अहंकार को चाहिए शांति

शास्त्र बिलकुल ये नहीं चाहते हैं के वो तुमको परेशान करें । हाँ, इतना ज़रूर है कि उनका समय और था, उनकी भाषा और सन्दर्भ दूसरे थे ।

अब जब तुम उनको देखते हो तो, बातें थोड़ी जटिल लगती हैं ।

मन की हालत का बनना-बिगड़ना ही पुनर्जन्म है ।

जो ‘आई’(मैं) सेंस होती है ना, वो वो चीज़ होती है जो कहीं भी, किसी से भी जाकर जुड़ जाती है । और जिससे जुड़ जाती है, उससे अलग कुछ नहीं रहती ।

अहंकार को चाहिए शांति, और शांति का माध्यम वो बनाता है, शरीर को ।



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: पुनर्जन्म, ग्रन्थपाठन और तुरीय अवस्था


 

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