आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर: कर्त्तव्य की विदाई ही प्रेम का आगमन है

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)कृताकृते च द्वन्द्वानि  कदा शान्तानि कस्य वा।

एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥

~अष्टावक्र गीता (अध्याय९, श्लोक १)

To whom does the conflict of duties performed and not performed…

कृता-कृते, कृता-कृते, कृत-अकृते, performed-not performed, done-not done.

To whom does the conflict of duties performed and not performed, and of the pairs of opposites belong. When do they cease? कदा शान्तानि, द्वन्द्वानि  कदा शान्तानि।

And for whom, कस्य वा।

Having thus fully enquired, through complete indifference to the world, become passionless and be devoted to renunciation.

 

अष्टावक्र ने इन शब्दों का प्रयोग किया है, सीधे उनको देखेंगे, बात वहाँ से ज़ाहिर होगी।

निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती।

न करने की आकांक्षा, न, न करने का संकल्प। दोनों ही सिरों से कोई प्रयोजन नहीं। कीमती शब्द है, अवृति, जिसने कुछ तय नहीं कर रखा। जिसने कुछ भी योजना बना ही नहीं रखी। जिसके पास कोई संकल्प शेष ही नहीं है।

अवृति की स्थिति कैसे आती है? किसको कह रहे हैं अष्टावक्र, एवं ज्ञात्वेह? क्या जानकर के तुम वहाँ तक पहुँचते हो? जब आवेग शांत है। निर्वेदाद् भव, कैसे? कि, किसके लिए है कर्तव्य? और किसके लिए है, अकर्तव्य? To whom does the conflict of duties performed and not performed exist? किसके लिए हैं? और किसके लिए इनका अंत हो जाना है? जिसके लिए थे उसी के लिए अंत हो जाना है। आप कहोगे, मन के लिए है, मन तक के लिए नहीं है।

मन की तीन हालतें होती है – सोना, जगना, अपने देखना। सोते समय भी कोई कर्त्तव्य  होता है? सो रहे हो, कोई कर्तव्य बचता है? ये तो कोई कहे ही न कि, मोक्ष में कर्तव्यों  के पार चले जाते है, कि समाधि में कर्तव्यों के पार चले जाते है, मैं तो पूछ रहा हूँ, जब अभी पूरी तरह मन में ही हो, मन की एक हालत है ना, सोना? अभी मन में ही हो, सो ही रहे हो, कोई मौन नहीं, कोई समाधि नहीं, कोई मोक्ष नहीं, कुछ नहीं। सोते समय भी कोई कर्त्तव्य बचता है? इतनी हक़ीकत है, कर्तव्यों में। इतनी हक़ीकत है कर्तव्यों को पूरा करके अर्जित किए गए सारे दर्प में। और इतनी हक़ीकत है उस पूरी शर्म में, जो हमने इकठ्ठा कर रखी है कि ये नहीं कर पाया, वो नहीं कर पाया।

न दर्प में हक़ीकत है, न शर्म में हक़ीकत है। मन के विचारो में तो इतनी भी हक़ीकत नहीं है कि वो सोते समय भी बचे रह सके। समाधि की छोड़ो, सुषुप्ति तक से पार नहीं पा पाते। बहुत दर्द हो रहा हो, सो जाओ, दर्द कहाँ गया? और बड़े उल्लासित थे, सो जाओ, कहाँ गई सारी पुलक? दुनिया के राजा हो और फुटपाथ के भिखारी हो, सो रहे हो, दोनों में क्या फर्क है? एक सो रहा होगा बड़े बिस्तर पर, एक सो रहा होगा सड़क किनारे, सो रहे है क्या फर्क है? कि है? बढ़िया तर माल खा कर के सोए थे और सूखी रोटी खा कर के सोए थे, अभी सो गए हो, क्या फर्क है? ये हक़ीकत है हमारे संसार की। वो तो मन के भी तिहाई हिस्से में ही जीवित है।

अगर मन की तीन अवस्थाएँ है, तो हमारा पूरा संसार उन तीन में से एक में है। बाकी दो में तो मन में भी नहीं है। और, उन दो अवस्थाओ में से एक में, एक वैकल्पिक संसार खड़ा हो जाता है। कौन सा? सपनों का। और लो, लो सपने जितने लेने हो। और सपने ऐसे-ऐसे जो बाक़ी तुम्हारी दुनिया से उलटे चलते है। उलटा चलाना है इसीलिए तो सपने है। तुम जितने शर्मीले होते हो अपनी जाग्रत अवस्था में, सोते समय तुम उतने भाषण दोगे। दुनिया में चढ़ के, हज़ारों की भीड़ है और, तुम गरज रहे हो। जगते समय तुम जितने बड़े भिखारी होते हो सोते समय उतने ही बड़े… बादशाह हो जाते हो। सपने ले रहे है, बादशाह के, इसको मार दिया, उसको, ख़त्म कर दिया। जगते समय जो कुछ तुम्हें नहीं मिला होता है बस कामनाएँ होती है, सोते समय वो सब उपलब्ध होने लग जाता है। जहाँ कभी गए नहीं वहाँ  पहुँच  जाते हो, दुनिया का भ्रमण कर रहें हो। जो अर्जित नहीं किया वो अर्जित कर लेते हो। आदमी-औरत में जिसका साथ नहीं मिला उसका साथ मिल जाता है। सब हो जाता है।

तो किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं, किसी पुस्तक के ज्ञान की भी विशेष आवश्यकता नहीं। अपने ही मन को देखकर के, जो ज़रा ध्यानी आदमी होता है उसमे ये सवाल उठता है, “ये सब किसके लिए है? किसके लिए? कस्य वा? किसका है ये सब? शांति भी किसकी है? अशांति किसके लिए है? शांति भी किसकी है?” उसके बाद वो इस पूरे खेल को, गंभीरता से नहीं ले सकता। उसके बाद, वो अपनी जान नहीं जलाएगा।

अच्छा शब्द इस्तेमाल किया अनुवाद में, पैशनलेस(passionless)। उसके भीतर वो आवेग अब उठेगा कैसे? पैशन(उद्वेग)। उसके भीतर व्रत उठेंगे अब कहाँ से कि आओ, आग पर हाथ रख के कसम खाएँ कि दुनिया हिला देंगे। ये तो हिली ही हुई है। लुढ़कती – पुढ़कती  रहती है। इसको हिलाएँ क्या? ‘हमारा जन्म संसार बदलने के लिए हुआ है’। ये तो प्रतिक्षण बदल ही रहा है, हम क्या बदले? और हमारे बदलने के बाद इसका बदलना रुक जाए तो बदल भी दें।

पानी पर लट्ठ मारो और कहो कि छेद कर रहे हैं। छेद तो कर दोगे, वो फिर वैसा ही हो जाएगा जैसा उसे होना है। तुम्हारा प्रयत्न असफल नहीं जाएगा। बढ़िया वाला कैमरा(camera) हो तो फोटो(photo) खिंच सकती है कि देखो छेद किया, इस क्षण छेद किया। उसके बाद?

इस्लाम में कहानी है ना कि, मुहम्मद का शैतान से इत्तेफाक़ हुआ। शैतान बोला, “मर तो मैं सकता नहीं, मैं तो रहूँगा, मैं संसार हूँ। तुम बदल भी दोगे तो किसको बदल दोगे? संसार को ही तो बदलोगे ना? जब तक ये है तब तक मैं हूँ। क़यामत के दिन तक हूँ मैं। तुम मुझे हरा नहीं सकते। मैं भी तुम्हें नहीं हरा सकता। हमारे तुम्हारे आपसी संघर्ष का, इस रगड़ का ही नाम, दुनिया है। हमारे तुम्हारे होने से चल रही है। अगर सिर्फ तुम होते, तो दुनिया कब की फ़ना हो गई होती क्योकिं तुमने सबको अल्लाह का नाम लेना सिखा दिया होता। अगर सिर्फ मैं होता तो भी दुनिया कब की फ़ना हो गई होती क्योंकि मैंने सबसे अल्लाह का नाम भुला दिया होता। पर तुम हो और हम है तो हमारे होने से, हमारी खीच-तान से ही तो दुनिया चल रही है।”

जो ये समझ गया कि ये तो ऐसा ही है, लुढ़कती-पुढ़कती, अब वो बड़ा व्यथित नहीं होता। उसका दिल नहीं कापता। करुणा उठती है उसमें, ये नहीं है कि वो संसार के प्रति बिलकुल उदासहीन हो जाता है। करुणा उठती है उसमें। पर वो करुणा उसके केंद्र को कम्पित नहीं कर देती है, वो ऐसी नहीं होती है कि दूसरों की बीमारी ठीक करने गए और खुद बीमार हो के आ गए। हमारा तो हाल यही है ना? दया और करुणा में यही अंतर समझना। दया का मतलब है कि दूसरो की बीमारी तुम्हें भी लग गई। और करुणा का मतलब है कि जान गए कि दूसरा भ्रम में है पर खुद उस भ्रम से अछूते रहे। और, दूसरे का भ्रम तभी दूर कर सकते हो जब तुम खुद, उस भ्रम से अछूते रहो। यहीं करुणा है।

मुझे दिख रहा है कि तू रो रहा है और मुझे ये भी दिख रहा है कि तेरे लिए तेरा दुःख असली है। पर मैं ये भी जानता हूँ कि तेरा दुःख असली नहीं है और मेरे लिए, बहुत ज़रूरी है मेरे लिए कि मैं जानता ही रहूँ कि तेरा दुःख असली नहीं है, क्योकिं यदि मैं भूल गया कि तेरा दुःख असली नहीं है तो फिर में तेरा दुःख दूर भी नहीं कर पाऊँगा। मेरे लिए बहुत ज़रूरी है कि मैं जानू कि तू रो रहा है, तेरे लिए तेरे आँसू असली है, पर वास्तव में नकली हैं। जिस दिन तक मुझे ये याद है कि ये तेरे नकली आँसू है, सिर्फ उसी दिन तक मैं तेरा चिकित्सक बन सकता हूँ। जिस दिन मैं भी इस भुलावे में पड़ गया कि तू वास्तव में रो रहा है, उस दिन कुछ न कर पाऊँगा तेरे लिए। ये हृदयहीनता नहीं है। ये पाषाण हो जाना नहीं है। यही संवेदनशीलता है। यही संतो का प्रेम है। और यही करुणा की स्पष्टतम परिभाषा है।

असल में बड़ा, एक भ्रम बना लिया गया है कि कर्तव्यों को छोड़ने का मतलब है, रिश्ते-नाते समाप्त हो जाएँगे, कर्तव्यों को छोड़ने का मतलब है कि आपका अब मानवता से कोई लेना-देना नहीं रहा। कुछ एसा सा प्रचार कर दिया गया है, मन में यही छवि रहती है। कोई आपसे आकर के कहे कि मेरे कोई कर्तव्य शेष नहीं रहे, तो एक बार के लिए आपको भी यही लगेगा कि इसका अर्थ ये है कि, इसने सम्बन्ध ही काट दिए है।

मैं अभी पिछले हफ्ते जब कॉलेज(college) में बात कर रहा था, तो एक छोटा सा सवाल पुछा था, एक छात्र से, कि सुबह अपनी माँ को चाय बना के अगर देते हो, कभी घर पर होते हो जब और सुबह चाय बना के ले गए माँ के पास, तो कर्तव्य के नाते करते हो कि प्रेम के नाते? वो क्षण भर को चुप हो गया। मैने कहा मुझे जवाब मिल गया। वो चाय ज़हर है। जो चाय कर्तव्य के नाते दी जाए, वो चाय नहीं है वो ज़हर है।

कर्तव्य नहीं रहता तो घृणा नहीं उपजती। कोई ये न सोचे कि कर्तव्यों के जाने पर, इनडिफरेंस(indifference) आ जाएगा; उदासीनता। यदि कर्तव्य वास्तव में विदा हुआ है, तो प्रेम आएगा। लेकिन हमनें एक वहम फैला दिया है कि कर्त्तव्य नहीं रहा, तो ये आदमी अब प्रेम-रहित हो गया। जहाँ ज़िम्मेदारी नहीं रहती, वास्तव में, देखिये मैं कर्तव्यरहित होने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं कर्त्तव्य के पार की बात कर रहा हूँ।

हमारे कान कुछ ऐसे है न कि उनको जब भी कहा जाता है कि, ज़िम्मेदारी का न होना, कहा क्या गया? ज़िम्मेदारी का न होना, सुना क्या गया? गैरज़िम्मेदारी। हमने गैरज़िम्मेदार तो नहीं कहा था। हमने तो कहा था, “कर्त्तव्य का न होना।” और जब हम कह रहे है, कर्त्तव्य का न होना, तो भाई, हमारे शब्दों के साथ न्याय करो। हम जो कह रहे है बस उतना ही सुनो। उसमें अपना आगा-पीछा मत जोड़ दो। हमने बस कहा कर्त्तव्य का न होना, जब कह रहे है कर्त्तव्य का न होना, तो उसका अर्थ है, कर्तव्यातीत, कर्त्तव्य के पार। और ज़िम्मेदारी के परे प्रेम का क्षेत्र है। वहाँ पर कर्तव्य नहीं चलते। वहाँ पर चाय इसीलिए नहीं दी जाती कि, यार अब बेटा हूँ तो चाय तो देनी चाहिए ना माँ को।

अष्टावक्र प्रेम की भाषा नहीं बोलते। ये शब्द आपको नहीं मिलेगा। पूरी संहिता में, ये शब्द न मिलेगा आपको, प्रेम। पर प्रेम के अतिरिक्त अष्टावक्र और कुछ गा ही नहीं रहे। ये पूरी बात ही प्रेम की है। अष्टावक्र कह रहे है अव्रती, अव्रती का अर्थ है जो सारे कसमे-वादे तोड़ दे। किसी व्रत का ख़याल ना रखे। व्रत माने होता ही यहीं है कसमे-वादे। और जब कहा जाता है कि कसमे-वादे तोड़ दो तो हम सहर जाते है। क्योंकि हमारे मन में वहम क्या उठता है? कि कसमे-वादे जो तोड़े, वो कैसा आदमी?

एक श्रोता: धोखेबाज़।

आचार्य जी:  धोखेबाज़। भाई… और वो आदमी कैसा जो बिना कसम और बिना वादे के हीं बड़े से बड़ा वादा निभा जाए। उसकी तो हम कल्पना ही नहीं कर पाते क्योंकि वो आदमी हमने कभी देखा नहीं। वो आदमी हमारी परिधि में है नहीं, जो हमारा सर्किल(circle) है, उसमें वो आदमी नज़र नहीं आता, तो हमारे लिए अकल्पनीय है। हम कहते है कि अगर व्रत न हो, अगर वादे का बंधन न हो, तो कोई क्यों निभाएगा? हम यही कहते है ना?

गाने भी गाते है तो कहते हैं, “जो वादा किया सो निभाना पड़ेगा।” अब गाना कल्पना है। गीतकार चाहता, अरे कल्पना ही कर रहे हो तो थोड़ी और उँची कल्पना कर लेते, वो ये भी लिख सकता था, जो वादा नहीं किया वो निभाना पड़ेगा। पर इतना तो उसकी बुद्धि जाएगी ही नहीं। वो निभाने की भी जब बात करेगा तो यही कहेगा कि देखो वादा किया है, तो निभाओ, कसम खाई है तो निभाओ।

अष्टावक्र कह रहे हैं, “वो कसम निभाओ जो कभी खाई नहीं। वो वादा निभाओ जो कभी किया नहीं।” अब ये बात हमारी मोटी बुद्धि के पल्ले पड़ती नहीं है। जब किया नहीं तो निभाए क्यों? और जब तुम ये कहते हो कि जब किया नहीं तो निभाए क्यों, तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि जो तुम निभा भी रहे हो, वो कितना नकली है। तुम्हारे वादे निभाने में बड़ी हिंसा का भाव है। तुम तिल-तिल कर के, मर-मर कर के निभाते हो। तुम कहते हो, “जो वादा किया सो निभाना पड़ेगा।” और अगली पंक्ति भी कुछ इसी तरीके की है “कि हमें जाँ से जाना पड़ेगा”। कि ये वादों के चक्कर में जान तो जा रही है, पर अब क्या करे निभाना पड़ेगा। ले लिये सात फेरे। प्रेम नहीं मोहताज होता, सात फेरों का के पन्द्रह फेरों का। और तुम्हारे कसमों का और वादों का। वो तो प्रतिक्षण जीता है, प्रतिपल बहता है। अव्रती होता है। कोई व्रत इतना बड़ा नहीं जिसमे जीवन का प्रवाह समा सके।

तुम्हारी चेतना निर्धारित करती है कि अभी क्या करना है, व्रत नहीं निर्धारित करेगा। व्रत तो उतना ही बता पाएगा ना जितना पहले करते थे। कि व्रत ले लिया है। व्रत ले लिया है कि समाज की सेवा करूँगा। अब सेवा की तुम्हारी परिभाषा तो वही है ना जो पहले से है – उलटी-सीधी, बासी। अव्रती होने का अर्थ है, जो उचित है वो होगा, करूँगा नहीं। हमने कोई व्रत नहीं लिया। जो उचित है वो होगा मेरे माध्यम से। और उसमे इतनी ऊर्जा बहती है, जो कभी व्रत से निकल नहीं सकती।

जिसने कोई वादा नहीं किया और बिना वादे के निभा रहा है वो ऐसा निभाएगा, कि मौत भी उसे हरा न पाएगी। तुम्हारे कसमे-वादे तो मौत तोड़ देती है। कोई और न तोड़े, सबसे पहले तो तुम खुद ही तोड़ देते हो। किसी और की तुम्हें ज़रूरत भी नहीं। थोड़ा नींद ज़्यादा आ गई, अब कौन सा वादा? सो लिए। पर मान लो की तुम डटे भी हुए हो, तो मौत तो आके के तोड़ ही देगी तुम्हारे सारे वादों को। अपनी जोड़ो में तुम फ़ोटो भी लगाते हो तो नीचे इतना ही तो लिखते हो ना, टिल डेथ(till death)।

(सभी हँसते है)

आचार्य जी:  बोल दीजिये, बोल दीजिये।

श्रोता: मौत हमें जुदा कर देगी)।

आचार्य जी: तो, ये तो तुम्हे पता होता है कि हार अभी से मान ली। कहानी चलेगी, पर वहीं तक चलेगी जहाँ तक दोनों में से एक मर न जाए। और उसके बाद फिर, हम भी ज़िंदाबाद…

(सभी हँसते है)

आचार्य जी:  उसमें कभी ये तो नहीं लिखते कि मरेंगे भी साथ में। ये तो मान के ही बैठे हो कि मौत आएगी और एक को…

श्रोता: ले जाएगी।

आचार्य जी: ले जाएगी। अवृति का मामला दूसरा है, वहाँ मौत भी नहीं जीतती। अब ये हैरानी की बात है, वो पैशनलेस(उद्वेग रहित) है, पर उसके जैसा प्रेमी दूसरा नहीं। और तुम पैशन(उद्वेग) से भरे हुए हो, और प्रेम जानते नहीं। वो उद्वेग रहित है, ‘निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती’, उसके प्रेम में, कोई लपट नहीं है। उसके संकल्प में कोई उद्घोषणा नहीं है। उसका जीवन चिल्ला-चिल्ला कर के, अपनी मौजूदगी का एहसास नहीं करा रहा, वो शांत है। हिमालय की तरह। कभी हिमालय को नाचते, हिलते-डुलते देखा?

पर उससे सैकड़ो नाचती हुई नदिया प्रवाहित होती है, अवृति ऐसा होता है। स्थिर शांत, ऋषिराज की तरह बैठा रहता है हिमालय। जैसा बिलकुल सफ़ेद, कोई बुड्ढा योगी। और देखा है, कितनी नदिया नाचती हुई निकलती है उससे? हिमालय को देखो तो कहोगे देखो जड़वत, चट्टान, हिमशिखा। और फिर नदियों को देखो। छोटी-छोटी धाराओं को देखो, नन्हे जानवरों को देखो, वो सब उसी ऋषिराज की गोद से निकल रहे है। ऐसा होता है अव्रती  हो जाना। ‘हम हिलते-डुलते नहीं, पर हमारे होने से, देखो सब नाच रहा है। हमनें कोई संकल्प नहीं लिया’।

हिमालय ने किसी दिन कसम खाई थी कि पूरी दुनिया की प्यास बुझाऊँगा? पर गंगा तो हिमालय से ही निकली। उसने कहा था कि मैं यहाँ बैठा हूँ, और बंगाल तक को पानी पिलाऊँगा? हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करेगी गंगा? न, वो अव्रती है उसे नहीं हिलना। कोई पैशन(उद्वेग) दिखाई देता है क्या हिमालय में? और तुम में पैशन(उद्वेग) ही पैशन(उद्वेग) भरपूर – कूद रहे हो, फांद रहे हो, दीवाल तोड़ दी मटका फोड़ दिया, कहीं जा के गिर पड़े, मुँह काला कर आए। यही सब, पैशन(उद्वेग) में यही सब होता है, कपड़े फट गए, दांत टूट गया।

पैशन(उद्वेग) शब्द ही पेन(पीड़ा) से उपजा है। उसका जो मूल शब्द है वो पेन(पीड़ा) है। तो उसमें और क्या मिलेगा पेन(पीड़ा) के आलावा।

दिल ऐसा शांत रहे जैसे हिमालय की, बिलकुल श्वेत चोटी। जहाँ कभी कोई घटना घटती ही नहीं। तुम्हारे दिल में कभी कोई घटना न घटे। वो समस्त घटनाओ से अछूता रहे। और तुम्हारा जीवन ऐसे नाचे जैसे पहाड़ी नदी। यही जीना है।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर: कर्त्तव्य की विदाई ही प्रेम का आगमन है(Beyond responsibility)

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

 

 

 

2 टिप्पणियाँ

  1. “न दर्प में हक़ीकत है, न शर्म में हक़ीकत है। मन के विचारो में तो इतनी भी हक़ीकत नहीं है कि वो सोते समय भी बचे रह सके। समाधि की छोड़ो, सुषुप्ति तक से पार नहीं पा पाते। बहुत दर्द हो रहा हो, सो जाओ, दर्द कहाँ गया? और बड़े उल्लासित थे, सो जाओ, कहाँ गई सारी पुलक? दुनिया के राजा हो और फुटपाथ के भिखारी हो, सो रहे हो, दोनों में क्या फर्क है? एक सो रहा होगा बड़े बिस्तर पर, एक सो रहा होगा सड़क किनारे, सो रहे है क्या फर्क है? कि है? बढ़िया तर माल खा कर के सोए थे और सूखी रोटी खा कर के सोए थे, अभी सो गए हो, क्या फर्क है? ये हक़ीकत है हमारे संसार की। वो तो मन के भी तिहाई हिस्से में ही जीवित है।”

    हम अपने आस पास के चीजों को देख कर के उनको ही असली मानने लगते हैं| धन्यवाद आचार्य जी इन वचनों के लिये|

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    • नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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