भौतिकता क्या है?

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प्रश्न: भौतिकता क्या है?

आचार्य प्रशांत: भौतिकता है ये मानना कि मात्र भूत हैं| भूत माने? यह सारे तत्व जो इन्द्रियों से लक्षित होते हैं| भौतिकता है ये मानना कि इसके अतिरिक्त कुछ होता नहीं, भौतिकता है इस विशवास में जीना कि जो भी कुछ है वो इन्द्रियों द्वारा देखा जा सकता है, सुना जा सकता है, पकड़ा जा सकता है और मन द्वारा समझा जा सकता है| भूत माने समझते हो? भूत माने तत्व| पंच भूत क्या होते हैं? तत्व |

जैसे अब तुम्हारा आवर्त सारणी चलता है तो उसमे कितने तत्व होते हैं? सौ से ऊपर, तो जब ये सब ग्रंथ लिखे गये थे उस समय पर उतने तत्व  की बात नहीं करी गयी थी, बस पाँच भूतों की पंच महाभूतों की बात कर दी गयी थी और उसमे सब समा जाता है, ठीक है|वो सारे वही हैं जिन्हें आँख देख सकती है, कान सुन सकते हैं, त्वचा स्पर्श कर सकती है और मन जिनका विचार कर सकता है|

फिर भौतिकता क्या हुई? भूत यदि ये हैं तो भौतिकता क्या हुई? भौतिकता हुई ये सोचना कि जो पूरा व्यापक विस्तार है, ये जो पूरा जीवन है, ये जो पूरे ब्रह्माण का होना है और जो मेरा होना है वो सब कुछ बस तात्विक है| वो सब कुछ पूर्णतः भौतिक है, वो सब कुछ इन्द्रियगत है| “जो भी कुछ है वो वही है जिसे मैं देख सकता हूँ, और यदि कुछ ऐसा है जिसे मैं देख न पाऊं तो वो है ही नहीं” ये भौतिकता है| यदि कुछ ऐसा है जिसे मैं छू न पाऊं तो वो है ही नहीं, यदि कुछ ऐसा है मन जिसका विचार न कर पाए तो वो? – है ही नहीं|

भौतिकता का अर्थ है कि “अगर तुम हमसे आ कर कहोगे कि कुछ ऐसा है जिसका विचार नहीं किया जा सकता तो हम कहेंगे वो है ही नहीं|” भौतिकता का अर्थ फिर समझो, भौतिकता माने “जो भी कुछ है वो इन्द्रियगत है| हम सिर्फ भूतों को”, भूत माने क्या? भूत माने वो जो इन्द्रियों से परिलक्षित होता हो, “हम सिर्फ भूतों को मान्यता देते हैं| यानि कि हम सिर्फ मन और इन्द्रियों को मान्यता देते हैं, हम और किसी और सत्ता को मान्यता देते ही नहीं|”

“आप हमसे पूछो कि दीवार है? हम कहेंगे है| क्यों है? क्योंकि दिखती है और छू सकते हैं| आप हमसे कहो कि बिजली कड़की क्या? आप कहोगे हाँ| क्यों? क्योंकि आवाज़ सुनाई दी| तो बिजली क्यों है? बिजली इसलिए नहीं है कि बिजली है, आपका तर्क है कि बिजली इसलिए है क्योंकि मेरे कानों ने सुना कि है| आपके लिए सर्वोप्रिय क्या है? – आपका तान|

भौतिकता है अपनी इन्द्रियों को महाआसन पर बिठा देना,

भौतिकता है ये कहना कि सब से ऊपर मन और इन्द्रियां आती हैं|

(व्यंग करते हुए) “यदि बिजली कड़के और सुनाई ही न दे तो बिजली कड़की ही नहीं, हम मानेंगे ही नहीं कि कड़की|”

बात समझ में आ रही है? यह भौतिकता है, भौतिकता माने संसार वही जिसको सोचा जा सके, संसार वही जो दृष्टिगत हो सके, जो स्पर्शित हो सके| आ रही है बात समझ में? भौतिक आदमी अपनी जगह तो बड़ा होशियार है, उसको कुछ फायदे भी हैं, क्या? वो अंधविश्वास से बचता है| तुम उससे कहो कि “यहाँ पर कोई भूत परेत खड़ा हुआ है” वो कहेगा “न दिखाई देता हैं, न सुनाई देता है, न विज्ञान के किसी प्रयोग से उसका होना सिद्ध किया जा सकता है तो हम इस निषकर्ष पर पहुँचते हैं कि जो तुम कह रहे हो यहाँ खड़ा है वो खड़ा नहीं है|” तो बात उसने बिल्कुल  ठीक करी, भौतिकता के हमे खूब फायदे मिले हैं क्योंकि जब तक भौतिकता नहीं थी तब तक हम निरे अन्धविश्वासी थे| हम ऐसी-ऐसी बातों पे यकीन करे बैठे थे जो बिल्कुल कपोल कल्पित| समझ रहे हो बात को?

हम कहते थे कि “पृथ्वी कछुए कि पीठ पर आधारित है| एक विशाल कछुआ है और पृथ्वी उसकी पीठ पे टिकी हुई है”, हम कहते थे “सूरज को ले कर के एक रथ चलता है जिसमे सात घोड़े जुटे हुए हैं”, हम कहते थे कि “जब मनुष्य मरता है तो उसमे से एक आत्मा निकलती है और फिर वो जा कर के किसी और गर्भ में प्रविष्ट हो जाती है|” हम दुनिया भर के तमाम मिथकों को, सपनों को, कल्पनाओं को बस सत्य माने बैठे रहते थे|

भौतिकता एक काम बहुत अच्छा करती है, वो अविचार से तुम्हें विचार के तल पे ले आती है|

वो अविचार से उठा के तुम्हें विचार के तल पर ले आती है| भूलना नहीं जो भी कुछ इन्द्रियों द्वारा स्पर्शित होता है और जो भी कुछ मन द्वारा चिंत्य होता है, वो सब विचार में समाहित होता है| तुम इस दीवार के बारे में सोच सकते हो, और यदि नहीं सोच पाओ तो दीवार है नहीं|

तो भौतिकता का फ़ायदा क्या हुआ? उसने तुम को विचारशील बना दिया और ये बहुत बड़ा फायदा है| दुनिया में अभी भी बहुत सारे लोग हैं जिन्हें और विचार करने कि ज़रूरत है, बहुत लोग हैं जिन्हें अभी और विचारशील होना चाहिए| वो विचार नहीं कर पाते, उनके दिमाग ऐसे कुंठित हैं कि वो सोच ही नहीं पाते, उनकी सोचने की ताकत ख़त्म हो गयी है और ये छोटी मोटी ताकत नहीं है, विचारणा की शक्ति बड़ी शक्ति है| भौतिक मन इस मामले में उपयोगी होता है, वो तुम्हें अंधविश्वास से बचाता है| तुम कहते हो “न… न… न… हमे सोचने दो” और ये सोचना अच्छा है ये सोचना शुभ है, ये सोचने का उचित प्रयोग है|

यहाँ तक तो कहानी बढ़िया है लेकिन एक दिक्कत हो जाती है, वो दिक्कत ये है कि कुछ ऐसा भी है, जो है तो, पर जिसे इन्द्रियाँ देख नहीं सकती और मन निरुपित नहीं कर सकता; पर वो है| भौतिक आदमी कहता है “यदि कुछ है तो लाओ हमे दो, थमाओ| अगर वो हाथ में पकड़ में आया तब तो हम मानेंगे कि है या अगर वो आँख से दिखाई दिया तब तो हम मानेंगे कि है, और यदि हाथ में न पकड़ पाए, आँख से न दिखाई देता हो तो कम से कम उसके बारे में कुछ ऐसा बताओ जो सोचा जा सकता हो तब तो हम मानेंगे कि है|” अब मामला फसता है, प्रेम को कैसे हाथ में थमाओगे? आनंद को कैसे जेब में रखोगे? मुक्ति का क्या रंग है? सरलता का कैसे विचार करोगे? निर्विचार की क्या सोच बनाओगे? सत्य की आवाज़ कहाँ सुन पाओगे? और ये बड़े कीमती हैं और ये भौतिक नहीं है|

भौतिक मन यहाँ आ कर के फंस जाता है, अटक जाता है| सांसारिक रूप से तो वो फ़ायदे में रहता है, भौतिक मन विज्ञान में बड़ी तरक्की करता है, भौतिक मन अंध विश्वास से भी मुक्त हो जाता है, विज्ञान तो उसे मिल जाता है, आध्यात्म के उसके रास्ते बंद हो जाते हैं क्योंकि उसने तो तय कर रखा है कि “असली वही जो हाथ में पकड़ा जा सके” अब प्रेम कैसे पकड़ोगे हाथ में? “असली वही जो ज़ेब में रखा जा सके” अब सत्य को कैसे रखोगे ज़ेब में| “असली वही जिसे कम से कम सुन सकूँ| चलो सूंघ नहीं सकता, स्वाद नहीं ले सकता तो कम से कम विचार कर सकूँ’|” आनंद का कैसे विचार करोगे? वो तो, या तो है नहीं तो नहीं है, विचार की वस्तु तो नहीं है आनंद|

ये जो भौतिक व्यक्ति होता है ‘मतीरियलिस्ट’ इसकी सज़ा ये होती है कि ये प्रेम, आनंद, मुक्ति, सरलता, सत्य इनसे वंचित रह जाता है, उसकी ज़िन्दगी में ये कभी आते नहीं| क्यों नहीं आते? क्योंकि उसने पहले ही तय कर रखा है कि सच्चा वही जो दिखे| अब वो सामने देखता है तो दीवार दिखाई देती है, बायं देखता है तो पहाड़ दिखाई देता है, दाएं देखता है तो लोग दिखाई देते हैं, पीछे देखता है तो नदी दिखाई देती है, नीचे देखता है तो ज़मीन दिखाई देती है, ऊपर देखता है तो आसमान दिखाई देता है; सत्य तो कहीं दिखाई देता नहीं तो उसका निषकर्ष क्या निकलता है? कि सत्य है ही नहीं| वो जानवर को देखता है तो जानवर दिखाई देता है, स्त्री को देखता है तो स्त्री दिखाई देती है, बच्चे को देखता है तो बच्चा दिखाई देता है, पत्ती को देखता है तो पत्ती दिखाई देती है| प्रेम? कहीं दिखाई देता नहीं, तो उसका निषकर्ष क्या निकलता है?

श्रोतागण: प्रेम है ही नहीं|

आचार्य जी: प्रेम है ही नहीं, ये मतीरियलिस्ट की सज़ा है क्योंकि जो कुछ भी वास्तव में कीमती है वो मटेरियल है ही नहीं| बात आ रही है समझ में? भौतिकता बड़ा वरदान है लेकिन अपनी जगह पर, लेकिन भौतिकता महाअभिशाप है अगर तुमने भौतिकता को अस्तित्वगत सत्य पर भी लागू कर दिया| भौतिकता बहुत बहुत उपयोगी बात है पर उसको वहीं पर चलाना जहाँ वो चल सकती है| जहाँ वो नहीं चल सकती वहाँ भौतिकता मत चला देना| ये मूर्खता मत कर देना कि किसी से कह रहे हो “ज़रा अपने प्रेम का प्रमाण दो” क्योंकि सारे प्रमाण किसके लिए होते हैं? मन के लिए और प्रेम मन में नहीं समाएगा, और ये मूर्खता तुम कर जाते हो कि नहीं?

श्रोतागण: हाँ|

आचार्य जी: “कि मैं कैसे मानू कि तू मुझसे प्यार करता है, प्रमाण दे?” अरे क्या कर रहे हो भौतिकता की हद हो गयी, तुम प्रेम का प्रमाण माँग रहे हो| तुम प्रेम का ही नहीं तुम ईश्वर का भी प्रमाण माँगते हो, तुम कहते हो “हम कैसे मान लें कि ‘वो’ है? अगर है तो अपने होने का सबूत दे|” क्या फाइल भेजे तुम्हारे पास? क्या भेजे? लेकिन तुम सबूत माँगते हो ये तो सिर्फ बेवकूफी है लेकिन चमत्कारों का चमत्कार ये है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो सबूत दिला भी देते हैं “ये देखो ये लड्डू उसने भेजा है तुम्हारे लिए, खाओ|” पराकाष्टा है ये, भौतिकता की जाने मूर्खता और तुम्हें फिर यकीन हो जाता है कि “ठीक, ब्रह्म लड्डू है| अभी-अभी उतरा है ताज़ा-ताज़ा ब्राह्मी ब्रांड|”

परमात्मा में यकीन करने का तुम्हारे पास और कोई तरीका ही नहीं है, तुम प्रमाण माँगते हो, और प्रमाण तो फिर वही जो इन्द्रियों को दिखाई दे और मन को सुझाई दे| लोग आते हैं “सर हम कैसे माने कि हम आनंदित हैं?” ऐसा है जब तुम आनंदित हो जाओगे तो तुम्हारे माथे पे भूरे रंग के…

श्रोता१: त्रिशूल निकल आएंगे|

(सब ज़ोर से हँसते हैं)

आचार्य जी: कुछ इसी तरह का प्रमाण चाहिए होगा तुम्हें कि पूच निकल आएगी; इन्हें आनंद का प्रमाण चाहिए|भौतिक मन की अकड़ ऐसी होती है कि वो श्रद्धा को अंधविश्वास से अलग नहीं समझ पाता, वो कहता है “सत्य दिखाई नहीं देता और तुम सत्य को मानते हो तो तुम अंधविश्वाशी हो” ये उसकी अकड़ होती है| उसकी पहचान ही ये है कि वो इन्ही सब मुहावरों में बात करेगा “नहीं मुझे बता न क्या मिल रहा है?” तुम क्या बताओगे कि ढाई सेर जलेबी| वो कुछ इसी तरह का उत्तर चाहता है कि वो पूछे कि “क्या मिल रहा है?” और तुम कुछ बता पाओ जिसका रूप, रंग, आकार, वज़न, गंद हो| कैसे बताओगे? प्यार का वज़न दिखाओगे? नहीं लोग होते हैं जो बोल देते हैं “मेरा प्रेम ५० किलो का है |”

“क्या मिल रहा है?” और फिर तुम जब न बता पाओ तो कहेंगे “हवा हवाई बातें मत करो मुझे मूर्त तथ्य दो” उन्हें लगेगा उन्होंने कितनी बुद्धिमानी की बात कर दी कि “मुझे कुछ वास्तविक बताओ वास्तविक|” उनको पूछो पगले वास्तविक माने वही न जो तेरी खोपड़ी में समाए और तेरी खोपड़ी का आकार ही कितना है? और वास्तविक तो तू ऐसे कह रहा है जैसे तूने कोई परम सत्य की बात कह दी हो| वास्तविक माने वो जो तेर लिए वास्तविक हो, वास्तविक माने वो जो तेरे ज़रा से हाथ में आ जाए, जो तेरे ज़रा से कानों में| और लोग बहुत ठसक के साथ बोलते हैं “मैं तुम्हारी तरह सपनों में नहीं खोया हुआ हूँ, मैं भ्रमित नहीं हूँ, चलो तथ्यों पर बात करते हैं|”

इसमें कोई इनकार की बात नहीं है कि जो ये भौतिक मन होता है ये जीता तथ्यों में ही है और इस बात के लिए उसे शाबाशी देनी पड़ेगी कि वो तथ्यों के करीब रहता है| और इस बात के लिए उसकी भर्सना भी करनी पड़ेगी कि वो कभी भी तथ्यों के आगे नहीं जा पाता| वो इमेजिनेशन से, कल्पनाओं से उठ के फैक्ट्स तक तो आ जाता है लेकिन फैक्ट्स से आगे नहीं जा पाता| तथ्यों तक आ जाता है इस बात के लिए शाबाशी और तथ्यों से आगे नहीं जा पाता इस बात के लिए भर्सना|

तथ्यों तक आओ ज़रूर आओ लेकिन वहीं अटक मत जाओ, अटक मत जाओ|

सोचो ज़रूर पर सोचते ही मत रह जाओ|

खूब सोचो, सोचना शुभ है लेकिन तुम्हारी सोच ऐसी न हो जो घूमती जा रही है घूमती जा रही है, एक अर्थहीन चक्र बन गया है;

विचार को निर्विचार में समाने दो|

आ रही है बात समझ में?

श्रोता२: लेकिन सर ये जो निर्विचार में जाना है यही सर मुझे मुश्किल सा लगता है कि ऐसे सामाज में रह रहे हैं मतलब जिस वातावरण में रह रहे हैं वो पूरी तरह से भौतिक ही है और हम भी तथ्यों में ही बिलीव करते हैं और फिर वही होता है कि हमेशा विचार, पर विचार से निर्विचार में आना| अंधविश्वास से विचारों तक तो आ गए पर विचार से निर्विचार तक कैसे जाएं?

आचार्य जी: विचार को ही और गहरा कर के| इतना तो विचार कर लेते हो कि आँखें संसार को देख रहे हैं, पर क्या ये विचार करते हो कि जिसे देखना कहते हो क्या वो सिर्फ एक जैविक, रासायनिक प्रक्रिया है? इतना तो विचार कर लेते हो कि मैं कुछ कह रहा हूँ इसका प्रमाण ये है कि तुम सुन रहे हो, पर ये विचार क्यों नहीं करते कि समझ कैसे रहा हूँ? “सुन रहा हूँ ये तो ठीक है| (अपने चेहरे को अंगित करते हुए) यहाँ से चली एक तरंग वो तुम्हारे कान के पर्दे पे पड़ी, तुम्हारे कान के पर्दे में कम्पन हुआ, वहाँ से के और तरंग निकली वो तुम्हारे मस्तिष्क तक गयी, वहाँ एक रासायनिक प्रक्रिया हुई पर ये जो भी हुआ इस सब में समझ कहाँ है?” समझ कहाँ से आ गयी, ये विचार क्यों नहीं करती?

विचार ही जब गहराएगा तो अपनी सीमा देख लेगा,

विचार ही जब गहराएगा तो निर्विचार में उतर जाएगा|

बड़े विचारक होते हैं जो ऋषि बन जाते हैं| ऋषि का निर्विचार बड़े विचार के मंथन से निकलता है, उसने सोचा होता है, उसके पास सोच पाने की क्षमता होती है और सोच-सोच के वो उस बिंदु पे पहुँच गया होता है जो सोच का शिखर है, जो सोच का क्लाइमेक्स (अंत) है| अब सोच उसके आगे नहीं जाती|

तुम कहते हो “अपने विचारों को देखता हूँ जो दिखाई देता है वो भौतिक है|” ये देखना क्या है? कौन है जो देख रहा है? और क्यों जो दिखाई दे रहा है वो बदलता रहता है| जो दिखता है न, उसी की प्रकृति पर गौर करोगे तो तथ्यों से आगे का रास्ता खुल जाएगा|

तथ्यों तक जो रास्ता आता है बेटा वो एक बनी बनाई सड़क है| तो तुम्हारा सामान्य शिक्षा व्यवस्था है न वो अच्छा है इस मामले में कि वो तुम्हें तथ्यों तक ले आता है| उसके लिए एक संदेही मन चाहिए, एक ऐसा मन जो काटे, संदेह करे, जो कहे कि “हमे मानेंगे तभी जब प्रयोगशाला में सिद्ध हो जाए| हम यूँ ही नहीं मानेंगे कि अम्मोनीयम क्लोराइड आ गया; चलो ज़रा लैब में कर के देखते हैं| हम यूँ ही नहीं मानेंगे 9.8m/s2 ज़रा गिराओ गेंद  को हम समय नापेंगे|” ये संदेह का रास्ता है और ये अच्छा है, इस रास्ते को बिल्कुल निरुपित किया जा सकता है, किताबें बनाई जा सकती है जिसमे एक प्रयोग, दूसरा प्रयोग, तीसरा प्रयोग दिया हो कि ये प्रयोग करो तो इससे ये सिद्ध हो जाएगा, ये प्रयोग करो तो ये सिध्द हो जाएगा और ये बहुत अच्छा है कि ये बना बनाया रास्ता भी है; विज्ञान का रास्ता है|

तथ्यों से आगे का जो रास्ता है न वो खुले आकाश की तरह है,

वहाँ तुम्हें संदेह नहीं चाहिए श्रद्धा चाहिए और ये बहुत बड़ा अंतर है|

संदेह बहुत ज़रूरी है संदेह नहीं करोगे तो तथ्यों तक कभी नहीं पहुँचोगे; संदेह ही नेति-नेति करवाता है| संदेह जिसके पास नहीं होगा वो अंधविश्वाशी हो जाएगा, तो संदेह का होना बहुत ज़रूरी है; संदेह तुम्हें तथ्यों तक ले कर आएगा, पर तथ्यों पर आने के बाद अब तुम्हें संदेह नहीं चाहिए श्रद्धा चाहिए| और अब तुम्हें कोई बना बनाया रास्ता नहीं मिलेगा;

श्रद्धा का मतलब ही है कि इसके आगे तो तुम्हें बस राम भरोसे उड़ना है|

विज्ञान भरोसे नहीं राम भरोसे, इसके आगे अब कोई रास्ता नहीं है जंगल है या आकाश है जैसे जाना है जाओ;

राम का नाम लो आगे बढ़ो|

समझ में आ रही है बात?

श्रोता१: अभी आप से एक बात आई थी कि ‘श्रद्धाहीन ज्ञान माथे का बोझ है’ और ये हम एक कह रहे हैं भौतिकवादी तो उसमे जो ज्ञानी है वहाँ पर और ये यहाँ जो भौतिकवादी है इसमें कोई फर्क है?

आचार्य जी: नहीं कोई फ़र्क नहीं है|

श्रोता१: तो जो वो ज्ञानी है वो ये भी तो देखता है कि “मेरे लाइफ में ये इशू हैं और इसका रीज़न ये ये हैं” वो सब कुछ करता है, गंदगी सारी देख लेता है| भौतिकवादी भी गंदगी देख पाता है?

आचार्य जी: देख पाता है लेकिन श्रद्धाहीन ज्ञान का अर्थ ही है अपूर्ण ज्ञान, ऐसा ज्ञान जो एक जगह पहुँच के रुक गया है और उसके आगे नहीं देख रहा है, ऐसा विचार जो अब चक्र में फंस गया है, गहरा नहीं हो पा रहा, एक जगह पर ही गोल-गोल घूम रहा है गहराई नहीं हासिल कर पा रहा है| जो ज्ञान रुक गया है, जो

ज्ञान रुक गया है वही ज्ञान अहंकार बनेगा और श्रद्धाहीन रहेगा|

जो ज्ञान लगातार बढ़ ही रहा है, बढ़ ही रहा है, वो ज्ञान विगलित हो जाएगा|

वो याद है न ‘ज्ञान बहता रहा तो प्रेम बनेगा, जम गया तो अहंकार|’ ज्ञान के बहते रहने का अर्थ ही यही है कि ज्ञान गहराई हासिल कर रहा है, अटक नहीं गया है|

श्रोता१: ये बहुत एक मतलब चमत्कार है, एक कृपा ही है कि जो भौतिकवादी है वो वास्तविक को ही सत्य मानता है| ये बहुत अच्छा है कि जो सत्य है वो वास्तविक नहीं है, क्योंकि अगर वास्तविक होता तो मूल रूप से वो वास्तविक चीज़ चाहता ही इसलिए है कि वो कह सके कि “अब मैं इसे जानता हूँ|” तो अच्छा ही है कि वह मूर्त नहीं है या फिर आप कहेंगे “अब मैं इसे जानता हूँ|

आचार्य जी: कह लो ऐसे कह लो|

श्रोता३: एक सवाल ये था इसमें कि जैसे कुछ चीज़ हैं प्रतिबद्धता है, विश्वसनीयता है तो ये भौतिक वाले उसमे आएगी या अभौतिक वाले में, क्योंकि जैसे कॉर्पोरेट वर्ल्ड का एक तरीका होता है कि भाई वो प्रतिबद्धता नाप रहा है, विश्वसनीयता नाप रहा है, आपके रिकॉर्ड को देख रहा है, लेकिन मुझे लग रहा है कि ये अभौतिक टाइप की ही है|

आचार्य जी: देखिए, जैसे हम होते हैं और जैसे हमारे सम्बन्ध होते हैं वैसा ही उन सम्बन्धों का पूरा माहौल होगा| अगर मैं ऐसा हूँ जिसे आंकड़ो के अलावा कुछ समझ में नहीं आता तो मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, मुझे प्रतिबद्धता , विश्वसनीयता इन सब को भी आंकड़ो में ही परिवर्तित करना होगा| मैं कहूँगा “किसका कितना प्रतिबद्धता है मेरे से जाओ एक टेबल में लिख कर के ले आओ|” फेसबुक में ये इन लड़कों का चलता है लव मीटर, तो उसमे आप अपना नाम दालिए और जिसके लिए आप आसक्त हैं उसका नाम दालिए; शशांक और श्वेता देयर 64% प्यार है और ये खुश होक फिर उसको चिपकाते हैं|

तो ये एक आंकड़ो से घिरे हुए मन का सबूत है, उसे हर चीज़ आकड़ो में चाहिए ही चाहिए; कोई उसके पास अब विकल्प नहीं है वो क्या करे? आप अगर उसको जा के बोल भी देंगे कि “भाई प्रतिबद्धता माने निष्ठा और निष्ठा तो आध्यात्मिक होती है वो आकड़ों में नापने वाली नहीं होती|” तो भी वो मजबूर है वो करेगा क्या? वो कहेगा “मैं खुद नहीं जानता आध्यात्म क्या है? तुम मुझे क्या कहानी सुना रहे हो? या तो तुम पहले मेरे लिए आध्यात्म का रास्ता प्रशस्त करो, तुम मुझे ये न बताओ कि मैं अपना रास्ता बदल दूँ; ये बिल्कुल मत बताओ| तुम मुझे बदल दो तो मेरा दुनिया को देखने का तरीका खुद बदल जाएगा| आज तो मैं जिसको भी देखता हूँ आंकड़ो पे नाप के ही देखता हूँ, क्यों? क्योंकि मैं खुद अपने लिए एक आंकड़ा हूँ| तुम मुझसे पूंछो कि मैं कौन? तो मैं दस आंकड़े रख दूँगा, मैं ये, मैं वो, इतने मेरे पैसे, ये मेरे घर, इतनी मेरी उपाधियाँ, ये पदवियां, ये हासिल किया, ये खोया|”

“जब मैं अपनी ही दृष्टि में एक आकड़ा हूँ तो मैं पूरी दुनिया को कैसे देखूंगा? एक आकड़े के तौर पे ही तो, तो मुझसे ये मत कहो कि मैं अपनी मैट्रिक्स बदल दो दुनिया को देखने की| हाँ, मेरी मदद करना चाहते हो तो मुझे बदल दो, पर इतना कहे देता हूँ मुझे बदलने आओगे तो गर्दन काट दूंगा तुम्हारी|”

दुनिया में हर साधक का वक्तव्य यही होता है कि “मेरी मदद करो, मेरी मदद करो, मैं बहुत कष्ट में हूँ, मुझे बदल दो, और इतना कहे देता हूँ मुझे बदलने आओगे तो गर्दन काट दूंगा तुम्हारी|”

ये हर मदद करने वाले की, हर गुरु की विड़म्बना है कि तुम्हारे सामने जो खड़ा हुआ है, जिसे मदद चाहिए वो एक ओर तो ये कह रहा है कि “मदद करो” दूसरी ओर ये भी कह रहा है कि “लेकिन साथ में बता रहे हैं, हाथ जोड़ के ही बता रहे हैं कि जब आप हमारी मदद करने आएंगे हम आपकी हत्या कर देंगे; लेकिन मदद करिए न| देखिए आप इतने महान है आप अपनी हत्या करवा सकते हैं, मदद करिए न|” अब ये आपको तय करना होता है कि आपके प्रेम में कितनी गहराई है?वो ईमानदार है, उसने बता दिया, “कि मुझे मदद की भी ज़रूरत है लेकिन मदद करोगे तो मार डालूँगा” अब ये आपके प्रेम की गहराई पर है कि आप किस हद तक अपने आप को जला सकते हैं उसके लिए|

कबीर कहते हैं कि “ये जग जो है काली कुतिया है; या जग काली कुटरी जो छेड़े सो खाए| इसे जो ही छेड़ेगा ये उसी को काटती है| पूरा जो बात है वो ये है कि ‘साधो ये जब बौराना, झूठ कहूं तो खुश रहता है; और सच बोलू तो मारने आता है|’ उसी में कहते हैं कि दुनिया है ये ऐसी ही है काली कुतिया की तरह, जो ही इसके पास जाएगा ये उसी को काट खाती है| तो आप मदद करने के लिए भी उसके पास जाएंगे, अब वो आप देख लीजिये |



सत्र देखें : भौतिकता क्या है?



निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

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