सबको एक ही चीज़ चाहिए

तुम जो भी कुछ करते हो, तुम उसे नहीं करते, उसके माध्यम से कुछ और पाना चाहते हो।

तुम किसी के पास जाते हो तो तुम इस कारण नहीं जाते की उसके पास जाने मे कुछ है। तुम उसके पास इसलिए जाते हो ताकि पास जाकर तुम्हें  कुछ आगे का लाभ हो जाए।

अंततः मन को क्या चाहिए? किसी तरीके का सुख, प्लेज़र ठीक है ना, वो आखरी है। मन उससे ज्यादा कुछ माँगता नहीं है।

विचार उसी चीज के आते हैं जो तुम्हें आखिरकार चाहिए।

मन को लेकिन उम्मीद बाकी है अगर तुमने भेजा है मन को तो तुम उसे खींच भी सकते हो। मालिक तुम ही हो, तुम्हीं ने रवाना किया है तो तुम ही वापस बुला सकता हो। उसके लिए तुम्हें अपनी मान्यताएँ बदलनी होंगी। उसके लिए तुम्हें पहले ये सोचना छोड़ना होगा की दुनिया इसीलिए है ताकि इसे खूब भोगो। तुम्हारी जो लगातार (प्लेज़र)सुख की तलाश है तुम्हें थोड़ा इससे हटना पड़ेगा।

सब एक ही रेस दौड़ रहे हैं। सबको एक ही चीज़ चाहिए।

माँ बाप भी होंगे की बेटा कम्पीटशन की तैयारी कर ले, लाखो बरसेंगे और बेटा पूछ भी नहीं रहा ​कि ​माँ लाखो कैसे बरसेंगे, तुम मुझे किस दिशा भेज रही हो, माँ ही हो या दुश्मन हो?



पूरा लेख पढ़ें: आचार्य प्रशांत: गलत जगह ढूंढ रहे सुख को


 

2 टिप्पणियाँ

    • सादर नमन,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!
      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं।

      फाउंडेशन से जुड़े रहने के लिए अपना नम्बर साझा करें।

      धन्यवाद

      सप्रेम
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

      पसंद करें

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