उन्हें समझाओगे, प्यार से समझाओगे, थोड़ा बहुत हो सकता है बल भी लगाओ।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: डर, बंधन और मुक्ति

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-


१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

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2 टिप्पणियाँ

  1. “मुक्ति पानी नहीं है मुक्ति भीतर बैठी है, वो लगातार आवाज़ देती है। आनन्द पाना नहीं है, मिला ही हुआ है वो भी लगातार आवाज़ देता है। प्रेम पाना नहीं है, वो है, वो भी पुकारता है। ये सब पाने की चीजें नहीं होती हैं, ये तो तुम्हें उपलब्ध ही हैं। तुम्हें बस वो सब हटा देना है जो तुमनें फालतू ही इक्टठा कर लिया है – कचरा। वही ताकत जो तुमसे ये सवाल बुलवा रही है ना, वही ताकत तुम्हें बताएगी कि तुम्हारी जिन्दगी मे वो क्या – क्या है जो तुम्हारा बंधन है, उस सबसे मुक्त हो जाओ।”

    हमनें व्यर्थ का क्या-क्या नहीं पाल रखा है।

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
      ___

      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
      ~~~~~
      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
      ~~~~~
      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
      ~~~~~
      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
      ~~~~~
      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
      ~~~~~~
      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
      ~~~~~~
      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
      ~~~~~~
      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
      __

      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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