पहला कदम

आज आशा के बहुत दरवाज़े उपलब्ध हो गए हैं।

योग के सामने बहुत बड़ी चुनौती है, आदमी की सफलता, सभ्यता और संस्कृति की सफलता, विज्ञान की सफलता।

चित्त की वृत्ति का निरोध वास्तविक योग है!

जिसे प्यास लगती है, पानी उसे उपलब्ध होना शुरू हो जाता है। भौतिक जीवन में भले ऐसा न होता हो, पर अध्यात्म में ये जादू सदा होता है।

पहला कदम आप बढ़ाइये, आगे की यात्रा स्वतः होने लगती है!

आज आदमी वृत्ति की गोद में ही पैदा होता है। आदमी छोटा है, वृत्ति बहुत बड़ी है। उसका विरोध कैसे करेगा आदमी? और, दूसरी बात हम कह रहे हैं कि विरोध करने की, या निरोध करने की तुम्हें ज़रुरत ही क्यों महसूस होगी, जब दुःख तुम्हें सता ही नहीं रहा है? आदमी अपने चित्त की वृत्तियों को शत्रु तो तब माने न जब वो शत्रु उसे पीड़ा दे? आज स्थिति यह है कि पीड़ा उठती है, और आदमी के पास पलायन के, मनोरंजन के, प्रसन्नता के, प्रमाद के पचास साधन मौजूद हैं।

अहम् वृत्ति ने परेशान किया, ईर्ष्या ने परेशान किया, महत्वाकांक्षा ने परेशान किया, अकेलेपन ने परेशान किया, हार ने परेशान किया, प्रतिद्वंद्विता ने परेशान किया, कामुकता ने परेशान किया, आप कहीं भी चले गए जी बहलाने – किसी दूसरे शहर चले गए, कुछ खरीदने चले गए, शॉपिंग कर ली, फिल्म देख ली, किसी अन्य तरीके से मनोरंजन कर लिया| और अगर इनसे बच गए, तो हाथ में मोबाइल फ़ोन तो हमेशा मौजूद है ही।



पूर्ण लेख पढ़ें: कालातीत योग और समकालीन चुनौतियाँ


 

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