आध्यात्मिकता – ऊँची से ऊँची अक्लमंदी

मन वो, जिसमें अन्दर कुछ चलता रहता है ।

कुछ तो चाहिए मन को, और मन को कौन चाहिए, जो अच्छा हो, सुन्दर हो, आकर्षक हो, जिसके पास जा कर के उसे ‘सुकून’ मिलता हो ।

अभी तक मन कहीं ठहरा नहीं, या ठहरा है ?  ठहरने का मतलब होता है की वहीँ जाकर रुक गया, उसकी तलाश खत्म हो गयी, अब और कुछ नहीं चाहिए ।  कोई है तुममें ऐसा जिसकी तलाश खत्म हो गयी हो ?

हम भूखे ही मर जाते हैं ।

हमें भी ‘माँ’ की ही तलाश है । ‘माँ’ माने जननी, ‘माँ’ माने हमारा वास्तविक उद्गम बिंदु । जहाँ से हम उठे हैं, जो हम हैं ही ।

जिस किसी ने ये सोचा कि एक परम विषय के अलावा किसी और विषय से उसको शांति, तृप्ति मिल जाएगी, पेट भर जाएगा; वो भूखा ही मरा ।

आध्यात्मिकता कोई फूहड़ रूढ़ – रिवाज नहीं है । वो ऊँची से ऊँची अक्लमंदी है ।

चालीस के बाद वो उम्र आनी शुरू हो जाती है । एक व्यर्थ गई जिंदगी अब अपना एहसास कराने लगती है की जिंदगी बर्बाद गयी ।

जब उसका पेट भरा होगा, जब वोमाँ के पास होगा, फिर मन दोस्त हो जाता है । फिर तुम जो भी करते हो, वही बहुत मस्त रहता है । फिर तुम पढ़ोगे, मस्ती में पढ़ोगे और फिर जिंदगी ढर्रों पर नहीं चलेगी । फिर ऐसे जियोगे जैसे आकाश में पक्षी उड़े । खुला बिल्कुल, कोई दिशा ही नहीं है । जिधर को जाए, वही उसकी दिशा । मुक्त, ऐसे जिओगे ।

इधर – उधर से उम्मीद छोड़ो, नाता छोड़ो । जिधर गति है, जहाँ सार्थकता है, उधर को जाओ और सब मस्त ।

ना धर्म वो है जो तुम माने बैठे हो, ना आध्यात्मिकता वो है जो तुम माने बैठे हो, ना सत्य वो है जो तुम माने बैठे हो । ये पंडों पुरोहितों, रीति रिवाजों की बात नहीं है । ये बोध की, इंटेलिजेंस की बात है । ये कपोल कल्पनाएँ नहीं हैं । ये एक मात्र सत्य है ।



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: मन हमेशा बेचैन क्यों रहता है?


 

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