सरल ही सही है

इस धरती पर अभी बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जिसे ज़रूरत है तुम्हारे गुस्से की | दिखाओ वहाँ जा कर के गुस्सा | बदल दो स्थितियों को | वो गुस्सा बड़ा शुभ होगा | कृष्ण ने भी गुस्सा किया है और राम ने भी किया है | तुम भी करो, तुम्हारा गुस्सा भी फिर दैवीय होगा |

शिव का तांडव कई कल्पों में एक बार होता है | वो आपको हर महीने कुपित नहीं दिखेगा | शायद जीवन में एक-आत दफ़े वो क्रोध करेगा और वो क्रोध ऐसा नहीं होगा कि पाँच मिनट को आग उठी और थम गयी | फिर उसका क्रोध उसकी नस-नस में बहेगा, जीवन बन जाएगा | वो जीयेगा अपने अपने क्रोध को | उसका पूरा जीवन क्रान्ति बन जाएगा | आग बन जाएगा कि मुझे कुछ पसंद नहीं है और उसको जला देना है | मेरा पूरा जीवन ही समर्पित है, गंदगी को जला देने के लिए | एक ही गुस्सा है, वही मेरा ईंधन है, वही मेरी अग्नि है |

जब जीवन में कुछ सच्चा नहीं तो क्रोध कहाँ से सच्चा होगा |

आप जब ध्यान में डूबे हो और बात को समझ रहे हो तो ऐसे कोई आकर के कैसे अपमान कर जाएगा आपका ?

जो भी कुछ दिमाग पर असर करता है उससे बचो ज़रा सा और कुछ नहीं करना है |

जिसकी संगत में छोटा अनुभव करो, सहम के, डर के, सतर्क होकर रहना पड़े उसकी सांगत क्यों करते हो | जिसके सामने सोच-सोच के बोलना पड़े उससे बातचीत ही क्यों करते हो ? जिसको नकली चेहरा दिखाना पड़े उसका चेहरा ही क्यों देखते हो ?

सरल सही है |

ध्यान बहुत बड़ी बात नहीं है; वो उपलब्ध हो जाता है | छोड़ना बड़ी बात है, वो साहस बड़ी बात है | वो सहास श्रद्धा से से आएगा | दिख तो जाता है, ध्यान दिखा देता है पर श्रद्धा की कमी की वजह से ध्यान जो दिखा देता है तुम उस पर अमल नहीं कर पाते |



पूर्ण लेख पढ़ें : अधकचरी ज़िन्दगी, अधकचरा क्रोध

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