प्रेम सर्वप्रथम

पहली चीज़ होनी चाहिए – प्रेम और यदि प्रेम है तो उसके बाद प्रतिस्पर्धा भी शुभ है।

 

प्रेम अगर पहले है तो उसके बाद जो होता है सब ठीक होता है ।

 

जो निरुद्देश्य फूल खिलता है वो बहुत सुन्दर होता है ।

 

हमने निरुद्देश्य को व्यर्थता के साथ जोड़ रखा है । हम जहाँ उद्देश्य नहीं पाते हमें लगता है कि व्यर्थ गया; नहीं, ऐसा नहीं है ।

निरुद्देश्य होना निष्फल होने के बराबर नहीं है ।

निरुद्देश्यता में बड़ी-बड़ी मंज़िल मिल जाती है, बड़े बड़े उद्देश्य मिल जाते हैं । जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे बहुत कुछ मिल जाता है ।

 

और अपने भावों के, अपने विचारों के, अपने मूड के, बहुत ना तो समर्थक रहो, ना ग़ुलाम ।

 

प्रार्थना में गलती नहीं है । प्रार्थना समझा के नहीं की जाती, इसमें गलती है ।

 

इस बात को ले कर के बड़े सतर्क रहा करिये – ऊँची से ऊँची बात अगर आपसे संबंधित नहीं है तो आपके किस काम की है?



पूर्ण लेख पढ़ें: प्रतिस्पर्धा, सही या गलत?

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