आचार्य प्रशांत,संत कबीर पर: केंद्रित सुख में, केंद्रित दुःख में

आचार्य प्रशांत: कबीर का है,

सज्जन जन वही है, ढाल सरीखा होय।

दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होय।।

~ कबीर

ये इसमें, कहाँ है? ये कहाँ से आया है कि ‘सज्जन जन वही है जो दूसरों की मुसीबत के ख़ुद आने वाली चीज़ को ढाल की तरह आगे आकर रोक ले।’

श्रोता: ये वो दोहा दिया था उसमे हिंदी, ये, दोहे के नीचे अंग्रेज़ी का भी थोड़ा लिखा हुआ था।

आचार्य जी: नहीं, कहाँ पर? किसने दिया ये?

श्रोता: आचार्य जी, वो हमको लिंक्स भेजा था किसी ने।

आचार्य जी: चलिए, जिन्होंने भी दिया है ये, ये सिर्फ मानसिक प्रक्षेपण है। कबीर ये कहीं नहीं कह रहे है कि जो पड़ोसी की मदद करने आए, दुःख के समय में वही सज्जन जन है।

हम करते क्या हैं कि अपने सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ती  का साधन आध्यात्मिकता को बना लेते है।

पड़ोसी की मदद करो, ये एक नैतिक मूल्य है जिसमें ये भी नहीं समझा जाता कि मदद का अर्थ क्या है। लेकिन नैतिकता का तकाज़ा ये है कि मदद जैसी कोई चीज़ करनी चाहिए जब पड़ोसी पर आफ़त आए। स्पष्ट तो उसमें सिर्फ यही नहीं है कि मदद क्या है, उसमें तो आफ़त की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है। नैतिकता आपको सिखाती है पड़ोसी पे आफ़त आए तो उसकी मदद करो।

आफ़त क्या है, इसकी भी कोई व्याख्या नहीं और मदद क्या है और कैसे की जाती है, और कौन अधिकृत है मदद करने के लिए, इस पर भी कोई रौशनी नहीं, पर ये खूब पता है कि पड़ोसी की मदद करो। उसी बात को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ पर भी जोड़ दिया है कि सज्जन जन वही है जो, पड़ोसी की मदद करने आता है जब पड़ोसी को दुःख होता है, लेकिन जब सुख के दिन चल रहे होते हैं तो वो चुप-चाप अपने घर में बैठता है। कुछ नहीं है। बात बहोत सीधी है।

‘सुख’ नहीं आता है, जब मन को उसके संस्कारों के अनुरूप कोई भोग्य विषय मिल जाता है तो उस स्थिति का नाम ‘सुख’ दे दिया जाता है। समझिएगा बात को। मन को जब उसके संस्कारों के अनुरूप कोई विषय मिल गया तो उस स्थिति को नाम दिया जाता है, ‘सुख।’ आपको संस्कारित किया गया है कि काला रंग जब भी दिखे, बड़ी शुभ घटना घटी है, बड़े उत्सव की बात है। तो ज्यों ही आपको काला दिखेगा, वैसे ही आपके भीतर एक प्रतीति उठेगी, उसका नाम है, ‘सुख।’

यही कारण तो है कि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग विषयों में सुख मिलता है। सुख की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा तो है नहीं कि जो तेरा सुख, वही मेरा सुख। हाँ, वृत्तियों के तल पर जरूर ऐसा होता है कि सबके सुख करीब-करीब एक जैसे होते है। उधारण के लिए, प्यास अगर पाँच लोगों को लगी है तो पाँचो को जल से सुख मिलेगा। पर वो इसलिए क्योंकि प्यास मन की बड़ी गहरी वृत्ति है। अन्यथा कोई भी सुख, ऐसा नहीं है जो सार्वभौम हो। सार्वभौम तो छोड़िये, विपरीत भी होते हैं।

जिसमें तुम्हें सुख मिल रहा होगा, किसी और को उसमें बहोत दुःख मिलता है। और जिसमें तुम्हे आज सुख मिल रहा है, उसमें तुम्हे कल बहोत दुःख मिलता था। और तुम्हे पक्का नहीं है कि कल अब दुःख उसमें मिलेगा के नहीं मिलेगा। कल के प्रेमी आज के दुश्मन हो जाते है। जिसको कहते थे कि तेरा चेहरा देखे बिना कोई सुख नहीं। अब कहते हो कि तेरा चेहरा देख लू तो कोई सुख नहीं।

तो मन की जैसी स्थिति होती है, जैसे उसके संस्कार होते हैं, जैसे उस पर प्रभाव चढ़े होते हैं, उसके अनुरूप विषय दिख गया तो नाम देते हो ‘सुख,’ उसके अनुरूप विषय नहीं दिखा, या उससे प्रतिकूल विषय दिख गया तो नाम देते हो, ‘दुःख।’ बस बात इतनी सी है। हमने पूरी दुनिया को दो ही हिस्सों में तो बाट रखा है, अनुकूल-प्रतिकूल और इसी सहारे हम ज़िंदा है।

‘दुःख’ से हम बचना चाहते हैं। ‘सुख’ को हम भोगना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि दो अलग-अलग विपरीत काम हो रहे हैं। दोनों में से कोई काम विपरीत नहीं है। आप बस एक काम कर रहे हो, अपने को कायम रख रहे हो। समझिएगा, संस्कारों के अनुरूप विषय आया, उसे भोगने गए, ‘सुख।’ संस्कारों के प्रतिकूल विषय आया, उससे पीछे हट गए, ‘दुःख।’ उसको ये भी ना कहो कि संस्कारों के प्रतिकूल विषय आया तो पीछे हट गए। संस्कारों ने ही सिखाया कि किसको नाम दे ‘सुख’ और संस्कारों ने ही सिखाया कि किसको नाम दें ‘दुःख।’ सुख के समय तुम उत्तेजित हुए, आगे बढ़े, पाँऊ, भोगु। दुःख के समय तुम निराश हुए, संकुचित होक पीछे हटे। पर इन दोनों ही स्थितियों में तुमने काम बिलकुल वही किये जो तुम्हे तुम्हारे संस्कारों ने सिखाए।

तो दिखने में ऐसा लग रहा है कि दो विपरीत काम हो रहे है। पर काम एक ही हो रहा है, वो क्या काम है? कि खुद को कायम रखा जा रहा है, कि मैं चलूँगा तो अपने संस्कारों के अनुरूप हीं। हम सुख भी भोगते है और हम दुःख भी भोगते है क्योंकि संस्कारों का अर्थ ही है, भोगो

सुख हम भोगते हैं, भोग-भोग कर और दुःख हम भोगते हैं, भाग-भाग कर।

भोगते हम दोनों को है।

हम बड़े प्राचीन भोगता है। भोगने के अलावा हम कुछ करते नहीं। क्योंकि जो भोगने से ऊपर उठ गया वो तो साक्षी हो जाता है, वो हम जानते नहीं।

कबीर कह रहे है, अपनी वृत्तियों के प्रवाह में बहना छोड़ो।

ना ‘सुख’ को भोगने की अकांक्षा, ना ‘दुःख’ से भागने का आवेग

दुःख में आगे रहे, दुःख से भाग नहीं रहा। इसका अर्थ ये भी ना समझना कि बढ़-चढ़ के दुःख भोग रहे है। आदमी के मन की बेवकूफियों का पता नहीं। कबीर के बात का ये भी अर्थ निकाला जा सकता है कि जानबूझ के दुःख भोगेंगे। और बहोत लोग है जिन्हें दुःख भोगने में बड़ा, गर्व अनुभव होता है। वो अपनी जीवन भर की कमाई ही ये बताते है, ‘अरे! साहब! हमने क्या-क्या कष्ट उठाए है, आप क्या उठाओगे?’ ‘बेटा तुम्हें पता है हमने तुम्हारे लिए क्या-क्या तकलीफें सहीं है? और अब तुम हमें एक मकान बनवा के भी नहीं दे सकते?’

‘दुःख में आगे रहे,’ इसको समझेंगे, कैसे?

एक सैनिक है, वो पाँच और सैनिको को कमांड कर रहा है। वो अधिकारी है उनका, नायक है। वो उनसे कहता है बड़ा खतरनाक मिशन है। कौन-कौन जाने को तैयार है? वृत्तियों के अनुसार अगर चले सैनिक, तो सबके-सब पीछे और हो जाएँगे, ये तो छोड़ो कि कौन आने को तैयार है। तो पूछा गया कि एक खतरनाक मिशन है कौन आने को तैयार है? और संस्कार क्या है? खतरे से बचो। पाँच में से चार पीछे हो गए, जो एक बचा वो, वहीँ रहा जहाँ वो था। और देखा जाए तो बाकियों से आगे हो गया, कबीर यही कह रहे है, दुःख में आगे रहे। इसका ये अर्थ नहीं है कि दुःख में बढ़-चढ़ के हिस्सा ले, इसका अर्थ यही है, जहाँ हो वहीँ खड़े रहो जब दुःख आए, अपना आसन मत छोड़ देना।

अपनी जगह पर खड़े रहना ही आगे हो जाना है जब दुःख की बात होती है क्योंकि बाक़ी पूरी दुनिया, पीछे हो जाएगी। जब बाकी चार सैनिक डर कर के पीछे हो गए और तुम यथावत खड़े रहे, तो तुम, कहे जा सकते हो कि आगे हो गए। बस यही है दुःख में आगे रहे।

क्योंकि दुनिया दुःख से पीछे भागती है, तुम पीछे मत भागना।

तुम कायम रहना।

तुम अपने केंद्र पर विराजमान रहना, तुम पदच्युत मत हो जाना।

सुख में पाछे होए, अब इसी उदाहरण से ये भी समझ लेना कि सुख में पाछे होए का क्या अर्थ है। पाँच जने खड़े है कतार में, और सामने से कोई ऐसी वस्तु निकलती है, कोई ऐसा विषय, कोई ऐसा व्यक्ति जो बहोत ललचाता है, इन्द्रियों को बिलकुल आकर्षित ही कर लेता है, तुम्हारे मन में तमाम तरह की कामनाएँ उठा देता है। तो पाँच में से चार लोग क्या करेंगे? उसकी ओर कूद पड़ेंगे, कि भोग ले। सैनिको ने क्या किया था? कि भाग ले। पीछे हो गए थे। ये चार कूद पड़ेंगे की भोग ले। तुम आगे ना कूद पड़ना। तुम अपनी जगह खड़े रहना, जब तुम अपनी जगह खड़े रहोगे तो ऐसा लगेगा कि तुम पीछे हो गए, कबीर वही कह रहे है, सुख में पाछे होए।

‘पाछे होने’ का अर्थ ये नहीं है, कि तुम्हें सुख से कोई दुश्मनी कर लेनी है कि अरे! सुख आ रहा है और लोग ऐसे भी होते है जिन्हें सुख से दुश्मनी होती है, उन्हें भीतर बड़ी ग्लानी अनुभव होती है कि सुख कैसे अनुभव हो गया। वो जानबूझ कर के कड़वा खाना चाहते हैं। सुख, अरे! महा-पाप लगेगा। महा-पाप लगेगा। जैसे कि द्वैत के एक सिरे से उछल कर के दूसरे सिरे पर बैठ कर के, तुम द्वैत से मुक्त हो जाओगे। तो जब दुनिया सुख भोगने को आतुर हो, तुमसे नहीं कहा जा रहा है कि तुम भाग जाओ, तुम बस वहीं रहो जहाँ तुम हो। उत्तेजित मत हो जाना, उछल मत पड़ना। तुम अपने केंद्र पर रहो।

ये जो पूरा दोहा है, ये बस वही है जिसे कृष्ण ने ‘स्थित्प्रग्य’ कहा है। वो स्थित रहता है, वो हिलता नहीं है। इसका अनर्थ मत कर लीजिए। इसका जो अर्थ आप लिखकर के आए है, कबीर उसको सुनते तो रो पड़ते।

सज्जन जन वही है, ढाल सरीखा होए।

दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होए।।

उसे ना सुख से मतलब है ना दुःख से मतलब है, ना उसे आगे होने से मतलब है, ना उसे पीछे होने से मतलब है। आगे-पीछे तो तुलनात्मक स्थितियाँ है, रिलेटिव, किससे आगे? किससे पीछे? मैं ही मैं हूँ, तो क्या कह पाओगे कि आगे हूँ या की पीछे हूँ? कोई दूसरा तो चाहिए ना, ये कहने के लिए कि आगे या पीछे? तो बस समझ लो कि दुसरो की ही तुलना में आगे और पीछे कहा है कबीर ने। दूसरे जब पीछे भागे, तुम पीछे ना भागना, तुम आगे हो गए। दूसरे जब आगे भागे तुम आगे ना भागना, तुम पीछे हो गए। बस यही कह रहे है।

तुलनात्मक तरीके से देखो तो आगे-पीछे, और यदि सीधे-सीधे सहज तरीके से देखो तो कोई गति नहीं है, हम वही है जहाँ थे। हम हिले कब? दुनिया हमारे चारो ओर आगे-पीछे, दाये-बाये, ऊपर-नीचे डोल रही है, हम हिले कब? सूने मंदिर दिया जला के…

श्रोता: आसन से मत डोल रे…

आचार्य जी: आसन से मत डोल रे…वही बात कही जा रही है। आसन से मत डोलना, सुख आए, दुःख आए, आसन से मत डोलना।

ना सुख का आलिंगन ना दुःख का प्रतिकार।

ना दुःख का आलिंगन, ना सुख का प्रतिकार। उलटा भी मत समझ लेना। हमारी बुद्धि किसी एक छोर पे जाके बैठ जाना चाहती है, जब कहा जाए कि सुख का आलिंगन ना करना तो जो मोटी बुद्धि का आदमी होता है वो समझता है कि कहा जा रहा है कि दुःख का आलिंगन कर लो। अरे! इतना ही कहा था कि सुख से मत चिपको, और तुमने क्या समझ लिया? दुःख से चिपको।

‘यदि सुख से ना चिपकने का अर्थ ये है कि दुःख से चिपक जाओ, तो ठीक है, बात इतनी स्थूल है कि आ गई पकड़ में।’ गुरू जी ने बताया कि सुख छोड़ो दुःख की तरफ जाओ, हाँ ठीक, बहोत बढ़िया। लेकिन अगर ये कहा गया, ना सुख ना दुःख, अब बड़ा झंझट है, ‘ये कौनसी अवस्था होती है? ना सुख ना दुःख। ये तो हम जानते ही नहीं, ना सुख ना दुःख। और हमें गोल-गोल घुमाने के लिए ये और बोल दिया कि जैसा सुख वैसा दुःख’, लो अब फँसो। ये क्या हो गया?

‘कभी कहते है ना सुख ना दुःख और कभी कह देते है, जैसा सुख वैसा दुःख। ये तो हम जानते नहीं। ये क्या है, जैसा सुख वैसा दुःख’। कोई राज़ होता है, कोई बात होती है, कोई नज़र होती है जिसने पकड़ लिया होता है कि सुख-दुःख में एक समझौता है, कि सुख-दुःख एक ही है। कभी ये चेहरा दिखा देते है कभी वो चेहरा दिखा देते है। अगर अलग-अलग होते तो हम चुन लेते, हम कहते एक दूसरे से श्र्यस्कर है। अलग-अलग है नहीं। एक नज़र होती है ऐसी जो ये पकड़ लेती है कि ये अलग-अलग नहीं है। एक हैं।

और जब पकड़ लेते हो कि अलग-अलग नहीं है, एक ही हैं, मन की एक तरंग है जिसको एक नाम दिया है, मन की एक तरंग है जिसको दूसरा नाम दिया है, है मन की ही तरंगे, उससे बाहर कुछ नहीं है। मेरे अनिवार्य स्वभाव से इनका कोई लेना-देना नहीं है। तब तुम इन दोनों के प्रति समभाव रखते हो। वहाँ कोई निषेध नहीं है। वहाँ कुछ विशेष भी नहीं है। वहाँ तुम ये नहीं कहते कि जीवन में कुछ प्राप्त हो गया तो में बड़ा उत्तेजित हो जाऊँगा, वाह! क्या मिल गया। तुम ये भी नहीं कहते कि जो मिल गया है तो बड़ा पाप हो गया है। मिल गया है तो मिल गया है।

तुम्हें बहोत अच्छा खाने को मिल गया, तुम खाना ठुकरा नहीं देते। और तुम ये भी नहीं कहते कि आज जैसा दिन पहले कभी आया नहीं था, अच्छा है, बहोत बढ़िया। कुछ मिल गया तो बहोत उत्तेजित नहीं हो जाएँगे और अगर नहीं मिला तो बहोत दुखी भी नहीं हो जाएँगे। जो मिलेगा, जो छिनेगा, संसार से ही मिलेगा-छिनेगा। संसार हमारे लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है कि हम उसको इतनी तवज्जो दे। उससे कुछ मिला तो उछल पड़े। और कुछ नहीं मिला तो रो पड़े। ये सवाल उठता हम सब के सामने है पर हम इसको बड़ा अधूरा देख लेते है। क्योंकि दुःख सताता है। जब दुःख सताता है तो हम दुःख से मुक्ति चाहते है,

पर हम जब दुःख से मुक्ति चाहते है, हम सुख से आसक्ति कायम रखते है।

ये हो नहीं पाएगा।

ख़ास तौर पे जो जवान लोग होते हैं, युवा वर्ग, उनको ये बात बड़ी खलती है कि किसी ने हम पे टिप्पणी कर दी, किसी ने हमें ऐसा बोल दिया, हमें बुरा लग गया। तो वो आई एक कि ‘मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि कोई मेरे ऊपर कोई कमेंट कर दे तो मैं बुरा मान जाती हूँ?’ मैंने कहा इसको छोड़ो, ये बताओ कि जब कोई तारीफ़ कर देता है तो कैसा लगता है? ‘ये तो फिर ठीक ही है, पर मैं उसकी बात नहीं कर रही हूँ। तारीफ़ का मुद्दा नहीं है, तारीफ़ तो बढ़िया चीज़ है। मुझे अभी ये बताइये कि जब कोई मेरे ऊपर कोई प्रतिकूल टिप्पणी कर देता है, मुझे बुरा बोल देता है, तो मेरा मन छोटा क्यों हो जाता है?’ मैंने कहा, ‘ना-ना तुम वो बताओ पहले, जब कोई तारीफ़ करता है तो कैसा लगता है?’ बोली ‘पूछने की क्या बात, सबको अच्छा लगता है, हमें भी अच्छा लगता है।’ ‘यही तो जवाब है ना।’

जब तक सुख में ‘सुख’ मिलेगा, तब तक, दुःख में ‘दुःख’ भी मिलेगा। तुम तब तो सोए रहते हो जब सुख मिल रहा होता है। ‘प्रसंशा’ मिली, तो मीठा-मीठा, बढ़िया है। ‘निंदा’ मिली, गलत हो गया। छोटे बच्चे खेलते हैं, मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू। मीठा-मीठा गप। उनके लिए चल जाएगा, मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू। बड़े बच्चो के लिए नहीं चलेगा। जिन्हें सुख चाहिए हो, उनको सुख के साथ, पुछल्ले की तरह, क्या मिलता है?

श्रोता: दुःख

आचार्य जी: और तुम्हारी मजबूरी ये है कि तुम्हे अगर दुःख चाहिए हो तो तुम्हे साथ में सुख भी मिल जाता है। बड़ी लाचारगी की हालत है। हम तो दुखी भी नहीं हो सकते पूरी तरह से। कई लोग होते है, पेशेवर दुखी आत्माएँ। उनकी ज़िन्दगी का उद्देश्य ही होता है दुखी रहना, वो दुखी रहने में बड़ा सुख पाते है। वो कहते है ‘आज, आज पता है कल से भी ज़्यादा दुखी हुआ। आज के रिफ्लेक्शन(अवलोकन) में और ज़ोर से लिखूंगा, ‘मुझसे ज़्यादा घटिया और कमीना आदमी कोई नहीं है, मैं बहोत दुखी था’ और फिर धीरे से देखूँगा किसी ने वो बनाया के नहीं बनाया, अंगूठा। हमसे बड़ा दुखी कोई है?’

हमने अपने मन को देखने के लिए, ये व्यवस्था बनाई कि आप रोज़ ज़रा अपने ऊपर दृष्टिपात करें, और फिर उसको खोल के लिखे, इससे मन का शोधन होता है। पर ज़रा आप गौर से देखेंगे कि वहाँ अक्सर क्या चल रहा है, तो यही चल रहा है। ‘हमसे बड़ा दुखी कोई है?’ एक आके कह रहा है ‘मैं बड़ा नालायक हूँ’ बोल रहा है, ‘तू, बड़ा नालायक? हम बताते है नालायकी क्या होती है’। नालायकी में श्रेष्ठता ढूंड ली गई है, द्वैत के एक सिरे के साथ दूसरा आता ही आता है। नालायकी में क्या ढूंड ली गई? ‘लायकी।’ ‘मैं कितना लायक हूँ कि मैं अपनी नालायकी, ज़ाहिर कर सकता हूँ’। ये तो आपके लायक होने का प्रमाण है कि आपने अपनी नालायकी को प्रकट कर दिया। लोग छुपाते हैं, ‘देखो हमने खोल दिया’।

तो कुछ लोगों को ये सूत्र पता चल गया कि दुःख के पीछे-पीछे सुख आता है, तो उन्होंने व्यवस्थाएँ ही कायम कर दी कि दुखी रहो। आप समाज को देखें, आप घरो को देखें, आप कई वृद्ध जनों को देखें, आपके मन में आदर उमड़-उमड़ पड़ेगा, वो इतने दुखी है। वो दुखी है क्योंकि उन्होंने एक बात पकड़ ली है कि दुःख में बड़ा सुख है। आप प्रयोग कर लीजिए। सीधे-सीधे तो आप सुख के पीछे खूब भाग ही लिए, और पकड़ में आता नहीं है। अब ज़रा उलटा-उलटा भागिए। अब आप ज़रा दुःख के पीछे भागिए, देखिए सुख साथ में चला आएगा।

मैंने कहा था ना हम बड़े मजबूर है। जो चाहते है उसी का उलटा मिल जाता है। सुख के पीछे भागते है तो दुःख मिलता था। अब दौड़ उलटी करी है तो दुःख की जगह सुख मिलने लगेगा। पर ज्यों ही आपको पता चलेगा कि आपको सुख मिल रहा है, वो सुख? दुःख में बदल जाएगा। क्योंकि सुख के साथ दुःख लगा हुआ है। बड़ी मजबूरी है।

मन को शान्त ही तो होना है ना? मन को यही तो अनुभव करना है ना कि बड़ी प्राप्ति हो गई। तभी तो सुख चाहिए, तभी दुःख से बचना है। सुख में क्या लगता है? कुछ मिल गया, दुःख से क्यों बचना चाहते हो? कुछ छिन ना जाए। और अगर प्राप्ति से भी, बड़ी प्राप्ति, बड़ी से बड़ी, बड़ी से बड़ी प्राप्ति सहज ही हो गई हो, तो कौन छोटी-मोटी प्राप्तियों के पीछे भागेगा? सारे सुख का एक उद्देश्य है, ‘कुछ कमी है, उसे पा लूँ’। कुछ छूटा हुआ है उसे हासिल कर लूँ। और जो बड़े से बड़ा हासिल है, वो मिल ही जाए तो कौन सुख को तवज्जो देगा।

उस दिन पूछ रहा था ना मैं कि अगर कोई करोड़पति है उसको दस रुपये मिल जाए तो वो नाचने लगेगा क्या? और अगर कोई करोड़पति है, उसके दस रूपये छिन जाए तो वो रोने लगेगा क्या? जो केंद्र पर बैठा होता है ना, उसके लिए सुख-दुःख दस-दस रूपये वाली चीज़े हैं। कहता है ‘हम करोड़ों पर बैठे है, दस रूपये मिल भी गए, तो कौनसी बड़ी बात हो गई और दस रूपये छिन भी गए तो हम शोक थोड़ी मनाने लगेंगे।’

पर जिसको नहीं मिले होते करोड़ों, उसके लिए दस रूपए भी बड़ी बात है, किसी भिखारी को देखो, उसके तुम छिन के दिखाओ दस रूपये। वैसी हालत हमारी है, कोई हमारा दस रुपया छीनता है, हमारे छोटे-छोटे सुख, तो हम कैसे तैश में आ जाते है। कोशिश करना, किसी भिखारी के दस रूपये छीनों, फिर देखो। अपनी याद आ जाएगी। और किसी भिखारी को दस रूपये दो, और फिर देखो उसको, फिर से अपनी याद आ जाएगी।

ना आगे, ना पीछे। आगे और पीछे, दोनों का अर्थ है ‘ग्रह-त्याग।’ दोनों का अर्थ है, घर से निकाल दिए गए। अप्रवासी हो गए — केंद्र में, बिलकुल केंद्र में।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत,संत कबीर पर:केंद्रित सुख में, केंद्रित दुःख में


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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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