समाज के साथ नहीं, स्वभाव के साथ चलो

हम जिसे ‘होश’ कहते हैं, वो हमारे लिए बहुत बड़ा बोझ है । वही दुश्मन है हमारा ।

और यही कारण है कि जब थक जाते हो तो पुनः सोने चले जाते हो । क्योंकि जिसे तुम ‘होश’ कहते हो वो तुम्हें थकाता है ।

अगर ‘होश’ इतनी सस्ती चीज़ है कि आँख खोलते ही सुबह मिल जाती है, तो उन ऋषियों का क्या हुआ जिन्होंने फिर अथक अनंत साधना करी, ‘होश’ पाने के लिए ।

‘होश’ का अर्थ होता है बोध, जागृति

हम इतने बेहोश हैं कि बेहोशी को ‘होश’ कह रहे हैं ।

आप बेहोशी माँगो !

लेकिन वो बेहोशी जो आपके ‘झूठे होश’ को तोड़े और ‘सच्चे होश’ की ओर ले जाए ।

‘सच्ची आज़ादी’ होती समाधि,

तुम जिस हालत में हो, जैसा तुम दिन बिताते हो, समाधि उस हालत को तोड़ती है । और तुम जिस हालत में हो, भाँग, धतूरा भी उस हालत को तोड़ते हैं । अंतर बस इतना है कि समाधि अटूट होती है, अनंत होती है, मिल गयी तो छिनेगी नहीं, दुखदायी नहीं होती; और नशा रातभर का होता है ।

होश माने, अपनी चेतना ही साधारण अवस्था ।

बुद्धों ने कहा, ना बाबा ना ! फुटबॉल का जनम लिया है क्या?

आदमी पैदा हुए हो, आदमी हैं यदि तो कुछ गरिमा होनी चाहिए जीवन में ! हमें नहीं पिटना ।

हर चीज़ तुम्हें आहत कर रही है ।

हाँ, इतना पिटे हो कि तुमने अब गौर करना छोड़ दिया है, तुमने अंकित करना छोड़ दिया है कि तुम कितना पिटे हो ।

समाज के साथ नहीं, स्वभाव के साथ चलो ।

तुमने कहा स्वभाव को और अच्छे से कैसे जान सकते हैं? ये सवाल ही स्वभाव का प्रदर्शन है ।

स्वभाव है “जानना” ।

सवाल इसलिए पूछ रहे हो ना कि जानना है? यही स्वभाव है ।

जो भी चीज़ तुम्हारे मन में घूम रही है, जो कुछ भी तुम्हारी चेतना का विषय है, वही ‘नशा’ है ।

वास्तविक ‘होश’ का अर्थ होता है, ‘मन का खाली हो जाना’ ।



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: झूठा होश


 

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