ईमानदार रहो

तुम्हारे दुःख तुम्हें संसार नें नहीं दिए | आकस्मिक संयोग नहीं थे तुम्हारे जीवन में जितने भी कष्टप्रद मौके आये | वो सबकुछ तुम्हारे तुम होनें का अंजाम थे |

‘दुःख’ की समझ और ‘दुःख’ से  मुक्ति |

जब तक तुम, ‘तुम हो,’ तुम दुःख में ही रहोगे | तुम्हारे लिए इस दुःख से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है | हम असंभव की माँग करते हैं | जब हम कहते हैं की काश मैं दुःख के पार जा सकूँ | ‘तुम स्वयं ही दुःख हो’ | तुम कैसे दुःख के पार जाओगे ? तुम असंभव की माँग कर रहे हो |

जब मन धारणाओं से साफ़ हो जाता है तब मन में, उस अव्यक्त के लिए जगह बचती है | जिसको हजार नाम दिए गए हैं जिनमें से एक नाम परमात्मा भी है |

तुम स्वीकार करो या न करो, तुम प्रतिपल जल रहे हो और जलते हुए व्यक्ति को ये पूछने का हक नहीं होता कि आग बुझ जाने के बाद मेरा क्या होगा ? तुम तो बस अपनी आग को बुझने दो | तुम्हारे लिए इतना ही काफी है कि अभी जिस अग्नि में जल रहे हो वो शमित हो जाये |

तुम जानते हो, मोक्ष मिलता है उसको जिसको तुमनें ‘मैं’ का नाम दे रखा है | मोक्ष का क्या अर्थ है? दुःख से मुक्ति ? नहीं, मोक्ष का अर्थ है दुःख और सुख दोनों से ‘मुक्ति’ | निर्वाण का क्या अर्थ है? संसार का त्याग ? नहीं, संसार का पूरी तरह से जान लेना | ‘निर्वाण’ का अर्थ है, ‘अधूरेपन का त्याग’ |

‘आनंद’ किसी घटना का मोहताज नहीं होता | सुख सदा घटनाओं का मोहताज होता है | सुख के तुम मौके अवसर खोजोगे | तुम कहोगे कि आज मौका है, सुख मनाने का | ‘आनंद’ का कोई अवसर नहीं होता |

अगर तुम पूरे ही तरीके से दुखी हो जाओ, पूरे ही तरीके से, तो फिर तुम दुखी नहीं रह सकते | हम ‘पूर्ण दुःख’ जानते नहीं | हमारा दुःख हमेशा, ‘आशा-मिश्रित दुःख ‘ रहता है |

जब भोगनें में मन बहुत लगा हो, तो वो ठीक से ध्यान दे नहीं पाता की कौन भोग रहा है और क्या भोग रहा है ?

ईमानदार रहो, ईमानदारी काफी है |

जिसने अपनी दीनता को, अपनी हार को, इमानदारी से स्वीकार कर लिया, सिर्फ वही अपनी हार के पार जा पता है |

जो जिधर को जाना चाहता है, उसी दिशा का नाम वो सुख रख देता है वरना सुख कुछ नहीं है | तुम्हारे पास हसरतें हैं, उन्ही हसरतों कि कल्पना को तुम सुख का नाम देते हो |



पूर्ण लेख पढ़ें : मैं अपना दुःख स्वयं हूँ

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