मुक्ति पानी नहीं है मुक्ति भीतर बैठी है, वो लगातार आवाज़ देती है।

मुक्ति पानी नहीं है मुक्ति भीतर बैठी है, वो लगातार आवाज़ देती है। आनन्द पाना नहीं है, मिला ही हुआ है वो भी लगातार आवाज़ देता है। प्रेम पाना नहीं है, वो है, वो भी पुकारता है। ये सब पाने की चीजें नहीं होती हैं, ये तो तुम्हें उपलब्ध ही हैं। तुम्हें बस वो सब हटा देना है जो तुमनें फालतू ही इक्टठा कर लिया है – कचरा। वही ताकत जो तुमसे ये सवाल बुलवा रही है ना, वही ताकत तुम्हें बताएगी कि तुम्हारी जिन्दगी मे वो क्या – क्या है जो तुम्हारा बंधन है, उस सबसे मुक्त हो जाओ।

जवान हो, होशियार हो, आँखें हैं तुम्हारे पास, सब दिखेगा। तुमको साफ – साफ दिखाई पड़ेगा कि किन फालतू बंधनों को पकड़कर बैठे हुए हो। बंधन हटाने हैं? मुक्ति पानी नही हैं? मुक्त तो तुम हो ही, बंधन बस बेहोशी का नतीजा है। तुम भोले होते हो, तुम्हें ये सूझता भी नहीं कि नासमझ लोग तुम्हारे दिमाग मे नासमझी भर रहे है, तुम संदेह भी नही कर पाते। ये भोलापन है तुम्हारा। और तुम्हारे भोलेपन में तुम्हारे दिमाग में बहुत सारा कचरा भर दिया जाता है, लगातार भरा ही जा रहा है। ऐसा नहीं है जो भर रहे है उनकी नीयति खराब है, उनकी नीयति नहीं खराब है, वो बस नासमझ हैं।

पर तुम नासमझ रह आए हो, ये कोई जरुरी नहीं है। तुम गौर से देखो कि तुमनें दिमाग में जो कुछ भी पाल रखा है, वो क्या है? और जो कुछ भी ऐसा पाओ, जो तुम्हें सीमित करता है, जो तुम्हें छोटा करता है, जो डराता है, तुरन्त उसको छोड़ दो, तुरन्त त्याग दो, यही मुक्ति है। सिर्फ इसीलिए कि बहुत सारे लोगों ने बहुत समय तक कुछ कहा है वो बात ठीक नहीं हो जाती। उसको जाँचो, उसको परखो, उसको अपनी मुक्त दृष्टि से देखो। सिर्फ इसीलिए कि परम्परा, समाज एक प्रकार से चलते रहे है, वो बात ठीक नहीं हो जाती। बल्कि ज्यादा संभावना इसी बात की हो जाती है कि बहुत सारे लोग यदि कुछ कर रहे हैं, तो वो बात मूर्खता की ही होगी।



पूर्ण लेख पढ़ें: डर, बंधन और मुक्ति

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