परम ही प्रथम

ॐ ‘अनहद’ है | ॐ का मतलब है मौन |

कर्मों के कारण होते हैं, निश्चित रूप से होते हैं | अकर्म का कोई कारण नहीं होता |

प्रेम की यदि वजह बता पा रहे हो तो वजह के हटते ही, प्रेम भी हट जायेगा | जो कुछ कीमती है वो अकारण है |

जो ‘परम’ है वो तो प्रथम है | उसका अपना कोई कारण नहीं है | तो जब तुम उससे मिल जाते हो तो तुम्हारा भी कोई कारण बचता नहीं | तुम बड़े अकारण हो जाते हो, बड़े बेवजह हो जाते हो |

मन को किसी न किसी दिशा जाना है | या तो ‘राम’ को भेज दो, या तो ‘काम’ को भेज दो, या तो ‘सहस्रार’ को भेज दो, या तो ‘मूलाधार’ को भेज दो |

मन को साफ़ करो, यही स्नान है |

समर्पित करो |

आदमी ने ये चाल खूब चली है | खुद को समर्पित नहीं करना है तो फूल समर्पित कर दो, और चीज़ें समर्पित कर दो, रुपया-पैसा समर्पित कर दो, मिठाई चढ़ा दो, कुर्बानी दे दो | मिठाई क्या चढ़ाते हो दो रुपये की | कुर्बानी क्या देते हो किसी जीव-जंतु की | हिम्मत है तो अपने आप को अर्पित करो ना | असली कुर्बानी ‘अहंकार’ की कुर्बानी है, वो दे के दिखाओ |



पूर्ण लेख पढ़ें : आचार्य प्रशांत, आत्मपूजा उपनिषद पर: पूज्य क्या,पूजा क्या ?

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