हम तीन हैं

अभी तुम ध्यान हो ।

एक तो तुम वो हो जो अभी होते हो । उसका नाम है विशुद्ध ध्यान, मौजूदगी, उपस्थिति और उसमें कोई और पहचान मायने नहीं रखती । उसमें तुम ये नहीं कहोगे कि अभी मैं स्त्री हूँ, अभी ये हूँ, अभी वो हूँ । अभी तुम यहाँ जितने बैठे हो, तुम सब विशुद्ध चैतन्य मूर्ति हो और ये सब मूर्तियाँ निराकार हैं । तो इनके चेहरे नहीं हैं । इनका कोई नाम आकार इत्यादि नहीं हैं ।

लेकिन ध्यान में जब तुम नहीं हो, जब ध्यान टूटा, तो फिर वही सारी पहचाने हावी हो जाती है, तुम वही हो जाते हो । ध्यान टूटेगा, तुम पुनः स्त्री हो जाओगे, तुम पुनः पुरुष हो जाओगे, बूढ़े हो जाओगे, बच्चे हो जाओगे, अमीर हो जाओगे, गरीब हो जाओगे । कोई हिन्दू हो जाएगा, कोई मुसलमान हो जाएगा ।

ध्यान में मुसलमान नहीं रहता या कह दो कि ध्यान में मुसलमान ‘सच्चा’ मुसलमान हो जाता है और हिन्दु ‘सच्चा’ हिन्दु हो जाता है ।

मैं तो कहता हूँ, ‘हम तीन हैं’ । एक सच्चा, एक झूठा, और एक वो जो सच्चे और झूठे में चुनाव करता है कि सच्चे के साथ होना है कि झूठे के साथ होना है ।

सच्चा भी आवाज़ देता है, और झूठा भी आवाज़ देता है । मेरी सारी शिक्षा इतनी ही है कि तुम सच्चे की सुनना ।

झूठे की आवाज़ घोटने की कोशिश मत करना । झूठा बोलता रहेगा । जिस दिन तक ये जिस्म है, उस दिन तक वो सारे संस्कार और प्रभाव और काल की धारा, बोलते ही रहेंगे, जिन्होंने तुम्हें ये जिस्म दिया । वो सब बोलेंगे । क्रोध भी आएगा, थकान भी होगी, इच्छाएँ भी उठेंगी, वासना भी उठेंगी, वो सब अपनी-अपनी बात करते रहेंगे । बस तुम उनकी बात पर ज़ोर मत देना । उनके पक्ष में मत खड़े हो जाना ।



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: अच्छा काम करने में डर की बाधा


 

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