एक ही काम दस बार करने से क्या नया परिणाम आ जाएगा?

ना उसके पाने में कुछ विशेष  था, ना रचित उसके छोड़ने में कुछ विशेष है ।

फिर तुम कहते हो कि जो मुझे मिला है उसमें इतनी ऐश है, कि वो दूसरों में भी बटें । काश किसी तरह दूसरे भी इस ऐश का अनुभव कर सकें ।

मैं उसी की बात करने बैठा हूँ तुम्हारे सामने, जहाँ पर मुझ में और तुम में कोई अंतर नहीं है । अगर वो बातें वास्तविक होतीं, जो मुझ में और तुम में अंतर पैदा करती हैं, तो मैं तुम्हारे सामने कैसे होता?

हम तुम साथ तो तभी बैठ सकते हैं ना जब हमारे बीच कुछ ऐसा हो जो साझा है । जो मुझमें भी वही है जो तुम में है । वही क़ीमती है, बिलकुल वही क़ीमती है । उसके अलावा कुछ भी नहीं है जो क़ीमती है ।

यहाँ तो जितनी दौड़ें हो सकती थीं, सारी दौड़ लीं । दौड़ भी लीं, जीत भी लीं, और उससे आगे बढ़ गए और आगे बढ़ कर के कहीं दूर नहीं पहुँचा हूँ, तुम्हारे पास पहुँचा हूँ ।

जो मेरे लिए हो पाया वो तेरे लिए भी है, तू क्यों डर रहा है? तू क्यों सीमित बैठा हुआ है? मैं उड़ सकता हूँ, तू भी उड़ सकता है । मूलतः हम एक हैं । कोई अंतर नहीं है । जो बात मैं समझ सकता हूँ, वो तुम भी समझ सकते हो ।

एक ही काम दस बार करने से क्या नया परिणाम आ जाएगा?

तुम सबको नयी ज़िंदगी तो चाहिए, पर ये देखने को तैयार नहीं हो कि हम कैसे हैं? बदलने को तैयार नहीं हो, जानने को तैयार नहीं हो । बदलने की बात छोड़ो, पहले जान तो लो कैसे हो? मन में क्या चलता रहता है? फिर बदलाव अपने आप आ जायेगा ।



पूर्ण लेख पढ़ें : आचार्य प्रशांत: आइ.आइ.टी, आइ.आइ.एम के बाद ये क्यों ?


 

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